📄 শাইখ মুহাম্মাদ ইবন সালেহ আল-উসাইমীন (১৪২১ হিজরী)
আমাদের শাইখ মুহাম্মাদ ইবন সালেহ আল-উসাইমীন রাহিমাহুল্লাহ সারা জীবন যত আকীদাহ'র বইয়ের ব্যাখ্যা করেছেন সবগুলোতেই আল্লাহ তা'আলার 'আরশের উপর উঠার বিষয়টির আলোচনা এনেছেন, তাঁর যেসব গ্রন্থে এসব আলোচনা এসেছে, তন্মধ্যে উল্লেখযোগ্য হচ্ছে, ১) শারহুল আকীদাতিস সাফারীনীয়্যাহ। ২) শারহু উসূলিল ঈমান ৩) শারহু লুম'আতিল ই'তিক্বাদ ৪) তালখীসু আকীদাতিল হামাওয়িয়্যাহ
আমরা এখানে একটি গ্রন্থের আলোচনা পেশ করব যেখানে তিনি এ বিষয়টিকে খুব সুন্দর ও সহজ করে তুলে ধরেছেন। তিনি শারহুল আকীদাতিল ওয়াসিত্বিয়্যাহ গ্রন্থে বলেন, وقوله : {ثُمَّ اسْتَوَى عَلَى الْعَرْشِ : ثَمَّ : للترتيب. و الْعَرْشِ : هو ذلك السقف المحيط بالمخلوقات، ولا نعلم مادة هذا العرش، لأنه لم يرد عن النبي صلى الله عليه وسلم حديث صحيح يبين من أين خلق هذا العرش، لكننا نعلم أنه أكبر المخلوقات التي نعرفها. وأصل العرش في اللغة: السرير الذي يختص به الملك، ومعلوم أن السرير الذي يختص به الملك سيكون سريراً عظيماً فخماً لا نظير له.
وفي هذه الآية من صفات الله تعالى عدة صفات، لكن المؤلف ساقها لإثبات صفة واحدة، وهي الاستواء على العرش.
وأهل السنة والجماعة يؤمنون بأن الله تعالى مستوى على عرشه استواء يليق بجلاله ولا يماثل استواء المخلوقين.
فإن سألت: ما معنى الاستواء عندهم؟ فمعناه العلو والاستقرار.
وقد ورد عن السلف في تفسيره أربعة معاني الأول: علا، والثاني : ارتفع، والثالث: صعد. والرابع: استقر. لكن (علا) و (ارتفع) و (صعد) معناها واحد، وأما (استقر)، فهو يختلف عنها.
ودليلهم في ذلك: أنها في جميع مواردها في اللغة العربية لم تأت إلا لهذا المعنى إذا كانت متعدية بـ (على): قال الله تعالى: ﴿فَإِذَا اسْتَوَيْتَ أَنْتَ وَمَنْ مَعَكَ عَلَى الْفُلْكِ﴾ [المؤمنون: ۲۸] . وقال تعالى: ﴿وَجَعَلَ لَكُمْ مِنَ الْفُلْكِ وَالأَنْعَامِ مَا تَرْكَبُونَ لِتَسْتَوُوا عَلَى ظُهُورِهِ ثُمَّ تَذْكُرُوا نِعْمَةَ رَبِّكُمْ إِذَا اسْتَوَيْتُمْ عَلَيْهِ﴾ [الزخرف: ١٢ - ١٣].
وفسره أهل التعطيل بأن المراد به الاستيلاء، وقالوا: معنى : أَثُمَّ اسْتَوَى عَلَى الْعَرْشِ) [الأعراف: ٥٤]، يعني: ثم استولى عليه.
واستدلوا لتحريفهم هذا بدليل موجب وبدليل سالب - أما الدليل الموجب، فقالوا : إننا نستدل بقول الشاعر : قد استوى بشر على العراق ... من غير سيف أو دم مهراق (بشر) ابن مروان (استوى) يعني: استولى على العراق.
قالوا: وهذا بيت بن رجل عربي، ولا يمكن أن يكون المراد به استوى على العراق، يعني علا على العراق! لا سيما أنه في ذلك الوقت لا طائرات يمكن أن يعلو على العراق بها.
أما الدليل السلبي، فقالوا لو أثبتنا أن الله عز وجل مستو على عرشه بالمعنى الذي تقولون، وهو العلو والاستقرار، لزم من ذلك أن يكون محتاجاً إلى العرش، وهذا مستحيل، واستحالة اللازم تدل على إستحالة الملزوم. ولزم من ذلك أن يكون جسماً، لأن استواء شيء على شيء بمعنى علوه عليه يعني أنه . جسم ولزم أن يكون محدوداً، لأن المستوي على الشيء يكون محدودا، وإذا استويت على البعير، فأنت محدود في منطقة معينة محصور بها وعلى محدود أيضاً.
هذه الأشياء الثلاثة التي زعموا أنها تلزم من إثبات أن الاستواء بمعنى العلو والارتفاع. والرد عليهم من وجوه
أولاً: تفسيركم هذا مخالف لتفسير السلف الذي أجمعوا عليه، والدليل على إجماعهم أنه لم ينقل عنهم أنهم قالوا به وخالفوا الظاهر، ولو كانوا يرون خلاف ظاهره، لنقل إلينا، فما منهم أحد قال: إن استوى) بمعنى (استولى) أبداً.
ثانياً: أنه مخالف لظاهر اللفظ، لأن مادة الاستواء إذا تعدت بـ (على)، فهي بمعنى العلو والاستقرار، هذا ظاهر اللفظ، وهذه مواردها في القرآن وفي كلام العرب.
ثالثاً: أنه يلزم عليه لوازم باطلة: ۱ - يلزم أن يكون الله عز وجل حين خلق السماوات والأرض ليس مستولياً على عرشه، لأن الله يقول: خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٍ ثُمَّ اسْتَوَى عَلَى الْعَرْشِ ﴾ [الأعراف: ٥٤]، و ثُمَّ) تفيد الترتيب، فيلزم أن يكون
العرش قبل تمام خلق السماوات والأرض لغير الله. ১- أن الغالب من كلمة (استولى) أنها لا تكون إلا بعد مغالبة! ولا أحد يغالب الله. ২ - من اللوازم الباطلة أنه يصح أن نقول: إن الله استوى على الأرض والشجر والجبال، لأنه مسئول عليها. وهذه لوازم باطلة، وبطلان اللازم يدل على بطلان الملزوم. وأما استدلالهم بالبيت، فنقول: ১ - أثبتوا لنا سند هذا البيت وثقة رجاله، ولن يجدوا إلى ذلك سبيلاً. ২ - من هذا القائل ؟ أفلا يمكن أن يكون قاله بعد تغير اللسان ؟ لأنه كل قول يستدل به على اللغة العربية بعد تغير اللغة العربية فإنه ليس بدليل، لأن العربية بدأت تتغير حين اتسعت الفتوح ودخل العجم مع العرب فاختلف اللسان، وهذا فيه احتمال أنه بعد تغير اللسان. ۳ - أن تفسيركم «استوى بشر على العراق» بـ (استولى) تفسير تعضده القرينة، لأنه من المعتذر أن بشراً يسعد فوق العراق فيستوى عليه كما يستوي على السرير أو على ظهر الدابة فلهذا نلجأ إلى تفسيره بـ (استولى). هذا نقوله من باب التنزل، وإلا، فعندنا في هذا جواب آخر : أن نقول: الاستواء في البيت بمعنى العلو، لأن العلو نوعان: ১ - علو حسي، كاستوائنا على السرير. ২ - وعلو معنوي، بمعنى السيطرة والغلبة. فيكون معنى استوى بشر على العراق يعني : علا علو غلبة وقهر. وأما قولكم: إنه يلزم من تفسير الاستواء بالعلو أن يكون الله جسماً. فجوابه : كل شيء يلزم من كتاب الله وسنة رسوله صلى الله عليه وسلم، فهو حق، ويجب علينا أن نلتزم به، ولكن الشأن كل الشأن أن يكون هذا من لازم كلام الله ورسوله، لأنه قد يمنع أن يكون لازماً، فإذا ثبت أنه لازم، فليكن، ولا حرج علينا إذا قلنا به.
ثم نقول: ماذا تعنون بالجسم الممتنع ؟ إن أردتم به أنه ليس الله ذات تتصف بالصفات اللازمة لها اللائقة بها ، فقولكم باطل، لأن الله ذاتاً حقيقية متصفة بالصفات، وأن له وجهاً ويداً وعيناً وقدماً، وقولوا ما شئتم من اللوازم التي هي لازم حق. وأن أردتم بالجسم الذي قلتم يمتنع أن يكون الله جسم : الجسم المركب من العظام واللحم والدم وما أشبه ذلك، فهذا ممتنع على الله، وليس بلازم من القول بأن استواء الله على العرش علوه عليه.
وأما قولهم: إنه يلزم أن يكون محدوداً. فجوابه أن نقول بالتفصيل: ماذا تعنون بالحد ؟ إن أردتم أن يكون محدوداً، أي: يكون مبايناً للخلق منفصلاً عنهم، كما تكون أرض لزيد وأرض لعمر، فهذه محدودة منفصلة عن هذه، فهذا حق ليس فيه شيء من النقص.
وإن أردتم بكونه محدوداً: أن العرش محيط به، فهذا باطل، وليس بلازم، فإن الله تعالى مستوى على العرش، وإن كان عز وجل أكبر من العرش ومن غير العرش، ولا يلزم أن يكون العرش محيطاً به بل لا يمكن أن يكون محيطاً به، لأن الله سبحانه وتعالى أعظم من كل شيء وأكبر من كل شيء والأرض جميعاً قبضته يوم القيامة، والسماوات مطويات بیمینه.
وأما قولهم: يلزم أن يكون محتاجاً إلى العرش. فنقول: لا يلزم، لأن معنى كونه مستوياً على العرش أنه فوق العرش، لكنه علو خالص، وليس معناه أن العرش يقله أبداً، فالعرش لا يقله، والسماء لا تقله، وهذا اللازم الذي ادعيتموه ممتنع، لأنه نقص بالنسبة إلى الله عز وجل، وليس بلازم من الاستواء الحقيقي، لأننا لسنا نقول: إن معنى اسْتَوَى عَلَى الْعَرْشِ)، يعني: أن العرش يقله ويحمله، فالعرش محمول: ﴿ وَيَحْمِلُ عَرْشَ رَبِّكَ فَوْقَهُمْ يَوْمَئِذٍ ثَمَانِيَةٌ ﴾ [الحاقة: ١٧]، وتحمله الملائكة الآن، لكنه ليس حاملاً لله عز وجل، لأن الله سبحانه وتعالى ليس محتاجاً إليه، ولا مفتقراً إليه، وبهذا تبطل حججهم السلبية. وخلاصة ردنا لكلامهم من عدة أوجه: الأول: أن قولهم هذا مخالف لظاهر النص. ثانياً: مخالف لإجماع الصحابة وإجماع السلف قاطبة. ثالثاً: أنه لم يرد في اللغة العربية أن (استوى) بمعنى (استولى)، والبيت الذي احتجوا به على ذلك لا يتم به الاستدلال. رابعاً: أنه يلزم عليه لوازم باطلة:
۱ - أن يكون العرش قبل خلق السماوات والأرض، ملكاً لغير الله. ٢ - أن كلمة (استولى) تعطي في الغالب أن هناك مغالبة بين الله وبين غيره، فاستولى عليه وغلبه. ٣ - أنه يصح أن نقول - على زعمكم: أن الله استوى على الأرض والشجر والجبال والإنسان والبعير، لأنه (استولى) على هذه الأشياء، فإذا صح أن نطلق كلمة (استولى) على شيء، صح أن نطلق كلمة (استولى) على شيء، صح أن نطلق (استوى) على ذلك الشيء، لأنهما مترادفان على زعمكم. فبهذه الأوجه يتبين أن تفسيرهم باطل.
"আর আল্লাহর বাণী, "সুম্মা ইস্তাওয়া 'আলাল 'আরশ” (তারপর তিনি 'আরশের উপর উঠলেন) এখানে 'সুম্মা' শব্দটি ধারাবাহিকতা বুঝানোর জন্য ব্যবহৃত হয়েছে।
আর 'আরশ' অর্থ সে ছাদ, যা সকল সৃষ্টিকে পরিবেষ্টন করে আছে, আমরা 'আরশের মূল উপাদান জানি না; কারণ নবী সাল্লাল্লাহু 'আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে এমন কোনো সহীহ হাদীস আসেনি যাতে 'আরশ কিসের তৈরি তা বর্ণনা করেছে, তবে আমরা অবশ্যই জানি যে, যত সৃষ্টি আমরা জানি তন্মধ্যে 'আরশ হচ্ছে সর্ববৃহৎ সৃষ্টি।
আর 'আরশ' শব্দটির আভিধানিক অর্থ হচ্ছে, এমন খাট যা বাদশাহ'র জন্য বিশেষভাবে নির্দিষ্ট। আর জানা কথা যে, বাদশাহ'র জন্য যে খাটটি নির্ধারিত, সেটি হবে অনেক বৃহৎ বিশাল, নজীরবিহীন।
এ আয়াতে আল্লাহর গুণাবলির মধ্যে অনেকগুলো গুণের বর্ণনা এসেছে, কিন্তু গ্রন্থকার (ইবন
তাইমিয়্যাহ) শুধু একটি গুণ সাব্যস্ত করার জন্য তা নিয়ে এসেছেন। আর তা হচ্ছে, 'আরশের উপর উঠার গুণ সাব্যস্ত করা।
আহলুস সুন্নাত ওয়াল জামা'আহ ঈমান আনে যে, আল্লাহ তা'আলা 'আরশের উপরে সমুন্নত, তিনি 'আরশের উপরে এমনভাবে উঠেছেন যেভাবে উঠা তাঁর মর্যাদার সাথে সঙ্গতিপূর্ণ, তাঁর সে উঠা সৃষ্টিকুলের উঠার মতো নয়।
যদি প্রশ্ন কর যে, আহলুস সুন্নাত ওয়াল জামা'আতের নিকট 'ইস্তিওয়া' এর অর্থ কী? উত্তর হবে, তাদের নিকট এর অর্থ, উপরে উঠা এবং উপরে অবস্থান করা।
সালফে সালেহীন থেকে 'ইস্তিওয়া' এর অর্থ বুঝাতে চারটি শব্দ এসেছে, এক, 'আলা' (علا) বা উপরে উঠা, দুই. 'ইরতাফা'আ' (ارتفع) বা উপরে উঠা, তিন, 'স্বা'আদা' (صعد) বা উপরে আরোহন করা, চার, 'ইস্তাকাররা' (استقر) বা উপরে অবস্থান করা।
তন্মধ্যে 'আলা', 'ইরতাফা'আ' ও স্বা'আদা এর অর্থ একই। শুধু শব্দগত পার্থক্য। কিন্তু 'ইস্তাকাররা' এ শব্দটি উপরোক্ত শব্দসমূহ থেকে অর্থের দিক থেকে একটু ভিন্নতর।
সালাফে সালেহীন তাদের বক্তব্যের সপক্ষে দলীল দিয়েছেন যে, আরবী ভাষার সকল অভিধানে এ অর্থেই এসেছে, যখন সেটার 'আলা' (alā) অব্যয় যুক্ত হয়ে ব্যবহৃত হয়। যেমন,
আল্লাহর বাণী, "অতঃপর যখন আপনি ও আপনার সঙ্গীরা নৌযানের উপরে স্থির হবে।" [সূরা আল-মুমিনূন, আয়াত: ২৮]
যেমন অপর বাণী, "যিনি তোমাদের জন্য সৃষ্টি করেছেন এমন নৌযান ও গৃহপালিত জন্তু যাতে তোমরা আরোহণ কর, যাতে তোমরা এর পিঠে স্থির হয়ে বসতে পার, তারপর তোমাদের রবের অনুগ্রহ স্মরণ করবে যখন তোমরা এর উপর স্থির হয়ে বসবে।” [সূরা আয-যুখরুফ, আয়াত: ১২-১৩]
এর বিপরীতে আমরা দেখি, তা'ত্বীল (বা এগুলোকে) আল্লাহর গুণাবলি সাব্যস্ত করতে অস্বীকারকারীরা 'ইস্তিওয়া' শব্দের অর্থ করেছেন 'ইস্তীলা' বা অধিকার করা। অধীনস্থ করা। তারা বলে, এখানে "সুম্মা ইস্তাওয়া আলাল 'আরশ” [সূরা আল-আ'রাফ, আয়াত: ৫৪] এর অর্থ হচ্ছে, তারপর তিনি 'আরশ অধিকার করলেন।
আর তারা সে বিকৃতি সাধনের জন্য পজেটিভ দলীল ও নেগেটিভ দলীল নিয়ে এসেছে।
তন্মধ্যে পজেটিভ বা ইতিবাচক দলীল হচ্ছে, তারা বলে, আমরা কবির কবিতা দিয়ে দলীল পেশ করছি, কবি বলেন, قد استوى بشر على العراق ... من غير سيف أو دم مهراق
অর্থাৎ, বিশর (ইবন মারওয়ান) ইস্তাওয়া (অধিকার করে নিয়েছে) ইরাককে।
তারা বলে, এটি তো এক আরবী লোকের কবিতা। সেখানে ইরাকের উপর উঠেছেন বলা সম্ভব নয়, কারণ, তখন তো আর কোনো বিমান ও এ জাতীয় জিনিস ছিল না যে, আমরা বলবো তিনি এগুলো দিয়ে ইরাকের আকাশে উঠেছেন।
আর তাদের নেগেটিভ বা নেতিবাচক দলীল হচ্ছে এটা বলা যে, আমরা যদি মহান আল্লাহর জন্য 'আরশের উপর উঠা সাব্যস্ত করি, যেমনটি তোমরা বলে থাক, আর যা উপরে উঠা ও উপরে
অবস্থান করা বুঝায়,
তাহলে তো এর দ্বারা আবশ্যক হয়ে যায় যে আল্লাহ তা'আলা 'আরশের মুখাপেক্ষী, যা অসম্ভব; আর আবশ্যক হওয়া জিনিস অসম্ভব হওয়ায় যা অসম্ভবকে আবশ্যক করে তোলে তাও অসম্ভব হওয়া প্রমাণিত হচ্ছে।
তাছাড়া আরেকটি জিনিসও বাধ্যতামূলকভাবে এসে যায়, তা হচ্ছে আল্লাহর জন্য দেহ সাব্যস্ত করা। কারণ কোনো কিছুর উপর কোনো কিছু উঠা অর্থই তার উপরে থাকা, তার অর্থ হচ্ছে সেটা দেহ।
অনুরূপ আরেকটি বিষয়ও এসে যায়, তা হচ্ছে আল্লাহকে সীমাবদ্ধ করা; কারণ কোনো কিছুর উপরে কোনো কিছু উঠার অর্থই হচ্ছে সেটাকে সীমাবদ্ধ বলা। কেননা, তুমি যখন কোনো উটের উপর উঠবে তার অর্থ দাঁড়ায় তুমি উটের উপরের যে নির্ধারিত জায়গা বা অংশ রয়েছে তাতে সীমাবদ্ধ করা ও নির্ধারিত করা।
আর এ তিনটি বিষয়, তাদের ধারণা মতে, আবশ্যক হয়ে পড়ে, যখন কেউ ইস্তেওয়া এর অর্থ উপরে উঠা বা ঊর্ধ্বে উঠা বলে।
সন্দেহের অপনোদন:
তাদের এসব সন্দেহের অপনোদন কয়েকভাবে করা যায়:
প্রথমত: তাদেরকে বলা হবে, তোমাদের এ ব্যাখ্যা সালাফে সালেহীনের ঐকমত্যের ব্যাখ্যার বিপরীত। তাদের এ ব্যাপারে ঐকমত্য ছিল যে, এর দ্বারা 'উপরে উঠা' অর্থই করা হবে; কারণ তাদের থেকে তোমাদের দাবি করা 'অধিকার করা' অর্থ কখনো বর্ণিত হয়নি। তাদের থেকে প্রকাশ্য অর্থের বিপরীত যাওয়ার কোনো প্রমাণ পাওয়া যায়নি। যদি তারা এর প্রকাশ্য অর্থের বিপরীত মত নিতেন তবে অবশ্যই তার বিপরীতটি আমাদের কাছে বর্ণিত হয়ে আসত। তাদের মধ্য থেকে কেউ কোনোদিন বলেননি যে, 'ইস্তাওয়া' এর অর্থ 'ইস্তাওলা' বা অধিকার করা।
দ্বিতীয়ত: এখানে 'ইস্তাওয়া' এর 'ইস্তাওলা' বা অধিকার অর্থ করা শব্দের প্রকাশ্য অর্থের বিপরীত কথা; কারণ 'ইস্তাওয়া' মূলধাতু যখন 'আলা (alā) অব্যয় যুক্ত হয়ে ব্যবহৃত হয়, তখন তার অর্থ হয়, উপরে উঠা, উপরে অবস্থান করা। এটাই হচ্ছে এ 'ইস্তাওয়া' শব্দের প্রকাশ্য অর্থ, কুরআনে কারীম ও আরবদের ভাষায় যেখানেই এভাবে এসেছে সেখানেই তার অর্থ হয়েছে উপরে উঠা ও উপরে অবস্থান করা।
তৃতীয়ত: 'ইস্তাওয়া' শব্দটিকে 'ইস্তাওলা' বা অধিকার করা অর্থ করা হলে বেশ কিছু বাতিল জিনিস এসে যায়:
১- 'অধিকার করা' অর্থ করার দ্বারা আবশ্যক হয়ে যায় যে, আল্লাহ তা'আলা যখন তিনি আসমান ও যমীন সৃষ্টি করেছেন তখন তিনি 'আরশের উপরে অধিকার সৃষ্টি করতে পারেননি। কারণ আল্লাহ তা'আলা বলেছেন, [الأعراف: ٤٥] ﴿خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٍ ثُمَّ اسْتَوَى عَلَى الْعَرْشِ "আল্লাহ্ যিনি আসমানসমূহ ও যমীন ছয়দিনে সৃষ্টি করেছেন; তারপর তিনি 'আরশের উপর উঠেছেন।” [সূরা আল-আ'রাফ: ৫৪] এখানে (ثُمَّ) বা 'তারপর' শব্দটি ব্যবহার করা হয়েছে, যা ধারাবাহিকতা বুঝায়। তখন এটা বুঝা আবশ্যক হয়ে পড়ে যে, আসমান ও যমীন সৃষ্টি পূর্ণ করার আগে 'আরশ আল্লাহ ব্যতীত অন্য কারও ছিল।
২- আরবী ভাষায় সাধারণ নিয়ম হচ্ছে ‘ইস্তাওলা’ বা অধিকার করা তখনই বলা হয়, যখন কেউ দ্বন্দ্বের পরে কোনো কিছুর কর্তৃত্ব লাভ করে। আর আল্লাহর বিপরীতে কেউ কোনোদিন দ্বন্দ্ব করতে আসেনি।
৩- ‘ইস্তাওয়া’ এর অর্থ ‘ইস্তাওলা’ করলে অপর আরেকটি বাতিল মেনে নেয়া আবশ্যক হয়ে পড়ে, সেটা হচ্ছে, এভাবে বলা শুদ্ধ হওয়া যে, আল্লাহ যমীন, গাছ, পাহাড়-পর্বত ইত্যাদির উপর ‘ইস্তেওয়া’ করেছেন। কারণ, এগুলোও তাঁরই অধিকারে। আর এগুলো অনেকগুলো বাতিলকে মেনে নিতে বাধ্য করে, আর যা বাতিল মেনে নেয়া আবশ্যক করে তা প্রমাণ করে যে, সে জিনিসও বাতিল যা এ বাতিলকে মেনে নেয়ার দিকে নিয়ে যায়। আর আরবী কবিতা দিয়ে প্রদত্ত তাদের দলীলের খণ্ডনে আমরা বলবো:
১- তোমরা এ কবিতাটির সনদ প্রদান করো, এর বর্ণনাকারীরা কতটুকু নির্ভরযোগ্য তাও দেখাও, তারা কখনও তা প্রমাণ করার কোনো পথ খুঁজে পাবে না।
২- এ কবিতার কবি কে? এটা কি সম্ভব নয় যে, এটি তখন বলা হয়েছিল যখন আরবদের ভাষায় বিকৃতি প্রবেশ করেছে? কারণ, আরবী ভাষার মৌলিকত্বে পরিবর্তন সাধিত হওয়ার পরে আসা কোনো কথা দিয়ে প্রমাণ দিলে তো তা প্রমাণ বলে বিবেচিত হবে না। কেননা যখন যুদ্ধে বিজয় লাভ করে তখন মুসলিম বিশ্বের সীমানা বর্ধিত হতে থাকে আর অনারবগণ আরবগণের সাথে মেলামেশা বেড়ে যায় তখন আর আরবদের ভাষার বিশুদ্ধতা অবশিষ্ট থাকেনি। তাই সম্ভাবনা প্রচুর যে, এ কবিতা তখন বলা হয়েছিল যখন ভাষা পরিবর্তন সাধিত হয়ে গিয়েছিল।
৩- ‘ইস্তাওয়া বিশরুন আলাল ইরাক’ এখানে যদি কবিতাটি শুদ্ধ ধরেও নেয়া হয়, তখন বুঝতে হবে যে, বাক্যের সাথে লাগানো বিশেষ কারণ ‘ইস্তাওয়া’ শব্দটিকে ‘ইস্তাওলা’ বা দখল করার অর্থে নেয়া বৈধ করে, কেননা এটা বলা সম্ভব নয় যে বিশর ইরাকের উপরে উঠে সেখানে অবস্থান নিয়েছে যেভাবে কেউ খাট বা বাহনের পিঠে উঠে অবস্থান নিয়ে থাকে। সুতরাং বাধ্য হয়েই যেহেতু ‘ইস্তাওয়া’ অর্থ উপরে উঠা করা যাচ্ছে না সেহেতু ‘ইস্তাওলা’ বা দখল করার অর্থ গ্রহণ করা ছাড়া অন্য কোনো পথ ছিল না। (কিন্তু কুরআনের আয়াতে বা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়াসাল্লামের হাদীসে সে রকম কোনো ‘কারীনাহ’ বা বাক্য সংশ্লিষ্ট বিশেষ কারণ যার ফলে আল্লাহ তা‘আলাকে ‘আরশ দখলকারী অর্থ করা হবে।) বস্তুত এ উত্তর হচ্ছে কবিতাটি বিশুদ্ধ ধরে নেয়ার পর, যদিও তা বিশুদ্ধ নয় এটিই আমাদের মত। তারপরও যদি দাবি করা হয় যে, তা বিশুদ্ধ তাহলে আমরা বলবো, এ কবিতাটিতেও ‘ইস্তেওয়া’ শব্দের অর্থ ‘উপরে উঠা’ করা সম্ভব; কারণ উপরে উঠা দুই প্রকার:
১- ইন্দ্রিয়গ্রাহ্য উপরে থাকা, যেমন আমরা খাটের উপরে উঠি।
২- মনস্তাত্ত্বিক দিক থেকে উপরে থাকা, যেমন কোনো কিছুর ওপর প্রভাব বিস্তার করে দখল করে ফেলা বা জয়লাভ করা। সে হিসেবে ‘ইস্তাওয়া বিশরুন আলাল ইরাকি’ অর্থ হবে বিশর ইরাকের ওপর ক্ষমতার ও অধীন করার মাধ্যমে উপরে উঠেছে। (তাহলে তো আমরা দেখতে পাচ্ছি যে, এখানেও উপরে উঠা অর্থ করা সম্ভব। আর এটা তখনই হয়েছে যখন প্রথম অর্থটি নেয়া সম্ভব না হবে। আল্লাহ তা‘আলার ব্যাপারে এ বিষয়টি মোটেই প্রযোজ্য হবে না। কারণ যারা "আল্লাহ কর্তৃক তাঁর ‘আরশের উপরে উঠা” অর্থ করে তারা প্রথম অর্থটি অসম্ভব মনে করে না।)
আর তাদের পরবর্তী সন্দেহ হচ্ছে 'ইস্তেওয়া' এর অর্থ 'উপরে উঠা' বললে আল্লাহকে দেহ বলা আবশ্যক হয়ে যায়। তার উত্তর হচ্ছে,
- আল্লাহর কিতাব ও রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু 'আলাইহি ওয়াসাল্লামের সুন্নাত যা যা আবশ্যক করে তা অবশ্যই সত্য, তার আবশ্যকতা আমরা মেনে নেয়া জরুরী মনে করি। তবে সত্যি সত্যিই তা আল্লাহ ও রাসূলের কথা দ্বারা আবশ্যক হওয়া লাগবে। তাই যদি কোথাও এটা সাব্যস্ত হয়ে যায় যে, এটা প্রকৃতপক্ষেই আবশ্যক হয়ে পড়েছে তাহলে সেটা বলাতে আমরা কোনো দোষ দেখি না।
- তারপর আমরা বলবো, তোমরা নিষিদ্ধ দেহ সাব্যস্ত করা বলতে কী উদ্দেশ্য নিয়ে থাক?
যদি এর দ্বারা তোমরা উদ্দেশ্য এটা নিয়ে থাক যে, আল্লাহর এমন কোনো সত্তা সাব্যস্ত হবে না যার জন্য তাঁর উপযোগী আবশ্যক গুণাবলি সাব্যস্ত করা লাগবে, তাহলে তোমাদের কথা বাতিল। কারণ আল্লাহর এমন এক প্রকৃত সত্তা রয়েছে যা বহু গুণে গুণান্বিত। তাঁর রয়েছে চেহারা, হাত, চোখ, পা। এগুলো সাব্যস্ত করা সত্য ও সঠিক। তার জন্য যদি তোমাদের নিকট বিভিন্ন জিনিসের বাধ্য-বাধকতা এসেও যায় তাতে আমাদের কোনো সমস্যা নেই। সেসব সাব্যস্ত করতে গেলে তোমাদের দৃষ্টিতে সমস্যা হিসেবে তোমরা যা ইচ্ছা তা বলতে পার, আমরা সেটাকে কোনো সমস্যা মনে করি না।
আর যদি 'নিষিদ্ধ দেহ' যা তোমরা আল্লাহর জন্য সাব্যস্ত করাকে অস্বীকার করে থাক, তা দ্বারা উদ্দেশ্য নিয়ে থাক এমন কোনো দেহ যা হাঁড়, গোশত, রক্ত ইত্যাদি জিনিস দিয়ে গঠিত, তাহলে তা অবশ্যই আল্লাহর জন্য হওয়া অসম্ভব। আর এটি 'আল্লাহর 'আরশের উপর উঠা' গুণ সাব্যস্ত করা দ্বারা আবশ্যকও হয় না।
আর তাদের পরবর্তী সন্দেহ হচ্ছে, 'ইস্তেওয়া' অর্থ 'উপরে উঠা' সাব্যস্ত করলে আল্লাহ তা'আলাকে সীমাবদ্ধ করা হয়ে যায়, তার বিস্তারিত উত্তর হচ্ছে,
- তোমরা সীমা বলতে কী বুঝাচ্ছ?
যদি সীমাবদ্ধ বলতে এটা বুঝাতে চাও যে, সৃষ্টি থেকে আলাদা, যেমন পৃথিবীতে এটা যায়েদের যমীন, ওটা 'উমারের যমীন, একের যমীন থেকে অন্যের যমীন আলাদা করা, যদি সীমা বলে আল্লাহ তা'আলাকে 'আরশের উপর থাকার কারণে এমন 'আলাদা সত্তা' বুঝাতে চাও তবে অবশ্যই জেনে রাখ, এ আলাদা করার সীমা নির্ধারণ অবশ্যই সত্য। এতে কোনো ত্রুটি নেই।
আর যদি সীমা দ্বারা উদ্দেশ্য হয়, 'আরশ আল্লাহ তা'আলাকে পরিবেষ্টন করে আছে, তাহলে এটা বাতিল। 'আরশের উপর উঠা' বলা দ্বারা এটা আবশ্যক করে না। কারণ, আল্লাহ তা'আলা 'আরশের উপর উঠেছেন, যদিও আল্লাহ তা'আলা 'আরশ ও 'আরশ ব্যতীত অন্য সবকিছুর চেয়ে অনেক বড়। 'আরশের উপর উঠা, 'আরশের উপর থাকা এ কথার দ্বারা 'আরশ আল্লাহকে ঘিরে আছে এমনটি বুঝা আবশ্যক নয়। বরং 'আরশ কোনোভাবেই আল্লাহ তা'আলাকে পরিবেষ্টন করতে পারে না; কারণ আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তা'আলা সবকিছুর চেয়ে বড় এবং কিছুর চেয়ে মহৎ। সকল যমীন কিয়ামতের দিন তাঁর হাতের মুষ্ঠির ভেতরে, সকল আসমান তাঁর ডান হাতে ভাঁজ করা অবস্থায় রয়েছে।
আর তাদের কথা, “আল্লাহ 'আরশের উপর আছেন" বললে আল্লাহকে 'আরশের প্রতি মুখাপেক্ষী সাব্যস্ত করা হয়, এর উত্তরে আমরা বলবো,
কখনো নয়, এটা বাধ্য করে না। কারণ আল্লাহ তা'আলা তাঁর 'আরশের উপর থাকার অর্থ হচ্ছে, 'আরশের ঊর্ধ্বে, এ এক বিশেষ উপরে থাকা। এর অর্থ কখনো এটা নয় যে, 'আরশ তাঁকে বহন করে, কখনো নয়। 'আরশ তাঁকে বহন করে না, আসমান তাঁকে বহন করে না, তোমরা যে জিনিসটির বাধ্যবাধকতার দাবি করছ সেটা নিষিদ্ধ; কারণ এর মাধ্যমে আল্লাহর প্রতি ত্রুটিযুক্ত গুণের সম্পর্ক করা হচ্ছে। আল্লাহর জন্য 'আরশের উপর উঠা' যা ইস্তেওয়া শব্দের প্রকৃত অর্থ তা সাব্যস্ত করলে কখনো এমন ত্রুটিপূর্ণ কিছু সাব্যস্ত করা আবশ্যক করে না। কারণ, আমরা কখনো বলি না, 'আল্লাহ 'আরশের উপর উঠেছেন' এর অর্থ 'আরশ তাঁকে বহন করে; বরং 'আরশ স্বয়ং বহনকৃত বস্তু; তাকে বহন করা হয়। আল্লাহ তা'আলা বলেন, "আর আপনার রবের 'আরশ সেদিন তাদের উপরে বহন করবে আটজন" [সূরা আল-হাক্কাহ, আয়াত: ১৭], ফিরিশতাগণ এখনও 'আরশ বহন করে চলছে, কিন্তু তারা মহান আল্লাহকে বহন করছে না। কারণ, আল্লাহ তা'আলা এর মুখাপেক্ষী নন। সুতরাং এভাবেই যাবতীয় নেগেটিভ বা না সূচক যুক্তি বাতিল হয়ে গেল।
মোটকথা, যারা বলে, 'আল্লাহ 'আরশের উপর উঠেছেন' বলা যাবে না, সংক্ষিপ্তভাবে আমরা তাদের কথার উত্তর কয়েকভাবে দিতে পারি:
এক- তাদের এ কথা কুরআন ও হাদীসের প্রকাশ্য বক্তব্য বিরোধী।
দুই- তাদের এ কথা সাহাবায়ে কেরাম ও সকল সালাফে সালেহীনের ইজমা' বিরোধী।
তিন- আরবী ভাষায় 'ইস্তাওয়া' এর অর্থ 'ইস্তাওলা' (অধিকার করা) আসেনি। যে কবিতা দিয়ে 'ইস্তাওলা' সাব্যস্ত করার জন্য তারা প্রমাণ পেশ করেছে তা দিয়ে দলীল গ্রহণ সম্পন্ন করা যায় না।
চার- 'ইস্তাওয়া' দ্বারা 'ইস্তাওলা' (অধিকার করা) সাব্যস্ত করলে বেশ কিছু বাতিল জিনিস মেনে নেয়ার বাধ্যবাধকতা এসে যায়,
১- 'আরশ আসমান ও যমীন সৃষ্টির পূর্বে আল্লাহ তা'আলা ব্যতীত অন্য কারও মালিকানায় থাকা আবশ্যক করে।
২- 'ইস্তাওলা' বাক্যটি সাধারণভাবে এই অর্থ প্রকাশ করে যে, সেখানে আল্লাহ ও অন্য কারও সাথে জয়-পরাজয়ের ব্যাপারে জড়িত, তারপর আল্লাহ 'আরশ অধিকার করলেন এবং বিপক্ষের উপর জয়লাভ করলেন। [নাউযুবিল্লাহ]
৩- যদি ইস্তেওয়া অর্থ তোমাদের ধারণা অনুযায়ী 'অধিকার করা' বলা হয়, তবে এটা বলাও জায়েয হবে যে, আল্লাহ যমীনের উপর ইস্তাওলা করেছেন, অনুরূপ গাছের উপর, পাহাড়ের উপর, মানুষের উপর, উটের উপরও ইস্তাওলা করেছেন। কারণ, এগুলোও তো আল্লাহ তা'আলার অধিকারে। কারণ, কোথাও যদি আল্লাহ তা'আলার জন্য 'অধিকার করা' বলা জায়েয হয় তাহলে অন্য জায়গাতেও সেটি বলা জায়েয মেনে নিতে হবে। সে হিসেবে 'ইস্তাওয়া' এমন সকল কিছুর উপরই ব্যবহার করা যাবে যেখানে 'ইস্তাওলা' ব্যবহার করা যায়, কারণ তোমাদের নিকট তো দু'টো সমার্থবোধক।
এসব উত্তর প্রমাণ করে দিচ্ছে যে, 'ইস্তেওয়া' এর ব্যাখ্যা 'ইস্তাওলা' দ্বারা করা সম্পূর্ণরূপে বাতিল।” (৭৯৮)