রিয়াদুস সলেহিন > ভাল লোকদের সাথে সাক্ষাৎ করা, তাঁদের সাহচর্য গ্রহণ করা, তাঁদেরকে ভালবাসা, তাঁদেরকে বাড়িতে দাওয়াত দেওয়া, তাঁদের কাছে দো‘আ চাওয়া এবং বরকতময় স্থানসমূহের দর্শন
রিয়াদুস সলেহিন ৩৬৪
وعن أبي هريرة رضي الله عنه، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: تنكح المرأة لأربع: لمالها، ولحسبها، ولجمالها، ولدينها، فاظفر بذات الدين تربت يداك" ((متفق عليه))
রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর জীবনাবসানের পর আবূ বকর সিদ্দীক (রাঃ) উমার (রাঃ)-কে বললেন, ‘চলুন, আমরা উম্মে আইমানের সাথে সাক্ষাৎ করতে যাই, যেমন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করতে যেতেন।’ সুতরাং যখন তাঁরা উম্মে আইমানের কাছে পৌঁছলেন, তখন তিনি কেঁদে ফেললেন। অতঃপর তাঁরা তাঁকে বললেন, ‘তুমি কাঁদছ কেন? তুমি কি জানো না যে, আল্লাহর কাছে যা রয়েছে, তা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর জন্য (দুনিয়া থেকে) অধিক উত্তম? তিনি উত্তর দিলেন, ‘আমি এ জন্য কান্না করছি না যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর জন্য আল্লাহর নিকট যা রয়েছে, তা অধিকতর উত্তম সে কথা আমি জানি না। কিন্তু আমি এজন্য কাঁদছি যে, আসমান হতে ওহী আসা বন্ধ হয়ে গেল।’ উম্মে আইমান (তাঁর এ দুঃখজনক কথা দ্বারা) ঐ দু’জনকে কাঁদতে বাধ্য করলেন। ফলে তাঁরাও তাঁর সাথে কাঁদতে লাগলেন। (মুসলিম) [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৬৫
وعن ابن عباس رضي الله عنهما قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم لجبريل: ما يمنعك أن تزورنا أكثر مما تزورنا؟ فنزلت :{وما نتنزل إلا بأمر ربك له ما بين أيدينا وما خلفنا وما بين ذلك} ((رواه البخاري))."
নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেন, ‘‘এক ব্যক্তি অন্য কোন গ্রামে তার ভাইয়ের সাথে সাক্ষাৎ করার জন্য বের হল। আল্লাহ তা‘আলা তার রাস্তায় এক ফেরেশতাকে বসিয়ে দিলেন, তিনি তার অপেক্ষা করতে থাকলেন। যখন সে তাঁর কাছে পৌঁছল, তখন তিনি তাকে বললেন, ‘তুমি কোথায় যাচ্ছ?’ সে বলল, ‘এ লোকালয়ে আমার এক ভাই আছে, আমি তার কাছে যাচ্ছি।’ ফিরিশতা জিজ্ঞেস করলেন, ‘তোমার প্রতি কি তার কোন অনুগ্রহ রয়েছে, যার বিনিময় দেওয়ার জন্য তুমি যাচ্ছ?’ সে বলল, ‘না, আমি তার নিকট কেবলমাত্র এই জন্য যাচ্ছি যে, আমি তাকে আল্লাহর ওয়াস্তে ভালবাসি।’ ফেরেশতা বললেন, ‘(তাহলে শোনো) আমি তোমার নিকট আল্লাহর দূত হিসাবে (এ কথা জানাবার জন্য) এসেছি যে, আল্লাহ তা‘আলা তোমাকে ভালবাসেন; যেমন তুমি তাকে আল্লাহর জন্য ভালবাস।’’ (মুসলিম) [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৬৬
وعن أبي سعيد الخدري رضي الله عنه ، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: لا تصاحب إلا مؤمنا، ولا يأكل طعامك إلا تقي" ((رواه أبو داود، والترمذي بإسناد لا بأس به))
তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, ‘‘যে ব্যক্তি কোনো রোগীকে সাক্ষাৎ করে খোঁজখবর নেয় অথবা তার কোনো আল্লাহর ওয়াস্তে কৃত ভাই এর সাথে সাক্ষাৎ করে, সে ব্যক্তিকে এক (গায়বী) আহ্বানকারী আহ্বান করে বলে, ‘সুখী হও তুমি, সুখকর হোক তোমার ঐ যাত্রা (সাক্ষাতের জন্য যাওয়া)। আর তোমার স্থান হোক জান্নাতের প্রাসাদে।’’ (তিরমিযী, হাসান বা গরীব সূত্রে)[১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৬৭
وعن أبي هريرة رضي الله عنه أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: الرجل على دين خليله، فلينظر أحدكم من يخالل" ((رواه أبو داود، والترمذي بإسناد صحيح، وقال الترمذي: حديث حسن))
নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, ‘‘সৎ সঙ্গী ও অসৎ সঙ্গীর উদাহরণ হল, কস্তুরী বহনকারী (আতরওয়ালা) ও হাপরে ফুৎকারকারী (কামারের) ন্যায়। কস্তুরী বহনকারী (আতরওয়ালা) হয়তো তোমাকে কিছু দান করবে অথবা তার কাছ থেকে তুমি কিছু খরিদ করবে অথবা তার কাছ থেকে সুবাস লাভ করবে। আর হাপরে ফুৎকারকারী (কামার) হয়ত তোমার কাপড় পুড়িয়ে দেবে অথবা তুমি তার কাছ থেকে দুর্গন্ধ পাবে।’’[১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৬৮
وعن أبي موسى الأشعري رضي الله عنه أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: المرء مع من أحب" ((متفق عليه)) . وفي رواية قال: قيل للنبي صلى الله عليه وسلم : الرجل يحب القوم ولما يلحق بهم؟ قال: "المرء مع من أحب"."
তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, ‘‘চারটি গুণ দেখে মহিলাকে বিবাহ করা হয়; তার ধন-সম্পদ, তার বংশ মর্যাদা, তার রূপ-সৌন্দর্য এবং তার দ্বীন-ধর্ম দেখে। তুমি দ্বীনদার পাত্রী লাভ করে সফলকাম হও। (অন্যথায় তুমি ক্ষতিগ্রস্ত হবে।)’’ (বুখারী)
রিয়াদুস সলেহিন ৩৬৯
وعن أنس رضي الله عنه أن أعرابيًا قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم : متى الساعة؟ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ما أعددت لها؟ قال: حب الله ورسوله قال: "أنت مع من أحببت" ((متفق عليه)) وهذا لفظ مسلم. وفي رواية لهما: ما أعددت لها من كثير صوم، ولا صلاة، ولا صدقة ولكني أحب الله ورسوله."
একদা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম জিব্রাঈলকে বললেন, ‘আপনি যতটা আমার সঙ্গে সাক্ষাৎ করেন তার চেয়ে বেশী সাক্ষাৎ করতে আপনার বাধা কিসের?’ ফলে এ আয়াত অবতীর্ণ হল, ‘‘(জিবরীল বললেন,) আমরা তোমার প্রতিপালকের আদেশ ব্যাতিরেকে অবতরণ করি না। যা আমাদের সম্মুখে ও পশ্চাতে এবং উভয়ের মধ্যস্থলে রয়েছে সে সকলই তাঁর মালিকানাধীন।’’ (সূরা মারয়্যাম ৬৪ আয়াত, বুখারী) [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৭০
وعن ابن مسعود رضي الله عنه قال: جاء رجل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله كيف تقول في رجل أحب قومًا ولم يلحق بهم؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم : المرء مع من أحب" ((متفق عليه))
নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেন, ‘‘মু’মিন মানুষ ছাড়া অন্য কারো সঙ্গী হয়ো না এবং তোমার খাবার যেন পরহেযগার ব্যক্তি ছাড়া অন্য কেউ না খায়।’’ (আবূ দাউদ, তিরমিযী) [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৭১
وعن أبي هريرة رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: الناس معادن كمعادن الذهب والفضة، خيارهم في الجاهلية خيارهم في الإسلام إذا فقهوا، والأرواح جنود مجندة، فما تعارف منها ائتلف، وما تناكر منها اختلف" ((رواه مسلم؟)). ((وروى البخاري)) قوله: "الأرواح" من رواية عائشة رضي الله عنها"
নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, ‘‘মানুষ তার বন্ধুর দ্বীনের উপর হয়। অতএব তোমাদের প্রত্যেককে দেখা উচিত যে, সে কার সাথে বন্ধুত্ব স্থাপন করছে।’’ (আবূ দাউদ, তিরিমিযী, বিশুদ্ধ সূত্রে) [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৭২
وعن أُسَير بن عمرو ويقال: ابن جابر وهو "بضم الهمزة وفتح السين المهملة" قال: كان عمر بن الخطاب إذا أتى عليه أمداد أهل اليمن سألهم: أفيكم أويس بن عامر؟ حتى أتى على أويس رضي الله عنه ، فقال له: أنت أويس بن عامر؟ قال: نعم، قال: من مراد ثم من قرن؟ قال: نعم قال: فكان بك برص، فبرأت منه إلا موضع درهم؟ قال نعم قال: لك والدة؟ قال : نعم، قال : سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول "يأتي عليكم أويس بن عامر مع أمداد أهل اليمن من مراد، ثم من قرن كان به برص، فبرأ منه إلا موضع درهم، له والدة هو بها بر لو أقسم على الله لأبره، فإن استطعت أن يستغفر لك فافعل" فاستغفر لي فاستغفر له، فقال له عمر: أين تريد؟ قال: الكوفة، قال: ألا أكتب لك إلى عاملها؟ قال: أكون في غبراء الناس أحب إلي، فلما كان من العام المقبل حج رجل من أشرافهم، فوافق عمر، فسأله عن أويس، فقال: تركته رث البيت قليل المتاع، قال: سمعت رسول الله يقول: يأتي عليكم أويس بن عامر مع أمداد من أهل اليمن من مراد ، ثم من قرن، كان به برص فبرأ منه إلا موضع درهم، له والدة هو بها بر لو أقسم على الله لأبره، فإن استطعت أن يستغفر لك : فافعل، فأتى أويسًا، فقال استغفر لي قال: أنت أحدث عهدًا بسفر صالح، فاستغفر لي. قال: لقيت عمر؟ قال: نعم، فاستغفر له، ففطن له الناس، فانطلق على وجهه. ((رواه مسلم)). وفي رواية لمسلم أيضًا عن أُسِير بن جابر رضي الله عنه أن أهل الكوفة وفدوا على عمر رضي الله عنه ، وفيهم رجل ممن كان يسخر بأويس، فقال عمر: هل هاهنا أحد من القرنين؟ فجاء ذلك الرجل، فقال عمر: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد قال:"إن رجلا يأتيكم من اليمن يقال له : أويس، لا يدع باليمن غير أم له، قد كان به بياض فدعا الله تعالى، فأذهبه إلا موضع الدينار أو الدرهم ، فمن لقيه منكم، فليستغفر لكم". وفي رواية له عن عمر رضي الله عنه قال: "إنى سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إن خير التابعين رجل يقال له: أويس: وله والدة وكان به بياض، فمروه، فليستغفر لكم"."
নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, ‘‘মানুষ (দুনিয়াতে) যাকে ভালবাসে (কিয়ামতে) সে তারই সাথী হবে।’’ অন্য এক বর্ণনায় আছে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে জিজ্ঞেস করা হল, ‘‘কোনো ব্যক্তি কোনো সম্প্রদায়কে ভালবাসে, কিন্তু (আমলে) তাদের সমকক্ষ হতে পারেনি। তিনি বললেন, মানুষ যাকে ভালবাসে, সে তারই সাথী হবে।’’ (বুখারী ও মুসলিম)[১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৭৩
وعن عمر بن الخطاب رضي الله عنه قال: استأذنت النبي صلى الله عليه وسلم في العمرة، فأذن لي، وقال: لا تنسنا يا أخي من دعائك" فقال كلمة ما يسرني أن لي بها الدنيا. وفي رواية قال: "أشركنا يا أخي في دعائك". حديث صحيح ((رواه أبو داود، والترمذي وقال: حديث حسن صحيح))."
এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে জিজ্ঞেস করল, ‘হে আল্লাহর রাসূল! কিয়ামত কবে ঘটবে?’ তিনি তাকে জিজ্ঞেস করলেন, ‘‘তুমি এর জন্য কি প্রস্তুতি নিয়েছ?’’ সে বলল, ‘আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের ভালবাসা।’ তিনি বললেন, ‘‘তুমি যাকে ভালবাস, তারই সাথী হবে।’’ (বুখারী ও মুসলিম শব্দগুলি মুসলিমের) [১] উভয়ের অন্য এক বর্ণনায় আছে, ‘‘আমি বেশি নামায-রোযা ও সাদকাহর মাধ্যমে প্রস্তুতি নিতে পরিনি। কিন্তু আমি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে ভালবাসি। (তিনি বললেন, তুমি যাকে ভালবাস, তারই সাথী হবে।)’’
রিয়াদুস সলেহিন ৩৭৪
وعن ابن عمر رضي الله عنهما قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يزور قباء راكبًا وماشيًا، فيصلي فيه ركعتين، ((متفق عليه)) . وفي رواية: كان النبي صلى الله عليه وسلم يأتي مسجد قباء كل سبت راكبًا وماشيًا وكان ابن عمر يفعله .
এক ব্যক্তি এসে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে জিজ্ঞেস করল, ‘হে আল্লাহর রাসূল! কোনো ব্যক্তি কোনো সম্প্রদায়কে ভালবাসে, কিন্তু (আমলে) তাদের সমকক্ষ হতে পারেনি।’ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, ‘‘মানুষ যাকে ভালবাসে, সে তারই সাথী হবে।’’ (বুখারী ও মুসলিম) [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৭৫
وعن أنس رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: ثلاث من كن فيه وجد بهن حلاوة الإيمان: أن يكون الله ورسوله أحب إليه مما سواهما، وأن يحب المرء لا يحبه إلا لله، وأن يكره أن يعود في الكفر بعد أن أنقذه الله منه، كما يكره أن يقذف في النار" ((متفق عليه))
নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, ‘‘সোনা-রূপার খনিরাজির মত মানব জাতিও নানা গোত্রের খনিরাজি। যারা জাহেলী যুগে উত্তম ছিল, তারা ইসলামী যুগেও উত্তম; যখন তারা দ্বীনের গভীর জ্ঞান লাভ করে। আর আত্মাসমূহ সমবেত সৈন্যদলের মত। সুতরাং আপোসে যে আত্মাদল পরিচিত ও অভিন্ন প্রকৃতির হয়, সে আত্মাদলের মাঝে মিলন ও বন্ধুত্ব স্থাপিত হয়ে থাকে এবং যে আত্মাদল আপোসে অপরিচিত ও ভিন্ন প্রকৃতির হয়, সে আত্মাদলের মাঝে বিচ্ছিন্নতা ও অনৈক্য প্রকট হয়ে ওঠে।’’ (মুসলিম) [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৭৬
و عن أبي هريرة رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: سبعة يظلهم الله في ظله يوم لا ظل إلا ظله: إما عادل، وشاب نشأ في عبادة الله عز وجل، ورجل قلبه معلق بالمساجد. ورجلان تحابا في الله اجتمعا عليه ، وتفرقا عليه، ورجل دعته امرأة ذات حسن وجمال، فقال: إني أخاف الله، ورجل تصدق بصدقة، فأخفاها حتى لا تعلم شماله ما تنفق يمينه، ورجل ذكر الله خاليًا ففاضت عيناه" ((متفق عليه)) . وعنه قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم " إن الله تعالى يقول يوم القيامة أين المتحابون بجلالي؟ اليوم أظلهم في ظلي يوم لا ظل إلا ظلي" (( رواه مسلم)) . وعنه قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : والذي نفسي بيده لا تدخلوا الجنة حتى تؤمنوا ولا تؤمنوا حتى تحابوا أولا أدلكم على شيء إذا فعلتموه تحاببتم: أفشوا السلام بينكم (( رواه مسلم)) ."
‘‘আত্মাসমূহ সমবেত সৈন্যদলের মত। সুতরাং আপোসে যে আত্মাদল পরিচিত ও অভিন্ন প্রকৃতির হয়, সে আত্মাদলের মাঝে মিলন ও বন্ধুত্ব স্থাপিত হয়ে থাকে এবং যে আত্মাদল আপোসে অপরিচিত ও ভিন্ন প্রকৃতির হয়, সে আত্মাদলের মাঝে বিচ্ছিন্নতা ও অনৈক্য প্রকট হয়ে ওঠে।’’ এ অংশটুকু আয়েশা রাদিয়াল্লাহু আনহা থেকে বর্ণনা করেছেন।
রিয়াদুস সলেহিন ৩৭৭
وعنه قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم إن الله تعالى يقول يوم القيامة أين المتحابون بجلالي؟ اليوم أظلهم في ظلي يوم لا ظل إلا ظلي" (( رواه مسلم))
উমার (রাঃ)-এর নিকট যখনই ইয়ামান থেকে সহযোগী যোদ্ধারা আসতেন, তখনই তিনি তাঁদেরকে জিজ্ঞেস করতেন, ‘তোমাদের মধ্যে কি উয়াইস ইবনু ‘আমের আছে?’ শেষ পর্যন্ত (এক দলের সঙ্গে) উয়াইস (ক্বারনী) (রাঃ) (মদ্বীনা) এলেন। অতঃপর উমার (রাঃ) তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন, ‘তুমি কি উয়াইস ইবনু আমের?’ তিনি বললেন, ‘হ্যাঁ।’ উমার (রাঃ) ললেন, ‘মুরাদ (পরিবারের) এবং ক্বার্ন্ (গোত্রের)?’ উয়াইস বললেন, ‘হ্যাঁ।’ তিনি (পুনরায়) জিজ্ঞেস করলেন, ‘তোমার শরীরে শ্বেত রোগ ছিল, তা এক দিরহাম সম জায়গা ব্যতীত (সবই) দূর হয়ে গেছে?’ উয়াইস বললেন, ‘হ্যাঁ।’ তিনি বললেন, ‘তোমার মা আছে?’ উয়াইস বললেন, ‘হ্যাঁ।’ তিনি বললেন, ‘আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছি, ‘‘মুরাদ (পরিবারের) এবং ক্বার্ন্ (গোত্রের) উয়াইস ইবনু আমের ইয়ামানের সহযোগী ফৌজের সঙ্গে তোমাদের কাছে আসবে। তার দেহে ধবল দাগ আছে, যা এক দিরহাম সম স্থান ছাড়া সবই ভাল হয়ে গেছে। সে তার মায়ের সাথে সদাচারী হবে। সে যদি আল্লাহর প্রতি কসম খায়, তবে আল্লাহ তা পূরণ করে দেবেন। সুতরাং (হে উমার!) তুমি যদি নিজের জন্য তাকে দিয়ে ক্ষমাপ্রার্থনার দো‘আ করাতে পার, তাহলে অবশ্যই করবে।’’ সুতরাং তুমি আমার জন্য (আল্লাহর কাছে) ক্ষমা প্রার্থনা কর।’ শোনামাত্র উয়াইস উমারের জন্য ক্ষমাপ্রার্থনা করলেন। অতঃপর উমার তাঁকে বললেন, ‘তুমি কোথায় যাবে?’ উয়াইস বললেন, ‘কূফা।’ তিনি বললেন, ‘আমি কি তোমার জন্য সেখানকার গর্ভনরকে পত্র লিখে দেব না?’ উয়াইস বললেন, ‘আমি সাধারণ গরীব-মিসকীনদের সাথে থাকতে ভালবাসি।’ অতঃপর যখন আগামী বছর এল তখন কূফার সম্ভ্রান্ত ব্যক্তিদের মধ্যে একজন হজ্জে এল। সে উমার (রাঃ)-এর সঙ্গে সাক্ষাৎ করলে তিনি তাকে উয়াইস সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। সে বলল, ‘আমি তাঁকে এই অবস্থায় ছেড়ে এসেছি যে, তিনি একটি ভগ্ন কুটির ও স্বল্প সামগ্রীর মালিক ছিলেন।’ উমার (রাঃ) বললেন, ‘আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছি, ‘‘মুরাদ (পরিবারের) এবং ক্বার্ন্ (গোত্রের) উয়াইস ইবনু আমের ইয়ামানের সহযোগী ফৌজের সঙ্গে তোমাদের নিকট আসবে। তার দেহে ধবল রোগ আছে, যা এক দিরহামসম স্থান ছাড়া সবই ভালো হয়ে গেছে। সে তার মায়ের সাথে সদাচারী (মা-ভক্ত) হবে। সে যদি আল্লাহর উপর কসম খায়, তাহলে আল্লাহ তা পূর্ণ করে দেবেন। যদি তুমি তোমার জন্য তার দ্বারা ক্ষমাপ্রার্থনার দো‘আ করাতে পার, তাহলে অবশ্যই করবে।’’ অতঃপর সে (কূফার লোকটি হজ্জ সম্পাদনের পর) উয়াইস (ক্বারনীর) নিকট এল এবং বলল, ‘আপনি আমার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন।’ উয়াইস বললেন, ‘তুমি এক শুভযাত্রা থেকে নব আগমন করেছ। অতএব তুমি আমার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা কর।’ অতঃপর তিনি বললেন, ‘তুমি উমারের সঙ্গে সাক্ষাৎ করেছ?’ সে বলল, ‘হ্যাঁ।’ সুতরাং উয়াইস তার জন্য ক্ষমাপ্রার্থনা করলেন। (এসব শুনে) লোকেরা (উয়াইসের) মর্যাদা জেনে নিল। সুতরাং তিনি তার সামনের দিকে (অন্যত্র) চলে গেলেন। (মুসলিম) মুসলিমের অন্য এক বর্ণনায় উসাইর ইবনু জাবের (রাঃ) থেকেই বর্ণিত, কুফার কিছু লোক উমার (রাঃ)-এর নিকট এল। তাদের মধ্যে একটি লোক ছিল, সে উয়াইসের সাথে উপহাস করত। উমার (রাঃ) জিজ্ঞেস করলেন, ‘এখানে ক্বার্ন গোত্রের কেউ আছে কি?’ অতঃপর ঐ ব্যক্তি এল। উমার (রাঃ) বললেন, ‘রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, ‘‘তোমাদের নিকট ইয়ামান থেকে উয়াইস নামক একটি লোক আসবে। সে ইয়ামানে কেবলমাত্র তার মা-কে রেখে আসবে। তার দেহে ধবল রোগ ছিল। সে আল্লাহর কাছে দো‘আ করলে আল্লাহ তা এক দ্বীনার অথবা এক দিরহাম সম স্থান ব্যতীত সবই দূর করে দিয়েছেন। সুতরাং তোমাদের কারো যদি তার সাথে সাক্ষাৎ হয়, তাহলে সে যেন তোমাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করে।’’ অন্য এক বর্ণনায় আছে, উমার (রাঃ) বলেন, ‘আমি আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট শুনেছি, তিনি বলেছেন, ‘‘সর্বশ্রেষ্ঠ তাবেঈন হল এক ব্যক্তি, যাকে উয়াইস বলা হয়। তার মা আছে। তার ধবল রোগ ছিল। তোমরা তাকে আদেশ করো, সে যেন তোমাদের জন্য (আল্লাহর নিকট) ক্ষমাপ্রার্থনা করে।’’ [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৭৮
وعنه قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : والذي نفسي بيده لا تدخلوا الجنة حتى تؤمنوا ولا تؤمنوا حتى تحابوا أولا أدلكم على شيء إذا فعلتموه تحاببتم: أفشوا السلام بينكم (( رواه مسلم)) .
আমি উমরাহ করার জন্য রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে অনুমতি চাইলাম। তিনি অনুমতি দিয়ে বললেন, “প্রিয় ভাই আমার, তোমার দু’আর সময় আমাদেরকে যেন ভুলো না।” (উমার বলেন) এমন বাক্য তিনি উচ্চারণ করলেন, যার বিনিময়ে গোটা পৃথিবীটা আমার হয়ে গেলেও তা আমার কাছে আনন্দদায়ক (বিবেচিত) নয়। অন্য এক বর্ণনায় বলা হয়েছে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, “ভাইয়া! তোমার দু‘আয় তুমি আমাদেরকেও শরীক রেখো।” (আবূ দাউদ ও তিরমিযি) যঈফ। [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৭৯
وعنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم :أن رجلاً زار أخًا له في قريةٍ أخرى، فأرصد الله له على مدرجته ملكاً" وذكر الحديث إلى قوله: "إن الله قد أحبك كما أحببته فيه" ((رواه مسلم)) (13)."
‘নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সওয়ার হয়ে ও পায়ে হেঁটে (মসজিদে) কুবার যিয়ারত করতেন। অতঃপর তাতে দু’ রাকআত নামায পড়তেন।’ (বুখারী ও মুসলিম) [১]
রিয়াদুস সলেহিন > আল্লাহর সন্তুষ্টির জন্য কারো সাথে ভালবাসা রাখার মাহাত্ম্য এবং তার প্রতি উৎসাহ প্রদান ও যে ব্যক্তি অন্য কাউকে ভালবাসে তাকে সে ব্যাপারে অবহিত করা ও কী বলে অবহিত করবে তার বিবরণ
রিয়াদুস সলেহিন ৩৮০
وعن البراء بن عازب رضي الله عنهما عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال في الأنصار: لا يحبهم إلا مؤمن، ولا يبغضهم إلا منافق، من أحبهم أحبه الله، ومن أبغضهم أبغضه الله" ((متفق عليه))
নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেন, ‘‘যার মধ্যে তিনটি গুণ থাকে, সে ঈমানের মিষ্টতা লাভ করে থাকে। আল্লাহ ও তাঁর রাসূল তার কাছে অন্য সব কিছু থেকে অধিক প্রিয় হবে; কাউকে ভালোবাসলে কেবল আল্লাহ’র জন্যই ভালবাসবে। আর কুফরী থেকে তাকে আল্লাহর বাঁচানোর পর পুনরায় তাতে ফিরে যাওয়াকে এমন অপছন্দ করবে, যেমন সে নিজেকে আগুনে নিক্ষিপ্ত করাকে অপছন্দ করে।’’ (বুখারী ও মুসলিম) [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৮১
وعن معاذ رضي الله عنه قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: قال الله عز وجل: المتحابون في جلالي، لهم منابر من نور يغبطهم النبيون والشهداء" ((رواه الترمذي وقال: حديث حسن صحيح))
আমি বললাম, ‘হে আল্লাহ রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম! আপনি আমাকে (কোন স্থানের সরকারী) কর্মচারী কেন নিযুক্ত করছেন না?’ তিনি নিজ হাত আমার কাঁধের উপর মেরে বললেন, ‘‘হে আবূ যার্র! তুমি দুর্বল এবং (এ পদ) আমানত ও এটা কিয়ামতের দিন অপমান ও অনুতাপের কারণ হবে। কিন্তু যে ব্যক্তি তা হকের সাথে (যোগ্যতার ভিত্তিতে) গ্রহণ করল এবং নিজ দায়িত্ব (যথাযথভাবে) পালন করল (তার জন্য এ পদ লজ্জা ও অনুতাপের কারণ নয়)।’’ (মুসলিম) [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৮২
وعن أبي إدريس الخولاني رحمه الله قال: دخلت مسجد دمشق، فإذا فتًى براق الثنايا وإذا الناس معه، فإذا اختلفوا بشيء، أسندوه إليه، وصدروا عن رأيه، فسألت عنه، فقيل: هذا معاذ بن جبل رضي الله عنه، فلما كان من الغد، هجرت، فوجدته قد سبقني بالتهجير، ووجدته يصلي، فانتظرته حتى قضى صلاته، ثم جئته من قبل وجهه، فسلمت عليه، ثم قلت: والله إني لأحبك، فقال: آلله؟ فقال: الله، فقال: آلله؟ فقالت: الله، فأخذني بحبوة ردائي، فجبذني إليه، فقال:أبشر، فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: قال الله تعالى وجبت محبتي للمتحابين فيَّ، والمتجالسين فيَّ ، والمتزاورين فيَّ ، والمتباذلين فيَّ " حديث صحيح ((رواه مالك فيَّ الموطأ بإسناده الصحيح))
তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, ‘‘আল্লাহ তা‘আলা কিয়ামতের দিন বলবেন, ‘আমার মহিমা ও শ্রেষ্ঠত্বের জন্য পরস্পরকে যারা ভালবেসেছিল তারা কোথায়? আজকের দিন আমি তাদেরকে আমার ছায়ায় আশ্রয় দেব, যেদিন আমার (আরশের) ছায়া ছাড়া অন্য কোনো ছায়া নেই।’’ (মুসলিম) [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৮৩
عن أبي كريمة المقداد بن معد يكرب رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: إذا أحب الرجل أخاه، فليخبره أنه يحبه" ((رواه أبو داود، والترمذي وقال : حديث حسن))
তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, ‘‘সেই সত্তার কসম যার হাতে আমার প্রাণ রয়েছে! তোমরা জান্নাতে প্রবেশ করবে না; যতক্ষণ না তোমরা মু’মিন হবে। এবং তোমরা মু’মিন হতে পারবে না; যে পর্যন্ত না তোমরা পরস্পরে ভালবাসা রাখবে। আমি কি তোমাদেরকে এমন কাজ বলে দেব না, যখন তোমরা তা করবে, তখন তোমরা একে অপরকে ভালবাসতে লাগবে? তোমরা পরস্পরের মধ্যে সালাম প্রচার কর।’’ (মুসলিম) [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৮৪
وعن معاذ رضي الله عنه، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم، أخذ بيده وقال: يا معاذ، والله إني لأحبك، ثم أوصيك يا معاذ لا تدعن في دبر كل صلاة تقول: اللهم أعني على ذكرك وشكرك، وحسن عبادتك" حديث صحيح، ((رواه أبو داود والنسائي بإسناد صحيح))
নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেন, ‘‘এক ব্যক্তি অন্য কোন গ্রামে তার ভাইয়ের সাথে সাক্ষাৎ করার জন্য বের হল। আল্লাহ তা‘আলা তার রাস্তায় এক ফেরেশতাকে বসিয়ে দিলেন, তিনি তার অপেক্ষা করতে থাকলেন।’’ অতঃপর বাকী হাদীস উল্লেখ করে বললেন, ‘‘আল্লাহ তা‘আলা তোমাকে ভালবাসেন যেমন তুমি তাকে আল্লাহর জন্য ভালবাস।’’ (মুসলিম) (৩৬৫ নং হাদীস দ্রষ্টব্য) [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৮৫
وعن أنس، رضي الله عنه ، أن رجلاً كان عند النبي، صلى الله عليه وسلم، فمر رجل به، فقال: يا رسول الله إني لأحب هذا، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم: أأعلمته؟" قال: لا : قال: "أعلمه" فلحقه، فقال : إني أحبك في الله، فقال: أحبك الله الذي أحببتني له. ((رواه أبو داود بإسناد صحيح))."
নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আনসার সম্পর্কে বলেছেন, ‘‘তাদেরকে কেবলমাত্র মু’মিনই ভালোবাসে এবং তাদের প্রতি কেবলমাত্র মুনাফিকই বিদ্বেষ রাখে। যে ব্যক্তি তাদেরকে ভালবাসবে, আল্লাহও তাকে ভালবাসবেন। আর যে ব্যক্তি তাদের প্রতি বিদ্বেষ রাখবে, আল্লাহও তার প্রতি বিদ্বেষ রাখবেন।’’(বুখারী-মুসলিম) [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৮৬
وعن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: إن الله تعالى قال: "من عاد لي وليَّا، فقد آذنته بالحرب، وما تقرب إلي عبدي بشيء أحب إليَّ مما افترضت عليه، وما يزال عبدي يتقرب إليَّ بالنوافل حتى أحبه فإذا أحببته كنت سمعه الذي يسمع به، وبصره الذي يبصر به، ويده التي يبطش بها، ورجله التي يمشي بها، وإن سألني، أعطيته، ولئن استعاذني، لأعيذنه" ((رواه البخاري))."
আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছি, আল্লাহ তা‘আলা বলেন, ‘‘আমার মর্যাদার ওয়াস্তে যারা আপোসে ভালবাসা স্থাপন করবে, তাদের (বসার) জন্য হবে নূরের মিম্বর; যা দেখে নবী ও শহীদগণ ঈর্ষা করবেন।’’(তিরমিযী, হাসান সূত্রে) [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৮৭
وعنه عن النبي، صلى الله عليه وسلم، قال: إذا أحب الله العبد نادى جبريل: إن الله تعالى يحب فلانًا، فأحببه، فيحبه جبريل، فينادي في أهل السماء: إن الله يحب فلانًا، فأحبوه، فيحبه أهل السماء، ثم يوضع له القبول في الأرض" ((متفق عليه)) . وفي رواية لمسلم : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إن الله تعالى إذا أحب عبدًا دعا جبريل، فقال : إني أحب فلانًا فأحببه، فيحبه جبريل، ثم ينادي في السماء، فيقول: إن الله يحب فلانًا، فأحبوه فيحبه أهل السماء، ثم يوضع له القبول في الأرض، وإذا أبغض عبدًا دعا جبريل فيقول: إني أبغض فلانًا، فأبغضه، فيبغضه جبريل، ثم ينادي في أهل السماء، إن الله يبغض فلانًا، فأبغضوه، ثم توضع له البغضاء في الأرض"."
আমি দিমাশকের মসজিদে প্রবেশ করে এক যুবককে দেখতে পেলাম, তাঁর সামনের দাঁতগুলি খুবই চকচকে এবং তাঁর সঙ্গে কিছু লোকও (বসে) রয়েছে। যখন তারা কোনো বিষয়ে মতভেদ করছে, তখন (সিদ্ধান্তের জন্য) তাঁর দিকে রুজু করছে এবং তাঁর মত গ্রহণ করছে। সুতরাং আমি তাঁর সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম (যে, ইনি কে)? (আমাকে) বলা হল যে, ‘ইনি মু‘আয ইবনু জাবাল।’ অতঃপর আগামী কাল আমি আগেভাগেই মসজিদে গেলাম। কিন্তু দেখলাম সেই (যুবকটি) আমার আগেই পৌঁছে গেছেন এবং তাঁকে নামাযরত অবস্থায় পেলাম। সুতরাং তাঁর নামায শেষ হওয়া পর্যন্ত আমি অপেক্ষা করলাম। অতঃপর আমি তাঁর সামনে এসে তাঁকে সালাম দিলাম। তারপর বললাম, ‘আল্লাহর কসম! আমি আপনাকে আল্লাহর ওয়াস্তে ভালবাসি।’ তিনি বললেন, ‘আল্লাহর কসম?’ আমি বললাম, ‘আল্লাহর কসম।’ পুনরায় তিনি বললেন, ‘আল্লাহর কসম?’ আমি বললাম, ‘আল্লাহর কসম।’ অতঃপর তিনি আমার চাদরের আঁচল ধরে আমাকে তাঁর দিকে টানলেন, তারপর বললেন, ‘সুসংবাদ নাও।’ কারণ, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছি, ‘আল্লাহ তা‘আলা বলেছেন, ‘‘আমার সন্তুষ্টি লাভের জন্য যারা পরস্পরের মধ্যে মহব্বত রাখে, একে অপরের সঙ্গে বসে, একে অপরের সাথে সাক্ষাৎ এবং একে অপরের জন্য খরচ করে, তাদের জন্য আমার মহব্বত ও ভালবাসা ওয়াজেব হয়ে যায়।’’(মুওয়াত্তা বিশুদ্ধ সূত্রে) [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৮৮
وعن عائشة رضي الله عنها، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم، بعث رجلاً على سرية، فكان يقرأ لأصحابه في صلاتهم، فيختم بـ{قل هو الله أحد} فلما رجعوا، ذكروا ذلك لرسول الله، صلى الله عليه وسلم، فقال: سلوه لأي شيء كان يصنع ذلك؟ " فسألوه، فقال : لأنها صفة الرحمن، فأنا أحب أن أقرأ بها، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم :"أخبروه أن الله تعالى يحبه" ((متفق عليه)) ."
নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, ‘‘যখন কোন মানুষ তার ভাইকে ভালবাসে, তখন সে যেন তাকে জানিয়ে দেয় যে, সে তাকে ভালবাসে।’’ (তিরমিযী, হাসান সূত্রে) [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৮৯
وعن جندب بن عبد الله رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : من صلى صلاة الصبح، فهو في ذمة الله، فلا يطلبنكم الله من ذمته بشئ، فإنه من يطلبه من ذمته بشئ، يدركه، ثم يكبه على وجهه في نار جهنم ((رواه مسلم))."
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার হাত ধরে বললেন, ‘‘হে মু‘আয! আল্লাহর শপথ! নিঃসন্দেহে আমি তোমাকে ভালবাসি। অতঃপর আমি তোমাকে অসিয়ত করছি, হে মু‘আয! তুমি প্রত্যেক নামাযের পশ্চাতে এ শব্দগুলো বলা ছাড়বে না, ‘আল্লা-হুম্মা আ‘ইন্নী আলা যিকরিকা ওয়াশুকরিকা অহুসনি ইবা-দাতিক।’’ (অর্থাৎ হে আল্লাহ! তোমার যিকর করার, তোমার কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করার এবং উত্তমরূপে তোমার ইবাদত করার ব্যাপারে আমাকে সাহায্য কর।) (আবূ দাউদ, নাসায়ী বিশুদ্ধ সূত্রে) [১]
রিয়াদুস সলেহিন ৩৯০
وعن ابن عمر رضي الله عنهما، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: أمرت أن أقاتل الناس حتى يشهدوا أن لا إله إلا الله ، وأن محمداً رسول الله ، ويقيموا الصلاة، ويؤتوا الزكاة ، فإذا فعلوا ذلك عصموا مني دماءهم وأموالهم إلا بحق الإسلام، وحسابهم على الله تعالى" ((متفق عليه))
তিনি বলেন, এক ব্যক্তি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট (বসে) ছিল। অতঃপর এক ব্যক্তি তাঁর পাশ দিয়ে অতিক্রম করল। (যে বসেছিল) সে বলল, ‘হে আল্লাহর রাসূল! নিঃসন্দেহে আমি একে ভালবাসি।’ (এ কথা শুনে) নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন, ‘‘তুমি কি (এ কথা) তাকে জানিয়েছ?’’ সে বলল, ‘না।’ তিনি বললেন, ‘‘তাকে জানিয়ে দাও।’’ সুতরাং সে (দ্রুত) তার পিছনে গিয়ে (তাকে) বলল, ‘আমি আল্লাহর ওয়াস্তে তোমাকে ভালবাসি।’ সে বলল, ‘যাঁর ওয়াস্তে তুমি আমাকে ভালবাস, তিনি তোমাকে ভালবাসুন।’ (আবূ দাউদ, বিশুদ্ধ সূত্রে) [১]