সুনান নাসাঈ > স্বামীর বিনা অনুমতিতে স্ত্রীর দান
সুনান নাসাঈ ৩৭৫৯
أخبرنا أبو عاصم خشيش بن أصرم، قال: حدثنا عبد الرزاق، قال: أنبأنا معمر، عن ابن عجلان، عن سعيد، عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «لقد هممت أن لا أقبل هدية إلا من قرشي أو أنصاري أو ثقفي أو دوسي»
আবূ হুরায়রা (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন : আমি ইচ্ছা করেছিলাম, কারো হাদিয়া গ্রহণ করবো না; তবে কুরায়শী, আনসারী, ‘সাকাফী এবং দাওসীদের হাদিয়া গ্রহন করবো।
আবূ হুরায়রা (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন : আমি ইচ্ছা করেছিলাম, কারো হাদিয়া গ্রহণ করবো না; তবে কুরায়শী, আনসারী, ‘সাকাফী এবং দাওসীদের হাদিয়া গ্রহন করবো।
أخبرنا أبو عاصم خشيش بن أصرم، قال: حدثنا عبد الرزاق، قال: أنبأنا معمر، عن ابن عجلان، عن سعيد، عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «لقد هممت أن لا أقبل هدية إلا من قرشي أو أنصاري أو ثقفي أو دوسي»
সুনান নাসাঈ ৩৭৫৯
أخبرنا أبو عاصم خشيش بن أصرم، قال: حدثنا عبد الرزاق، قال: أنبأنا معمر، عن ابن عجلان، عن سعيد، عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «لقد هممت أن لا أقبل هدية إلا من قرشي أو أنصاري أو ثقفي أو دوسي»
আবূ হুরায়রা (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন : আমি ইচ্ছা করেছিলাম, কারো হাদিয়া গ্রহণ করবো না; তবে কুরায়শী, আনসারী, ‘সাকাফী এবং দাওসীদের হাদিয়া গ্রহন করবো।
আবূ হুরায়রা (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন : আমি ইচ্ছা করেছিলাম, কারো হাদিয়া গ্রহণ করবো না; তবে কুরায়শী, আনসারী, ‘সাকাফী এবং দাওসীদের হাদিয়া গ্রহন করবো।
أخبرنا أبو عاصم خشيش بن أصرم، قال: حدثنا عبد الرزاق، قال: أنبأنا معمر، عن ابن عجلان، عن سعيد، عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «لقد هممت أن لا أقبل هدية إلا من قرشي أو أنصاري أو ثقفي أو دوسي»
সুনান নাসাঈ ৩৭৫৯
أخبرنا أبو عاصم خشيش بن أصرم، قال: حدثنا عبد الرزاق، قال: أنبأنا معمر، عن ابن عجلان، عن سعيد، عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «لقد هممت أن لا أقبل هدية إلا من قرشي أو أنصاري أو ثقفي أو دوسي»
আবূ হুরায়রা (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন : আমি ইচ্ছা করেছিলাম, কারো হাদিয়া গ্রহণ করবো না; তবে কুরায়শী, আনসারী, ‘সাকাফী এবং দাওসীদের হাদিয়া গ্রহন করবো।
আবূ হুরায়রা (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন : আমি ইচ্ছা করেছিলাম, কারো হাদিয়া গ্রহণ করবো না; তবে কুরায়শী, আনসারী, ‘সাকাফী এবং দাওসীদের হাদিয়া গ্রহন করবো।
أخبرنا أبو عاصم خشيش بن أصرم، قال: حدثنا عبد الرزاق، قال: أنبأنا معمر، عن ابن عجلان، عن سعيد، عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «لقد هممت أن لا أقبل هدية إلا من قرشي أو أنصاري أو ثقفي أو دوسي»
সুনান নাসাঈ ৩৭৬০
أخبرنا إسحاق بن إبراهيم، قال: حدثنا وكيع، قال: حدثنا شعبة، عن قتادة، عن أنس، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أتي بلحم فقال: «ما هذا؟» فقيل: تصدق به على بريرة، فقال: «هو لها صدقة ولنا هدية»
আনাস (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে গোশ্ত দেয়া হলে তিনি জিজ্ঞাসা করলেন : এ কী (এই গোশত কোন্ ধরনের)? বলা হলো : তা বারীরাহ্কে সাদ্কারূপে দেয়া হয়েছে। তিনি বললেন : তা তার জন্য তো সাদ্কা, কিন্তু আমাদের জন্য হাদিয়া।
আনাস (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে গোশ্ত দেয়া হলে তিনি জিজ্ঞাসা করলেন : এ কী (এই গোশত কোন্ ধরনের)? বলা হলো : তা বারীরাহ্কে সাদ্কারূপে দেয়া হয়েছে। তিনি বললেন : তা তার জন্য তো সাদ্কা, কিন্তু আমাদের জন্য হাদিয়া।
أخبرنا إسحاق بن إبراهيم، قال: حدثنا وكيع، قال: حدثنا شعبة، عن قتادة، عن أنس، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أتي بلحم فقال: «ما هذا؟» فقيل: تصدق به على بريرة، فقال: «هو لها صدقة ولنا هدية»
সুনান নাসাঈ ৩৭৫৬
أخبرنا محمد بن معمر، قال: حدثنا حبان، قال: حدثنا حماد بن سلمة، ح وأخبرني إبراهيم بن يونس بن محمد، قال: حدثنا أبي، قال: حدثنا حماد بن سلمة، عن داود وهو ابن أبي هند، وحبيب المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «لا يجوز لامرأة هبة في مالها إذا ملك زوجها عصمتها» اللفظ لمحمد "
আমর ইব্ন শুআয়ব (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন : স্ত্রীর পক্ষে তার মাল হতে দান করা বৈধ নয়, যখন তার স্বামী তার ইযযতের মালিক হয়ে যায়। [১]
আমর ইব্ন শুআয়ব (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন : স্ত্রীর পক্ষে তার মাল হতে দান করা বৈধ নয়, যখন তার স্বামী তার ইযযতের মালিক হয়ে যায়। [১]
أخبرنا محمد بن معمر، قال: حدثنا حبان، قال: حدثنا حماد بن سلمة، ح وأخبرني إبراهيم بن يونس بن محمد، قال: حدثنا أبي، قال: حدثنا حماد بن سلمة، عن داود وهو ابن أبي هند، وحبيب المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «لا يجوز لامرأة هبة في مالها إذا ملك زوجها عصمتها» اللفظ لمحمد "
সুনান নাসাঈ ৩৭৫৬
أخبرنا محمد بن معمر، قال: حدثنا حبان، قال: حدثنا حماد بن سلمة، ح وأخبرني إبراهيم بن يونس بن محمد، قال: حدثنا أبي، قال: حدثنا حماد بن سلمة، عن داود وهو ابن أبي هند، وحبيب المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «لا يجوز لامرأة هبة في مالها إذا ملك زوجها عصمتها» اللفظ لمحمد "
আমর ইব্ন শুআয়ব (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন : স্ত্রীর পক্ষে তার মাল হতে দান করা বৈধ নয়, যখন তার স্বামী তার ইযযতের মালিক হয়ে যায়। [১]
আমর ইব্ন শুআয়ব (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন : স্ত্রীর পক্ষে তার মাল হতে দান করা বৈধ নয়, যখন তার স্বামী তার ইযযতের মালিক হয়ে যায়। [১]
أخبرنا محمد بن معمر، قال: حدثنا حبان، قال: حدثنا حماد بن سلمة، ح وأخبرني إبراهيم بن يونس بن محمد، قال: حدثنا أبي، قال: حدثنا حماد بن سلمة، عن داود وهو ابن أبي هند، وحبيب المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «لا يجوز لامرأة هبة في مالها إذا ملك زوجها عصمتها» اللفظ لمحمد "
সুনান নাসাঈ ৩৭৫৬
أخبرنا محمد بن معمر، قال: حدثنا حبان، قال: حدثنا حماد بن سلمة، ح وأخبرني إبراهيم بن يونس بن محمد، قال: حدثنا أبي، قال: حدثنا حماد بن سلمة، عن داود وهو ابن أبي هند، وحبيب المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «لا يجوز لامرأة هبة في مالها إذا ملك زوجها عصمتها» اللفظ لمحمد "
আমর ইব্ন শুআয়ব (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন : স্ত্রীর পক্ষে তার মাল হতে দান করা বৈধ নয়, যখন তার স্বামী তার ইযযতের মালিক হয়ে যায়। [১]
আমর ইব্ন শুআয়ব (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন : স্ত্রীর পক্ষে তার মাল হতে দান করা বৈধ নয়, যখন তার স্বামী তার ইযযতের মালিক হয়ে যায়। [১]
أخبرنا محمد بن معمر، قال: حدثنا حبان، قال: حدثنا حماد بن سلمة، ح وأخبرني إبراهيم بن يونس بن محمد، قال: حدثنا أبي، قال: حدثنا حماد بن سلمة، عن داود وهو ابن أبي هند، وحبيب المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «لا يجوز لامرأة هبة في مالها إذا ملك زوجها عصمتها» اللفظ لمحمد "
সুনান নাসাঈ ৩৭৫৭
أخبرنا إسماعيل بن مسعود، قال: حدثنا خالد، قال: حدثنا حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب، أن أباه، حدثه، عن عبد الله بن عمرو، ح وأخبرنا حميد بن مسعدة، قال: حدثنا يزيد بن زريع، قال: حدثنا حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: لما فتح رسول الله صلى الله عليه وسلم مكة قام خطيبا فقال في خطبته: «لا يجوز لامرأة عطية إلا بإذن زوجها»
আবদুল্লাহ্ ইব্ন আমর ইব্ন শু’আয়ব (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
তিনি বলেছেন : রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের পর খুতবা দিতে গিয়ে দাঁড়িয়ে বললেন : স্বামীর অনুমতি ব্যতীত কোন স্ত্রীর জন্য কাউকে কিছু দান করা বৈধ নয়।
আবদুল্লাহ্ ইব্ন আমর ইব্ন শু’আয়ব (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
তিনি বলেছেন : রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের পর খুতবা দিতে গিয়ে দাঁড়িয়ে বললেন : স্বামীর অনুমতি ব্যতীত কোন স্ত্রীর জন্য কাউকে কিছু দান করা বৈধ নয়।
أخبرنا إسماعيل بن مسعود، قال: حدثنا خالد، قال: حدثنا حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب، أن أباه، حدثه، عن عبد الله بن عمرو، ح وأخبرنا حميد بن مسعدة، قال: حدثنا يزيد بن زريع، قال: حدثنا حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: لما فتح رسول الله صلى الله عليه وسلم مكة قام خطيبا فقال في خطبته: «لا يجوز لامرأة عطية إلا بإذن زوجها»
সুনান নাসাঈ ৩৭৫৭
أخبرنا إسماعيل بن مسعود، قال: حدثنا خالد، قال: حدثنا حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب، أن أباه، حدثه، عن عبد الله بن عمرو، ح وأخبرنا حميد بن مسعدة، قال: حدثنا يزيد بن زريع، قال: حدثنا حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: لما فتح رسول الله صلى الله عليه وسلم مكة قام خطيبا فقال في خطبته: «لا يجوز لامرأة عطية إلا بإذن زوجها»
আবদুল্লাহ্ ইব্ন আমর ইব্ন শু’আয়ব (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
তিনি বলেছেন : রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের পর খুতবা দিতে গিয়ে দাঁড়িয়ে বললেন : স্বামীর অনুমতি ব্যতীত কোন স্ত্রীর জন্য কাউকে কিছু দান করা বৈধ নয়।
আবদুল্লাহ্ ইব্ন আমর ইব্ন শু’আয়ব (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
তিনি বলেছেন : রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের পর খুতবা দিতে গিয়ে দাঁড়িয়ে বললেন : স্বামীর অনুমতি ব্যতীত কোন স্ত্রীর জন্য কাউকে কিছু দান করা বৈধ নয়।
أخبرنا إسماعيل بن مسعود، قال: حدثنا خالد، قال: حدثنا حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب، أن أباه، حدثه، عن عبد الله بن عمرو، ح وأخبرنا حميد بن مسعدة، قال: حدثنا يزيد بن زريع، قال: حدثنا حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: لما فتح رسول الله صلى الله عليه وسلم مكة قام خطيبا فقال في خطبته: «لا يجوز لامرأة عطية إلا بإذن زوجها»
সুনান নাসাঈ ৩৭৫৭
أخبرنا إسماعيل بن مسعود، قال: حدثنا خالد، قال: حدثنا حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب، أن أباه، حدثه، عن عبد الله بن عمرو، ح وأخبرنا حميد بن مسعدة، قال: حدثنا يزيد بن زريع، قال: حدثنا حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: لما فتح رسول الله صلى الله عليه وسلم مكة قام خطيبا فقال في خطبته: «لا يجوز لامرأة عطية إلا بإذن زوجها»
আবদুল্লাহ্ ইব্ন আমর ইব্ন শু’আয়ব (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
তিনি বলেছেন : রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের পর খুতবা দিতে গিয়ে দাঁড়িয়ে বললেন : স্বামীর অনুমতি ব্যতীত কোন স্ত্রীর জন্য কাউকে কিছু দান করা বৈধ নয়।
আবদুল্লাহ্ ইব্ন আমর ইব্ন শু’আয়ব (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
তিনি বলেছেন : রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের পর খুতবা দিতে গিয়ে দাঁড়িয়ে বললেন : স্বামীর অনুমতি ব্যতীত কোন স্ত্রীর জন্য কাউকে কিছু দান করা বৈধ নয়।
أخبرنا إسماعيل بن مسعود، قال: حدثنا خالد، قال: حدثنا حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب، أن أباه، حدثه، عن عبد الله بن عمرو، ح وأخبرنا حميد بن مسعدة، قال: حدثنا يزيد بن زريع، قال: حدثنا حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: لما فتح رسول الله صلى الله عليه وسلم مكة قام خطيبا فقال في خطبته: «لا يجوز لامرأة عطية إلا بإذن زوجها»
সুনান নাসাঈ ৩৭৫৮
أخبرنا هناد بن السري، قال: حدثنا أبو بكر بن عياش، عن يحيى بن هانئ، عن أبي حذيفة، عن عبد الملك بن محمد بن بشير، عن عبد الرحمن بن علقمة الثقفي، قال: قدم وفد ثقيف على رسول الله صلى الله عليه وسلم ومعهم هدية، فقال: «أهدية أم صدقة؟ فإن كانت هدية فإنما يبتغى بها وجه رسول الله صلى الله عليه وسلم وقضاء الحاجة، وإن كانت صدقة فإنما يبتغى بها وجه الله عز وجل»، قالوا: لا بل هدية، فقبلها منهم وقعد معهم يسائلهم ويسائلونه حتى صلى الظهر مع العصر
আবদুর রহমান ইব্ন আলকামা (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
সাকাফী গোত্রের প্রতিনিধি দল রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপস্থিত হয়, তখন তাদের হাতে কিছু হাদিয়া ছিল। তিনি বললেন : এটা হাদিয়া না সাদকা ? যদি তা হাদিয়া হয়, তবে এরদ্বারা তো আল্লাহ্র রাসূলের সন্তুষ্টি অর্জন এবং উদ্দেশ্য পূর্ণ হওয়ার বাসনা হয়ে থাকে। আর যদি তা সাদাকা হয়, তবে তা মহান মহীয়ান আল্লাহ্ তা’আলার সন্তুষ্টি লাভ করা উদ্দেশ্য। তারা বললেন : না, ইহা হাদিয়া। তখন রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের এই হাদিয়া গ্রহণ করলেন। আর তিনি তাদের সাথে উপবেশন করলেন এবং তিনি জিজ্ঞাসাবাদ করতে লাগলেন (তাদের প্রশ্ন করতে লাগলেন এবং তারাও তাঁকে প্রশ্ন করতে) লাগলো। এরপর রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুহরের সালাত আদায় করলেন আসরের সালাতের সঙ্গে, অর্থাৎ জুহরের শেষ ওয়াকতে জুহরের সালাত আদায় করে, আসরের প্রথম ওয়াকতে সেখানে আসরের সালাত আদায় করেন।
আবদুর রহমান ইব্ন আলকামা (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
সাকাফী গোত্রের প্রতিনিধি দল রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপস্থিত হয়, তখন তাদের হাতে কিছু হাদিয়া ছিল। তিনি বললেন : এটা হাদিয়া না সাদকা ? যদি তা হাদিয়া হয়, তবে এরদ্বারা তো আল্লাহ্র রাসূলের সন্তুষ্টি অর্জন এবং উদ্দেশ্য পূর্ণ হওয়ার বাসনা হয়ে থাকে। আর যদি তা সাদাকা হয়, তবে তা মহান মহীয়ান আল্লাহ্ তা’আলার সন্তুষ্টি লাভ করা উদ্দেশ্য। তারা বললেন : না, ইহা হাদিয়া। তখন রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের এই হাদিয়া গ্রহণ করলেন। আর তিনি তাদের সাথে উপবেশন করলেন এবং তিনি জিজ্ঞাসাবাদ করতে লাগলেন (তাদের প্রশ্ন করতে লাগলেন এবং তারাও তাঁকে প্রশ্ন করতে) লাগলো। এরপর রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুহরের সালাত আদায় করলেন আসরের সালাতের সঙ্গে, অর্থাৎ জুহরের শেষ ওয়াকতে জুহরের সালাত আদায় করে, আসরের প্রথম ওয়াকতে সেখানে আসরের সালাত আদায় করেন।
أخبرنا هناد بن السري، قال: حدثنا أبو بكر بن عياش، عن يحيى بن هانئ، عن أبي حذيفة، عن عبد الملك بن محمد بن بشير، عن عبد الرحمن بن علقمة الثقفي، قال: قدم وفد ثقيف على رسول الله صلى الله عليه وسلم ومعهم هدية، فقال: «أهدية أم صدقة؟ فإن كانت هدية فإنما يبتغى بها وجه رسول الله صلى الله عليه وسلم وقضاء الحاجة، وإن كانت صدقة فإنما يبتغى بها وجه الله عز وجل»، قالوا: لا بل هدية، فقبلها منهم وقعد معهم يسائلهم ويسائلونه حتى صلى الظهر مع العصر