মুয়াত্তা ইমাম মালিক > কানযের বর্ণনা

মুয়াত্তা ইমাম মালিক ৫৮১

حدثني يحيى عن مالك عن عبد الله بن دينار أنه قال سمعت عبد الله بن عمر وهو يسأل عن الكنز ما هو فقال هو المال الذي لا تؤدى منه الزكاة.

আবদুল্লাহ ইবনু দীনার (র) থেকে বর্নিতঃ

কানয সম্পর্কে আবদুল্লাহ্ ইবনু উমার (রা)-কে জিজ্ঞেস করা হলে তিনি বলেছিলেন, কানয হল এমন ধরনের সম্পদ, যার যাকাত আদায় করা হয়নি। (হাদীসটি ইমাম মালিক (রঃ) একক ভাবে বর্ণনা করেছেন)

আবদুল্লাহ ইবনু দীনার (র) থেকে বর্নিতঃ

কানয সম্পর্কে আবদুল্লাহ্ ইবনু উমার (রা)-কে জিজ্ঞেস করা হলে তিনি বলেছিলেন, কানয হল এমন ধরনের সম্পদ, যার যাকাত আদায় করা হয়নি। (হাদীসটি ইমাম মালিক (রঃ) একক ভাবে বর্ণনা করেছেন)

حدثني يحيى عن مالك عن عبد الله بن دينار أنه قال سمعت عبد الله بن عمر وهو يسأل عن الكنز ما هو فقال هو المال الذي لا تؤدى منه الزكاة.


মুয়াত্তা ইমাম মালিক ৫৮২

و حدثني عن مالك عن عبد الله بن دينار عن أبي صالح السمان عن أبي هريرة أنه كان يقول من كان عنده مال لم يؤد زكاته مثل له يوم القيامة شجاعا أقرع له زبيبتان يطلبه حتى يمكنه يقول أنا كنزك.

আবূ হুরায়রা (রা) থেকে বর্নিতঃ

আবূ হুরায়রা (রা) বলতেন যে সম্পদের যাকাত আদায় করা হয়নি, কিয়ামতের দিন সে সম্পদ এক সাদা বর্ণের মাথাওয়ালা সাপের রূপ ধারণ করবে। উহার চোখের উপর কাল দাগ হবে এবং আপন মালিককে খুঁজতে থাকবে। শেষে তাকে তালাশ করে বের করবে এবং বলবে, আমি তোমারই সম্পত্তি, যার যাকাত তুমি আদায় করনি। (হাদীসটি ইমাম মালিক (রঃ) একক ভাবে বর্ণনা করেছেন)

আবূ হুরায়রা (রা) থেকে বর্নিতঃ

আবূ হুরায়রা (রা) বলতেন যে সম্পদের যাকাত আদায় করা হয়নি, কিয়ামতের দিন সে সম্পদ এক সাদা বর্ণের মাথাওয়ালা সাপের রূপ ধারণ করবে। উহার চোখের উপর কাল দাগ হবে এবং আপন মালিককে খুঁজতে থাকবে। শেষে তাকে তালাশ করে বের করবে এবং বলবে, আমি তোমারই সম্পত্তি, যার যাকাত তুমি আদায় করনি। (হাদীসটি ইমাম মালিক (রঃ) একক ভাবে বর্ণনা করেছেন)

و حدثني عن مالك عن عبد الله بن دينار عن أبي صالح السمان عن أبي هريرة أنه كان يقول من كان عنده مال لم يؤد زكاته مثل له يوم القيامة شجاعا أقرع له زبيبتان يطلبه حتى يمكنه يقول أنا كنزك.


মুয়াত্তা ইমাম মালিক > চতুষ্পদ পশুর যাকাত

মুয়াত্তা ইমাম মালিক ৫৮৩

- حدثني يحيى عن مالك أنه قرأ كتاب عمر بن الخطاب في الصدقة قال فوجدت فيه بسم الله الرحمن الرحيم كتاب الصدقة في أربع وعشرين من الإبل فدونها الغنم في كل خمس شاة وفيما فوق ذلك إلى خمس وثلاثين ابنة مخاض فإن لم تكن ابنة مخاض فابن لبون ذكر وفيما فوق ذلك إلى خمس وأربعين بنت لبون وفيما فوق ذلك إلى ستين حقة طروقة الفحل وفيما فوق ذلك إلى خمس وسبعين جذعة وفيما فوق ذلك إلى تسعين ابنتا لبون وفيما فوق ذلك إلى عشرين ومائة حقتان طروقتا الفحل فما زاد على ذلك من الإبل ففي كل أربعين بنت لبون وفي كل خمسين حقة وفي سائمة الغنم إذا بلغت أربعين إلى عشرين ومائة شاة وفيما فوق ذلك إلى مائتين شاتان وفيما فوق ذلك إلى ثلاث مائة ثلاث شياه فما زاد على ذلك ففي كل مائة شاة ولا يخرج في الصدقة تيس ولا هرمة ولا ذات عوار إلا ما شاء المصدق ولا يجمع بين مفترق ولا يفرق بين مجتمع خشية الصدقة وما كان من خليطين فإنهما يتراجعان بينهما بالسوية وفي الرقة إذا بلغت خمس أواق ربع العشر.

বর্ণনাকারী থেকে বর্নিতঃ

মালিক (র) উমার ইবনু খাত্তাব (রা)-এর যাকাত সম্পর্কীয় পত্রটি পাঠ করেছিলেন। (হাদীসটি ইমাম মালিক (রঃ) একক ভাবে বর্ণনা করেছেন) এতে নিম্নরূপ বিবরণ লিখিত ছিল বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহিম। যাকাত সম্পর্কে এই পত্রটি লিখিত (পাঁচ হতে) চব্বিশ পর্যন্ত উটে প্রতি পাঁচটিতে একটি ছাগল ধার্য হবে। চব্বিশ হতে পঁয়ত্রিশ পর্যন্ত উটে একটি এক বৎসর বয়সী উষ্ট্রী ধার্য হবে। এক বৎসর বয়সের উষ্ট্রী না থাকলে দুই বৎসর বয়সের একটি উষ্ট্রী গ্রহণ করা যাবে। পঁয়ত্রিশ হতে পঁয়তাল্লিশটি পর্যন্ত দুই বৎসর বয়সের একটি উষ্ট্রী ধার্য হবে। পঁয়তাল্লিশ হতে ষাট পর্যন্ত তিন বৎসর বয়সের একটি উষ্ট্রী ধার্য হবে। ষাট হতে পঁচাত্তর পর্যন্ত সংখ্যায় চার বৎসর বয়সের একটি উষ্ট্রী ধার্য হবে। পঁচাত্তর হতে নব্বই পর্যন্ত সংখ্যায় দুই বছর বয়সের দুটি উষ্ট্রী ধার্য হবে। নব্বই হতে একশত বিশটি পর্যন্ত উটে তিন বৎসর বয়সের দুটি উষ্ট্রী ধার্য হবে। একশত বিশের উর্ধ্বে প্রতি চল্লিশটিতে দুই বৎসর বয়সের একটি উষ্ট্রী এবং প্রতি পঞ্চাশটিতে তিন বৎসর বয়সের একটি করে উষ্ট্রী ধার্য হবে। চারণভূমিতে বিচরণরত ছাগলের সংখ্যা চল্লিশটি হলে চল্লিশ হতে একশত বিশ পর্যন্ত একটি বকরী ধার্য হবে। একশত বিশ হতে দুইশত পর্যন্ত দুটি বকরী এবং দুইশত হতে তিনশত পর্যন্ত তিনটি বকরী ধার্য হবে। পরে প্রতি শতে একটি করে বকরী আদায় করতে হবে। যাকাতের ক্ষেত্রে ছাগল গ্রহণ করা হবে না। এমনিভাবে দোষযুক্ত এবং বৃদ্ধ পশুও এতে গ্রহণ করা হবে না। যাকাত উসুলকারী ব্যক্তি যদি ভাল মনে করেন তবে তা নিতে পারেন। যাকাত ধার্য হওয়ার ভয়ে পশুর বিভিন্ন দলকে একত্র বা দলকে বিভক্ত যেন করা না হয়। [১] একদল পশুতে যারা শরীক আছেন তাঁরা যাকাত আদায়ের ক্ষেত্রে বরাবর হিসাব ভাগী হবেন। রৌপ্য পাঁচ উকিয়া পরিমাণ হলে তাতে এক-চত্তারিংশ যাকাত দিতে হবে। (হাদীসটি ইমাম মালিক (রঃ) একক ভাবে বর্ণনা করেছেন)

বর্ণনাকারী থেকে বর্নিতঃ

মালিক (র) উমার ইবনু খাত্তাব (রা)-এর যাকাত সম্পর্কীয় পত্রটি পাঠ করেছিলেন। (হাদীসটি ইমাম মালিক (রঃ) একক ভাবে বর্ণনা করেছেন) এতে নিম্নরূপ বিবরণ লিখিত ছিল বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহিম। যাকাত সম্পর্কে এই পত্রটি লিখিত (পাঁচ হতে) চব্বিশ পর্যন্ত উটে প্রতি পাঁচটিতে একটি ছাগল ধার্য হবে। চব্বিশ হতে পঁয়ত্রিশ পর্যন্ত উটে একটি এক বৎসর বয়সী উষ্ট্রী ধার্য হবে। এক বৎসর বয়সের উষ্ট্রী না থাকলে দুই বৎসর বয়সের একটি উষ্ট্রী গ্রহণ করা যাবে। পঁয়ত্রিশ হতে পঁয়তাল্লিশটি পর্যন্ত দুই বৎসর বয়সের একটি উষ্ট্রী ধার্য হবে। পঁয়তাল্লিশ হতে ষাট পর্যন্ত তিন বৎসর বয়সের একটি উষ্ট্রী ধার্য হবে। ষাট হতে পঁচাত্তর পর্যন্ত সংখ্যায় চার বৎসর বয়সের একটি উষ্ট্রী ধার্য হবে। পঁচাত্তর হতে নব্বই পর্যন্ত সংখ্যায় দুই বছর বয়সের দুটি উষ্ট্রী ধার্য হবে। নব্বই হতে একশত বিশটি পর্যন্ত উটে তিন বৎসর বয়সের দুটি উষ্ট্রী ধার্য হবে। একশত বিশের উর্ধ্বে প্রতি চল্লিশটিতে দুই বৎসর বয়সের একটি উষ্ট্রী এবং প্রতি পঞ্চাশটিতে তিন বৎসর বয়সের একটি করে উষ্ট্রী ধার্য হবে। চারণভূমিতে বিচরণরত ছাগলের সংখ্যা চল্লিশটি হলে চল্লিশ হতে একশত বিশ পর্যন্ত একটি বকরী ধার্য হবে। একশত বিশ হতে দুইশত পর্যন্ত দুটি বকরী এবং দুইশত হতে তিনশত পর্যন্ত তিনটি বকরী ধার্য হবে। পরে প্রতি শতে একটি করে বকরী আদায় করতে হবে। যাকাতের ক্ষেত্রে ছাগল গ্রহণ করা হবে না। এমনিভাবে দোষযুক্ত এবং বৃদ্ধ পশুও এতে গ্রহণ করা হবে না। যাকাত উসুলকারী ব্যক্তি যদি ভাল মনে করেন তবে তা নিতে পারেন। যাকাত ধার্য হওয়ার ভয়ে পশুর বিভিন্ন দলকে একত্র বা দলকে বিভক্ত যেন করা না হয়। [১] একদল পশুতে যারা শরীক আছেন তাঁরা যাকাত আদায়ের ক্ষেত্রে বরাবর হিসাব ভাগী হবেন। রৌপ্য পাঁচ উকিয়া পরিমাণ হলে তাতে এক-চত্তারিংশ যাকাত দিতে হবে। (হাদীসটি ইমাম মালিক (রঃ) একক ভাবে বর্ণনা করেছেন)

- حدثني يحيى عن مالك أنه قرأ كتاب عمر بن الخطاب في الصدقة قال فوجدت فيه بسم الله الرحمن الرحيم كتاب الصدقة في أربع وعشرين من الإبل فدونها الغنم في كل خمس شاة وفيما فوق ذلك إلى خمس وثلاثين ابنة مخاض فإن لم تكن ابنة مخاض فابن لبون ذكر وفيما فوق ذلك إلى خمس وأربعين بنت لبون وفيما فوق ذلك إلى ستين حقة طروقة الفحل وفيما فوق ذلك إلى خمس وسبعين جذعة وفيما فوق ذلك إلى تسعين ابنتا لبون وفيما فوق ذلك إلى عشرين ومائة حقتان طروقتا الفحل فما زاد على ذلك من الإبل ففي كل أربعين بنت لبون وفي كل خمسين حقة وفي سائمة الغنم إذا بلغت أربعين إلى عشرين ومائة شاة وفيما فوق ذلك إلى مائتين شاتان وفيما فوق ذلك إلى ثلاث مائة ثلاث شياه فما زاد على ذلك ففي كل مائة شاة ولا يخرج في الصدقة تيس ولا هرمة ولا ذات عوار إلا ما شاء المصدق ولا يجمع بين مفترق ولا يفرق بين مجتمع خشية الصدقة وما كان من خليطين فإنهما يتراجعان بينهما بالسوية وفي الرقة إذا بلغت خمس أواق ربع العشر.


মুয়াত্তা ইমাম মালিক > গরু-মহিষাদির যাকাত

মুয়াত্তা ইমাম মালিক ৫৮৪

حدثني يحيى عن مالك عن حميد بن قيس المكي عن طاوس اليماني أن معاذ بن جبل الأنصاري أخذ من ثلاثين بقرة تبيعا ومن أربعين بقرة مسنة وأتي بما دون ذلك فأبى أن يأخذ منه شيئا وقال لم أسمع من رسول الله صلى الله عليه وسلم فيه شيئا حتى ألقاه فأسأله فتوفي رسول الله صلى الله عليه وسلم قبل أن يقدم معاذ بن جبل ৮৯২-قال يحيى قال مالك أحسن ما سمعت فيمن كانت له غنم على راعيين مفترقين أو على رعاء مفترقين في بلدان شتى أن ذلك يجمع كله على صاحبه فيؤدي منه صدقته ومثل ذلك الرجل يكون له الذهب أو الورق متفرقة في أيدي ناس شتى إنه ينبغي له أن يجمعها فيخرج منها ما وجب عليه في ذلك من زكاتها ৮৯৩-و قال يحيى قال مالك في الرجل يكون له الضأن والمعز أنها تجمع عليه في الصدقة فإن كان فيها ما تجب فيه الصدقة صدقت وقال إنما هي غنم كلها وفي كتاب عمر بن الخطاب وفي سائمة الغنم إذا بلغت أربعين شاة شاة قال مالك فإن كانت الضأن هي أكثر من المعز ولم يجب على ربها إلا شاة واحدة أخذ المصدق تلك الشاة التي وجبت على رب المال من الضأن وإن كانت المعز أكثر من الضأن أخذ منها فإن استوى الضأن والمعز أخذ الشاة من أيتهما شاء ৮৯৪-قال يحيى قال مالك وكذلك الإبل العراب والبخت يجمعان على ربهما في الصدقة وقال إنما هي إبل كلها فإن كانت العراب هي أكثر من البخت ولم يجب على ربها إلا بعير واحد فليأخذ من العراب صدقتها فإن كانت البخت أكثر فليأخذ منها فإن استوت فليأخذ من أيتهما شاء ৮৯৫-قال مالك وكذلك البقر والجواميس تجمع في الصدقة على ربها وقال إنما هي بقر كلها فإن كانت البقر هي أكثر من الجواميس ولا تجب على ربها إلا بقرة واحدة فليأخذ من البقر صدقتهما وإن كانت الجواميس أكثر فليأخذ منها فإن استوت فليأخذ من أيتهما شاء فإذا وجبت في ذلك الصدقة صدق الصنفان جميعا ৮৯৬ قال يحيى قال مالك من أفاد ماشية من إبل أو بقر أو غنم فلا صدقة عليه فيها حتى يحول عليها الحول من يوم أفادها إلا أن يكون له قبلها نصاب ماشية والنصاب ما تجب فيه الصدقة إما خمس ذود من الإبل وإما ثلاثون بقرة وإما أربعون شاة فإذا كان للرجل خمس ذود من الإبل أو ثلاثون بقرة أو أربعون شاة ثم أفاد إليها إبلا أو بقرا أو غنما باشتراء أو هبة أو ميراث فإنه يصدقها مع ماشيته حين يصدقها وإن لم يحل على الفائدة الحول وإن كان ما أفاد من الماشية إلى ماشيته قد صدقت قبل أن يشتريها بيوم واحد أو قبل أن يرثها بيوم واحد فإنه يصدقها مع ماشيته حين يصدق ماشيته ৮৯৭قال يحيى قال مالك وإنما مثل ذلك مثل الورق يزكيها الرجل ثم يشتري بها من رجل آخر عرضا وقد وجبت عليه في عرضه ذلك إذا باعه الصدقة فيخرج الرجل الآخر صدقتها هذا اليوم ويكون الآخر قد صدقها من الغد ৮৯قال مالك في رجل كانت له غنم لا تجب فيها الصدقة فاشترى إليها غنما كثيرة تجب في دونها الصدقة أو ورثها أنه لا تجب عليه في الغنم كلها الصدقة حتى يحول عليها الحول من يوم أفادها باشتراء أو ميراث وذلك أن كل ما كان عند الرجل من ماشية لا تجب فيها الصدقة من إبل أو بقر أو غنم فليس يعد ذلك نصاب مال حتى يكون في كل صنف منها ما تجب فيه الصدقة فذلك النصاب الذي يصدق معه ما أفاد إليه صاحبه من قليل أو كثير من الماشية ৮৯৯-قال مالك ولو كانت لرجل إبل أو بقر أو غنم تجب في كل صنف منها الصدقة ثم أفاد إليها بعيرا أو بقرة أو شاة صدقها مع ماشيته حين يصدقها قال يحيى قال مالك وهذا أحب ما سمعت إلي في هذا ৯قال مالك في الفريضة تجب على الرجل فلا توجد عنده أنها إن كانت ابنة مخاض فلم توجد أخذ مكانها ابن لبون ذكر وإن كانت بنت لبون أو حقة أو جذعة ولم يكن عنده كان على رب الإبل أن يبتاعها له حتى يأتيه بها ولا أحب أن يعطيه قيمته ৯و قال مالك في الإبل النواضح والبقر السواني وبقر الحرث إني أرى أن يؤخذ من ذلك كله إذا وجبت فيه الصدقة.

তাউস ইয়ামানী (র) থেকে বর্নিতঃ

মুয়ায ইবনু জাবল (রা) ত্রিশটি গাভীতে এক একটি বৎসরের বাছুর এবং চল্লিশটি গাভীতে দুই বছর বয়সের একটি গাভী গ্রহণ করেছিলেন। ত্রিশের কম সংখ্যায় কিছুই তিনি নেননি। তখন তিনি বলেছিলেন, এই বিষয়ে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়াসাল্লাম) হতে কোন নির্দেশ আমি শুনি নাই। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়াসাল্লাম) এর সাথে যদি পুনরায় সাক্ষাৎ ঘটে তবে এই সম্পর্কে জিজ্ঞেস করে জেনে নিব। কিন্তু মুয়ায (রা) (ইয়ামন হতে ফিরে) আসার পূর্বেই রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়াসাল্লাম) আল্লাহর সান্নিধ্যে চলে গিয়েছিলেন। (সহীহ, আবূ দাঊদ ১৫৭৭, তিরমিযী ৬২৩, নাসাঈ ২৪৫০, ইবনু মাজাহ ১৮০৩, আলবানী হাদীসটিকে সহীহ বলেছেন [সহীহ ও যয়ীফ সুনানে আবূ দাঊদ]) মালিক (র) বলেন, কারো বকরীসমূহ দুই বা ততোধিক একত্র করার পর যে সংখ্যায় হবে সেই অনুসারে এর যাকাত ধার্য হবে। তদ্রুপ কারো স্বর্ণ বা রৌপ্য যদি বিভিন্ন লোকের হাতে থাকে তবে সবগুলোকে একত্র করার পর যে পরিমাণ হবে সে হিসাবে এতে যাকাত ধার্য করা হবে। মালিক (র) বলেন, কারো নিকট যদি ভেড়া অথবা বকরী একই পালে মিশ্রিত হয়ে থাকে তবে সবগুলো গণনা করে দেখা হবে। সবগুলো একত্রে যাকাত ধার্য হয় এমন সংখ্যায় উপনীত হলে যাকাত ধার্য হবে। কারণ এগুলো ‘গনম’ (বকরী) জাতীয় পশু। উমার ইবনু খাত্তাব (রা) তাঁর পূর্বে উল্লেখিত পত্রে উল্লেখ করেছেন, বকরীর সংখ্যা চল্লিশ হলে একটি বকরী যাকাত দিবে। সংখ্যায় ভেড়া অধিক হলে আর বকরী কম হলে যাকাতের বেলায় ভেড়া গ্রহণ করা হবে। আর বিপরীত হলে বকরী নেওয়া হবে। সংখ্যায় সমান হলে যাকাতগ্রহীতার ইখতিয়ার থাকবে যা ভাল মনে করে তাই গ্রহণ করবে। মালিক (র) বলেন, তদ্রুপ আরবি বা বুখতী উট একত্রে মিলিয়ে যাকাত নেওয়া হবে। সংখ্যায় যা অধিক হবে তা হতেই যাকাত গ্রহণ করা হবে। আর সমসংখ্যক হলে এটা যাকাতগ্রহীতার ইখতিয়ারাধীন থাকবে। মালিক (র) বলেন, গরু ও মহিষ একই সম্প্রদায়ভুক্ত বলে গণ্য। এতে উভয় জাতীয়কে একত্র করে যাকাত নেয়া উচিত। যে জাতীয় পশু সংখ্যায় অধিক হবে যাকাতে তাই গ্রহণ করা হবে। সমসংখ্যক হলে যাকাত গ্রহীতার ইখতিয়ারাধীন থাকবে। গাভী ও মহিষ উভয় দলই যদি নিসাব পরিমাণ থাকে তবে উভয় হতে আলাদা যাকাত লওয়া হবে। মালিক (র) বলেন, নতুনভাবে যদি কেউ পশুর মালিক হয় তবে ঐ দিন পূর্ণ এক বৎসর অতিক্রান্ত না হওয়া পর্যন্ত তাতে যাকাত ধার্য হবে না। তবে পূর্ব হতে যদি নিসাব পরিমাণ পশু (পাঁচটি উট বা ত্রিশটি গাভী বা চল্লিশটি বকরী) তার নিকট থাকে আর পরে সে ক্রয় বা হেবা বা উত্তরাধিকার সূত্রে আর কিছু পশুর মালিক হয় তবে পূর্বস্থিত পশুগুলির সহিত মিশ্রণ করে এগুলো যাকাত আদায় করতে হবে যদিও এগুলোতে পূর্ণ এক বৎসর অতিক্রান্ত হয়নি। পূর্বস্থিত পশুগুলির যাকাত আদায় করে দেওয়ার পর যদি এগুলো তার মালিকানায় এসে থাকে তবে পূর্বস্থিত পশুগুলোর পুনরায় যখন যাকাত দেবে তখন সেই সঙ্গে এগুলোরও যাকাত দেবে। মালিক (র) বলেন, মাস’আলাটির উপমা হল, কেউ তার মালিকানাধীন রৌপ্যের যাকাত আদায় করে বাকি রৌপ্য দ্বারা অন্য কোন ব্যক্তির নিকট হতে পণ্যদ্রব্য কিনে নিল। বিক্রেতার উপর উক্ত পণ্যদ্রব্যের যাকাত প্রদান করা ওয়াজিব। কাজেই এই দ্বিতীয় ব্যক্তি যাকাত দেবে। এই অবস্থায় ক্রয়কারী লোকটি যেন অদ্য তার যাকাত আদায় করল আর বিক্রেতা যেন গতকাল তার যাকাত আদায় করেছে। মালিক (র) বলেন, নিসাব পরিমাণ হতে কম বকরী কারো কাছে ছিল এবং পরে সে আরও কিছু বকরীর মালিক হল, এতে নিসাব পরিমাণের চাইতেও যদি তার বকরীর সংখ্যা অধিক হয়ে যায় তবুও পূর্ণ এক বৎসর অতিক্রান্ত না হওয়া পর্যন্ত তাতে যাকাত ধার্য হবে না। কারণ যাকাতের বেলায় নিসাব পরিমাণ হতে কম দ্রব্য ধর্তব্য বলে গণ্য হয় না। নিসাব পরিমাণ হয়ে যাওয়ার পর ঐ জাতীয় যত পশু তার মালিকানায় আসবে, কম হোক বা বেশি হোক, সবগুলিরই যাকাত দিতে হবে। মালিক (র) বলেন, নিসাব পরিমাণ পশু (উট, গরু, ছাগল) কারো কাছে ছিল, পরে আরও কিছু পশু যদি তার অধিকারে আসে তবে পূর্ণ নিসাবের সহিত এগুলোরও যাকাত প্রদান করতে হবে। আর এ ব্যাপারে আমি যা শুনেছি তন্মধ্যে এ মতটি আমার কাছে অধিক প্রিয়। মালিক (র) বলেন, যে ধরনের পশু যাকাতে ধার্য করা হয়েছে সে ধরনের পশু যদি নিসাবের অধিকারী ব্যক্তির পশুপালে না থাকে, যেমন ধার্য হয়েছে এক বৎসর বয়সের উট আর ঐ ব্যক্তির পালে তা নেই, তবে দুই বৎসর বয়সের উট প্রদান করা হবে। আর দুই, তিন বা চার বৎসর বয়সের যাকাতে ধার্যকৃত উট পশুপালে পাওয়া না গেলে, সে ধরনের ক্রয় করে তা আদায় করা হবে। এটার জন্য মূল্য দ্বারা যাকাত প্রদান করা আমি পছন্দ করি না। মালিক (র) বলেন, সেচ কার্যের বা হালের উট বা মহিষ নিসাব পরিমাণ হলে তাতেও যাকাত ওয়াজিব হবে।

তাউস ইয়ামানী (র) থেকে বর্নিতঃ

মুয়ায ইবনু জাবল (রা) ত্রিশটি গাভীতে এক একটি বৎসরের বাছুর এবং চল্লিশটি গাভীতে দুই বছর বয়সের একটি গাভী গ্রহণ করেছিলেন। ত্রিশের কম সংখ্যায় কিছুই তিনি নেননি। তখন তিনি বলেছিলেন, এই বিষয়ে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়াসাল্লাম) হতে কোন নির্দেশ আমি শুনি নাই। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়াসাল্লাম) এর সাথে যদি পুনরায় সাক্ষাৎ ঘটে তবে এই সম্পর্কে জিজ্ঞেস করে জেনে নিব। কিন্তু মুয়ায (রা) (ইয়ামন হতে ফিরে) আসার পূর্বেই রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়াসাল্লাম) আল্লাহর সান্নিধ্যে চলে গিয়েছিলেন। (সহীহ, আবূ দাঊদ ১৫৭৭, তিরমিযী ৬২৩, নাসাঈ ২৪৫০, ইবনু মাজাহ ১৮০৩, আলবানী হাদীসটিকে সহীহ বলেছেন [সহীহ ও যয়ীফ সুনানে আবূ দাঊদ]) মালিক (র) বলেন, কারো বকরীসমূহ দুই বা ততোধিক একত্র করার পর যে সংখ্যায় হবে সেই অনুসারে এর যাকাত ধার্য হবে। তদ্রুপ কারো স্বর্ণ বা রৌপ্য যদি বিভিন্ন লোকের হাতে থাকে তবে সবগুলোকে একত্র করার পর যে পরিমাণ হবে সে হিসাবে এতে যাকাত ধার্য করা হবে। মালিক (র) বলেন, কারো নিকট যদি ভেড়া অথবা বকরী একই পালে মিশ্রিত হয়ে থাকে তবে সবগুলো গণনা করে দেখা হবে। সবগুলো একত্রে যাকাত ধার্য হয় এমন সংখ্যায় উপনীত হলে যাকাত ধার্য হবে। কারণ এগুলো ‘গনম’ (বকরী) জাতীয় পশু। উমার ইবনু খাত্তাব (রা) তাঁর পূর্বে উল্লেখিত পত্রে উল্লেখ করেছেন, বকরীর সংখ্যা চল্লিশ হলে একটি বকরী যাকাত দিবে। সংখ্যায় ভেড়া অধিক হলে আর বকরী কম হলে যাকাতের বেলায় ভেড়া গ্রহণ করা হবে। আর বিপরীত হলে বকরী নেওয়া হবে। সংখ্যায় সমান হলে যাকাতগ্রহীতার ইখতিয়ার থাকবে যা ভাল মনে করে তাই গ্রহণ করবে। মালিক (র) বলেন, তদ্রুপ আরবি বা বুখতী উট একত্রে মিলিয়ে যাকাত নেওয়া হবে। সংখ্যায় যা অধিক হবে তা হতেই যাকাত গ্রহণ করা হবে। আর সমসংখ্যক হলে এটা যাকাতগ্রহীতার ইখতিয়ারাধীন থাকবে। মালিক (র) বলেন, গরু ও মহিষ একই সম্প্রদায়ভুক্ত বলে গণ্য। এতে উভয় জাতীয়কে একত্র করে যাকাত নেয়া উচিত। যে জাতীয় পশু সংখ্যায় অধিক হবে যাকাতে তাই গ্রহণ করা হবে। সমসংখ্যক হলে যাকাত গ্রহীতার ইখতিয়ারাধীন থাকবে। গাভী ও মহিষ উভয় দলই যদি নিসাব পরিমাণ থাকে তবে উভয় হতে আলাদা যাকাত লওয়া হবে। মালিক (র) বলেন, নতুনভাবে যদি কেউ পশুর মালিক হয় তবে ঐ দিন পূর্ণ এক বৎসর অতিক্রান্ত না হওয়া পর্যন্ত তাতে যাকাত ধার্য হবে না। তবে পূর্ব হতে যদি নিসাব পরিমাণ পশু (পাঁচটি উট বা ত্রিশটি গাভী বা চল্লিশটি বকরী) তার নিকট থাকে আর পরে সে ক্রয় বা হেবা বা উত্তরাধিকার সূত্রে আর কিছু পশুর মালিক হয় তবে পূর্বস্থিত পশুগুলির সহিত মিশ্রণ করে এগুলো যাকাত আদায় করতে হবে যদিও এগুলোতে পূর্ণ এক বৎসর অতিক্রান্ত হয়নি। পূর্বস্থিত পশুগুলির যাকাত আদায় করে দেওয়ার পর যদি এগুলো তার মালিকানায় এসে থাকে তবে পূর্বস্থিত পশুগুলোর পুনরায় যখন যাকাত দেবে তখন সেই সঙ্গে এগুলোরও যাকাত দেবে। মালিক (র) বলেন, মাস’আলাটির উপমা হল, কেউ তার মালিকানাধীন রৌপ্যের যাকাত আদায় করে বাকি রৌপ্য দ্বারা অন্য কোন ব্যক্তির নিকট হতে পণ্যদ্রব্য কিনে নিল। বিক্রেতার উপর উক্ত পণ্যদ্রব্যের যাকাত প্রদান করা ওয়াজিব। কাজেই এই দ্বিতীয় ব্যক্তি যাকাত দেবে। এই অবস্থায় ক্রয়কারী লোকটি যেন অদ্য তার যাকাত আদায় করল আর বিক্রেতা যেন গতকাল তার যাকাত আদায় করেছে। মালিক (র) বলেন, নিসাব পরিমাণ হতে কম বকরী কারো কাছে ছিল এবং পরে সে আরও কিছু বকরীর মালিক হল, এতে নিসাব পরিমাণের চাইতেও যদি তার বকরীর সংখ্যা অধিক হয়ে যায় তবুও পূর্ণ এক বৎসর অতিক্রান্ত না হওয়া পর্যন্ত তাতে যাকাত ধার্য হবে না। কারণ যাকাতের বেলায় নিসাব পরিমাণ হতে কম দ্রব্য ধর্তব্য বলে গণ্য হয় না। নিসাব পরিমাণ হয়ে যাওয়ার পর ঐ জাতীয় যত পশু তার মালিকানায় আসবে, কম হোক বা বেশি হোক, সবগুলিরই যাকাত দিতে হবে। মালিক (র) বলেন, নিসাব পরিমাণ পশু (উট, গরু, ছাগল) কারো কাছে ছিল, পরে আরও কিছু পশু যদি তার অধিকারে আসে তবে পূর্ণ নিসাবের সহিত এগুলোরও যাকাত প্রদান করতে হবে। আর এ ব্যাপারে আমি যা শুনেছি তন্মধ্যে এ মতটি আমার কাছে অধিক প্রিয়। মালিক (র) বলেন, যে ধরনের পশু যাকাতে ধার্য করা হয়েছে সে ধরনের পশু যদি নিসাবের অধিকারী ব্যক্তির পশুপালে না থাকে, যেমন ধার্য হয়েছে এক বৎসর বয়সের উট আর ঐ ব্যক্তির পালে তা নেই, তবে দুই বৎসর বয়সের উট প্রদান করা হবে। আর দুই, তিন বা চার বৎসর বয়সের যাকাতে ধার্যকৃত উট পশুপালে পাওয়া না গেলে, সে ধরনের ক্রয় করে তা আদায় করা হবে। এটার জন্য মূল্য দ্বারা যাকাত প্রদান করা আমি পছন্দ করি না। মালিক (র) বলেন, সেচ কার্যের বা হালের উট বা মহিষ নিসাব পরিমাণ হলে তাতেও যাকাত ওয়াজিব হবে।

حدثني يحيى عن مالك عن حميد بن قيس المكي عن طاوس اليماني أن معاذ بن جبل الأنصاري أخذ من ثلاثين بقرة تبيعا ومن أربعين بقرة مسنة وأتي بما دون ذلك فأبى أن يأخذ منه شيئا وقال لم أسمع من رسول الله صلى الله عليه وسلم فيه شيئا حتى ألقاه فأسأله فتوفي رسول الله صلى الله عليه وسلم قبل أن يقدم معاذ بن جبل ৮৯২-قال يحيى قال مالك أحسن ما سمعت فيمن كانت له غنم على راعيين مفترقين أو على رعاء مفترقين في بلدان شتى أن ذلك يجمع كله على صاحبه فيؤدي منه صدقته ومثل ذلك الرجل يكون له الذهب أو الورق متفرقة في أيدي ناس شتى إنه ينبغي له أن يجمعها فيخرج منها ما وجب عليه في ذلك من زكاتها ৮৯৩-و قال يحيى قال مالك في الرجل يكون له الضأن والمعز أنها تجمع عليه في الصدقة فإن كان فيها ما تجب فيه الصدقة صدقت وقال إنما هي غنم كلها وفي كتاب عمر بن الخطاب وفي سائمة الغنم إذا بلغت أربعين شاة شاة قال مالك فإن كانت الضأن هي أكثر من المعز ولم يجب على ربها إلا شاة واحدة أخذ المصدق تلك الشاة التي وجبت على رب المال من الضأن وإن كانت المعز أكثر من الضأن أخذ منها فإن استوى الضأن والمعز أخذ الشاة من أيتهما شاء ৮৯৪-قال يحيى قال مالك وكذلك الإبل العراب والبخت يجمعان على ربهما في الصدقة وقال إنما هي إبل كلها فإن كانت العراب هي أكثر من البخت ولم يجب على ربها إلا بعير واحد فليأخذ من العراب صدقتها فإن كانت البخت أكثر فليأخذ منها فإن استوت فليأخذ من أيتهما شاء ৮৯৫-قال مالك وكذلك البقر والجواميس تجمع في الصدقة على ربها وقال إنما هي بقر كلها فإن كانت البقر هي أكثر من الجواميس ولا تجب على ربها إلا بقرة واحدة فليأخذ من البقر صدقتهما وإن كانت الجواميس أكثر فليأخذ منها فإن استوت فليأخذ من أيتهما شاء فإذا وجبت في ذلك الصدقة صدق الصنفان جميعا ৮৯৬ قال يحيى قال مالك من أفاد ماشية من إبل أو بقر أو غنم فلا صدقة عليه فيها حتى يحول عليها الحول من يوم أفادها إلا أن يكون له قبلها نصاب ماشية والنصاب ما تجب فيه الصدقة إما خمس ذود من الإبل وإما ثلاثون بقرة وإما أربعون شاة فإذا كان للرجل خمس ذود من الإبل أو ثلاثون بقرة أو أربعون شاة ثم أفاد إليها إبلا أو بقرا أو غنما باشتراء أو هبة أو ميراث فإنه يصدقها مع ماشيته حين يصدقها وإن لم يحل على الفائدة الحول وإن كان ما أفاد من الماشية إلى ماشيته قد صدقت قبل أن يشتريها بيوم واحد أو قبل أن يرثها بيوم واحد فإنه يصدقها مع ماشيته حين يصدق ماشيته ৮৯৭قال يحيى قال مالك وإنما مثل ذلك مثل الورق يزكيها الرجل ثم يشتري بها من رجل آخر عرضا وقد وجبت عليه في عرضه ذلك إذا باعه الصدقة فيخرج الرجل الآخر صدقتها هذا اليوم ويكون الآخر قد صدقها من الغد ৮৯قال مالك في رجل كانت له غنم لا تجب فيها الصدقة فاشترى إليها غنما كثيرة تجب في دونها الصدقة أو ورثها أنه لا تجب عليه في الغنم كلها الصدقة حتى يحول عليها الحول من يوم أفادها باشتراء أو ميراث وذلك أن كل ما كان عند الرجل من ماشية لا تجب فيها الصدقة من إبل أو بقر أو غنم فليس يعد ذلك نصاب مال حتى يكون في كل صنف منها ما تجب فيه الصدقة فذلك النصاب الذي يصدق معه ما أفاد إليه صاحبه من قليل أو كثير من الماشية ৮৯৯-قال مالك ولو كانت لرجل إبل أو بقر أو غنم تجب في كل صنف منها الصدقة ثم أفاد إليها بعيرا أو بقرة أو شاة صدقها مع ماشيته حين يصدقها قال يحيى قال مالك وهذا أحب ما سمعت إلي في هذا ৯قال مالك في الفريضة تجب على الرجل فلا توجد عنده أنها إن كانت ابنة مخاض فلم توجد أخذ مكانها ابن لبون ذكر وإن كانت بنت لبون أو حقة أو جذعة ولم يكن عنده كان على رب الإبل أن يبتاعها له حتى يأتيه بها ولا أحب أن يعطيه قيمته ৯و قال مالك في الإبل النواضح والبقر السواني وبقر الحرث إني أرى أن يؤخذ من ذلك كله إذا وجبت فيه الصدقة.


মুয়াত্তা ইমাম মালিক > শরীকানা সম্পদের যাকাত

মুয়াত্তা ইমাম মালিক ৫৮৫

قال يحيى قال مالك في الخليطين إذا كان الراعي واحدا والفحل واحدا والمراح واحدا والدلو واحدا فالرجلان خليطان وإن عرف كل واحد منهما ماله من مال صاحبه قال والذي لا يعرف ماله من مال صاحبه ليس بخليط إنما هو شريك. قال مالك ولا تجب الصدقة على الخليطين حتى يكون لكل واحد منهما ما تجب فيه الصدقة وتفسير ذلك أنه إذا كان لأحد الخليطين أربعون شاة فصاعدا وللآخر أقل من أربعين شاة كانت الصدقة على الذي له الأربعون شاة ولم تكن على الذي له أقل من ذلك صدقة ৯-فإن كان لكل واحد منهما ما تجب فيه الصدقة جمعا في الصدقة ووجبت الصدقة عليهما جميعا فإن -كان لأحدهما ألف شاة أو أقل من ذلك مما تجب فيه الصدقة وللآخر أربعون شاة أو أكثر فهما خليطان يترادان الفضل بينهما بالسوية على قدر عدد أموالهما على الألف بحصتها وعلى الأربعين بحصتها. ৯قال مالك الخليطان في الإبل بمنزلة الخليطين في الغنم يجتمعان في الصدقة جميعا إذا كان لكل واحد منهما ما تجب فيه الصدقة وذلك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال ليس فيما دون خمس ذود من الإبل صدقة و قال عمر بن الخطاب في سائمة الغنم إذا بلغت أربعين شاة شاة و قال يحيى قال مالك وهذا أحب ما سمعت إلي في ذلك ৯৭-قال مالك و قال عمر بن الخطاب لا يجمع بين مفترق ولا يفرق بين مجتمع خشية الصدقة أنه إنما يعني بذلك أصحاب المواشي قال مالك وتفسير لا يجمع بين مفترق أن يكون النفر الثلاثة الذين يكون لكل واحد منهم أربعون شاة قد وجبت على كل واحد منهم في غنمه الصدقة فإذا أظلهم المصدق جمعوها لئلا يكون عليهم فيها إلا شاة واحدة فنهوا عن ذلك وتفسير قوله ولا يفرق بين مجتمع أن الخليطين يكون لكل واحد منهما مائة شاة وشاة فيكون عليهما فيها ثلاث شياه فإذا أظلهما المصدق فرقا غنمهما فلم يكن على كل واحد منهما إلا شاة واحدة فنهي عن ذلك فقيل لا يجمع بين مفترق ولا يفرق بين مجتمع خشية الصدقة قال مالك فهذا الذي سمعت في ذلك

মালিক (র) থেকে বর্নিতঃ

দুই ব্যক্তির অংশীদারিত্বে যদি কিছু পশু থাকে এবং রাখাল, চারণক্ষেত্র, পানি পান করাবার বালতি, নর জাতীয় পশুও যদি দু’জনেরই থাকে, আর উভয়েই স্ব-স্ব হিস্যার পশুগুলি শনাক্ত করতে সক্ষম হয়, তবে এই দুই শরীককে খলীতান বলা হয়। আর শনাক্ত করতে সক্ষম না হলে তাদেরকে শরীয়তের পরিভাষায় শরীকান বলা হয়। মালিক (র) বলেন, খলীতানের প্রত্যেকেই নিসাব পরিমাণ পশুর মালিক না হলে তাদের কারো উপর যাকাত ধার্য হবে না। যেমন একজনের যদি চল্লিশটি বা তদুর্ধ বকরী থাকে, আরেকজনের যদি কম হয়, তবে প্রথমজনের উপর যাকাত ওয়াজিব হবে, দ্বিতীয়জনের উপর ওয়াজিব হবে না। আর প্রত্যেক জনেরই যদি নিসাব পরিমাণ থাকে তবে দু’জনের মালিকানাধীন পশুসমূহ একত্র করে যাকাত আদায় করা হবে। সুতরাং একজনের যদি এক হাজার বা তদূর্ধ্ব বকরী হয় আর অপরজনের থাকে চল্লিশ বা তদূর্ধ্ব, তবে উভয় খলীত পরস্পরে হিসাব সম্পন্ন করে স্ব-স্ব হিস্যানুসারে যাকাত প্রদান করবে। মালিক (র) বলেন, উটের মধ্যে খলীত হওয়ার হুকুম বকরীর মধ্যে খলীত হওয়ার মতই। যদি উভয় খলীতের প্রত্যেকের কাছে নিসাব পরিমাণ উট থাকে তবে দু’জনের নিকট হতে একত্রে যাকাত আদায় করা হবে। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বলেছেন, পাঁচটির কম উটে যাকাত ওয়াজিব হয় না। উমার ইবনু খাত্তাব (রা) বলেছেন, মাঠে বিচরণরত বকরীর সংখ্যা চল্লিশে পৌঁছালে এতে একটি বকরী ধার্য হয়। মালিক (র) বলেন, এই বক্তব্যটি আমার পছন্দনীয়। উমার ইবনু খাত্তাব (রা) বলেছেন, যাকাত ধার্য হওয়ার ভয়ে বিভক্ত সম্পদ একত্র বা একীভূত সম্পদ বিভক্ত করা যাবে না। মালিক (র) বলেন, এই বক্তব্যটির অর্থ হল, পৃথক পৃথক দলে বিভক্ত দল একত্র করা হবে না, যেমন তিন ব্যক্তির প্রত্যেকেরই চল্লিশটি করে বকরী ছিল। তাতে প্রত্যেকের উপরই একটি করে বকরী যাকাত ধার্য হত। কিন্তু তারা নিজের মালিকানাধীন বকরীসমূহ একত্র করে ফেলল। ফলে এতে সকলের উপর মাত্র একটি বকরী ওয়াজিব হয়। এমনিভাবে একত্রে যে পশুর দল রক্ষিত হয় সেগুলোকে আলাদা করা হবে না। তার ব্যাখ্যা নিম্নরূপ- দুই খলীতের একশত একটি করে বকরী ছিল। তাদের উপর তিনটি বকরী যাকাত ধার্য হবে। কিন্তু যাকাত আদায়কারী আসলে তারা তাদের বকরীগুলো পৃথক করে নিল। এতে তাদের প্রত্যেকের একটি করে বকরী যাকাত ধার্য হয়। মোদ্দা কথা, যাকাতের ভয়ে পৃথক পৃথক দলকে একত্র করা হবে না, অথবা একীভূত দলকে পৃথক করা হবে না। মালিক (র) বলেন, এ বিষয়ে আমি এটাই শুনেছি।

মালিক (র) থেকে বর্নিতঃ

দুই ব্যক্তির অংশীদারিত্বে যদি কিছু পশু থাকে এবং রাখাল, চারণক্ষেত্র, পানি পান করাবার বালতি, নর জাতীয় পশুও যদি দু’জনেরই থাকে, আর উভয়েই স্ব-স্ব হিস্যার পশুগুলি শনাক্ত করতে সক্ষম হয়, তবে এই দুই শরীককে খলীতান বলা হয়। আর শনাক্ত করতে সক্ষম না হলে তাদেরকে শরীয়তের পরিভাষায় শরীকান বলা হয়। মালিক (র) বলেন, খলীতানের প্রত্যেকেই নিসাব পরিমাণ পশুর মালিক না হলে তাদের কারো উপর যাকাত ধার্য হবে না। যেমন একজনের যদি চল্লিশটি বা তদুর্ধ বকরী থাকে, আরেকজনের যদি কম হয়, তবে প্রথমজনের উপর যাকাত ওয়াজিব হবে, দ্বিতীয়জনের উপর ওয়াজিব হবে না। আর প্রত্যেক জনেরই যদি নিসাব পরিমাণ থাকে তবে দু’জনের মালিকানাধীন পশুসমূহ একত্র করে যাকাত আদায় করা হবে। সুতরাং একজনের যদি এক হাজার বা তদূর্ধ্ব বকরী হয় আর অপরজনের থাকে চল্লিশ বা তদূর্ধ্ব, তবে উভয় খলীত পরস্পরে হিসাব সম্পন্ন করে স্ব-স্ব হিস্যানুসারে যাকাত প্রদান করবে। মালিক (র) বলেন, উটের মধ্যে খলীত হওয়ার হুকুম বকরীর মধ্যে খলীত হওয়ার মতই। যদি উভয় খলীতের প্রত্যেকের কাছে নিসাব পরিমাণ উট থাকে তবে দু’জনের নিকট হতে একত্রে যাকাত আদায় করা হবে। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বলেছেন, পাঁচটির কম উটে যাকাত ওয়াজিব হয় না। উমার ইবনু খাত্তাব (রা) বলেছেন, মাঠে বিচরণরত বকরীর সংখ্যা চল্লিশে পৌঁছালে এতে একটি বকরী ধার্য হয়। মালিক (র) বলেন, এই বক্তব্যটি আমার পছন্দনীয়। উমার ইবনু খাত্তাব (রা) বলেছেন, যাকাত ধার্য হওয়ার ভয়ে বিভক্ত সম্পদ একত্র বা একীভূত সম্পদ বিভক্ত করা যাবে না। মালিক (র) বলেন, এই বক্তব্যটির অর্থ হল, পৃথক পৃথক দলে বিভক্ত দল একত্র করা হবে না, যেমন তিন ব্যক্তির প্রত্যেকেরই চল্লিশটি করে বকরী ছিল। তাতে প্রত্যেকের উপরই একটি করে বকরী যাকাত ধার্য হত। কিন্তু তারা নিজের মালিকানাধীন বকরীসমূহ একত্র করে ফেলল। ফলে এতে সকলের উপর মাত্র একটি বকরী ওয়াজিব হয়। এমনিভাবে একত্রে যে পশুর দল রক্ষিত হয় সেগুলোকে আলাদা করা হবে না। তার ব্যাখ্যা নিম্নরূপ- দুই খলীতের একশত একটি করে বকরী ছিল। তাদের উপর তিনটি বকরী যাকাত ধার্য হবে। কিন্তু যাকাত আদায়কারী আসলে তারা তাদের বকরীগুলো পৃথক করে নিল। এতে তাদের প্রত্যেকের একটি করে বকরী যাকাত ধার্য হয়। মোদ্দা কথা, যাকাতের ভয়ে পৃথক পৃথক দলকে একত্র করা হবে না, অথবা একীভূত দলকে পৃথক করা হবে না। মালিক (র) বলেন, এ বিষয়ে আমি এটাই শুনেছি।

قال يحيى قال مالك في الخليطين إذا كان الراعي واحدا والفحل واحدا والمراح واحدا والدلو واحدا فالرجلان خليطان وإن عرف كل واحد منهما ماله من مال صاحبه قال والذي لا يعرف ماله من مال صاحبه ليس بخليط إنما هو شريك. قال مالك ولا تجب الصدقة على الخليطين حتى يكون لكل واحد منهما ما تجب فيه الصدقة وتفسير ذلك أنه إذا كان لأحد الخليطين أربعون شاة فصاعدا وللآخر أقل من أربعين شاة كانت الصدقة على الذي له الأربعون شاة ولم تكن على الذي له أقل من ذلك صدقة ৯-فإن كان لكل واحد منهما ما تجب فيه الصدقة جمعا في الصدقة ووجبت الصدقة عليهما جميعا فإن -كان لأحدهما ألف شاة أو أقل من ذلك مما تجب فيه الصدقة وللآخر أربعون شاة أو أكثر فهما خليطان يترادان الفضل بينهما بالسوية على قدر عدد أموالهما على الألف بحصتها وعلى الأربعين بحصتها. ৯قال مالك الخليطان في الإبل بمنزلة الخليطين في الغنم يجتمعان في الصدقة جميعا إذا كان لكل واحد منهما ما تجب فيه الصدقة وذلك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال ليس فيما دون خمس ذود من الإبل صدقة و قال عمر بن الخطاب في سائمة الغنم إذا بلغت أربعين شاة شاة و قال يحيى قال مالك وهذا أحب ما سمعت إلي في ذلك ৯৭-قال مالك و قال عمر بن الخطاب لا يجمع بين مفترق ولا يفرق بين مجتمع خشية الصدقة أنه إنما يعني بذلك أصحاب المواشي قال مالك وتفسير لا يجمع بين مفترق أن يكون النفر الثلاثة الذين يكون لكل واحد منهم أربعون شاة قد وجبت على كل واحد منهم في غنمه الصدقة فإذا أظلهم المصدق جمعوها لئلا يكون عليهم فيها إلا شاة واحدة فنهوا عن ذلك وتفسير قوله ولا يفرق بين مجتمع أن الخليطين يكون لكل واحد منهما مائة شاة وشاة فيكون عليهما فيها ثلاث شياه فإذا أظلهما المصدق فرقا غنمهما فلم يكن على كل واحد منهما إلا شاة واحدة فنهي عن ذلك فقيل لا يجمع بين مفترق ولا يفرق بين مجتمع خشية الصدقة قال مالك فهذا الذي سمعت في ذلك


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