আদাবুল মুফরাদ > অনুচ্ছেদঃ কেউ বেষ্টনীবিহীন ছাদে ঘুমালে।
আদাবুল মুফরাদ ১২০৫
حدثنا محمد بن كثير قال: أخبرنا سفيان، عن عمران بن مسلم بن رياح الثقفي، عن علي بن عمارة قال: جاء أبو أيوب الأنصاري، فصعدت به على سطح أجلح، فنزل وقال: كدت أن أبيت الليلة ولا ذمة لي
আবু আইউব আনসারী (রাঃ) এলে আমি তাকে নিয়ে উন্মুক্ত ছাদে উঠলাম। তিনি নেমে এসে বলেন, আমি এখানে রাত কাটালে আমার ব্যাপারে (আল্লাহর) কোন যিম্মাদারি নাই।
আবু আইউব আনসারী (রাঃ) এলে আমি তাকে নিয়ে উন্মুক্ত ছাদে উঠলাম। তিনি নেমে এসে বলেন, আমি এখানে রাত কাটালে আমার ব্যাপারে (আল্লাহর) কোন যিম্মাদারি নাই।
حدثنا محمد بن كثير قال: أخبرنا سفيان، عن عمران بن مسلم بن رياح الثقفي، عن علي بن عمارة قال: جاء أبو أيوب الأنصاري، فصعدت به على سطح أجلح، فنزل وقال: كدت أن أبيت الليلة ولا ذمة لي
আদাবুল মুফরাদ ১২০৬
حدثنا موسى بن إسماعيل قال: حدثنا الحارث بن عبيد قال: حدثني أبو عمران، عن زهير، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: " من بات على إنجار فوقع منه فمات، برئت منه الذمة، ومن ركب البحر حين يرتج - يعني: يغتلم - فهلك برئت منه الذمة "
নবী (সাঃ) বলেন কেউ উন্মুক্ত ছাদে ঘুমালে এবং তা থেকে পতিত হয়ে নিহত হলে তার ব্যাপারে কোন দায়দায়িত্ব নাই। কেউ ঝঞ্ঝা বিক্ষুব্ধ অবস্থায় সমুদ্রভ্রমণে গিয়ে নিহত হলে তার ব্যাপারেও কোন দায়দায়িত্ব নাই। (আহমাদ)
নবী (সাঃ) বলেন কেউ উন্মুক্ত ছাদে ঘুমালে এবং তা থেকে পতিত হয়ে নিহত হলে তার ব্যাপারে কোন দায়দায়িত্ব নাই। কেউ ঝঞ্ঝা বিক্ষুব্ধ অবস্থায় সমুদ্রভ্রমণে গিয়ে নিহত হলে তার ব্যাপারেও কোন দায়দায়িত্ব নাই। (আহমাদ)
حدثنا موسى بن إسماعيل قال: حدثنا الحارث بن عبيد قال: حدثني أبو عمران، عن زهير، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: " من بات على إنجار فوقع منه فمات، برئت منه الذمة، ومن ركب البحر حين يرتج - يعني: يغتلم - فهلك برئت منه الذمة "
আদাবুল মুফরাদ ১২০৪
حدثنا محمد بن المثنى قال: حدثنا سالم بن نوح قال: أخبرنا عمر - رجل من بني حنيفة هو ابن جابر - عن وعلة بن عبد الرحمن بن وثاب، عن عبد الرحمن بن علي، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: «من بات على ظهر بيت ليس عليه حجاب فقد برئت منه الذمة» . قال أبو عبد الله: في إسناده نظر
নবী (সাঃ) বলেনঃ কেউ বেষ্টনীবিহীন ছাদে রাতে ঘুমালে (এবং কোন দুর্ঘটনা ঘটলে) তার সম্পর্কে (আল্লাহর) কোন যিম্মাদারি নাই। (আবু দাউদ হা/৫০৪১)
নবী (সাঃ) বলেনঃ কেউ বেষ্টনীবিহীন ছাদে রাতে ঘুমালে (এবং কোন দুর্ঘটনা ঘটলে) তার সম্পর্কে (আল্লাহর) কোন যিম্মাদারি নাই। (আবু দাউদ হা/৫০৪১)
حدثنا محمد بن المثنى قال: حدثنا سالم بن نوح قال: أخبرنا عمر - رجل من بني حنيفة هو ابن جابر - عن وعلة بن عبد الرحمن بن وثاب، عن عبد الرحمن بن علي، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: «من بات على ظهر بيت ليس عليه حجاب فقد برئت منه الذمة» . قال أبو عبد الله: في إسناده نظر
আদাবুল মুফরাদ > অনুচ্ছেদঃ পা ঝুলিয়ে দিয়ে বসা যাবে কি?
আদাবুল মুফরাদ ১২০৭
حدثنا إسماعيل قال: حدثني عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن أبيه قال: شهد عندي أبو سلمة بن عبد الرحمن، أخبره عبد الرحمن بن نافع بن عبد الحارث الخزاعي، أن أبا موسى الأشعري أخبره، أن النبي صلى الله عليه وسلم كان في حائط على قف البئر، مدليا رجليه في البئر
নবী (সাঃ) চার দেয়ালের অভ্যন্তরে এক কূপের মধ্যে তার পদদ্বয় ঝুলিয়ে দিয়ে এর বেষ্টনীর উপর বসেছিলেন। -(বুখারী, মুসলিম, মুসনাদ আবু আওয়া নাসাঈ)
নবী (সাঃ) চার দেয়ালের অভ্যন্তরে এক কূপের মধ্যে তার পদদ্বয় ঝুলিয়ে দিয়ে এর বেষ্টনীর উপর বসেছিলেন। -(বুখারী, মুসলিম, মুসনাদ আবু আওয়া নাসাঈ)
حدثنا إسماعيل قال: حدثني عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن أبيه قال: شهد عندي أبو سلمة بن عبد الرحمن، أخبره عبد الرحمن بن نافع بن عبد الحارث الخزاعي، أن أبا موسى الأشعري أخبره، أن النبي صلى الله عليه وسلم كان في حائط على قف البئر، مدليا رجليه في البئر
আদাবুল মুফরাদ ১২০৭
حدثنا إسماعيل قال: حدثني عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن أبيه قال: شهد عندي أبو سلمة بن عبد الرحمن، أخبره عبد الرحمن بن نافع بن عبد الحارث الخزاعي، أن أبا موسى الأشعري أخبره، أن النبي صلى الله عليه وسلم كان في حائط على قف البئر، مدليا رجليه في البئر
নবী (সাঃ) চার দেয়ালের অভ্যন্তরে এক কূপের মধ্যে তার পদদ্বয় ঝুলিয়ে দিয়ে এর বেষ্টনীর উপর বসেছিলেন। -(বুখারী, মুসলিম, মুসনাদ আবু আওয়া নাসাঈ)
নবী (সাঃ) চার দেয়ালের অভ্যন্তরে এক কূপের মধ্যে তার পদদ্বয় ঝুলিয়ে দিয়ে এর বেষ্টনীর উপর বসেছিলেন। -(বুখারী, মুসলিম, মুসনাদ আবু আওয়া নাসাঈ)
حدثنا إسماعيل قال: حدثني عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن أبيه قال: شهد عندي أبو سلمة بن عبد الرحمن، أخبره عبد الرحمن بن نافع بن عبد الحارث الخزاعي، أن أبا موسى الأشعري أخبره، أن النبي صلى الله عليه وسلم كان في حائط على قف البئر، مدليا رجليه في البئر
আদাবুল মুফরাদ ১২০৭
حدثنا إسماعيل قال: حدثني عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن أبيه قال: شهد عندي أبو سلمة بن عبد الرحمن، أخبره عبد الرحمن بن نافع بن عبد الحارث الخزاعي، أن أبا موسى الأشعري أخبره، أن النبي صلى الله عليه وسلم كان في حائط على قف البئر، مدليا رجليه في البئر
নবী (সাঃ) চার দেয়ালের অভ্যন্তরে এক কূপের মধ্যে তার পদদ্বয় ঝুলিয়ে দিয়ে এর বেষ্টনীর উপর বসেছিলেন। -(বুখারী, মুসলিম, মুসনাদ আবু আওয়া নাসাঈ)
নবী (সাঃ) চার দেয়ালের অভ্যন্তরে এক কূপের মধ্যে তার পদদ্বয় ঝুলিয়ে দিয়ে এর বেষ্টনীর উপর বসেছিলেন। -(বুখারী, মুসলিম, মুসনাদ আবু আওয়া নাসাঈ)
حدثنا إسماعيل قال: حدثني عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن أبيه قال: شهد عندي أبو سلمة بن عبد الرحمن، أخبره عبد الرحمن بن نافع بن عبد الحارث الخزاعي، أن أبا موسى الأشعري أخبره، أن النبي صلى الله عليه وسلم كان في حائط على قف البئر، مدليا رجليه في البئر
আদাবুল মুফরাদ > অনুচ্ছেদঃ কোন প্রয়োজনে ঘর থেকে রওয়ানা হওয়ার সময় কি বলবে?
আদাবুল মুফরাদ ১২০৮
أخبرنا عبد الله قال: أخبرنا محمد بن إبراهيم قال: حدثني مسلم بن أبي مريم، أن ابن عمر كان إذا خرج من بيته قال: اللهم سلمني وسلم مني
ইবনে উমার (রাঃ) তার ঘর থেকে বাইরে রওয়ানা হওয়ার সময় বলতেন, “হে আল্লাহ! আমাকে নিরাপদ রাখো এবং আমার থেকে (অন্যদেরও) নিরাপদ রাখো”।
ইবনে উমার (রাঃ) তার ঘর থেকে বাইরে রওয়ানা হওয়ার সময় বলতেন, “হে আল্লাহ! আমাকে নিরাপদ রাখো এবং আমার থেকে (অন্যদেরও) নিরাপদ রাখো”।
أخبرنا عبد الله قال: أخبرنا محمد بن إبراهيم قال: حدثني مسلم بن أبي مريم، أن ابن عمر كان إذا خرج من بيته قال: اللهم سلمني وسلم مني
আদাবুল মুফরাদ ১২০৯
حدثنا محمد بن الصلت أبو يعلى قال: حدثنا حاتم بن إسماعيل، عن عبد الله بن حسين بن عطاء، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه كان إذا خرج من بيته قال: «بسم الله، التكلان على الله، لا حول ولا قوة إلا بالله»
নবী (সাঃ) তার ঘর থেকে বাইরে রওয়ানা হয়ে বলতেনঃ “বিসমিল্লাহি আত-তুকলানু আলাল্লাহি লা হাওলা ওয়ালা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ” (আল্লাহর নামে, আল্লাহর উপর ভরসা, আল্লাহ ছাড়া ক্ষতি রোধ করার বা কল্যাণ হাসিল করার শক্তি কারো নাইবনে মাজাহ)। (ইবনে মাজাহ হা/৩৮৮৫, আহমাদ, হাকিম, ইবনুস সুন্নী)
নবী (সাঃ) তার ঘর থেকে বাইরে রওয়ানা হয়ে বলতেনঃ “বিসমিল্লাহি আত-তুকলানু আলাল্লাহি লা হাওলা ওয়ালা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ” (আল্লাহর নামে, আল্লাহর উপর ভরসা, আল্লাহ ছাড়া ক্ষতি রোধ করার বা কল্যাণ হাসিল করার শক্তি কারো নাইবনে মাজাহ)। (ইবনে মাজাহ হা/৩৮৮৫, আহমাদ, হাকিম, ইবনুস সুন্নী)
حدثنا محمد بن الصلت أبو يعلى قال: حدثنا حاتم بن إسماعيل، عن عبد الله بن حسين بن عطاء، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه كان إذا خرج من بيته قال: «بسم الله، التكلان على الله، لا حول ولا قوة إلا بالله»
আদাবুল মুফরাদ > অনুচ্ছেদঃ কোন ব্যক্তি কি তার সংগীদের দিকে নিজের পদদ্বয় প্রসারিত করে দিতে পারে বা তাদের সামনে হেলান দিয়ে বসতে পারে?
আদাবুল মুফরাদ ১২১০
حدثنا موسى بن إسماعيل قال: حدثنا يحيى بن عبد الرحمن العصري قال: حدثنا شهاب بن عباد العصري، أن بعض وفد عبد القيس سمعه يذكر، قال: لما بدأنا في وفادتنا إلى النبي صلى الله عليه وسلم سرنا، حتى إذا شارفنا القدوم تلقانا رجل يوضع على قعود له، فسلم، فرددنا عليه، ثم وقف فقال: ممن القوم؟ قلنا: وفد عبد القيس، قال: مرحبا بكم وأهلا، إياكم طلبت، جئت لأبشركم، قال النبي صلى الله عليه وسلم بالأمس لنا: إنه نظر إلى المشرق فقال: " ليأتين غدا من هذا الوجه - يعني: المشرق - خير وفد العرب "، فبت أروغ حتى أصبحت، فشددت على راحلتي، فأمعنت في المسير حتى ارتفع النهار، وهممت بالرجوع، ثم رفعت رءوس رواحلكم، ثم ثنى راحلته بزمامها راجعا يوضع عوده على بدئه، حتى انتهى إلى النبي صلى الله عليه وسلم , وأصحابه حوله من المهاجرين والأنصار، فقال: بأبي [ص: 410] وأمي، جئت أبشرك بوفد عبد القيس، فقال: «أنى لك بهم يا عمر؟» قال: هم أولاء على أثري، قد أظلوا، فذكر ذلك، فقال: «بشرك الله بخير» ، وتهيأ القوم في مقاعدهم، وكان النبي صلى الله عليه وسلم قاعدا، فألقى ذيل ردائه تحت يده فاتكأ عليه، وبسط رجليه. فقدم الوفد ففرح بهم المهاجرون والأنصار، فلما رأوا النبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه أمرحوا ركابهم فرحا بهم، وأقبلوا سراعا، فأوسع القوم، والنبي صلى الله عليه وسلم متكئ على حاله، فتخلف الأشج - وهو: منذر بن عائذ بن منذر بن الحارث بن النعمان بن زياد بن عصر - فجمع ركابهم ثم أناخها، وحط أحمالها، وجمع متاعها، ثم أخرج عيبة له وألقى عنه ثياب السفر ولبس حلة، ثم أقبل يمشي مترسلا، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: «من سيدكم وزعيمكم، وصاحب أمركم؟» فأشاروا بأجمعهم إليه، وقال: «ابن سادتكم هذا؟» قالوا: كان آباؤه سادتنا في الجاهلية، وهو قائدنا إلى الإسلام، فلما انتهى الأشج أراد أن يقعد من ناحية، استوى النبي صلى الله عليه وسلم قاعدا قال: «ها هنا يا أشج» ، وكان أول يوم سمي الأشج ذلك اليوم، أصابته حمارة بحافرها وهو فطيم، فكان في وجهه مثل القمر، فأقعده إلى جنبه، وألطفه، وعرف فضله عليهم، فأقبل القوم على النبي صلى الله عليه وسلم يسألونه ويخبرهم، حتى كان بعقب الحديث قال: «هل معكم من أزودتكم شيء؟» قالوا: نعم، فقاموا سراعا، كل رجل منهم إلى ثقله فجاءوا بصبر التمر في أكفهم، فوضعت على نطع بين يديه، وبين يديه جريدة دون الذراعين وفوق الذراع، فكان يختصر بها، قلما يفارقها، فأومأ بها إلى صبرة من ذلك التمر فقال: «تسمون هذا التعضوض؟» قالوا: نعم، قال: «وتسمون هذا الصرفان؟» قالوا: نعم، «وتسمون هذا البرني؟» ، قالوا: نعم، قال: «هو خير تمركم وأنفعه لكم - وقال بعض شيوخ الحي - وأعظمه بركة» وإنما كانت عندنا خصبة نعلفها إبلنا وحميرنا، فلما رجعنا من وفادتنا تلك عظمت رغبتنا فيها، وفسلناها حتى تحولت ثمارنا منها، ورأينا البركة فيها
তিনি আবদুল কায়েস গোত্রের প্রতিনিধি দলের কোন সদস্যকে বর্ণনা করতে শুনেছেন। তিনি বলেন, নবী (সাঃ)-এর নিকট প্রতিনিধিদল পাঠানোর প্রয়োজনীয়তা আমাদের নিকট প্রতীয়মান হলে আমরা রওয়ানা হলাম। আমরা সফরের শেষপ্রান্তে উপনীত হলে রাস্তার মাথায় বসা এক ব্যক্তি আমাদের সাথে সাক্ষাত করেন। তিনি সালাম দিলে আমরা তার উত্তর দিলাম। তিনি দণ্ডায়মান হয়ে জিজ্ঞেস করলেন, তোমরা কারা? আমরা বললাম, আবদুল কায়েস গোত্রের প্রতিনিধি দল। তিনি বলেন, স্বাগতম, তোমাদের সাদর সম্ভাষণ। আমি তোমাদের তালাশেই এসেছি তোমাদের সুসংবাদ পৌছে দেয়ার জন্য। গতকাল নবী (সাঃ) আমাদের বলেছিলেন। তিনি পুবের দিকে দৃষ্টিপাত করে বলেছিলেনঃ “অবশ্যই আগামী কাল এদিক অর্থাৎ পূর্বদিক থেকে আরবের উত্তম প্রতিনিধিদল আসবে”। এপাশ ওপাশ করতে করতে আমার রাতটি অতিবাহিত হলো। ভোর হতেই আমি কাফেলা ও রাস্তার উপর তীক্ষ্ণ দৃষ্টিতে দেখতে থাকলাম। এভাবে বেশ বেলা হয়ে গেলো এবং আমি ফিরে আসার মনস্থ করলাম। ইত্যবসরে তোমাদের জন্তুযানের মাথা আমার দৃষ্টিগোচর হলো। একথা বলে লোকটি তার জন্তুযানের লাগাম ধরে তাকে ঘুরিয়ে নিয়ে দ্রুতবেগে ফিরে যেতে লাগলেন। তিনি নবী (সাঃ)-এর নিকট পৌছে তাকে মুহাজির ও আনসার সাহাবীগণ পরিবেষ্টিত পেলেন। তিনি বলেন, আমার পিতা-মাতা আপনার জন্য কোরবান হোক! আমি আবদুল কায়েস গোত্রের প্রতিনিধিদল সম্পর্কে আপনাকে সুসংবাদ দিতে এসেছি। তিনি জিজ্ঞেস করেনঃ হে উমার! তাদের সাথে কোথায় তোমার সাক্ষাত হয়েছে? তিনি বলেন, তারা আমার পেছনে আসছে এবং এখনই এসে পৌছবে। তিনি এটা উল্লেখ করলে নবী (সাঃ) বলেনঃ আল্লাহ তোমাকে সুসংবাদ দান করুন। লোকজন তাদের বসাবার ব্যবস্থা করতে লেগে গেলো। আর নবী (সাঃ) বসা অবস্থায় ছিলেন। তিনি তার চাদরের প্রান্তভাগ তার হাতের নিচে রেখে তাতে ভর দিয়ে বসলেন এবং পদদ্বয় সামনে প্রসারিত করে দিলেন। প্রতিনিধি দল এসে পৌঁছলে তাদের দেখে মুহাজির ও আনাসরগণ আনন্দিত হলেন। তারা নবী (সাঃ) ও তার সাহাবীগণকে দেখে আনন্দিত হয়ে রেকাবদানি বাজাতে থাকে এবং দ্রুতবেগে নবী (সাঃ)-এর খেদমতে উপস্থিত হয়। লোকজন সরে গিয়ে তাদের বসার জায়গা করে দিলো এবং নবী (সাঃ) পূর্ববৎ হাতে ভর দিয়ে বসে থাকলেন। (দলনেতাবারানী) আল-আশাজ্জের পৌছতে বিলম্ব হলো । তারা জন্তুযান একত্র করলো, সেগুলোকে বসালো এবং মালপত্র নামিয়ে একত্র করলো, অতঃপর একটি হাতবাক্স বের করে সফরের পোশাক পরিবর্তন করে চাদর পরিধান করে তার প্রান্তভাগ ঝুলিয়ে দিয়ে হেঁটে এসে উপস্থিত হলো। নবী (সাঃ) জিজ্ঞেস করেনঃ তোমাদের নেতা কে, তোমাদের যাবতীয় কাজের দায়িত্বশীল কে? সকলে একসাথে আল-আশাজ্জের দিকে ইংগিত করলো। তিনি বলেনঃ সে কি তোমাদের নেতার পুত্র? তারা বললো, তার পূর্বপুরুষ জাহিলী যুগেও আমাদের নেতা ছিলো এবং ইনি ইসলামে আমাদের নেতা। আশাজ এসে পৌছে এক প্রান্তে বসার ইচ্ছা করলে নবী (সাঃ) সোজা হয়ে বসে বলেনঃ হে আশাজ্জ! এখানে। শিশুকালে যেদিন একটি গর্দভীর ক্ষুরের আঘাতে তিনি আহত হন সেদিন থেকে তার নাম হয়েছে আশাজ্জ (আহত), যার চিহ্ন তার চেহারায় চাদের মত ভাস্কর ছিল। নবী (সাঃ) তাকে নিজের পাশে বসান, তার প্রতি অনুগ্রহ প্রদর্শন করেন এবং তাদের উপর তার মর্যাদার স্বীকৃতি দেন। প্রতিনিধি দল নবী (সাঃ)-কে প্রশ্ন করতে থাকে এবং তিনি তাদের অবহিত করতে থাকেন। সাথে অবশিষ্ট আছে কি? তারা বললো, হাঁ। প্রত্যেক ব্যক্তি নিজ নিজ সামানপত্রের দিকে দ্রুত অগ্রসর হলো এবং বস্তাভর্তি খেজুর নিয়ে এলো। সেগুলো তার সামনে একটি চামড়ার পাত্রের উপর রেখে দেয়া হলো। তাঁর সামনে ছিল দুই হাতের চেয়ে ক্ষুদ্র এবং এক হাতের চেয়ে বড় একটি খেজুরের ছড়ি। এটা তিনি নিজের কাছেই রাখতেন, তা খুব কমই তার থেকে বিচ্ছিন্ন থাকতো। তিনি সেটি দ্বারা খেজুরের স্তুপের দিকে ইশারা করে বলেনঃ তোমরা এর ‘তাদূদ’ নামকরণ করেছো”? তারা বললো, হাঁ। তিনি বলেনঃ তোমরা এর ‘সারাফান’ নামকরণ করেছো? তারা বললো, হাঁ। তিনি বলেনঃ তোমরা এর ‘বারনী’ নামকরণ করেছো ? তারা বললো, হাঁ। এটা তোমাদের সর্বোত্তম ও অধিক ফলনশীল খেজুর। গোত্রের কোন কোন প্রবীণ ব্যক্তি বলেন, এটি ছিল সর্বাধিক বরকতপূর্ণ। কম ফলনশীল ও নিম্ন মানের খেজুরও আমাদের সাথে ছিল যা আমরা আমাদের উট ও গাধাকে খাওয়াই। আমরা আমাদের প্রতিনিধি দলের সাথে ফিরে আসার পর ঐ খেজুরের প্রতি আমাদের আকর্ষণ বেড়ে গেলো এবং আমরা তার চাষাবাদ করলাম। শেষে এটাই আমাদের উৎপাদিত শস্যে পরিণত হলো এবং তাতে আমরা পর্যাপ্ত বরকত লক্ষ্য করলাম। (আহমাদ হা/১৫৬৪৪ ও ১৭৯৮৫)
তিনি আবদুল কায়েস গোত্রের প্রতিনিধি দলের কোন সদস্যকে বর্ণনা করতে শুনেছেন। তিনি বলেন, নবী (সাঃ)-এর নিকট প্রতিনিধিদল পাঠানোর প্রয়োজনীয়তা আমাদের নিকট প্রতীয়মান হলে আমরা রওয়ানা হলাম। আমরা সফরের শেষপ্রান্তে উপনীত হলে রাস্তার মাথায় বসা এক ব্যক্তি আমাদের সাথে সাক্ষাত করেন। তিনি সালাম দিলে আমরা তার উত্তর দিলাম। তিনি দণ্ডায়মান হয়ে জিজ্ঞেস করলেন, তোমরা কারা? আমরা বললাম, আবদুল কায়েস গোত্রের প্রতিনিধি দল। তিনি বলেন, স্বাগতম, তোমাদের সাদর সম্ভাষণ। আমি তোমাদের তালাশেই এসেছি তোমাদের সুসংবাদ পৌছে দেয়ার জন্য। গতকাল নবী (সাঃ) আমাদের বলেছিলেন। তিনি পুবের দিকে দৃষ্টিপাত করে বলেছিলেনঃ “অবশ্যই আগামী কাল এদিক অর্থাৎ পূর্বদিক থেকে আরবের উত্তম প্রতিনিধিদল আসবে”। এপাশ ওপাশ করতে করতে আমার রাতটি অতিবাহিত হলো। ভোর হতেই আমি কাফেলা ও রাস্তার উপর তীক্ষ্ণ দৃষ্টিতে দেখতে থাকলাম। এভাবে বেশ বেলা হয়ে গেলো এবং আমি ফিরে আসার মনস্থ করলাম। ইত্যবসরে তোমাদের জন্তুযানের মাথা আমার দৃষ্টিগোচর হলো। একথা বলে লোকটি তার জন্তুযানের লাগাম ধরে তাকে ঘুরিয়ে নিয়ে দ্রুতবেগে ফিরে যেতে লাগলেন। তিনি নবী (সাঃ)-এর নিকট পৌছে তাকে মুহাজির ও আনসার সাহাবীগণ পরিবেষ্টিত পেলেন। তিনি বলেন, আমার পিতা-মাতা আপনার জন্য কোরবান হোক! আমি আবদুল কায়েস গোত্রের প্রতিনিধিদল সম্পর্কে আপনাকে সুসংবাদ দিতে এসেছি। তিনি জিজ্ঞেস করেনঃ হে উমার! তাদের সাথে কোথায় তোমার সাক্ষাত হয়েছে? তিনি বলেন, তারা আমার পেছনে আসছে এবং এখনই এসে পৌছবে। তিনি এটা উল্লেখ করলে নবী (সাঃ) বলেনঃ আল্লাহ তোমাকে সুসংবাদ দান করুন। লোকজন তাদের বসাবার ব্যবস্থা করতে লেগে গেলো। আর নবী (সাঃ) বসা অবস্থায় ছিলেন। তিনি তার চাদরের প্রান্তভাগ তার হাতের নিচে রেখে তাতে ভর দিয়ে বসলেন এবং পদদ্বয় সামনে প্রসারিত করে দিলেন। প্রতিনিধি দল এসে পৌঁছলে তাদের দেখে মুহাজির ও আনাসরগণ আনন্দিত হলেন। তারা নবী (সাঃ) ও তার সাহাবীগণকে দেখে আনন্দিত হয়ে রেকাবদানি বাজাতে থাকে এবং দ্রুতবেগে নবী (সাঃ)-এর খেদমতে উপস্থিত হয়। লোকজন সরে গিয়ে তাদের বসার জায়গা করে দিলো এবং নবী (সাঃ) পূর্ববৎ হাতে ভর দিয়ে বসে থাকলেন। (দলনেতাবারানী) আল-আশাজ্জের পৌছতে বিলম্ব হলো । তারা জন্তুযান একত্র করলো, সেগুলোকে বসালো এবং মালপত্র নামিয়ে একত্র করলো, অতঃপর একটি হাতবাক্স বের করে সফরের পোশাক পরিবর্তন করে চাদর পরিধান করে তার প্রান্তভাগ ঝুলিয়ে দিয়ে হেঁটে এসে উপস্থিত হলো। নবী (সাঃ) জিজ্ঞেস করেনঃ তোমাদের নেতা কে, তোমাদের যাবতীয় কাজের দায়িত্বশীল কে? সকলে একসাথে আল-আশাজ্জের দিকে ইংগিত করলো। তিনি বলেনঃ সে কি তোমাদের নেতার পুত্র? তারা বললো, তার পূর্বপুরুষ জাহিলী যুগেও আমাদের নেতা ছিলো এবং ইনি ইসলামে আমাদের নেতা। আশাজ এসে পৌছে এক প্রান্তে বসার ইচ্ছা করলে নবী (সাঃ) সোজা হয়ে বসে বলেনঃ হে আশাজ্জ! এখানে। শিশুকালে যেদিন একটি গর্দভীর ক্ষুরের আঘাতে তিনি আহত হন সেদিন থেকে তার নাম হয়েছে আশাজ্জ (আহত), যার চিহ্ন তার চেহারায় চাদের মত ভাস্কর ছিল। নবী (সাঃ) তাকে নিজের পাশে বসান, তার প্রতি অনুগ্রহ প্রদর্শন করেন এবং তাদের উপর তার মর্যাদার স্বীকৃতি দেন। প্রতিনিধি দল নবী (সাঃ)-কে প্রশ্ন করতে থাকে এবং তিনি তাদের অবহিত করতে থাকেন। সাথে অবশিষ্ট আছে কি? তারা বললো, হাঁ। প্রত্যেক ব্যক্তি নিজ নিজ সামানপত্রের দিকে দ্রুত অগ্রসর হলো এবং বস্তাভর্তি খেজুর নিয়ে এলো। সেগুলো তার সামনে একটি চামড়ার পাত্রের উপর রেখে দেয়া হলো। তাঁর সামনে ছিল দুই হাতের চেয়ে ক্ষুদ্র এবং এক হাতের চেয়ে বড় একটি খেজুরের ছড়ি। এটা তিনি নিজের কাছেই রাখতেন, তা খুব কমই তার থেকে বিচ্ছিন্ন থাকতো। তিনি সেটি দ্বারা খেজুরের স্তুপের দিকে ইশারা করে বলেনঃ তোমরা এর ‘তাদূদ’ নামকরণ করেছো”? তারা বললো, হাঁ। তিনি বলেনঃ তোমরা এর ‘সারাফান’ নামকরণ করেছো? তারা বললো, হাঁ। তিনি বলেনঃ তোমরা এর ‘বারনী’ নামকরণ করেছো ? তারা বললো, হাঁ। এটা তোমাদের সর্বোত্তম ও অধিক ফলনশীল খেজুর। গোত্রের কোন কোন প্রবীণ ব্যক্তি বলেন, এটি ছিল সর্বাধিক বরকতপূর্ণ। কম ফলনশীল ও নিম্ন মানের খেজুরও আমাদের সাথে ছিল যা আমরা আমাদের উট ও গাধাকে খাওয়াই। আমরা আমাদের প্রতিনিধি দলের সাথে ফিরে আসার পর ঐ খেজুরের প্রতি আমাদের আকর্ষণ বেড়ে গেলো এবং আমরা তার চাষাবাদ করলাম। শেষে এটাই আমাদের উৎপাদিত শস্যে পরিণত হলো এবং তাতে আমরা পর্যাপ্ত বরকত লক্ষ্য করলাম। (আহমাদ হা/১৫৬৪৪ ও ১৭৯৮৫)
حدثنا موسى بن إسماعيل قال: حدثنا يحيى بن عبد الرحمن العصري قال: حدثنا شهاب بن عباد العصري، أن بعض وفد عبد القيس سمعه يذكر، قال: لما بدأنا في وفادتنا إلى النبي صلى الله عليه وسلم سرنا، حتى إذا شارفنا القدوم تلقانا رجل يوضع على قعود له، فسلم، فرددنا عليه، ثم وقف فقال: ممن القوم؟ قلنا: وفد عبد القيس، قال: مرحبا بكم وأهلا، إياكم طلبت، جئت لأبشركم، قال النبي صلى الله عليه وسلم بالأمس لنا: إنه نظر إلى المشرق فقال: " ليأتين غدا من هذا الوجه - يعني: المشرق - خير وفد العرب "، فبت أروغ حتى أصبحت، فشددت على راحلتي، فأمعنت في المسير حتى ارتفع النهار، وهممت بالرجوع، ثم رفعت رءوس رواحلكم، ثم ثنى راحلته بزمامها راجعا يوضع عوده على بدئه، حتى انتهى إلى النبي صلى الله عليه وسلم , وأصحابه حوله من المهاجرين والأنصار، فقال: بأبي [ص: 410] وأمي، جئت أبشرك بوفد عبد القيس، فقال: «أنى لك بهم يا عمر؟» قال: هم أولاء على أثري، قد أظلوا، فذكر ذلك، فقال: «بشرك الله بخير» ، وتهيأ القوم في مقاعدهم، وكان النبي صلى الله عليه وسلم قاعدا، فألقى ذيل ردائه تحت يده فاتكأ عليه، وبسط رجليه. فقدم الوفد ففرح بهم المهاجرون والأنصار، فلما رأوا النبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه أمرحوا ركابهم فرحا بهم، وأقبلوا سراعا، فأوسع القوم، والنبي صلى الله عليه وسلم متكئ على حاله، فتخلف الأشج - وهو: منذر بن عائذ بن منذر بن الحارث بن النعمان بن زياد بن عصر - فجمع ركابهم ثم أناخها، وحط أحمالها، وجمع متاعها، ثم أخرج عيبة له وألقى عنه ثياب السفر ولبس حلة، ثم أقبل يمشي مترسلا، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: «من سيدكم وزعيمكم، وصاحب أمركم؟» فأشاروا بأجمعهم إليه، وقال: «ابن سادتكم هذا؟» قالوا: كان آباؤه سادتنا في الجاهلية، وهو قائدنا إلى الإسلام، فلما انتهى الأشج أراد أن يقعد من ناحية، استوى النبي صلى الله عليه وسلم قاعدا قال: «ها هنا يا أشج» ، وكان أول يوم سمي الأشج ذلك اليوم، أصابته حمارة بحافرها وهو فطيم، فكان في وجهه مثل القمر، فأقعده إلى جنبه، وألطفه، وعرف فضله عليهم، فأقبل القوم على النبي صلى الله عليه وسلم يسألونه ويخبرهم، حتى كان بعقب الحديث قال: «هل معكم من أزودتكم شيء؟» قالوا: نعم، فقاموا سراعا، كل رجل منهم إلى ثقله فجاءوا بصبر التمر في أكفهم، فوضعت على نطع بين يديه، وبين يديه جريدة دون الذراعين وفوق الذراع، فكان يختصر بها، قلما يفارقها، فأومأ بها إلى صبرة من ذلك التمر فقال: «تسمون هذا التعضوض؟» قالوا: نعم، قال: «وتسمون هذا الصرفان؟» قالوا: نعم، «وتسمون هذا البرني؟» ، قالوا: نعم، قال: «هو خير تمركم وأنفعه لكم - وقال بعض شيوخ الحي - وأعظمه بركة» وإنما كانت عندنا خصبة نعلفها إبلنا وحميرنا، فلما رجعنا من وفادتنا تلك عظمت رغبتنا فيها، وفسلناها حتى تحولت ثمارنا منها، ورأينا البركة فيها