সহিহ মুসলিম > কা‘ব ইবনু মালিক (রাঃ) ও তাঁর দু’ সাথীর তাওবার বিবরণ
সহিহ মুসলিম ৬৯১১
وحدثني عبد بن حميد، حدثني يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثنا محمد بن عبد، الله بن مسلم ابن أخي الزهري عن عمه، محمد بن مسلم الزهري أخبرني عبد الرحمن، بن عبد الله بن كعب بن مالك أن عبيد الله بن كعب بن مالك، وكان، قائد كعب حين عمي قال سمعت كعب بن مالك يحدث حديثه حين تخلف عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك . وساق الحديث وزاد فيه على يونس فكان رسول الله صلى الله عليه وسلم قلما يريد غزوة إلا ورى بغيرها حتى كانت تلك الغزوة . ولم يذكر في حديث ابن أخي الزهري أبا خيثمة ولحوقه بالنبي صلى الله عليه وسلم .
‘আবদুর রহ্মান ইবনু ‘আবদুল্লাহ ইবনু কা‘ব ইবনু মালিক (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
তিনি বলেন, ‘উবাইদুল্লাহ ইবুন কা‘ব ইবনু মালিক (রাঃ) যিনি (তার বাবা) কা‘ব (রাঃ) অন্ধ হয়ে যাবার পর তাকে আনা নেয়া করতেন। তিনি (‘উবাইদুল্লাহ) বলেছেন, তাবূক যুদ্ধে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে অংশগ্রহণ না করে ঘরে বসে থাকার সম্পর্কে কা‘ব ইবনু মালিক (রাঃ)-কে আমি এ কথা বলতে শুনেছি। অতঃপর তিনি অবিকল হাদীস বর্ণনা করেছেন। তবে এতে অতিরিক্ত রয়েছে যে, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যেদিকে যুদ্ধ করার জন্যে যেতেন সাধারণতঃ তিনি আলোচনায় ঐ স্থানের কথা আলোচনা না করে অন্য জায়গার কথা আলোচনা করতেন। তবে এ যুদ্ধের কথা স্পষ্টভাবে বর্ণনা করেছিলেন। যুহরীর ভ্রাতুষ্পুত্রের এ হাদীসের মধ্যে আবূ খাইসামার কথা এবং নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাঁর সাক্ষাতের কথা আলোচনা নেই। (ই.ফা. ৬৭৬১, ই.সে. ৬৮১৬)
‘আবদুর রহ্মান ইবনু ‘আবদুল্লাহ ইবনু কা‘ব ইবনু মালিক (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
তিনি বলেন, ‘উবাইদুল্লাহ ইবুন কা‘ব ইবনু মালিক (রাঃ) যিনি (তার বাবা) কা‘ব (রাঃ) অন্ধ হয়ে যাবার পর তাকে আনা নেয়া করতেন। তিনি (‘উবাইদুল্লাহ) বলেছেন, তাবূক যুদ্ধে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে অংশগ্রহণ না করে ঘরে বসে থাকার সম্পর্কে কা‘ব ইবনু মালিক (রাঃ)-কে আমি এ কথা বলতে শুনেছি। অতঃপর তিনি অবিকল হাদীস বর্ণনা করেছেন। তবে এতে অতিরিক্ত রয়েছে যে, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যেদিকে যুদ্ধ করার জন্যে যেতেন সাধারণতঃ তিনি আলোচনায় ঐ স্থানের কথা আলোচনা না করে অন্য জায়গার কথা আলোচনা করতেন। তবে এ যুদ্ধের কথা স্পষ্টভাবে বর্ণনা করেছিলেন। যুহরীর ভ্রাতুষ্পুত্রের এ হাদীসের মধ্যে আবূ খাইসামার কথা এবং নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাঁর সাক্ষাতের কথা আলোচনা নেই। (ই.ফা. ৬৭৬১, ই.সে. ৬৮১৬)
وحدثني عبد بن حميد، حدثني يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثنا محمد بن عبد، الله بن مسلم ابن أخي الزهري عن عمه، محمد بن مسلم الزهري أخبرني عبد الرحمن، بن عبد الله بن كعب بن مالك أن عبيد الله بن كعب بن مالك، وكان، قائد كعب حين عمي قال سمعت كعب بن مالك يحدث حديثه حين تخلف عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك . وساق الحديث وزاد فيه على يونس فكان رسول الله صلى الله عليه وسلم قلما يريد غزوة إلا ورى بغيرها حتى كانت تلك الغزوة . ولم يذكر في حديث ابن أخي الزهري أبا خيثمة ولحوقه بالنبي صلى الله عليه وسلم .
সহিহ মুসলিম ৬৯১২
وحدثني سلمة بن شبيب، حدثنا الحسن بن أعين، حدثنا معقل، - وهو ابن عبيد الله - عن الزهري، أخبرني عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب بن مالك، عن عمه، عبيد الله بن كعب وكان قائد كعب حين أصيب بصره وكان أعلم قومه وأوعاهم لأحاديث أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم قال سمعت أبي كعب بن مالك وهو أحد الثلاثة الذين تيب عليهم يحدث أنه لم يتخلف عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة غزاها قط غير غزوتين . وساق الحديث وقال فيه وغزا رسول الله صلى الله عليه وسلم بناس كثير يزيدون على عشرة آلاف ولا يجمعهم ديوان حافظ .
‘উবাইদুল্লাহ ইবনু কা‘ব (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
কা‘ব (রাঃ) চক্ষু রোগে আক্রান্ত হবার পর ‘উবাইদুল্লাহ তাঁকে পরিচালন করতেন। তিনি তাঁর কাওমের মাঝে সবচেয়ে প্রজ্ঞাবান লোক ছিলেন এবং রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহাবাদের হাদীস বেশি হিফাযাতকারী ছিলেন। তিনি বলেনঃ যে তিনজন লোকের তাওবাহ্ গ্রহণ করেছিলেন, আমার পিতা কা‘ব ইবনু মালিক (রাঃ) ঐ তিন লোকের অন্যতম ছিলেন। আমি তাঁকে বলতে শুনেছি, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যত যুদ্ধ করেছেন এর মধ্যে তিনি দু’টি ছাড়া আর কোন যুদ্ধে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে পেছনে থাকেননি। তারপর তিনি পূর্বের অনুরূপ ঘটনাটি বর্ণনা করেছেন। তবে এতে রয়েছে যে, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বহু সৈন্য সামন্ত নিয়ে এ যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন। তাদের সংখ্যা দশ হাজারের চেয়েও বেশি ছিল। কোন তালিকায় তাঁদের নাম লিখে রাখা ছিল না। (ই.ফা. ৬৭৬২, ই.সে. ৬৮১৭)
‘উবাইদুল্লাহ ইবনু কা‘ব (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
কা‘ব (রাঃ) চক্ষু রোগে আক্রান্ত হবার পর ‘উবাইদুল্লাহ তাঁকে পরিচালন করতেন। তিনি তাঁর কাওমের মাঝে সবচেয়ে প্রজ্ঞাবান লোক ছিলেন এবং রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহাবাদের হাদীস বেশি হিফাযাতকারী ছিলেন। তিনি বলেনঃ যে তিনজন লোকের তাওবাহ্ গ্রহণ করেছিলেন, আমার পিতা কা‘ব ইবনু মালিক (রাঃ) ঐ তিন লোকের অন্যতম ছিলেন। আমি তাঁকে বলতে শুনেছি, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যত যুদ্ধ করেছেন এর মধ্যে তিনি দু’টি ছাড়া আর কোন যুদ্ধে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে পেছনে থাকেননি। তারপর তিনি পূর্বের অনুরূপ ঘটনাটি বর্ণনা করেছেন। তবে এতে রয়েছে যে, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বহু সৈন্য সামন্ত নিয়ে এ যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন। তাদের সংখ্যা দশ হাজারের চেয়েও বেশি ছিল। কোন তালিকায় তাঁদের নাম লিখে রাখা ছিল না। (ই.ফা. ৬৭৬২, ই.সে. ৬৮১৭)
وحدثني سلمة بن شبيب، حدثنا الحسن بن أعين، حدثنا معقل، - وهو ابن عبيد الله - عن الزهري، أخبرني عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب بن مالك، عن عمه، عبيد الله بن كعب وكان قائد كعب حين أصيب بصره وكان أعلم قومه وأوعاهم لأحاديث أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم قال سمعت أبي كعب بن مالك وهو أحد الثلاثة الذين تيب عليهم يحدث أنه لم يتخلف عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة غزاها قط غير غزوتين . وساق الحديث وقال فيه وغزا رسول الله صلى الله عليه وسلم بناس كثير يزيدون على عشرة آلاف ولا يجمعهم ديوان حافظ .
সহিহ মুসলিম ৬৯০৯
حدثني أبو الطاهر، أحمد بن عمرو بن عبد الله بن عمرو بن سرح مولى بني أمية أخبرني ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، قال ثم غزا رسول الله صلى الله عليه وسلم غزوة تبوك وهو يريد الروم ونصارى العرب بالشام . قال ابن شهاب فأخبرني عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب بن مالك أن عبد الله بن كعب كان قائد كعب من بنيه حين عمي قال سمعت كعب بن مالك يحدث حديثه حين تخلف عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك قال كعب بن مالك لم أتخلف عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة غزاها قط إلا في غزوة تبوك غير أني قد تخلفت في غزوة بدر ولم يعاتب أحدا تخلف عنه إنما خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم والمسلمون يريدون عير قريش حتى جمع الله بينهم وبين عدوهم على غير ميعاد ولقد شهدت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة العقبة حين تواثقنا على الإسلام وما أحب أن لي بها مشهد بدر وإن كانت بدر أذكر في الناس منها وكان من خبري حين تخلفت عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك أني لم أكن قط أقوى ولا أيسر مني حين تخلفت عنه في تلك الغزوة والله ما جمعت قبلها راحلتين قط حتى جمعتهما في تلك الغزوة فغزاها رسول الله صلى الله عليه وسلم في حر شديد واستقبل سفرا بعيدا ومفازا واستقبل عدوا كثيرا فجلا للمسلمين أمرهم ليتأهبوا أهبة غزوهم فأخبرهم بوجههم الذي يريد والمسلمون مع رسول الله صلى الله عليه وسلم كثير ولا يجمعهم كتاب حافظ - يريد بذلك الديوان - قال كعب فقل رجل يريد أن يتغيب يظن أن ذلك سيخفى له ما لم ينزل فيه وحى من الله عز وجل وغزا رسول الله صلى الله عليه وسلم تلك الغزوة حين طابت الثمار والظلال فأنا إليها أصعر فتجهز رسول الله صلى الله عليه وسلم والمسلمون معه وطفقت أغدو لكى أتجهز معهم فأرجع ولم أقض شيئا . وأقول في نفسي أنا قادر على ذلك إذا أردت . فلم يزل ذلك يتمادى بي حتى استمر بالناس الجد فأصبح رسول الله صلى الله عليه وسلم غاديا والمسلمون معه ولم أقض من جهازي شيئا ثم غدوت فرجعت ولم أقض شيئا فلم يزل ذلك يتمادى بي حتى أسرعوا وتفارط الغزو فهممت أن أرتحل فأدركهم فيا ليتني فعلت ثم لم يقدر ذلك لي فطفقت إذا خرجت في الناس بعد خروج رسول الله صلى الله عليه وسلم يحزنني أني لا أرى لي أسوة إلا رجلا مغموصا عليه في النفاق أو رجلا ممن عذر الله من الضعفاء ولم يذكرني رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى بلغ تبوكا فقال وهو جالس في القوم بتبوك " ما فعل كعب بن مالك " . قال رجل من بني سلمة يا رسول الله حبسه برداه والنظر في عطفيه . فقال له معاذ بن جبل بئس ما قلت والله يا رسول الله ما علمنا عليه إلا خيرا . فسكت رسول الله صلى الله عليه وسلم فبينما هو على ذلك رأى رجلا مبيضا يزول به السراب فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم " كن أبا خيثمة " . فإذا هو أبو خيثمة الأنصاري وهو الذي تصدق بصاع التمر حين لمزه المنافقون . فقال كعب بن مالك فلما بلغني أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد توجه قافلا من تبوك حضرني بثي فطفقت أتذكر الكذب وأقول بم أخرج من سخطه غدا وأستعين على ذلك كل ذي رأى من أهلي فلما قيل لي إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد أظل قادما زاح عني الباطل حتى عرفت أني لن أنجو منه بشىء أبدا فأجمعت صدقه وصبح رسول الله صلى الله عليه وسلم قادما وكان إذا قدم من سفر بدأ بالمسجد فركع فيه ركعتين ثم جلس للناس فلما فعل ذلك جاءه المخلفون فطفقوا يعتذرون إليه ويحلفون له وكانوا بضعة وثمانين رجلا فقبل منهم رسول الله صلى الله عليه وسلم علانيتهم وبايعهم واستغفر لهم ووكل سرائرهم إلى الله حتى جئت فلما سلمت تبسم تبسم المغضب ثم قال " تعال " . فجئت أمشي حتى جلست بين يديه فقال لي " ما خلفك " . ألم تكن قد ابتعت ظهرك " . قال قلت يا رسول الله إني والله لو جلست عند غيرك من أهل الدنيا لرأيت أني سأخرج من سخطه بعذر ولقد أعطيت جدلا ولكني والله لقد علمت لئن حدثتك اليوم حديث كذب ترضى به عني ليوشكن الله أن يسخطك على ولئن حدثتك حديث صدق تجد على فيه إني لأرجو فيه عقبى الله والله ما كان لي عذر والله ما كنت قط أقوى ولا أيسر مني حين تخلفت عنك . قال رسول الله صلى الله عليه وسلم " أما هذا فقد صدق فقم حتى يقضي الله فيك " . فقمت وثار رجال من بني سلمة فاتبعوني فقالوا لي والله ما علمناك أذنبت ذنبا قبل هذا لقد عجزت في أن لا تكون اعتذرت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم بما اعتذر به إليه المخلفون فقد كان كافيك ذنبك استغفار رسول الله صلى الله عليه وسلم لك . قال فوالله ما زالوا يؤنبونني حتى أردت أن أرجع إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فأكذب نفسي - قال - ثم قلت لهم هل لقي هذا معي من أحد قالوا نعم لقيه معك رجلان قالا مثل ما قلت فقيل لهما مثل ما قيل لك - قال - قلت من هما قالوا مرارة بن ربيعة العامري وهلال بن أمية الواقفي - قال - فذكروا لي رجلين صالحين قد شهدا بدرا فيهما أسوة - قال - فمضيت حين ذكروهما لي . قال ونهى رسول الله صلى الله عليه وسلم المسلمين عن كلامنا أيها الثلاثة من بين من تخلف عنه - قال - فاجتنبنا الناس - وقال - تغيروا لنا حتى تنكرت لي في نفسي الأرض فما هي بالأرض التي أعرف فلبثنا على ذلك خمسين ليلة فأما صاحباى فاستكانا وقعدا في بيوتهما يبكيان وأما أنا فكنت أشب القوم وأجلدهم فكنت أخرج فأشهد الصلاة وأطوف في الأسواق ولا يكلمني أحد وآتي رسول الله صلى الله عليه وسلم فأسلم عليه وهو في مجلسه بعد الصلاة فأقول في نفسي هل حرك شفتيه برد السلام أم لا ثم أصلي قريبا منه وأسارقه النظر فإذا أقبلت على صلاتي نظر إلى وإذا التفت نحوه أعرض عني حتى إذا طال ذلك على من جفوة المسلمين مشيت حتى تسورت جدار حائط أبي قتادة وهو ابن عمي وأحب الناس إلى فسلمت عليه فوالله ما رد على السلام فقلت له يا أبا قتادة أنشدك بالله هل تعلمن أني أحب الله ورسوله قال فسكت فعدت فناشدته فسكت فعدت فناشدته فقال الله ورسوله أعلم . ففاضت عيناى وتوليت حتى تسورت الجدار فبينا أنا أمشي في سوق المدينة إذا نبطي من نبط أهل الشام ممن قدم بالطعام يبيعه بالمدينة يقول من يدل على كعب بن مالك - قال - فطفق الناس يشيرون له إلى حتى جاءني فدفع إلى كتابا من ملك غسان وكنت كاتبا فقرأته فإذا فيه أما بعد فإنه قد بلغنا أن صاحبك قد جفاك ولم يجعلك الله بدار هوان ولا مضيعة فالحق بنا نواسك . قال فقلت حين قرأتها وهذه أيضا من البلاء . فتياممت بها التنور فسجرتها بها حتى إذا مضت أربعون من الخمسين واستلبث الوحى إذا رسول رسول الله صلى الله عليه وسلم يأتيني فقال إن رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمرك أن تعتزل امرأتك . قال فقلت أطلقها أم ماذا أفعل قال لا بل اعتزلها فلا تقربنها - قال - فأرسل إلى صاحبى بمثل ذلك - قال - فقلت لامرأتي الحقي بأهلك فكوني عندهم حتى يقضي الله في هذا الأمر - قال - فجاءت امرأة هلال بن أمية رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت له يا رسول الله إن هلال بن أمية شيخ ضائع ليس له خادم فهل تكره أن أخدمه قال " لا ولكن لا يقربنك " . فقالت إنه والله ما به حركة إلى شىء ووالله ما زال يبكي منذ كان من أمره ما كان إلى يومه هذا . قال فقال لي بعض أهلي لو استأذنت رسول الله صلى الله عليه وسلم في امرأتك فقد أذن لامرأة هلال بن أمية أن تخدمه - قال - فقلت لا أستأذن فيها رسول الله صلى الله عليه وسلم وما يدريني ماذا يقول رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا استأذنته فيها وأنا رجل شاب - قال - فلبثت بذلك عشر ليال فكمل لنا خمسون ليلة من حين نهي عن كلامنا - قال - ثم صليت صلاة الفجر صباح خمسين ليلة على ظهر بيت من بيوتنا فبينا أنا جالس على الحال التي ذكر الله عز وجل منا قد ضاقت على نفسي وضاقت على الأرض بما رحبت سمعت صوت صارخ أوفى على سلع يقول بأعلى صوته يا كعب بن مالك أبشر - قال - فخررت ساجدا وعرفت أن قد جاء فرج . - قال - فآذن رسول الله صلى الله عليه وسلم الناس بتوبة الله علينا حين صلى صلاة الفجر فذهب الناس يبشروننا فذهب قبل صاحبى مبشرون وركض رجل إلى فرسا وسعى ساع من أسلم قبلي وأوفى الجبل فكان الصوت أسرع من الفرس فلما جاءني الذي سمعت صوته يبشرني فنزعت له ثوبى فكسوتهما إياه ببشارته والله ما أملك غيرهما يومئذ واستعرت ثوبين . فلبستهما فانطلقت أتأمم رسول الله صلى الله عليه وسلم يتلقاني الناس فوجا فوجا يهنئوني بالتوبة ويقولون لتهنئك توبة الله عليك . حتى دخلت المسجد فإذا رسول الله صلى الله عليه وسلم جالس في المسجد وحوله الناس فقام طلحة بن عبيد الله يهرول حتى صافحني وهنأني والله ما قام رجل من المهاجرين غيره . قال فكان كعب لا ينساها لطلحة . قال كعب فلما سلمت على رسول الله صلى الله عليه وسلم قال وهو يبرق وجهه من السرور ويقول " أبشر بخير يوم مر عليك منذ ولدتك أمك " . قال فقلت أمن عندك يا رسول الله أم من عند الله فقال " لا بل من عند الله " . وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا سر استنار وجهه كأن وجهه قطعة قمر - قال - وكنا نعرف ذلك - قال - فلما جلست بين يديه قلت يا رسول الله إن من توبتي أن أنخلع من مالي صدقة إلى الله وإلى رسوله صلى الله عليه وسلم . فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم " أمسك بعض مالك فهو خير لك " . قال فقلت فإني أمسك سهمي الذي بخيبر - قال - وقلت يا رسول الله إن الله إنما أنجاني بالصدق وإن من توبتي أن لا أحدث إلا صدقا ما بقيت - قال - فوالله ما علمت أن أحدا من المسلمين أبلاه الله في صدق الحديث منذ ذكرت ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم إلى يومي هذا أحسن مما أبلاني الله به والله ما تعمدت كذبة منذ قلت ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم إلى يومي هذا وإني لأرجو أن يحفظني الله فيما بقي . قال فأنزل الله عز وجل { لقد تاب الله على النبي والمهاجرين والأنصار الذين اتبعوه في ساعة العسرة من بعد ما كاد يزيغ قلوب فريق منهم ثم تاب عليهم إنه بهم رءوف رحيم * وعلى الثلاثة الذين خلفوا حتى إذا ضاقت عليهم الأرض بما رحبت وضاقت عليهم أنفسهم} حتى بلغ { يا أيها الذين آمنوا اتقوا الله وكونوا مع الصادقين} قال كعب والله ما أنعم الله على من نعمة قط بعد إذ هداني الله للإسلام أعظم في نفسي من صدقي رسول الله صلى الله عليه وسلم أن لا أكون كذبته فأهلك كما هلك الذين كذبوا إن الله قال للذين كذبوا حين أنزل الوحى شر ما قال لأحد وقال الله { سيحلفون بالله لكم إذا انقلبتم إليهم لتعرضوا عنهم فأعرضوا عنهم إنهم رجس ومأواهم جهنم جزاء بما كانوا يكسبون * يحلفون لكم لترضوا عنهم فإن ترضوا عنهم فإن الله لا يرضى عن القوم الفاسقين} قال كعب كنا خلفنا أيها الثلاثة عن أمر أولئك الذين قبل منهم رسول الله صلى الله عليه وسلم حين حلفوا له فبايعهم واستغفر لهم وأرجأ رسول الله صلى الله عليه وسلم أمرنا حتى قضى الله فيه فبذلك قال الله عز وجل { وعلى الثلاثة الذين خلفوا} وليس الذي ذكر الله مما خلفنا تخلفنا عن الغزو وإنما هو تخليفه إيانا وإرجاؤه أمرنا عمن حلف له واعتذر إليه فقبل منه .
ইবনু শিহাব (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
তিনি বলেন, অতঃপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবূকের যুদ্ধে শারীক হন। তাঁর উদ্দেশ্য ছিল, সিরিয়ার আরব খ্রিস্টান ও রোমকরা। ইবনু শিহাব বলেন, আমাকে ‘আবদুর রহ্মান ইবনু ‘আবদুল্লাহ ইবনু কা‘ব ইবনু মালিক (রহঃ) অবিহিত করেছেন যে, প্রকৃতপক্ষে ‘আবদুল্লাহ ইবনু কা‘ব বলেছেন, কা‘ব ইবনু মালিক (রাঃ) অন্ধ হয়ে যাওয়ার পর তার সন্তানদের মাঝে তিনি ছিলেন তাঁর চালক। তিনি বলেন, আমি কা‘ব ইবনু মালিক (রাঃ)-কে তাবূক যুদ্ধে রসূলের সাথে অংশগ্রহণ না করার ইতিবৃত্ত স্বীয় মুখে বর্ণনা করতে শুনেছি। কা‘ব ইবনু মালিক (রাঃ) বলেছেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যত যুদ্ধ করেছেন তাবূক যুদ্ধ ছাড়া এর সব ক’টির মাঝেই আমি তাঁর সাথে অংশগ্রহণ করেছিলাম। কিন্তু বদর যুদ্ধে আমি তাঁর সাথে অংশগ্রহণ করতে পারিনি। তবে যারা তাদের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেননি তাদের কাউকেও দোষারোপ করেননি। তখন তো রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও মুসলিমগণ কেবলমাত্র কুরায়শ কাফিলার উদ্দেশে বের হয়েছিলেন। পরিশেষে আল্লাহ তা‘আলা মুসলিম ও কাফিরদের অনির্ধারিত সময়ে একত্রিত করে দিলেন। ‘আকাবার রাত্রে যখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আমরা ইসলামের উপর অঙ্গীকার নিচ্ছিলাম, সে রাত্রে আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উপস্থিত ছিলাম। যদিও বদর যুদ্ধ মানুষের কাছে সবচেয়ে বেশী প্রসিদ্ধ, তথাপি ‘আকাবাহ্ রাত্রির পরিবর্তে বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণ করা আমার নিকট বেশি প্রিয় নয়। তাবূক যুদ্ধে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে অংশগ্রহণ না করার খবর হচ্ছে এই যে, (যখন এ যুদ্ধ সংঘটিত হয়েছিল) তখন আমি যেমন শক্তিশালী ও স্বচ্ছল ছিলাম, তেমন আর কখনো ছিলাম না। আল্লাহর শপথ! এর পূর্বে দু’টি সওয়ারী কখনো একত্রে জমা করতে পারিনি। কিন্তু এ যুদ্ধের সময় দু’টি সওয়ারী একত্রিত করেছিলাম। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এ অভিযানে যান প্রচণ্ড গরমের মধ্যে। মরুভূমিতে দীর্ঘসফরে যাত্রা করলেন। বহু সংখ্যক শত্রুর সম্মুখীন হতে যাচ্ছিলেন। তাই তিনি বিষয়টি মুসলিমদের সামনে স্পষ্ট করে তুললেন, যাতে তারা যুদ্ধের জন্যে সম্পূর্ণ প্রস্তুতি গ্রহণ করে নিতে পারে। তাদের উদ্দেশ্য সম্পর্কেও রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে অবহিত করেছেন। তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মুসলিমের সংখ্যা ছিল বেশি এবং তাদের নাম একত্র করেনি কোন সংরক্ষণকারী কিতাবে অর্থাৎ-রেজিস্ট্রারে। কা‘ব বলেন, সুতরাং যে লোক অনুপস্থিত থাকতে সংকল্প করে সে কমপক্ষে এ চিন্তা করতে পারত যে, তার অনুপস্থিতির বিষয়টি গোপন থাকবে, যতক্ষন না আল্লাহর তরফ থেকে তার ব্যাপারে ওয়াহী অবতীর্ণ হয়। এ যুদ্ধ সংঘটিত হয়েছিল, যখন গাছের ফল পাকছিল এবং বৃক্ষের ছায়া ছিল আনন্দদায়ক। আর আমিও ছিলাম এসবের প্রতি আকৃষ্ট। পরিশেষে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও মসুলমগণ যুদ্ধের জন্য সম্পূর্ণ প্রস্তুতি গ্রহণ করলেন। আমিও তাঁদের সঙ্গে যুদ্ধে অংশগ্রহণ করার জন্য প্রস্তুতি গ্রহণের উদ্দেশে বাড়ী হতে সকালে বের হতাম, কিন্তু কোন কিছু সিদ্ধান্ত না করেই ফিরে আসতাম এবং মনে মনে বলতাম, আমি তো যুদ্ধে যেতে সক্ষম, যখনই সংকল্প করি। আমার ব্যাপারটি এভাবেই চলতে থাকল। এদিকে লোকজন সত্যিই প্রস্তুতি চালিয়ে যেতে লাগল। পরিশেষে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভোরে রওনা হলেন এবং তাঁর সাথে মুসলিমগণও রওনা হয়ে গেল। কিন্তু আমি কোন প্রস্তুতি গ্রহণ করিনি। পরদিন ভোরে আমি বের হলাম। তবে কোন প্রস্তুতি না নিয়েই ফিরে আসলাম। এভাবে আমার সময় দীর্ঘায়িত হতে লাগল। এদিকে লোকজন দ্রুতগতিতে অগ্রসর হয় আর মুজাহিদ্বীনের দল বহু দূরে চলে যায়। তখন আমি চিন্তা করলাম যে, আমিও রওনা হয়ে তাদের সঙ্গে একত্রিত হয়ে যাই। হায় আফসোস! আমি যদি তা করতাম। তবে আমার ভাগ্যে তা নির্ধারিত হয়নি। অতএব রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুদ্ধে চলে যাওয়ার পর আমি যখন লোকালয়ে বের হতাম তখন এ সম্পর্কে আমাকে দুঃখ দিত যে, আমি অনুসরণীয় নমুনা দেখতে পেতাম না, কেবলমাত্র এমন এক লোক যাদের উপর নিফাকের অভিযোগ রয়েছে অথবা সে সকল অক্ষম লোক যাদের আল্লাহ তা‘আলা মাযূর হিসেবে অবকাশ দিয়েছেন। এদিকে তাবূক পৌঁছার পূর্বে রাস্তায় রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কথা মোটেই আলোচনা করেননি। কিন্তু তাবূক পৌঁছার পর লোকেদের মধ্যে বসা অবস্থায় রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন, কা‘ব ইবনু মালিক কি করছে? তখন বানূ সালামাহ্ গোত্রের এক লোক বলল, হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! তার লালজোড়া চাদর এবং তার অহঙ্কার তাকে দূরে রেখেছে। তখন মু‘আয ইবনু জাবাল (রাঃ) বললেন, তুমি অনেক খারাপ কথা বলল। আল্লাহ শপথ, হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমরা তো তাকে ভালই জানি। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নীরব থাকলেন। ইতিমধ্যে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শুভ্র পেশাক পরিহিত এক লোককে ধূলা উড়িয়ে আসতে দেখে বললেন, আবূ খাইসামাই হবে। দেখা গেল, তিনি আনসারী সহাবা আবূ খাইসামাহ্ (রাঃ) আর তিনি সে লোক যিনি এক সা‘ খেজুর সদাকাহ্ করেছিলেন যার জন্য মুনাফিকরা তার দূর্নাম রটনা করেছিল। কা‘ব ইবনু মালিক (রাঃ) বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবূক হতে ফিরে (মাদীনাহ্ অভিমুখে) রওনা হওয়ার সংবাদ আমার নিকট পৌঁছার পর আমার উপর চিন্তার ছাপ পড়ে গেল। আমি মনে মনে মিথ্যা ওযর কল্পনা করতে লাগলাম এবং এমন কথা ভাবতে লাগলাম যা বলে সকালে আমি তাঁর রাগ হতে বাঁচতে পারি। আর এ বিষয়ে আমি বুদ্ধিমান আপনজনেরও সহযোগিতা নিতে লাগলাম। পরিশেষে যখন আমাকে বলা হলো যে, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পৌঁছেই যাচ্ছেন, তখন আমার অন্তর হতে সকল বাতিল কল্পনা দূরে সরে গেল। এমনকি আমি বুঝতে পারলাম যে, কোন কিছুতেই আমি তাঁর কাছ থেকে মুক্তি পাব না। তাই আমি তাঁর নিকট সত্য বলারই ইচ্ছা করলাম। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সকাল বেলা সফর থেকে আগমন করলেন। তাঁর রীতি ছিল, সফর থেকে ফিরে প্রথমে তিনি মাসজিদে আসতেন এবং সেখানে দু’রাক‘আত (সলাত) আদায় করে মানুষের সঙ্গে সাক্ষাতের জন্যে বসতেন। এবারও যখন তিনি বসলেন, তখন যারা যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেনি তারা এসে অজুহাত দেয়া শুরু করল এবং এর উপর কসম খেতে লাগল। এ সমস্ত লোক সংখ্যায় আশির বেশি ছিল। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের প্রকাশ্য অজুহাত গ্রহণ করলেন এবং তাদের হতে বাই‘আত নিয়ে তাদের জন্য আল্লাহর কাছে মাফ চাইলেন। আর তাদের অন্তর্নিহিত অবস্থা আল্লাহর উপর ছেড়ে দিলেন। পরিশেষে আমি উপস্থিত হয়ে সালাম করলাম। তখন তিনি ক্রুদ্ধ লোকের হাসির মতো মুচকি হাসলেন। তারপর তিনি বললেন, এসো। আমি এসে তাঁর সম্মুখে বসলাম। তখন তিনি আমাকে প্রশ্ন করলেন, কিসে তোমাকে পিছনে ফেলে দিয়েছিল? তুমি কি সওয়ারী কিনে ছিলে না? তিনি বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আল্লাহর শপথ, আমি যদি আপনি ছাড়া কোন দুনিয়াদারী মানুষের নিকট বসতাম তবে আপনি দেখতেন যে, অবশ্যই আমি কোন অজুহাত পেশ করে তার গোস্বা হতে বের হতাম। কারণ আমাকে বাকশক্তির ক্ষমতা দেয়া হয়েছে। কিন্তু আল্লাহর শপথ! আমার দৃঢ় ধারণা, আজ যদি আমি মিথ্যা কথা বলি যাতে আপনি আমার প্রতি সন্তুষ্ট হন, তবে শীঘ্রই আল্লাহ তা‘আলা আপনাকে আমার প্রতি অসন্তুষ্ট করবেন না। আর যদি আমি সত্য কথা বলি এবং এতে আপনি আমার প্রতি অসন্তুষ্ট হন, তবে এতে আল্লাহর তরফ হতে আমি কল্যাণজনক পরিণামের প্রত্যাশা রাখি। আল্লাহর শপথ! আমার কোন ওযর-আপত্তি ছিল না। আল্লাহর শপথ! আপনার (অভিযান) হতে পিছনে থাকার সময়ের চেয়ে কোন সময় আমি অধিক ক্ষমতাসম্পন্ন ও অধিক ধন-সম্পদের অধিকারী ছিলাম না। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বরলেন, নিশ্চয়ই এ লোক সত্য কথা বলেছে। এরপর তিনি বললেন, তুমি চলে যাও, যতক্ষণ না আল্লাহ তা‘আলা তোমার সম্বন্ধে কোন সিদ্ধান্ত দেন। তারপর আমি চলে গেলাম। তখন বানূ সালামাহ্ গোত্রের কিছু লোক দৌড়িয়ে আমার নিকটে এসে বলল, আল্লাহর কসম! আমরা তো ইতিপূর্বে তোমাকে আর কোন অন্যায় করতে দেখিনি। যারা পশ্চাতে রয়ে গিয়েছিল, তারা যেমন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ওযর পেশ করেছে সেভাবে ওযর পেশ করতে কি তুমি অক্ষম ছিলে? অতএব রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইস্তিগফারই তোমার পাপের জন্য যথেষ্ট হত। তিনি বলেন, আল্লাহর কসম। এভাবে তারা আমাকে এত ভর্ৎসনা করতে লাগল যে, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আবার গিয়ে আমার স্বীয় উক্তি মিথ্যা প্রতিপন্ন করার ইচ্ছা হতে লাগল। আমি লোকদের বললাম, আমার মতো আর কারো এমন অবস্থা হয়েছে কি? তারা বলল, হ্যাঁ, আরো দু’ জন তোমার মতো করেছেন। তুমি যা বলেছ তারাও অবিকল বলেছেন এবং তোমাকে যা বলা হয়েছে তাদেরও তাই বলা হয়েছে। আমি বললাম, তারা কারা? তারা বলল, তাঁরা হলেন, মুরারাহ্ ইবনু রাবী‘আহ্ ‘আমিরী এবং হিলাল ইবনু উমাইয়্যাহ্ আল ওয়াকিফী (রাঃ)। কা‘ব বলেন, তাঁরা আমার কাছে এমন দু’ লোকের কথা বর্ণনা করল, যাঁরা ছিলেন নেক্কার, বদর যুদ্ধে অংশ গ্রহণকারী। এঁরা দু’জনই ছিলেন নমুনা স্বরূপ। কা‘ব (রাঃ) বলেন, যখন তারা ঐ দু’ লোকের কথা বর্ণনা করল, তখন আমি স্বীয় অবস্থার উপর থেকে গেলাম। এদিকে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যারা যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেনি তাদের মধ্য থেকে শুধু আমাদের তিন জনের সাথে মুসলিমদের কথা বলতে নিষেধ করে দিলেন। এরপর লোকেরা আমাদের পরিহার করল অথবা বলেছেন, আমাদের সাথে তাদের ব্যবহার বদলে গেল। এমনকি পৃথিবীও যেন অপছন্দ করতে লাগল, (মনে হলো) যে ভূমি আমি চিনতাম, এ যেন তা নেই। এমনি করে পঞ্চাশ রাত কাটালাম। আর আমার দু’ সাথী ছিলেন হীনবল, তাই তাঁরা নিজ নিজ গৃহে নীরবে বসে রইলেন এবং কাঁদতে লাগলেন। আর আমি তাদের মাঝে কম বয়স্ক ও সবল ছিলাম। আমি রাস্তায় বের হতাম, সলাতে শারীক হতাম এবং বাজারেও হাঁটাহাঁটি করতাম। কিন্তু কেউ আমার সাথে কোন কথা বলত না। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সলাত আদায়ের পর স্বীয় স্থানে বসাবস্থায় আমি তাঁর নিকট আসতাম, তাকে সালাম করতাম এবং মনে মনে ভাবতাম, তিনি সালামের জওয়াব প্রদান করে তাঁর ওষ্ঠযুগল নাড়িয়েছেন কি-না? তারপর আমি তাঁর কাছে দাঁড়িয়ে সলাত আদায় করতাম এবং গোপন চাহনির মাধ্যমে আমি তাঁর দিকে লক্ষ্য করতাম। যখন আমি সলাতে নিমগ্ন হতাম তখন তিনি আমার প্রতি দৃষ্টি দিতেন। কিন্তু আমি যখন তাঁর দিকে তাকাতাম তখন তিনি আমার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিতেন। আমার প্রতি মুসলিমের এ রূঢ় আচরণ যখন দীর্ঘায়িত হয়ে গেল তখন আমি গিয়ে আবূ কাতাদাহ্ (রাঃ)-এর বাগানের দেয়াল টপকিয়ে তার কাছে গেলাম। তিনি ছিলেন আমার চাচাতো ভাই এবং আমার খুবই প্রিয় ব্যক্তি। উপরে উঠেই আমি তাঁকে সালাম করলাম। কিন্তু আল্লাহর কসম! তিনি আমার সালামের কোন জবাব দিলেন না। আমি তাঁকে বললাম, হে আবূ কাতাদাহ্! আমি তোমাকে আল্লাহর শপথ করে জিজ্ঞেস করছি, তুমি কি জান না যে, আমি আল্লাহ ও তাঁর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ভালবাসি? তিনি কোন জবাব দিলেন না। আমি আবার তাঁকে শপথ করে জিজ্ঞেস করলাম। এবারও তিনি কোন জবাব দিলেন না। তারপর পুনরায় আমি তাঁকে শপথ করে জিজ্ঞেস করলাম। উত্তরে তিনি বললেন, আল্লাহ ও তাঁর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ই ভাল জানেন। এ কথা শুনে আমার দু’চোখ দিয়ে পানি ঝড়তে লাগল। পরিশেষে পিছন ফিরে আমি আবার প্রাচীর টপকিয়ে ফিরে এলাম। তারপর আমি কোন একদিন মাদীনার বাজার দিয়ে হাঁটতেছিলাম, তখন মাদীনার বাজারে শাক-সবজি বিক্রির উদ্দেশে আগত সিরিয়ার কৃষকদের মাঝখান থেকে একজন বলতে লাগল, এমন কোন লোক আছে কি, যে আমাকে কা‘ব ইবনু মালিকের ঠিকানা বলতে পারে? লোকেরা ইঙ্গিতে আমাকে দেখিয়ে দিলে সে আমার কাছে আসলো এবং গাস্সান সম্রাটের তরফ হতে আমাকে একটি চিঠি দিল। আমি লেখাপড়া জানতাম। তাই আমি তা পড়লাম। এতে লেখা ছিল, “আমি জানতে পারলাম যে, তোমার সাথী মুহাম্মাদ তোমার প্রতি অন্যায় আচরণ করছে। অথচ আল্লাহ তা‘আলা তোমাকে নীচু গৃহে জন্ম দেননি এবং ধ্বংসাত্মক স্থানেও নয়। সুতরাং তুমি আমাদের কাছে চলে এসো। আমরা তোমার সাথে ভাল আচরণ করব।” এ চিঠি পড়া মাত্র আমি বললাম, এটাও এক রকমের পরীক্ষা। তখন এ চিঠিটি নিয়ে আমি চুলার কাছে গেলাম এবং আগুনে তা পুড়িয়ে দিলাম। চল্লিশ দিন অতিক্রান্ত হলো। এখনও এদিকে কোন ওয়াহী আসছে না। এমতাবস্থায় রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এক বার্তাবাহক আমার কাছে এসে বললেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনাকে আপনার সহধর্মিণী থেকে দূরে থাকার নির্দেশ দিয়েছেন। আমি তাকে প্রশ্ন করলাম, আমি কি তাকে তালাক্ দিব, না অন্য কিছু করব? তিনি বললেন, না তালাক্ দিতে হবে না। বরং তুমি তার হতে আলাদা হয়ে যাও এবং তার সঙ্গে মিলন করো না। তিনি বলেন, আমার অপর সাথীদের কাছেও এমন খবর পাঠানো হলো। কা‘ব (রাঃ) বলেন, তারপর আমি আমার সহধর্মিণীকে বললাম, তুমি তোমার পিতার বাড়ী চলে যাও এবং যে পর্যন্ত আল্লাহ তা‘আলা এ ব্যাপারে কোন সিদ্ধান্ত না দেন ততদিন সেখানেই অবস্থান করবে। কা‘ব (রাঃ) বলেন, এরপর হিলাল ইবনু উমাইয়্যাহ্ (রাঃ)-এর সহধর্মিণী রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন, হে আল্লাহ্র রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! হিলাল ইবনু উমাইয়্যাহ্ একজন বয়োঃবৃদ্ধ লোক। তাঁর কোন সেবক নেই। আমি যদি তাঁর সেবা করি, আপনি কি তাতে আপত্তি করেন? তিনি বললেন, না। কিন্তু সে তোমার সঙ্গে সহবাস করতে পারবে না। এ কথা শুনে হিলাল (রাঃ)-এর সহধর্মিণী বললেন, আল্লাহ শপথ! কোন কাজের ব্যাপারেই তার মনে কোন স্পন্দন নেই এবং আল্লাহর কসম! ঐ ঘটনার পর হতে অদ্যাবধি সে প্রতিদিন কেঁদে চলছে। তিনি বলেন, আমার পরিবারের কেউ বললেন, আচ্ছা তুমিও যদি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হতে তোমার সহধর্মিণীর ব্যাপারে অনুমতি নিয়ে নিতে। তিনি তো হিলাল ইবনু উমাইয়্যার স্ত্রীকে তাঁর স্বামীর সেবার অনুমতি দিয়েছেন। আমি বললাম, না, আমি স্ত্রীর ব্যাপারে অনুমতি প্রার্থনা করব না। কারণ আমি যুবক মানুষ। আমি আমার স্ত্রীর ব্যাপারে অনুমতি চাইলে না জানি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি বলেন। এ অবস্থায় আরো দশ রাত কাটালাম। এভাবে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন থেকে আমাদের সঙ্গে কথাবার্তা বলতে বারণ করেছিলেন, তখন থেকে আমাদের পঞ্চাশ রাত পূর্ণ হয়। কা‘ব বলেন, পঞ্চাশতম রাত্রের ফাজ্রের সলাত আমি আমার ঘরের ছাদের উপর আদায় করলাম। এরপর যখন আমি ঐ অবস্থায় বসা ছিলাম, যা আল্লাহ আমাদের ব্যাপারে আলোচনা করেছেন, “অর্থাৎ- আমার মন সংকীর্ণ হয়ে গেছে এবং প্রশস্ত পৃথিবী আমার নিকট সংকুচিত হয়ে পড়েছে”, তখন আমি একজন ঘোষণাকারীর শব্দ শুনলাম, যিনি সালা পর্বতের চূড়ায় উঠে উচ্চ আওয়াজে বলছেন, হে কা‘ব ইবনু মালিক! তোমার জন্যে সুসংবাদ। কা‘ব বলেন, তখন আমি সাজ্দায় অবনত হলাম এবং আমি বুজতে পারলাম যে, প্রশস্ততা আগমন করেছে। কা‘ব বলেন, এদিকে ফাজ্রের সলাতের পর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকেদের নিকট ঘোষণা করলেন যে, আল্লাহ তা‘আলা আমাদের তাওবাহ্ গ্রহণ করেছেন। তখনই লোকেরা আমাদের সুখবর দেয়ার জন্যে ছুটে গেলেন এবং আমার সঙ্গীদ্বয়কে সুখবর পৌছানোর জন্যে কিছু লোক তাদের কাছে গেলেন। আর আমার দিকে একজন ঘোড়ার উপর আরোহণ হয়ে রওনা হলেন এবং আসলাম সম্প্রদায়ের আরেক লোকও রওনা হলেন। আর তিনি পাহাড়ের উপর উঠে ঘোষণা দিলেন। আর ঘোড়ার চেয়েও শব্দের গতি অতি দ্রুত ছিল। এরপর যার সুখবরের শব্দ আমি শুনেছিলাম- তিনি আমার কাছে আসলে আমি আমার পরিধেয় কাপড় দু’টো সুখবরের উপঢৌকন স্বরূপ তাকে দিয়ে দিলাম। আল্লাহর শপথ! সেদিন ঐ দু’টো কাপড় ছাড়া আমি আর কোন কাপড়ের মালিক ছিলাম না। অতএব আমি দু’টো কাপড় ধার নিয়ে তা পড়লাম। তারপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে দেখা করার জন্যে আমি রওনা দিলাম। আমার তাওবাহ্ গ্রহণের মুবারকবাদ জানানোর জন্য লোকেরা দলে দলে আমার সাথে দেখা করতে লাগল এবং বলতে লাগল, আল্লাহর মার্জনা তোমার জন্য মুবারক হোক। এমতাবস্থায় আমি মাসজিদে ঢুকে দেখলাম, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাসজিদেই উপবিষ্ট আছেন এবং তাঁর পাশে লোকজন রয়েছে। তখন তাল্হাহ্ ইবনু ‘উবাইদুল্লাহ (রাঃ) দণ্ডায়মান হলেন এবং দৌড়ে এসে আমার সঙ্গে মুসাফাহা করলেন এবং তিনি আমাকে মুবারকবাদ জানালেন। আল্লাহর শপথ! মুহাজিরদের মাঝে তখন তিনি ছাড়া আর কেউ (আমাকে দেখে) দাঁড়াননি। রাবী বলেন, কা‘ব তালহার এ সদ্ব্যবহারের কথা ভুলে যাননি। কা’ব ইবনু মালিক (রাঃ) বলেন, এরপর আমি যখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাম করলাম তখন তাঁর মুখায়ব আনন্দে উচ্ছাসিত ছিল। তিনি বললেন, তোমার মা তোমাকে জন্ম দেয়ার পর থেকে যতদিন অতিবাহিত হয়েছে, তার মধ্যে তোমার জন্যে এ মুবারক দিনটির সুখবর। কা‘ব (রাঃ) বলেন, আমি তাঁকে প্রশ্ন করলাম, তা কি আপনার তরফ থেকে, হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! না মহান আল্লাহর তরফ থেকে? তিনি বললেন, না, বরং মহান আল্লাহর পক্ষ থেকে। আর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন আনন্দিত হতেন, তখন তাঁর মুখায়ব এমন উজ্জ্বল হতো যেন তা এক টুকরো চাঁদ। কা‘ব (রাঃ) বলেন, আমরা তাঁর মুখায়ব দেখেই তা উপলব্ধি করতে পারতাম। তিনি বলেন, আমি যখন তাঁর সম্মুখে বসলাম তখন বললাম, হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমার তাওবার শুকরগুজার হিসেবে আল্লাহ ও তাঁর রসূলের জন্য সদাকাহ্ করে আমি সকল প্রকার ধন-সম্পদ থেকে মুক্ত হওয়ার মনস্থ করেছি। তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ কিছু সম্পদ তোমার নিজের জন্যে রেখে দাও। এ-ই তোমার জন্য সবচেয়ে ভাল। আমি বললাম, তাহলে আমি খাইবারে প্রাপ্য অংশটুকু রেখে দিব। কা‘ব (রাঃ) বলেন, তারপর আমি বললাম, হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! সত্য কথাই আল্লাহ আমাকে মুক্তি দিয়েছে; তাই যতদিন জীবন থাকে আমি শুধু সত্যই বলব। তিনি বলেন, আল্লাহর শপথ! আর কোন মুসিলম ব্যক্তিকে সত্য বলার জন্য এমন পুরস্কৃত করেছেন বলে আমার জানা নেই। আল্লাহর শপথ! রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে এ আলোচনা করার পর অদ্যাবধি স্বেচ্ছায় আমি কখনো মিথ্যা কথা বলিনি। আমার প্রত্যাশা, অবশিষ্ট জীবনেও আল্লাহ তা‘আলা আমাকে মিথ্যা থেকে রক্ষা করবেন। কা‘ব (রাঃ) বলেন, আমার তাওবাহ্ কবূলযোগ্য হওয়ার ব্যাপারে আল্লাহ তা‘আলা তখন নিম্নোক্ত আয়াত অবতীর্ণ করেছিলেনঃ “আল্লাহ দয়াপরবেশ হলেন নাবীর প্রতি এবং মুহাজির ও আনসারদের প্রতি, যারা তার অনুসরণ করেছিল সংকটকালে, এমনটি যখন তাদের এক দলের হৃদয়-বক্রের উপক্রম হয়েছিল। পরে আল্লাহ তাদেরকে মার্জনা করলেন। তিনি তাদের প্রতি দয়াশীল এবং অপর তিন ব্যক্তি যাদের সিদ্ধান্ত গ্রহণ বিলম্বিত করা হয়েছিল, যে পর্যন্ত না পৃথিবী বিশাল হওয়া সত্ত্বেও তাদের জন্যে সংকুচিত হয়েছিল এবং তাদের জীবন তাদের জন্য অতিষ্ঠ হয়েছিল এবং তারা বুঝতে পেরেছিল যে, আল্লাহ ছাড়া কোন আশ্রয়স্থল নেই। পরে তিনি তাদের প্রতি অনুগ্রহপরায়ণ হলেন, যাতে তারা তাওবাহ্ করে। আল্লাহ ক্ষমাশীল, পরম দয়ালূ। হে মু’মিনগণ! তোমরা আল্লাহকে ভয় করে এবং সত্যবাদীদের শামিল হও”- (সূরাহ্ আত্ তাওবাহ্ ৯ : ১১৭-১১৯) কা‘ব (রাঃ) বলেন, আল্লাহর শপথ! রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে সেদিন সত্য কথা বলার জন্যে আল্লাহ তা‘আলা আমার প্রতি যে নি‘আমাত দান করেছেন, তেমন নি‘আমাত ইসলাম কবূলের পর আল্লাহ তা‘আলা আমার উপর আর কক্ষনো করেননি। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট সেদিন আমি মিথ্যা বলিনি। যদি বলতাম তবে নিশ্চয়ই আমি ক্ষতিগ্রস্ত হয়ে যেতাম, যেমন ক্ষতিগ্রস্ত হয়ে গিয়েছিল মিথ্যাবাদীগণ। ওয়াহী নাযিলকালে আল্লাহ তা‘আলা মিথ্যাবাদীদের এমন কঠোর সমালোচনা করেছেন, যা আর কাউকে করেননি। তিনি বলেছেন, “তোমরা তাদের কাছে ফিরে এলে তারা আল্লাহর কসম করবে, যেন তোমরা তাদেরকে এড়িয়ে চলো। কাজেই তোমরা তাদেরকে এড়িয়ে চলবে তারা অপবিত্র, তাদের কৃতকর্মের প্রতিদান জাহান্নাম তাদের আবাসস্থল। তারা তোমাদের কাছে হলফ করবে যাতে তোমরা তাদের প্রতি তুষ্ট হও। তোমরা তাদের প্রতি সন্তুষ্ট হলেও আল্লাহ ফাসিক (সত্যত্যাগী) লোকেদের উপর সন্তুষ্ট হবেন না।” (সূরাহ্ আত্ তাওবাহ্ ৯ : ৯৫-৯৬)। কা‘ব (রাঃ) বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট কসম করার পর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যাদের ওযর গ্রহণ করেছিলেন, যাদের বাই‘আত করেছিলেন এবং যাদের জন্য আল্লাহর নিকট ক্ষমা প্রার্থনা করেছিলেন তাদের থেকে আমাদের তিনজনের ব্যাপারটিকে দেরী করা হয়েছিল। আল্লাহর পক্ষ থেকে সিদ্ধান্ত আসা পর্যন্ত রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের ব্যাপারটিকে স্থগিত রেখেছিলেন। তাই আল কুরআনে আল্লাহ তা‘আলা বলেছেনঃ “আর তিনি মাফ করলেন অপর তিনজনকেও যাদের সিদ্ধান্ত স্থগিত রাখা হয়েছিল।” (আরবী) শব্দের অর্থ “যুদ্ধ হতে আমাদের পশ্চাতে থাকা” নয়। বরং এর অর্থ হচ্ছে, রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কর্তৃক “আমাদের বিষয়টিকে স্থগিত রাখা।” ঐ সকল লোকেদের চেয়ে যারা রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে কসম করেছিল এবং ওযর উপস্থিত করেছিল; অতঃপর তা গৃহীত হয়েছিল। (ই.ফা. ৬৭৬০, ই.সে. ৬৮১৫)
ইবনু শিহাব (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
তিনি বলেন, অতঃপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবূকের যুদ্ধে শারীক হন। তাঁর উদ্দেশ্য ছিল, সিরিয়ার আরব খ্রিস্টান ও রোমকরা। ইবনু শিহাব বলেন, আমাকে ‘আবদুর রহ্মান ইবনু ‘আবদুল্লাহ ইবনু কা‘ব ইবনু মালিক (রহঃ) অবিহিত করেছেন যে, প্রকৃতপক্ষে ‘আবদুল্লাহ ইবনু কা‘ব বলেছেন, কা‘ব ইবনু মালিক (রাঃ) অন্ধ হয়ে যাওয়ার পর তার সন্তানদের মাঝে তিনি ছিলেন তাঁর চালক। তিনি বলেন, আমি কা‘ব ইবনু মালিক (রাঃ)-কে তাবূক যুদ্ধে রসূলের সাথে অংশগ্রহণ না করার ইতিবৃত্ত স্বীয় মুখে বর্ণনা করতে শুনেছি। কা‘ব ইবনু মালিক (রাঃ) বলেছেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যত যুদ্ধ করেছেন তাবূক যুদ্ধ ছাড়া এর সব ক’টির মাঝেই আমি তাঁর সাথে অংশগ্রহণ করেছিলাম। কিন্তু বদর যুদ্ধে আমি তাঁর সাথে অংশগ্রহণ করতে পারিনি। তবে যারা তাদের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেননি তাদের কাউকেও দোষারোপ করেননি। তখন তো রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও মুসলিমগণ কেবলমাত্র কুরায়শ কাফিলার উদ্দেশে বের হয়েছিলেন। পরিশেষে আল্লাহ তা‘আলা মুসলিম ও কাফিরদের অনির্ধারিত সময়ে একত্রিত করে দিলেন। ‘আকাবার রাত্রে যখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আমরা ইসলামের উপর অঙ্গীকার নিচ্ছিলাম, সে রাত্রে আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উপস্থিত ছিলাম। যদিও বদর যুদ্ধ মানুষের কাছে সবচেয়ে বেশী প্রসিদ্ধ, তথাপি ‘আকাবাহ্ রাত্রির পরিবর্তে বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণ করা আমার নিকট বেশি প্রিয় নয়। তাবূক যুদ্ধে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে অংশগ্রহণ না করার খবর হচ্ছে এই যে, (যখন এ যুদ্ধ সংঘটিত হয়েছিল) তখন আমি যেমন শক্তিশালী ও স্বচ্ছল ছিলাম, তেমন আর কখনো ছিলাম না। আল্লাহর শপথ! এর পূর্বে দু’টি সওয়ারী কখনো একত্রে জমা করতে পারিনি। কিন্তু এ যুদ্ধের সময় দু’টি সওয়ারী একত্রিত করেছিলাম। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এ অভিযানে যান প্রচণ্ড গরমের মধ্যে। মরুভূমিতে দীর্ঘসফরে যাত্রা করলেন। বহু সংখ্যক শত্রুর সম্মুখীন হতে যাচ্ছিলেন। তাই তিনি বিষয়টি মুসলিমদের সামনে স্পষ্ট করে তুললেন, যাতে তারা যুদ্ধের জন্যে সম্পূর্ণ প্রস্তুতি গ্রহণ করে নিতে পারে। তাদের উদ্দেশ্য সম্পর্কেও রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে অবহিত করেছেন। তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মুসলিমের সংখ্যা ছিল বেশি এবং তাদের নাম একত্র করেনি কোন সংরক্ষণকারী কিতাবে অর্থাৎ-রেজিস্ট্রারে। কা‘ব বলেন, সুতরাং যে লোক অনুপস্থিত থাকতে সংকল্প করে সে কমপক্ষে এ চিন্তা করতে পারত যে, তার অনুপস্থিতির বিষয়টি গোপন থাকবে, যতক্ষন না আল্লাহর তরফ থেকে তার ব্যাপারে ওয়াহী অবতীর্ণ হয়। এ যুদ্ধ সংঘটিত হয়েছিল, যখন গাছের ফল পাকছিল এবং বৃক্ষের ছায়া ছিল আনন্দদায়ক। আর আমিও ছিলাম এসবের প্রতি আকৃষ্ট। পরিশেষে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও মসুলমগণ যুদ্ধের জন্য সম্পূর্ণ প্রস্তুতি গ্রহণ করলেন। আমিও তাঁদের সঙ্গে যুদ্ধে অংশগ্রহণ করার জন্য প্রস্তুতি গ্রহণের উদ্দেশে বাড়ী হতে সকালে বের হতাম, কিন্তু কোন কিছু সিদ্ধান্ত না করেই ফিরে আসতাম এবং মনে মনে বলতাম, আমি তো যুদ্ধে যেতে সক্ষম, যখনই সংকল্প করি। আমার ব্যাপারটি এভাবেই চলতে থাকল। এদিকে লোকজন সত্যিই প্রস্তুতি চালিয়ে যেতে লাগল। পরিশেষে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভোরে রওনা হলেন এবং তাঁর সাথে মুসলিমগণও রওনা হয়ে গেল। কিন্তু আমি কোন প্রস্তুতি গ্রহণ করিনি। পরদিন ভোরে আমি বের হলাম। তবে কোন প্রস্তুতি না নিয়েই ফিরে আসলাম। এভাবে আমার সময় দীর্ঘায়িত হতে লাগল। এদিকে লোকজন দ্রুতগতিতে অগ্রসর হয় আর মুজাহিদ্বীনের দল বহু দূরে চলে যায়। তখন আমি চিন্তা করলাম যে, আমিও রওনা হয়ে তাদের সঙ্গে একত্রিত হয়ে যাই। হায় আফসোস! আমি যদি তা করতাম। তবে আমার ভাগ্যে তা নির্ধারিত হয়নি। অতএব রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুদ্ধে চলে যাওয়ার পর আমি যখন লোকালয়ে বের হতাম তখন এ সম্পর্কে আমাকে দুঃখ দিত যে, আমি অনুসরণীয় নমুনা দেখতে পেতাম না, কেবলমাত্র এমন এক লোক যাদের উপর নিফাকের অভিযোগ রয়েছে অথবা সে সকল অক্ষম লোক যাদের আল্লাহ তা‘আলা মাযূর হিসেবে অবকাশ দিয়েছেন। এদিকে তাবূক পৌঁছার পূর্বে রাস্তায় রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কথা মোটেই আলোচনা করেননি। কিন্তু তাবূক পৌঁছার পর লোকেদের মধ্যে বসা অবস্থায় রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন, কা‘ব ইবনু মালিক কি করছে? তখন বানূ সালামাহ্ গোত্রের এক লোক বলল, হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! তার লালজোড়া চাদর এবং তার অহঙ্কার তাকে দূরে রেখেছে। তখন মু‘আয ইবনু জাবাল (রাঃ) বললেন, তুমি অনেক খারাপ কথা বলল। আল্লাহ শপথ, হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমরা তো তাকে ভালই জানি। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নীরব থাকলেন। ইতিমধ্যে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শুভ্র পেশাক পরিহিত এক লোককে ধূলা উড়িয়ে আসতে দেখে বললেন, আবূ খাইসামাই হবে। দেখা গেল, তিনি আনসারী সহাবা আবূ খাইসামাহ্ (রাঃ) আর তিনি সে লোক যিনি এক সা‘ খেজুর সদাকাহ্ করেছিলেন যার জন্য মুনাফিকরা তার দূর্নাম রটনা করেছিল। কা‘ব ইবনু মালিক (রাঃ) বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবূক হতে ফিরে (মাদীনাহ্ অভিমুখে) রওনা হওয়ার সংবাদ আমার নিকট পৌঁছার পর আমার উপর চিন্তার ছাপ পড়ে গেল। আমি মনে মনে মিথ্যা ওযর কল্পনা করতে লাগলাম এবং এমন কথা ভাবতে লাগলাম যা বলে সকালে আমি তাঁর রাগ হতে বাঁচতে পারি। আর এ বিষয়ে আমি বুদ্ধিমান আপনজনেরও সহযোগিতা নিতে লাগলাম। পরিশেষে যখন আমাকে বলা হলো যে, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পৌঁছেই যাচ্ছেন, তখন আমার অন্তর হতে সকল বাতিল কল্পনা দূরে সরে গেল। এমনকি আমি বুঝতে পারলাম যে, কোন কিছুতেই আমি তাঁর কাছ থেকে মুক্তি পাব না। তাই আমি তাঁর নিকট সত্য বলারই ইচ্ছা করলাম। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সকাল বেলা সফর থেকে আগমন করলেন। তাঁর রীতি ছিল, সফর থেকে ফিরে প্রথমে তিনি মাসজিদে আসতেন এবং সেখানে দু’রাক‘আত (সলাত) আদায় করে মানুষের সঙ্গে সাক্ষাতের জন্যে বসতেন। এবারও যখন তিনি বসলেন, তখন যারা যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেনি তারা এসে অজুহাত দেয়া শুরু করল এবং এর উপর কসম খেতে লাগল। এ সমস্ত লোক সংখ্যায় আশির বেশি ছিল। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের প্রকাশ্য অজুহাত গ্রহণ করলেন এবং তাদের হতে বাই‘আত নিয়ে তাদের জন্য আল্লাহর কাছে মাফ চাইলেন। আর তাদের অন্তর্নিহিত অবস্থা আল্লাহর উপর ছেড়ে দিলেন। পরিশেষে আমি উপস্থিত হয়ে সালাম করলাম। তখন তিনি ক্রুদ্ধ লোকের হাসির মতো মুচকি হাসলেন। তারপর তিনি বললেন, এসো। আমি এসে তাঁর সম্মুখে বসলাম। তখন তিনি আমাকে প্রশ্ন করলেন, কিসে তোমাকে পিছনে ফেলে দিয়েছিল? তুমি কি সওয়ারী কিনে ছিলে না? তিনি বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আল্লাহর শপথ, আমি যদি আপনি ছাড়া কোন দুনিয়াদারী মানুষের নিকট বসতাম তবে আপনি দেখতেন যে, অবশ্যই আমি কোন অজুহাত পেশ করে তার গোস্বা হতে বের হতাম। কারণ আমাকে বাকশক্তির ক্ষমতা দেয়া হয়েছে। কিন্তু আল্লাহর শপথ! আমার দৃঢ় ধারণা, আজ যদি আমি মিথ্যা কথা বলি যাতে আপনি আমার প্রতি সন্তুষ্ট হন, তবে শীঘ্রই আল্লাহ তা‘আলা আপনাকে আমার প্রতি অসন্তুষ্ট করবেন না। আর যদি আমি সত্য কথা বলি এবং এতে আপনি আমার প্রতি অসন্তুষ্ট হন, তবে এতে আল্লাহর তরফ হতে আমি কল্যাণজনক পরিণামের প্রত্যাশা রাখি। আল্লাহর শপথ! আমার কোন ওযর-আপত্তি ছিল না। আল্লাহর শপথ! আপনার (অভিযান) হতে পিছনে থাকার সময়ের চেয়ে কোন সময় আমি অধিক ক্ষমতাসম্পন্ন ও অধিক ধন-সম্পদের অধিকারী ছিলাম না। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বরলেন, নিশ্চয়ই এ লোক সত্য কথা বলেছে। এরপর তিনি বললেন, তুমি চলে যাও, যতক্ষণ না আল্লাহ তা‘আলা তোমার সম্বন্ধে কোন সিদ্ধান্ত দেন। তারপর আমি চলে গেলাম। তখন বানূ সালামাহ্ গোত্রের কিছু লোক দৌড়িয়ে আমার নিকটে এসে বলল, আল্লাহর কসম! আমরা তো ইতিপূর্বে তোমাকে আর কোন অন্যায় করতে দেখিনি। যারা পশ্চাতে রয়ে গিয়েছিল, তারা যেমন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ওযর পেশ করেছে সেভাবে ওযর পেশ করতে কি তুমি অক্ষম ছিলে? অতএব রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইস্তিগফারই তোমার পাপের জন্য যথেষ্ট হত। তিনি বলেন, আল্লাহর কসম। এভাবে তারা আমাকে এত ভর্ৎসনা করতে লাগল যে, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আবার গিয়ে আমার স্বীয় উক্তি মিথ্যা প্রতিপন্ন করার ইচ্ছা হতে লাগল। আমি লোকদের বললাম, আমার মতো আর কারো এমন অবস্থা হয়েছে কি? তারা বলল, হ্যাঁ, আরো দু’ জন তোমার মতো করেছেন। তুমি যা বলেছ তারাও অবিকল বলেছেন এবং তোমাকে যা বলা হয়েছে তাদেরও তাই বলা হয়েছে। আমি বললাম, তারা কারা? তারা বলল, তাঁরা হলেন, মুরারাহ্ ইবনু রাবী‘আহ্ ‘আমিরী এবং হিলাল ইবনু উমাইয়্যাহ্ আল ওয়াকিফী (রাঃ)। কা‘ব বলেন, তাঁরা আমার কাছে এমন দু’ লোকের কথা বর্ণনা করল, যাঁরা ছিলেন নেক্কার, বদর যুদ্ধে অংশ গ্রহণকারী। এঁরা দু’জনই ছিলেন নমুনা স্বরূপ। কা‘ব (রাঃ) বলেন, যখন তারা ঐ দু’ লোকের কথা বর্ণনা করল, তখন আমি স্বীয় অবস্থার উপর থেকে গেলাম। এদিকে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যারা যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেনি তাদের মধ্য থেকে শুধু আমাদের তিন জনের সাথে মুসলিমদের কথা বলতে নিষেধ করে দিলেন। এরপর লোকেরা আমাদের পরিহার করল অথবা বলেছেন, আমাদের সাথে তাদের ব্যবহার বদলে গেল। এমনকি পৃথিবীও যেন অপছন্দ করতে লাগল, (মনে হলো) যে ভূমি আমি চিনতাম, এ যেন তা নেই। এমনি করে পঞ্চাশ রাত কাটালাম। আর আমার দু’ সাথী ছিলেন হীনবল, তাই তাঁরা নিজ নিজ গৃহে নীরবে বসে রইলেন এবং কাঁদতে লাগলেন। আর আমি তাদের মাঝে কম বয়স্ক ও সবল ছিলাম। আমি রাস্তায় বের হতাম, সলাতে শারীক হতাম এবং বাজারেও হাঁটাহাঁটি করতাম। কিন্তু কেউ আমার সাথে কোন কথা বলত না। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সলাত আদায়ের পর স্বীয় স্থানে বসাবস্থায় আমি তাঁর নিকট আসতাম, তাকে সালাম করতাম এবং মনে মনে ভাবতাম, তিনি সালামের জওয়াব প্রদান করে তাঁর ওষ্ঠযুগল নাড়িয়েছেন কি-না? তারপর আমি তাঁর কাছে দাঁড়িয়ে সলাত আদায় করতাম এবং গোপন চাহনির মাধ্যমে আমি তাঁর দিকে লক্ষ্য করতাম। যখন আমি সলাতে নিমগ্ন হতাম তখন তিনি আমার প্রতি দৃষ্টি দিতেন। কিন্তু আমি যখন তাঁর দিকে তাকাতাম তখন তিনি আমার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিতেন। আমার প্রতি মুসলিমের এ রূঢ় আচরণ যখন দীর্ঘায়িত হয়ে গেল তখন আমি গিয়ে আবূ কাতাদাহ্ (রাঃ)-এর বাগানের দেয়াল টপকিয়ে তার কাছে গেলাম। তিনি ছিলেন আমার চাচাতো ভাই এবং আমার খুবই প্রিয় ব্যক্তি। উপরে উঠেই আমি তাঁকে সালাম করলাম। কিন্তু আল্লাহর কসম! তিনি আমার সালামের কোন জবাব দিলেন না। আমি তাঁকে বললাম, হে আবূ কাতাদাহ্! আমি তোমাকে আল্লাহর শপথ করে জিজ্ঞেস করছি, তুমি কি জান না যে, আমি আল্লাহ ও তাঁর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ভালবাসি? তিনি কোন জবাব দিলেন না। আমি আবার তাঁকে শপথ করে জিজ্ঞেস করলাম। এবারও তিনি কোন জবাব দিলেন না। তারপর পুনরায় আমি তাঁকে শপথ করে জিজ্ঞেস করলাম। উত্তরে তিনি বললেন, আল্লাহ ও তাঁর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ই ভাল জানেন। এ কথা শুনে আমার দু’চোখ দিয়ে পানি ঝড়তে লাগল। পরিশেষে পিছন ফিরে আমি আবার প্রাচীর টপকিয়ে ফিরে এলাম। তারপর আমি কোন একদিন মাদীনার বাজার দিয়ে হাঁটতেছিলাম, তখন মাদীনার বাজারে শাক-সবজি বিক্রির উদ্দেশে আগত সিরিয়ার কৃষকদের মাঝখান থেকে একজন বলতে লাগল, এমন কোন লোক আছে কি, যে আমাকে কা‘ব ইবনু মালিকের ঠিকানা বলতে পারে? লোকেরা ইঙ্গিতে আমাকে দেখিয়ে দিলে সে আমার কাছে আসলো এবং গাস্সান সম্রাটের তরফ হতে আমাকে একটি চিঠি দিল। আমি লেখাপড়া জানতাম। তাই আমি তা পড়লাম। এতে লেখা ছিল, “আমি জানতে পারলাম যে, তোমার সাথী মুহাম্মাদ তোমার প্রতি অন্যায় আচরণ করছে। অথচ আল্লাহ তা‘আলা তোমাকে নীচু গৃহে জন্ম দেননি এবং ধ্বংসাত্মক স্থানেও নয়। সুতরাং তুমি আমাদের কাছে চলে এসো। আমরা তোমার সাথে ভাল আচরণ করব।” এ চিঠি পড়া মাত্র আমি বললাম, এটাও এক রকমের পরীক্ষা। তখন এ চিঠিটি নিয়ে আমি চুলার কাছে গেলাম এবং আগুনে তা পুড়িয়ে দিলাম। চল্লিশ দিন অতিক্রান্ত হলো। এখনও এদিকে কোন ওয়াহী আসছে না। এমতাবস্থায় রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এক বার্তাবাহক আমার কাছে এসে বললেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনাকে আপনার সহধর্মিণী থেকে দূরে থাকার নির্দেশ দিয়েছেন। আমি তাকে প্রশ্ন করলাম, আমি কি তাকে তালাক্ দিব, না অন্য কিছু করব? তিনি বললেন, না তালাক্ দিতে হবে না। বরং তুমি তার হতে আলাদা হয়ে যাও এবং তার সঙ্গে মিলন করো না। তিনি বলেন, আমার অপর সাথীদের কাছেও এমন খবর পাঠানো হলো। কা‘ব (রাঃ) বলেন, তারপর আমি আমার সহধর্মিণীকে বললাম, তুমি তোমার পিতার বাড়ী চলে যাও এবং যে পর্যন্ত আল্লাহ তা‘আলা এ ব্যাপারে কোন সিদ্ধান্ত না দেন ততদিন সেখানেই অবস্থান করবে। কা‘ব (রাঃ) বলেন, এরপর হিলাল ইবনু উমাইয়্যাহ্ (রাঃ)-এর সহধর্মিণী রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন, হে আল্লাহ্র রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! হিলাল ইবনু উমাইয়্যাহ্ একজন বয়োঃবৃদ্ধ লোক। তাঁর কোন সেবক নেই। আমি যদি তাঁর সেবা করি, আপনি কি তাতে আপত্তি করেন? তিনি বললেন, না। কিন্তু সে তোমার সঙ্গে সহবাস করতে পারবে না। এ কথা শুনে হিলাল (রাঃ)-এর সহধর্মিণী বললেন, আল্লাহ শপথ! কোন কাজের ব্যাপারেই তার মনে কোন স্পন্দন নেই এবং আল্লাহর কসম! ঐ ঘটনার পর হতে অদ্যাবধি সে প্রতিদিন কেঁদে চলছে। তিনি বলেন, আমার পরিবারের কেউ বললেন, আচ্ছা তুমিও যদি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হতে তোমার সহধর্মিণীর ব্যাপারে অনুমতি নিয়ে নিতে। তিনি তো হিলাল ইবনু উমাইয়্যার স্ত্রীকে তাঁর স্বামীর সেবার অনুমতি দিয়েছেন। আমি বললাম, না, আমি স্ত্রীর ব্যাপারে অনুমতি প্রার্থনা করব না। কারণ আমি যুবক মানুষ। আমি আমার স্ত্রীর ব্যাপারে অনুমতি চাইলে না জানি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি বলেন। এ অবস্থায় আরো দশ রাত কাটালাম। এভাবে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন থেকে আমাদের সঙ্গে কথাবার্তা বলতে বারণ করেছিলেন, তখন থেকে আমাদের পঞ্চাশ রাত পূর্ণ হয়। কা‘ব বলেন, পঞ্চাশতম রাত্রের ফাজ্রের সলাত আমি আমার ঘরের ছাদের উপর আদায় করলাম। এরপর যখন আমি ঐ অবস্থায় বসা ছিলাম, যা আল্লাহ আমাদের ব্যাপারে আলোচনা করেছেন, “অর্থাৎ- আমার মন সংকীর্ণ হয়ে গেছে এবং প্রশস্ত পৃথিবী আমার নিকট সংকুচিত হয়ে পড়েছে”, তখন আমি একজন ঘোষণাকারীর শব্দ শুনলাম, যিনি সালা পর্বতের চূড়ায় উঠে উচ্চ আওয়াজে বলছেন, হে কা‘ব ইবনু মালিক! তোমার জন্যে সুসংবাদ। কা‘ব বলেন, তখন আমি সাজ্দায় অবনত হলাম এবং আমি বুজতে পারলাম যে, প্রশস্ততা আগমন করেছে। কা‘ব বলেন, এদিকে ফাজ্রের সলাতের পর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকেদের নিকট ঘোষণা করলেন যে, আল্লাহ তা‘আলা আমাদের তাওবাহ্ গ্রহণ করেছেন। তখনই লোকেরা আমাদের সুখবর দেয়ার জন্যে ছুটে গেলেন এবং আমার সঙ্গীদ্বয়কে সুখবর পৌছানোর জন্যে কিছু লোক তাদের কাছে গেলেন। আর আমার দিকে একজন ঘোড়ার উপর আরোহণ হয়ে রওনা হলেন এবং আসলাম সম্প্রদায়ের আরেক লোকও রওনা হলেন। আর তিনি পাহাড়ের উপর উঠে ঘোষণা দিলেন। আর ঘোড়ার চেয়েও শব্দের গতি অতি দ্রুত ছিল। এরপর যার সুখবরের শব্দ আমি শুনেছিলাম- তিনি আমার কাছে আসলে আমি আমার পরিধেয় কাপড় দু’টো সুখবরের উপঢৌকন স্বরূপ তাকে দিয়ে দিলাম। আল্লাহর শপথ! সেদিন ঐ দু’টো কাপড় ছাড়া আমি আর কোন কাপড়ের মালিক ছিলাম না। অতএব আমি দু’টো কাপড় ধার নিয়ে তা পড়লাম। তারপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে দেখা করার জন্যে আমি রওনা দিলাম। আমার তাওবাহ্ গ্রহণের মুবারকবাদ জানানোর জন্য লোকেরা দলে দলে আমার সাথে দেখা করতে লাগল এবং বলতে লাগল, আল্লাহর মার্জনা তোমার জন্য মুবারক হোক। এমতাবস্থায় আমি মাসজিদে ঢুকে দেখলাম, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাসজিদেই উপবিষ্ট আছেন এবং তাঁর পাশে লোকজন রয়েছে। তখন তাল্হাহ্ ইবনু ‘উবাইদুল্লাহ (রাঃ) দণ্ডায়মান হলেন এবং দৌড়ে এসে আমার সঙ্গে মুসাফাহা করলেন এবং তিনি আমাকে মুবারকবাদ জানালেন। আল্লাহর শপথ! মুহাজিরদের মাঝে তখন তিনি ছাড়া আর কেউ (আমাকে দেখে) দাঁড়াননি। রাবী বলেন, কা‘ব তালহার এ সদ্ব্যবহারের কথা ভুলে যাননি। কা’ব ইবনু মালিক (রাঃ) বলেন, এরপর আমি যখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাম করলাম তখন তাঁর মুখায়ব আনন্দে উচ্ছাসিত ছিল। তিনি বললেন, তোমার মা তোমাকে জন্ম দেয়ার পর থেকে যতদিন অতিবাহিত হয়েছে, তার মধ্যে তোমার জন্যে এ মুবারক দিনটির সুখবর। কা‘ব (রাঃ) বলেন, আমি তাঁকে প্রশ্ন করলাম, তা কি আপনার তরফ থেকে, হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! না মহান আল্লাহর তরফ থেকে? তিনি বললেন, না, বরং মহান আল্লাহর পক্ষ থেকে। আর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন আনন্দিত হতেন, তখন তাঁর মুখায়ব এমন উজ্জ্বল হতো যেন তা এক টুকরো চাঁদ। কা‘ব (রাঃ) বলেন, আমরা তাঁর মুখায়ব দেখেই তা উপলব্ধি করতে পারতাম। তিনি বলেন, আমি যখন তাঁর সম্মুখে বসলাম তখন বললাম, হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমার তাওবার শুকরগুজার হিসেবে আল্লাহ ও তাঁর রসূলের জন্য সদাকাহ্ করে আমি সকল প্রকার ধন-সম্পদ থেকে মুক্ত হওয়ার মনস্থ করেছি। তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ কিছু সম্পদ তোমার নিজের জন্যে রেখে দাও। এ-ই তোমার জন্য সবচেয়ে ভাল। আমি বললাম, তাহলে আমি খাইবারে প্রাপ্য অংশটুকু রেখে দিব। কা‘ব (রাঃ) বলেন, তারপর আমি বললাম, হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! সত্য কথাই আল্লাহ আমাকে মুক্তি দিয়েছে; তাই যতদিন জীবন থাকে আমি শুধু সত্যই বলব। তিনি বলেন, আল্লাহর শপথ! আর কোন মুসিলম ব্যক্তিকে সত্য বলার জন্য এমন পুরস্কৃত করেছেন বলে আমার জানা নেই। আল্লাহর শপথ! রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে এ আলোচনা করার পর অদ্যাবধি স্বেচ্ছায় আমি কখনো মিথ্যা কথা বলিনি। আমার প্রত্যাশা, অবশিষ্ট জীবনেও আল্লাহ তা‘আলা আমাকে মিথ্যা থেকে রক্ষা করবেন। কা‘ব (রাঃ) বলেন, আমার তাওবাহ্ কবূলযোগ্য হওয়ার ব্যাপারে আল্লাহ তা‘আলা তখন নিম্নোক্ত আয়াত অবতীর্ণ করেছিলেনঃ “আল্লাহ দয়াপরবেশ হলেন নাবীর প্রতি এবং মুহাজির ও আনসারদের প্রতি, যারা তার অনুসরণ করেছিল সংকটকালে, এমনটি যখন তাদের এক দলের হৃদয়-বক্রের উপক্রম হয়েছিল। পরে আল্লাহ তাদেরকে মার্জনা করলেন। তিনি তাদের প্রতি দয়াশীল এবং অপর তিন ব্যক্তি যাদের সিদ্ধান্ত গ্রহণ বিলম্বিত করা হয়েছিল, যে পর্যন্ত না পৃথিবী বিশাল হওয়া সত্ত্বেও তাদের জন্যে সংকুচিত হয়েছিল এবং তাদের জীবন তাদের জন্য অতিষ্ঠ হয়েছিল এবং তারা বুঝতে পেরেছিল যে, আল্লাহ ছাড়া কোন আশ্রয়স্থল নেই। পরে তিনি তাদের প্রতি অনুগ্রহপরায়ণ হলেন, যাতে তারা তাওবাহ্ করে। আল্লাহ ক্ষমাশীল, পরম দয়ালূ। হে মু’মিনগণ! তোমরা আল্লাহকে ভয় করে এবং সত্যবাদীদের শামিল হও”- (সূরাহ্ আত্ তাওবাহ্ ৯ : ১১৭-১১৯) কা‘ব (রাঃ) বলেন, আল্লাহর শপথ! রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে সেদিন সত্য কথা বলার জন্যে আল্লাহ তা‘আলা আমার প্রতি যে নি‘আমাত দান করেছেন, তেমন নি‘আমাত ইসলাম কবূলের পর আল্লাহ তা‘আলা আমার উপর আর কক্ষনো করেননি। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট সেদিন আমি মিথ্যা বলিনি। যদি বলতাম তবে নিশ্চয়ই আমি ক্ষতিগ্রস্ত হয়ে যেতাম, যেমন ক্ষতিগ্রস্ত হয়ে গিয়েছিল মিথ্যাবাদীগণ। ওয়াহী নাযিলকালে আল্লাহ তা‘আলা মিথ্যাবাদীদের এমন কঠোর সমালোচনা করেছেন, যা আর কাউকে করেননি। তিনি বলেছেন, “তোমরা তাদের কাছে ফিরে এলে তারা আল্লাহর কসম করবে, যেন তোমরা তাদেরকে এড়িয়ে চলো। কাজেই তোমরা তাদেরকে এড়িয়ে চলবে তারা অপবিত্র, তাদের কৃতকর্মের প্রতিদান জাহান্নাম তাদের আবাসস্থল। তারা তোমাদের কাছে হলফ করবে যাতে তোমরা তাদের প্রতি তুষ্ট হও। তোমরা তাদের প্রতি সন্তুষ্ট হলেও আল্লাহ ফাসিক (সত্যত্যাগী) লোকেদের উপর সন্তুষ্ট হবেন না।” (সূরাহ্ আত্ তাওবাহ্ ৯ : ৯৫-৯৬)। কা‘ব (রাঃ) বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট কসম করার পর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যাদের ওযর গ্রহণ করেছিলেন, যাদের বাই‘আত করেছিলেন এবং যাদের জন্য আল্লাহর নিকট ক্ষমা প্রার্থনা করেছিলেন তাদের থেকে আমাদের তিনজনের ব্যাপারটিকে দেরী করা হয়েছিল। আল্লাহর পক্ষ থেকে সিদ্ধান্ত আসা পর্যন্ত রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের ব্যাপারটিকে স্থগিত রেখেছিলেন। তাই আল কুরআনে আল্লাহ তা‘আলা বলেছেনঃ “আর তিনি মাফ করলেন অপর তিনজনকেও যাদের সিদ্ধান্ত স্থগিত রাখা হয়েছিল।” (আরবী) শব্দের অর্থ “যুদ্ধ হতে আমাদের পশ্চাতে থাকা” নয়। বরং এর অর্থ হচ্ছে, রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কর্তৃক “আমাদের বিষয়টিকে স্থগিত রাখা।” ঐ সকল লোকেদের চেয়ে যারা রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে কসম করেছিল এবং ওযর উপস্থিত করেছিল; অতঃপর তা গৃহীত হয়েছিল। (ই.ফা. ৬৭৬০, ই.সে. ৬৮১৫)
حدثني أبو الطاهر، أحمد بن عمرو بن عبد الله بن عمرو بن سرح مولى بني أمية أخبرني ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، قال ثم غزا رسول الله صلى الله عليه وسلم غزوة تبوك وهو يريد الروم ونصارى العرب بالشام . قال ابن شهاب فأخبرني عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب بن مالك أن عبد الله بن كعب كان قائد كعب من بنيه حين عمي قال سمعت كعب بن مالك يحدث حديثه حين تخلف عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك قال كعب بن مالك لم أتخلف عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة غزاها قط إلا في غزوة تبوك غير أني قد تخلفت في غزوة بدر ولم يعاتب أحدا تخلف عنه إنما خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم والمسلمون يريدون عير قريش حتى جمع الله بينهم وبين عدوهم على غير ميعاد ولقد شهدت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة العقبة حين تواثقنا على الإسلام وما أحب أن لي بها مشهد بدر وإن كانت بدر أذكر في الناس منها وكان من خبري حين تخلفت عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك أني لم أكن قط أقوى ولا أيسر مني حين تخلفت عنه في تلك الغزوة والله ما جمعت قبلها راحلتين قط حتى جمعتهما في تلك الغزوة فغزاها رسول الله صلى الله عليه وسلم في حر شديد واستقبل سفرا بعيدا ومفازا واستقبل عدوا كثيرا فجلا للمسلمين أمرهم ليتأهبوا أهبة غزوهم فأخبرهم بوجههم الذي يريد والمسلمون مع رسول الله صلى الله عليه وسلم كثير ولا يجمعهم كتاب حافظ - يريد بذلك الديوان - قال كعب فقل رجل يريد أن يتغيب يظن أن ذلك سيخفى له ما لم ينزل فيه وحى من الله عز وجل وغزا رسول الله صلى الله عليه وسلم تلك الغزوة حين طابت الثمار والظلال فأنا إليها أصعر فتجهز رسول الله صلى الله عليه وسلم والمسلمون معه وطفقت أغدو لكى أتجهز معهم فأرجع ولم أقض شيئا . وأقول في نفسي أنا قادر على ذلك إذا أردت . فلم يزل ذلك يتمادى بي حتى استمر بالناس الجد فأصبح رسول الله صلى الله عليه وسلم غاديا والمسلمون معه ولم أقض من جهازي شيئا ثم غدوت فرجعت ولم أقض شيئا فلم يزل ذلك يتمادى بي حتى أسرعوا وتفارط الغزو فهممت أن أرتحل فأدركهم فيا ليتني فعلت ثم لم يقدر ذلك لي فطفقت إذا خرجت في الناس بعد خروج رسول الله صلى الله عليه وسلم يحزنني أني لا أرى لي أسوة إلا رجلا مغموصا عليه في النفاق أو رجلا ممن عذر الله من الضعفاء ولم يذكرني رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى بلغ تبوكا فقال وهو جالس في القوم بتبوك " ما فعل كعب بن مالك " . قال رجل من بني سلمة يا رسول الله حبسه برداه والنظر في عطفيه . فقال له معاذ بن جبل بئس ما قلت والله يا رسول الله ما علمنا عليه إلا خيرا . فسكت رسول الله صلى الله عليه وسلم فبينما هو على ذلك رأى رجلا مبيضا يزول به السراب فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم " كن أبا خيثمة " . فإذا هو أبو خيثمة الأنصاري وهو الذي تصدق بصاع التمر حين لمزه المنافقون . فقال كعب بن مالك فلما بلغني أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد توجه قافلا من تبوك حضرني بثي فطفقت أتذكر الكذب وأقول بم أخرج من سخطه غدا وأستعين على ذلك كل ذي رأى من أهلي فلما قيل لي إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد أظل قادما زاح عني الباطل حتى عرفت أني لن أنجو منه بشىء أبدا فأجمعت صدقه وصبح رسول الله صلى الله عليه وسلم قادما وكان إذا قدم من سفر بدأ بالمسجد فركع فيه ركعتين ثم جلس للناس فلما فعل ذلك جاءه المخلفون فطفقوا يعتذرون إليه ويحلفون له وكانوا بضعة وثمانين رجلا فقبل منهم رسول الله صلى الله عليه وسلم علانيتهم وبايعهم واستغفر لهم ووكل سرائرهم إلى الله حتى جئت فلما سلمت تبسم تبسم المغضب ثم قال " تعال " . فجئت أمشي حتى جلست بين يديه فقال لي " ما خلفك " . ألم تكن قد ابتعت ظهرك " . قال قلت يا رسول الله إني والله لو جلست عند غيرك من أهل الدنيا لرأيت أني سأخرج من سخطه بعذر ولقد أعطيت جدلا ولكني والله لقد علمت لئن حدثتك اليوم حديث كذب ترضى به عني ليوشكن الله أن يسخطك على ولئن حدثتك حديث صدق تجد على فيه إني لأرجو فيه عقبى الله والله ما كان لي عذر والله ما كنت قط أقوى ولا أيسر مني حين تخلفت عنك . قال رسول الله صلى الله عليه وسلم " أما هذا فقد صدق فقم حتى يقضي الله فيك " . فقمت وثار رجال من بني سلمة فاتبعوني فقالوا لي والله ما علمناك أذنبت ذنبا قبل هذا لقد عجزت في أن لا تكون اعتذرت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم بما اعتذر به إليه المخلفون فقد كان كافيك ذنبك استغفار رسول الله صلى الله عليه وسلم لك . قال فوالله ما زالوا يؤنبونني حتى أردت أن أرجع إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فأكذب نفسي - قال - ثم قلت لهم هل لقي هذا معي من أحد قالوا نعم لقيه معك رجلان قالا مثل ما قلت فقيل لهما مثل ما قيل لك - قال - قلت من هما قالوا مرارة بن ربيعة العامري وهلال بن أمية الواقفي - قال - فذكروا لي رجلين صالحين قد شهدا بدرا فيهما أسوة - قال - فمضيت حين ذكروهما لي . قال ونهى رسول الله صلى الله عليه وسلم المسلمين عن كلامنا أيها الثلاثة من بين من تخلف عنه - قال - فاجتنبنا الناس - وقال - تغيروا لنا حتى تنكرت لي في نفسي الأرض فما هي بالأرض التي أعرف فلبثنا على ذلك خمسين ليلة فأما صاحباى فاستكانا وقعدا في بيوتهما يبكيان وأما أنا فكنت أشب القوم وأجلدهم فكنت أخرج فأشهد الصلاة وأطوف في الأسواق ولا يكلمني أحد وآتي رسول الله صلى الله عليه وسلم فأسلم عليه وهو في مجلسه بعد الصلاة فأقول في نفسي هل حرك شفتيه برد السلام أم لا ثم أصلي قريبا منه وأسارقه النظر فإذا أقبلت على صلاتي نظر إلى وإذا التفت نحوه أعرض عني حتى إذا طال ذلك على من جفوة المسلمين مشيت حتى تسورت جدار حائط أبي قتادة وهو ابن عمي وأحب الناس إلى فسلمت عليه فوالله ما رد على السلام فقلت له يا أبا قتادة أنشدك بالله هل تعلمن أني أحب الله ورسوله قال فسكت فعدت فناشدته فسكت فعدت فناشدته فقال الله ورسوله أعلم . ففاضت عيناى وتوليت حتى تسورت الجدار فبينا أنا أمشي في سوق المدينة إذا نبطي من نبط أهل الشام ممن قدم بالطعام يبيعه بالمدينة يقول من يدل على كعب بن مالك - قال - فطفق الناس يشيرون له إلى حتى جاءني فدفع إلى كتابا من ملك غسان وكنت كاتبا فقرأته فإذا فيه أما بعد فإنه قد بلغنا أن صاحبك قد جفاك ولم يجعلك الله بدار هوان ولا مضيعة فالحق بنا نواسك . قال فقلت حين قرأتها وهذه أيضا من البلاء . فتياممت بها التنور فسجرتها بها حتى إذا مضت أربعون من الخمسين واستلبث الوحى إذا رسول رسول الله صلى الله عليه وسلم يأتيني فقال إن رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمرك أن تعتزل امرأتك . قال فقلت أطلقها أم ماذا أفعل قال لا بل اعتزلها فلا تقربنها - قال - فأرسل إلى صاحبى بمثل ذلك - قال - فقلت لامرأتي الحقي بأهلك فكوني عندهم حتى يقضي الله في هذا الأمر - قال - فجاءت امرأة هلال بن أمية رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت له يا رسول الله إن هلال بن أمية شيخ ضائع ليس له خادم فهل تكره أن أخدمه قال " لا ولكن لا يقربنك " . فقالت إنه والله ما به حركة إلى شىء ووالله ما زال يبكي منذ كان من أمره ما كان إلى يومه هذا . قال فقال لي بعض أهلي لو استأذنت رسول الله صلى الله عليه وسلم في امرأتك فقد أذن لامرأة هلال بن أمية أن تخدمه - قال - فقلت لا أستأذن فيها رسول الله صلى الله عليه وسلم وما يدريني ماذا يقول رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا استأذنته فيها وأنا رجل شاب - قال - فلبثت بذلك عشر ليال فكمل لنا خمسون ليلة من حين نهي عن كلامنا - قال - ثم صليت صلاة الفجر صباح خمسين ليلة على ظهر بيت من بيوتنا فبينا أنا جالس على الحال التي ذكر الله عز وجل منا قد ضاقت على نفسي وضاقت على الأرض بما رحبت سمعت صوت صارخ أوفى على سلع يقول بأعلى صوته يا كعب بن مالك أبشر - قال - فخررت ساجدا وعرفت أن قد جاء فرج . - قال - فآذن رسول الله صلى الله عليه وسلم الناس بتوبة الله علينا حين صلى صلاة الفجر فذهب الناس يبشروننا فذهب قبل صاحبى مبشرون وركض رجل إلى فرسا وسعى ساع من أسلم قبلي وأوفى الجبل فكان الصوت أسرع من الفرس فلما جاءني الذي سمعت صوته يبشرني فنزعت له ثوبى فكسوتهما إياه ببشارته والله ما أملك غيرهما يومئذ واستعرت ثوبين . فلبستهما فانطلقت أتأمم رسول الله صلى الله عليه وسلم يتلقاني الناس فوجا فوجا يهنئوني بالتوبة ويقولون لتهنئك توبة الله عليك . حتى دخلت المسجد فإذا رسول الله صلى الله عليه وسلم جالس في المسجد وحوله الناس فقام طلحة بن عبيد الله يهرول حتى صافحني وهنأني والله ما قام رجل من المهاجرين غيره . قال فكان كعب لا ينساها لطلحة . قال كعب فلما سلمت على رسول الله صلى الله عليه وسلم قال وهو يبرق وجهه من السرور ويقول " أبشر بخير يوم مر عليك منذ ولدتك أمك " . قال فقلت أمن عندك يا رسول الله أم من عند الله فقال " لا بل من عند الله " . وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا سر استنار وجهه كأن وجهه قطعة قمر - قال - وكنا نعرف ذلك - قال - فلما جلست بين يديه قلت يا رسول الله إن من توبتي أن أنخلع من مالي صدقة إلى الله وإلى رسوله صلى الله عليه وسلم . فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم " أمسك بعض مالك فهو خير لك " . قال فقلت فإني أمسك سهمي الذي بخيبر - قال - وقلت يا رسول الله إن الله إنما أنجاني بالصدق وإن من توبتي أن لا أحدث إلا صدقا ما بقيت - قال - فوالله ما علمت أن أحدا من المسلمين أبلاه الله في صدق الحديث منذ ذكرت ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم إلى يومي هذا أحسن مما أبلاني الله به والله ما تعمدت كذبة منذ قلت ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم إلى يومي هذا وإني لأرجو أن يحفظني الله فيما بقي . قال فأنزل الله عز وجل { لقد تاب الله على النبي والمهاجرين والأنصار الذين اتبعوه في ساعة العسرة من بعد ما كاد يزيغ قلوب فريق منهم ثم تاب عليهم إنه بهم رءوف رحيم * وعلى الثلاثة الذين خلفوا حتى إذا ضاقت عليهم الأرض بما رحبت وضاقت عليهم أنفسهم} حتى بلغ { يا أيها الذين آمنوا اتقوا الله وكونوا مع الصادقين} قال كعب والله ما أنعم الله على من نعمة قط بعد إذ هداني الله للإسلام أعظم في نفسي من صدقي رسول الله صلى الله عليه وسلم أن لا أكون كذبته فأهلك كما هلك الذين كذبوا إن الله قال للذين كذبوا حين أنزل الوحى شر ما قال لأحد وقال الله { سيحلفون بالله لكم إذا انقلبتم إليهم لتعرضوا عنهم فأعرضوا عنهم إنهم رجس ومأواهم جهنم جزاء بما كانوا يكسبون * يحلفون لكم لترضوا عنهم فإن ترضوا عنهم فإن الله لا يرضى عن القوم الفاسقين} قال كعب كنا خلفنا أيها الثلاثة عن أمر أولئك الذين قبل منهم رسول الله صلى الله عليه وسلم حين حلفوا له فبايعهم واستغفر لهم وأرجأ رسول الله صلى الله عليه وسلم أمرنا حتى قضى الله فيه فبذلك قال الله عز وجل { وعلى الثلاثة الذين خلفوا} وليس الذي ذكر الله مما خلفنا تخلفنا عن الغزو وإنما هو تخليفه إيانا وإرجاؤه أمرنا عمن حلف له واعتذر إليه فقبل منه .
সহিহ মুসলিম ৬৯১০
وحدثنيه محمد بن رافع، حدثنا حجين بن المثنى، حدثنا الليث، عن عقيل، عن ابن شهاب، بإسناد يونس عن الزهري، سواء .
ইবনু শিহাব (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
ইবনু শিহাব (রহঃ)-এর সানাদে ইউনুস (রহঃ)-এর অবিকল হাদীস বর্ণনা করেছেন। (ই.ফা. ৬৭৬০, ই.সে. ৬৮১৬)
ইবনু শিহাব (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
ইবনু শিহাব (রহঃ)-এর সানাদে ইউনুস (রহঃ)-এর অবিকল হাদীস বর্ণনা করেছেন। (ই.ফা. ৬৭৬০, ই.সে. ৬৮১৬)
وحدثنيه محمد بن رافع، حدثنا حجين بن المثنى، حدثنا الليث، عن عقيل، عن ابن شهاب، بإسناد يونس عن الزهري، سواء .
সহিহ মুসলিম > মিথ্যা অপবাদ দেয়া এবং অপবাদ রটনাকারীর তাওবাহ্ গৃহীত হওয়া
সহিহ মুসলিম ৬৯১৫
حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة، ومحمد بن العلاء، قالا حدثنا أبو أسامة، عن هشام، بن عروة عن أبيه، عن عائشة، قالت لما ذكر من شأني الذي ذكر وما علمت به قام رسول الله صلى الله عليه وسلم خطيبا فتشهد فحمد الله وأثنى عليه بما هو أهله ثم قال " أما بعد أشيروا على في أناس أبنوا أهلي وايم الله ما علمت على أهلي من سوء قط وأبنوهم بمن والله ما علمت عليه من سوء قط ولا دخل بيتي قط إلا وأنا حاضر ولا غبت في سفر إلا غاب معي " . وساق الحديث بقصته وفيه ولقد دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم بيتي فسأل جاريتي فقالت والله ما علمت عليها عيبا إلا أنها كانت ترقد حتى تدخل الشاة فتأكل عجينها أو قالت خميرها - شك هشام - فانتهرها بعض أصحابه فقال اصدقي رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى أسقطوا لها به فقالت سبحان الله والله ما علمت عليها إلا ما يعلم الصائغ على تبر الذهب الأحمر . وقد بلغ الأمر ذلك الرجل الذي قيل له فقال سبحان الله والله ما كشفت عن كنف أنثى قط . قالت عائشة وقتل شهيدا في سبيل الله . وفيه أيضا من الزيادة وكان الذين تكلموا به مسطح وحمنة وحسان وأما المنافق عبد الله بن أبى فهو الذي كان يستوشيه ويجمعه وهو الذي تولى كبره وحمنة .
‘আয়িশাহ্ (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, আমার সম্পর্কে মানুষেরা যখন কুৎসা রটাতে শুরু করল, যা আমি জানি না, তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বক্তব্য দেয়ার জন্যে দাঁড়িয়ে তাশাহ্হুদ পড়লেন এবং আল্লাহর প্রশংসা করলেন। এরপর বললেন, অতঃপর যারা আমার সহধর্মিণী সম্পর্কে অপবাদ রটাচ্ছে তাদের ব্যাপারে তোমরা আমাকে পরামর্শ দাও। আল্লাহর শপথ! আমি আমার সহধর্মিণী সম্পর্কে খারাপ কোন কিছুই জানি না এবং তারা যার ব্যাপারে অপবাদ রটাচ্ছে তাঁর সম্পর্কেও খারাপ কিছু আমি জানি না। আমার অনুপস্থিতিতে সে আমার ঘরে কক্ষনো প্রবেশ করেনি এবং আমি যখন সফরে বের হয়েছি সেও তখন আমার সঙ্গে সফরে বের হয়েছে। অতঃপর বর্ণনাকারী সম্পূর্ণ ঘটনাসহ হাদীসটি বর্ণনা করেছেন। অবশ্য এতে বর্ধিত রয়েছে যে, একদা রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার ঘরে প্রবেশ করে আমার বাঁদীকে জিজ্ঞাসাবাদ করলেন। তখন সে বলল, আল্লাহর শপথ! ‘আয়িশা (রাঃ)-এর মধ্যে আমি কোন ত্রুটি দেখিনি। তবে তিনি নিদ্রায় যেতেন, আর বকরী এসে মথিত আটা খেয়ে ফেলত। অথবা বললেন, খামীর খেয়ে ফেলত। বর্ণনাকারী হিশাম এতে সন্দেহ করেছেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোন সহাবা তাকে ধমক দিয়ে বললেন, তুমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট সত্য কথা বলো। এমনকি তাঁরা তার সম্মুখে ঘটনা উত্থাপন করলেন। তখন বারীরাহ্ বললেন, সুব্হানাল্লাহ! আল্লাহর শপথ! স্বর্ণকার খাঁটি স্বর্ণের টুকরা সম্পর্কে যেমন জানে আমিও ‘আয়িশাহ্ সম্বন্ধে অনুরূপ জানি। যে লোক সম্পর্কে এ অপবাদ রটানো হচ্ছিল তার কাছে এ সংবাদ পৌঁছার পর তিনিও বললেন, সুব্হানাল্লাহ। আল্লাহর শপথ! আমি কক্ষনো কোন মহিলার আবরণ খুলিনি। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, পরে তিনি আল্লাহর রাস্তায় শাহীদ হন। এতে আরো বর্ধিত রয়েছে যে, অপবাদ রটনাকারীদের মাঝে ছিলেন মিসতাহ্, হামনাহ্, হাস্সান। আর মুনাফিক ‘আবদুল্লাহ ইবনু উবাই সে ছিল ঐ লোক যে খুঁজে খুঁজে বের করে এসব জমা করত। সে এবং হামনাই এক্ষেত্রে মূল ভূমিকা পালন করেছে। (ই.ফা. ৬৭৬৫, ই.সে. ৬৮২০)
‘আয়িশাহ্ (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, আমার সম্পর্কে মানুষেরা যখন কুৎসা রটাতে শুরু করল, যা আমি জানি না, তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বক্তব্য দেয়ার জন্যে দাঁড়িয়ে তাশাহ্হুদ পড়লেন এবং আল্লাহর প্রশংসা করলেন। এরপর বললেন, অতঃপর যারা আমার সহধর্মিণী সম্পর্কে অপবাদ রটাচ্ছে তাদের ব্যাপারে তোমরা আমাকে পরামর্শ দাও। আল্লাহর শপথ! আমি আমার সহধর্মিণী সম্পর্কে খারাপ কোন কিছুই জানি না এবং তারা যার ব্যাপারে অপবাদ রটাচ্ছে তাঁর সম্পর্কেও খারাপ কিছু আমি জানি না। আমার অনুপস্থিতিতে সে আমার ঘরে কক্ষনো প্রবেশ করেনি এবং আমি যখন সফরে বের হয়েছি সেও তখন আমার সঙ্গে সফরে বের হয়েছে। অতঃপর বর্ণনাকারী সম্পূর্ণ ঘটনাসহ হাদীসটি বর্ণনা করেছেন। অবশ্য এতে বর্ধিত রয়েছে যে, একদা রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার ঘরে প্রবেশ করে আমার বাঁদীকে জিজ্ঞাসাবাদ করলেন। তখন সে বলল, আল্লাহর শপথ! ‘আয়িশা (রাঃ)-এর মধ্যে আমি কোন ত্রুটি দেখিনি। তবে তিনি নিদ্রায় যেতেন, আর বকরী এসে মথিত আটা খেয়ে ফেলত। অথবা বললেন, খামীর খেয়ে ফেলত। বর্ণনাকারী হিশাম এতে সন্দেহ করেছেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোন সহাবা তাকে ধমক দিয়ে বললেন, তুমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট সত্য কথা বলো। এমনকি তাঁরা তার সম্মুখে ঘটনা উত্থাপন করলেন। তখন বারীরাহ্ বললেন, সুব্হানাল্লাহ! আল্লাহর শপথ! স্বর্ণকার খাঁটি স্বর্ণের টুকরা সম্পর্কে যেমন জানে আমিও ‘আয়িশাহ্ সম্বন্ধে অনুরূপ জানি। যে লোক সম্পর্কে এ অপবাদ রটানো হচ্ছিল তার কাছে এ সংবাদ পৌঁছার পর তিনিও বললেন, সুব্হানাল্লাহ। আল্লাহর শপথ! আমি কক্ষনো কোন মহিলার আবরণ খুলিনি। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, পরে তিনি আল্লাহর রাস্তায় শাহীদ হন। এতে আরো বর্ধিত রয়েছে যে, অপবাদ রটনাকারীদের মাঝে ছিলেন মিসতাহ্, হামনাহ্, হাস্সান। আর মুনাফিক ‘আবদুল্লাহ ইবনু উবাই সে ছিল ঐ লোক যে খুঁজে খুঁজে বের করে এসব জমা করত। সে এবং হামনাই এক্ষেত্রে মূল ভূমিকা পালন করেছে। (ই.ফা. ৬৭৬৫, ই.সে. ৬৮২০)
حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة، ومحمد بن العلاء، قالا حدثنا أبو أسامة، عن هشام، بن عروة عن أبيه، عن عائشة، قالت لما ذكر من شأني الذي ذكر وما علمت به قام رسول الله صلى الله عليه وسلم خطيبا فتشهد فحمد الله وأثنى عليه بما هو أهله ثم قال " أما بعد أشيروا على في أناس أبنوا أهلي وايم الله ما علمت على أهلي من سوء قط وأبنوهم بمن والله ما علمت عليه من سوء قط ولا دخل بيتي قط إلا وأنا حاضر ولا غبت في سفر إلا غاب معي " . وساق الحديث بقصته وفيه ولقد دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم بيتي فسأل جاريتي فقالت والله ما علمت عليها عيبا إلا أنها كانت ترقد حتى تدخل الشاة فتأكل عجينها أو قالت خميرها - شك هشام - فانتهرها بعض أصحابه فقال اصدقي رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى أسقطوا لها به فقالت سبحان الله والله ما علمت عليها إلا ما يعلم الصائغ على تبر الذهب الأحمر . وقد بلغ الأمر ذلك الرجل الذي قيل له فقال سبحان الله والله ما كشفت عن كنف أنثى قط . قالت عائشة وقتل شهيدا في سبيل الله . وفيه أيضا من الزيادة وكان الذين تكلموا به مسطح وحمنة وحسان وأما المنافق عبد الله بن أبى فهو الذي كان يستوشيه ويجمعه وهو الذي تولى كبره وحمنة .
সহিহ মুসলিম ৬৯১৪
وحدثني أبو الربيع العتكي، حدثنا فليح بن سليمان، ح وحدثنا الحسن بن علي، الحلواني وعبد بن حميد قالا حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثنا أبي، عن صالح، بن كيسان كلاهما عن الزهري، . بمثل حديث يونس ومعمر بإسنادهما . وفي حديث فليح اجتهلته الحمية كما قال معمر . وفي حديث صالح احتملته الحمية . كقول يونس وزاد في حديث صالح قال عروة كانت عائشة تكره أن يسب عندها حسان وتقول فإنه قال فإن أبي ووالده وعرضي لعرض محمد منكم وقاء وزاد أيضا قال عروة قالت عائشة والله إن الرجل الذي قيل له ما قيل ليقول سبحان الله فوالذي نفسي بيده ما كشفت عن كنف أنثى قط . قالت ثم قتل بعد ذلك شهيدا في سبيل الله . وفي حديث يعقوب بن إبراهيم موعرين في نحر الظهيرة وقال عبد الرزاق موغرين . قال عبد بن حميد قلت لعبد الرزاق ما قوله موغرين قال الوغرة شدة الحر .
যুহরী (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
ইউনুস এবং মা‘মার-এর অবিকল হাদীস বর্ণনা করেছেন। বর্ণনাকারী ফুলায়হ্-এর হাদীসে রয়েছে, গোত্রীয় আত্মম্ভরিতা তাকে অজ্ঞতামূলক আচরণ করতে উত্তেজিত করেছিল। মা‘মার তাঁর বর্ণনায় যেমন বলেছেন। আর সালিহ-এর হাদীসের মধ্যে ইউনুসের বর্ণনার মতো এতে রয়েছে (আরবী) অর্থাৎ- ‘গোত্রীয় আত্মম্ভরিতা তাকে উত্তেজিত করলো।’ সালিহ-এর হাদীসে এটাও রয়েছে যে, ‘উরওয়াহ্ (রহঃ) বলেন, ‘আয়িশা (রাঃ) হাস্সান ইবনু সাবিত (রাঃ)-কে কটু বাক্য বলার বিষয়টিকে অপছন্দ করতেন। তিনি বলতেন, হাস্সান তো নিম্নোক্ত কবিতা রচনা করেছেন, “আমার পিতা-মাতা, আমার ইয্যত সবই রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইয্যত-সম্মানের জন্যে রক্ষাকবচ।” এতে এটাও বর্ধিত রয়েছে যে, ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, যে লোকের ব্যাপারে দোষারোপ করা হয়েছে তিনি বলতেন, সুবহানাল্লাহ! আল্লাহর কসম! আমি কক্ষনো কোন মহিলার-আবরণ খুলিনি। অতঃপর তিনি আল্লাহর পথে শাহীদ হন। ইয়া’কূব ইবনু ইব্রাহীম-এর হাদীসে রয়েছে (আরবী) কিন্তু ‘আবদুর রায্যাক (রহঃ) বলেন, (আরবী) ‘আব্দ ইবনু হুমায়দ (রহঃ) বলেন, আমি ‘আবদুর রায্যাককে (আবরী) শব্দের ব্যাখ্যা সম্পর্কে প্রশ্ন করলে তিনি বলেন, (আরবী) অর্থ কঠিন গরম। (ই.ফা. ৬৭৬৪, ই.সে. ৬৮১৯)
যুহরী (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ
ইউনুস এবং মা‘মার-এর অবিকল হাদীস বর্ণনা করেছেন। বর্ণনাকারী ফুলায়হ্-এর হাদীসে রয়েছে, গোত্রীয় আত্মম্ভরিতা তাকে অজ্ঞতামূলক আচরণ করতে উত্তেজিত করেছিল। মা‘মার তাঁর বর্ণনায় যেমন বলেছেন। আর সালিহ-এর হাদীসের মধ্যে ইউনুসের বর্ণনার মতো এতে রয়েছে (আরবী) অর্থাৎ- ‘গোত্রীয় আত্মম্ভরিতা তাকে উত্তেজিত করলো।’ সালিহ-এর হাদীসে এটাও রয়েছে যে, ‘উরওয়াহ্ (রহঃ) বলেন, ‘আয়িশা (রাঃ) হাস্সান ইবনু সাবিত (রাঃ)-কে কটু বাক্য বলার বিষয়টিকে অপছন্দ করতেন। তিনি বলতেন, হাস্সান তো নিম্নোক্ত কবিতা রচনা করেছেন, “আমার পিতা-মাতা, আমার ইয্যত সবই রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইয্যত-সম্মানের জন্যে রক্ষাকবচ।” এতে এটাও বর্ধিত রয়েছে যে, ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, যে লোকের ব্যাপারে দোষারোপ করা হয়েছে তিনি বলতেন, সুবহানাল্লাহ! আল্লাহর কসম! আমি কক্ষনো কোন মহিলার-আবরণ খুলিনি। অতঃপর তিনি আল্লাহর পথে শাহীদ হন। ইয়া’কূব ইবনু ইব্রাহীম-এর হাদীসে রয়েছে (আরবী) কিন্তু ‘আবদুর রায্যাক (রহঃ) বলেন, (আরবী) ‘আব্দ ইবনু হুমায়দ (রহঃ) বলেন, আমি ‘আবদুর রায্যাককে (আবরী) শব্দের ব্যাখ্যা সম্পর্কে প্রশ্ন করলে তিনি বলেন, (আরবী) অর্থ কঠিন গরম। (ই.ফা. ৬৭৬৪, ই.সে. ৬৮১৯)
وحدثني أبو الربيع العتكي، حدثنا فليح بن سليمان، ح وحدثنا الحسن بن علي، الحلواني وعبد بن حميد قالا حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثنا أبي، عن صالح، بن كيسان كلاهما عن الزهري، . بمثل حديث يونس ومعمر بإسنادهما . وفي حديث فليح اجتهلته الحمية كما قال معمر . وفي حديث صالح احتملته الحمية . كقول يونس وزاد في حديث صالح قال عروة كانت عائشة تكره أن يسب عندها حسان وتقول فإنه قال فإن أبي ووالده وعرضي لعرض محمد منكم وقاء وزاد أيضا قال عروة قالت عائشة والله إن الرجل الذي قيل له ما قيل ليقول سبحان الله فوالذي نفسي بيده ما كشفت عن كنف أنثى قط . قالت ثم قتل بعد ذلك شهيدا في سبيل الله . وفي حديث يعقوب بن إبراهيم موعرين في نحر الظهيرة وقال عبد الرزاق موغرين . قال عبد بن حميد قلت لعبد الرزاق ما قوله موغرين قال الوغرة شدة الحر .
সহিহ মুসলিম ৬৯১৩
حدثنا حبان بن موسى، أخبرنا عبد الله بن المبارك، أخبرنا يونس بن يزيد، الأيلي ح وحدثنا إسحاق بن إبراهيم الحنظلي، ومحمد بن رافع، وعبد بن حميد، قال ابن رافع حدثنا وقال الآخران، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، والسياق، حديث معمر من رواية عبد وابن رافع قال يونس ومعمر جميعا عن الزهري أخبرني سعيد بن المسيب وعروة بن الزبير وعلقمة بن وقاص وعبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود عن حديث عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم حين قال لها أهل الإفك ما قالوا فبرأها الله مما قالوا وكلهم حدثني طائفة من حديثها وبعضهم كان أوعى لحديثها من بعض وأثبت اقتصاصا وقد وعيت عن كل واحد منهم الحديث الذي حدثني وبعض حديثهم يصدق بعضا ذكروا أن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أراد أن يخرج سفرا أقرع بين نسائه فأيتهن خرج سهمها خرج بها رسول الله صلى الله عليه وسلم معه - قالت عائشة - فأقرع بيننا في غزوة غزاها فخرج فيها سهمي فخرجت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم وذلك بعد ما أنزل الحجاب فأنا أحمل في هودجي وأنزل فيه مسيرنا حتى إذا فرغ رسول الله صلى الله عليه وسلم من غزوه وقفل ودنونا من المدينة آذن ليلة بالرحيل فقمت حين آذنوا بالرحيل فمشيت حتى جاوزت الجيش فلما قضيت من شأني أقبلت إلى الرحل فلمست صدري فإذا عقدي من جزع ظفار قد انقطع فرجعت فالتمست عقدي فحبسني ابتغاؤه وأقبل الرهط الذين كانوا يرحلون لي فحملوا هودجي فرحلوه على بعيري الذي كنت أركب وهم يحسبون أني فيه - قالت - وكانت النساء إذ ذاك خفافا لم يهبلن ولم يغشهن اللحم إنما يأكلن العلقة من الطعام فلم يستنكر القوم ثقل الهودج حين رحلوه ورفعوه وكنت جارية حديثة السن فبعثوا الجمل وساروا ووجدت عقدي بعد ما استمر الجيش فجئت منازلهم وليس بها داع ولا مجيب فتيممت منزلي الذي كنت فيه وظننت أن القوم سيفقدوني فيرجعون إلى فبينا أنا جالسة في منزلي غلبتني عيني فنمت وكان صفوان بن المعطل السلمي ثم الذكواني قد عرس من وراء الجيش فادلج فأصبح عند منزلي فرأى سواد إنسان نائم فأتاني فعرفني حين رآني وقد كان يراني قبل أن يضرب الحجاب على فاستيقظت باسترجاعه حين عرفني فخمرت وجهي بجلبابي ووالله ما يكلمني كلمة ولا سمعت منه كلمة غير استرجاعه حتى أناخ راحلته فوطئ على يدها فركبتها فانطلق يقود بي الراحلة حتى أتينا الجيش بعد ما نزلوا موغرين في نحر الظهيرة فهلك من هلك في شأني وكان الذي تولى كبره عبد الله بن أبى ابن سلول فقدمنا المدينة فاشتكيت حين قدمنا المدينة شهرا والناس يفيضون في قول أهل الإفك ولا أشعر بشىء من ذلك وهو يريبني في وجعي أني لا أعرف من رسول الله صلى الله عليه وسلم اللطف الذي كنت أرى منه حين أشتكي إنما يدخل رسول الله صلى الله عليه وسلم فيسلم ثم يقول " كيف تيكم " . فذاك يريبني ولا أشعر بالشر حتى خرجت بعد ما نقهت وخرجت معي أم مسطح قبل المناصع وهو متبرزنا ولا نخرج إلا ليلا إلى ليل وذلك قبل أن نتخذ الكنف قريبا من بيوتنا وأمرنا أمر العرب الأول في التنزه وكنا نتأذى بالكنف أن نتخذها عند بيوتنا فانطلقت أنا وأم مسطح وهي بنت أبي رهم بن المطلب بن عبد مناف وأمها ابنة صخر بن عامر خالة أبي بكر الصديق وابنها مسطح بن أثاثة بن عباد بن المطلب فأقبلت أنا وبنت أبي رهم قبل بيتي حين فرغنا من شأننا فعثرت أم مسطح في مرطها فقالت تعس مسطح . فقلت لها بئس ما قلت أتسبين رجلا قد شهد بدرا . قالت أى هنتاه أولم تسمعي ما قال قلت وماذا قال قالت فأخبرتني بقول أهل الإفك فازددت مرضا إلى مرضي فلما رجعت إلى بيتي فدخل على رسول الله صلى الله عليه وسلم فسلم ثم قال " كيف تيكم " . قلت أتأذن لي أن آتي أبوى قالت وأنا حينئذ أريد أن أتيقن الخبر من قبلهما . فأذن لي رسول الله صلى الله عليه وسلم فجئت أبوى فقلت لأمي يا أمتاه ما يتحدث الناس فقالت يا بنية هوني عليك فوالله لقلما كانت امرأة قط وضيئة عند رجل يحبها ولها ضرائر إلا كثرن عليها - قالت - قلت سبحان الله وقد تحدث الناس بهذا قالت فبكيت تلك الليلة حتى أصبحت لا يرقأ لي دمع ولا أكتحل بنوم ثم أصبحت أبكي ودعا رسول الله صلى الله عليه وسلم علي بن أبي طالب وأسامة بن زيد حين استلبث الوحى يستشيرهما في فراق أهله - قالت - فأما أسامة بن زيد فأشار على رسول الله صلى الله عليه وسلم بالذي يعلم من براءة أهله وبالذي يعلم في نفسه لهم من الود فقال يا رسول الله هم أهلك ولا نعلم إلا خيرا . وأما علي بن أبي طالب فقال لم يضيق الله عليك والنساء سواها كثير وإن تسأل الجارية تصدقك - قالت - فدعا رسول الله صلى الله عليه وسلم بريرة فقال " أى بريرة هل رأيت من شىء يريبك من عائشة " . قالت له بريرة والذي بعثك بالحق إن رأيت عليها أمرا قط أغمصه عليها أكثر من أنها جارية حديثة السن تنام عن عجين أهلها فتأتي الداجن فتأكله - قالت - فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم على المنبر فاستعذر من عبد الله بن أبى ابن سلول - قالت - فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو على المنبر " يا معشر المسلمين من يعذرني من رجل قد بلغ أذاه في أهل بيتي فوالله ما علمت على أهلي إلا خيرا ولقد ذكروا رجلا ما علمت عليه إلا خيرا وما كان يدخل على أهلي إلا معي " . فقام سعد بن معاذ الأنصاري فقال أنا أعذرك منه يا رسول الله إن كان من الأوس ضربنا عنقه وإن كان من إخواننا الخزرج أمرتنا ففعلنا أمرك - قالت - فقام سعد بن عبادة وهو سيد الخزرج وكان رجلا صالحا ولكن اجتهلته الحمية فقال لسعد بن معاذ كذبت لعمر الله لا تقتله ولا تقدر على قتله . فقام أسيد بن حضير وهو ابن عم سعد بن معاذ فقال لسعد بن عبادة كذبت لعمر الله لنقتلنه فإنك منافق تجادل عن المنافقين فثار الحيان الأوس والخزرج حتى هموا أن يقتتلوا ورسول الله صلى الله عليه وسلم قائم على المنبر فلم يزل رسول الله صلى الله عليه وسلم يخفضهم حتى سكتوا وسكت - قالت - وبكيت يومي ذلك لا يرقأ لي دمع ولا أكتحل بنوم ثم بكيت ليلتي المقبلة لا يرقأ لي دمع ولا أكتحل بنوم وأبواى يظنان أن البكاء فالق كبدي فبينما هما جالسان عندي وأنا أبكي استأذنت على امرأة من الأنصار فأذنت لها فجلست تبكي - قالت - فبينا نحن على ذلك دخل علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم فسلم ثم جلس - قالت - ولم يجلس عندي منذ قيل لي ما قيل وقد لبث شهرا لا يوحى إليه في شأني بشىء - قالت - فتشهد رسول الله صلى الله عليه وسلم حين جلس ثم قال " أما بعد يا عائشة فإنه قد بلغني عنك كذا وكذا فإن كنت بريئة فسيبرئك الله وإن كنت ألممت بذنب فاستغفري الله وتوبي إليه فإن العبد إذا اعترف بذنب ثم تاب تاب الله عليه " . قالت فلما قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم مقالته قلص دمعي حتى ما أحس منه قطرة فقلت لأبي أجب عني رسول الله صلى الله عليه وسلم فيما قال . فقال والله ما أدري ما أقول لرسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت لأمي أجيبي عني رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت والله ما أدري ما أقول لرسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت وأنا جارية حديثة السن لا أقرأ كثيرا من القرآن إني والله لقد عرفت أنكم قد سمعتم بهذا حتى استقر في نفوسكم وصدقتم به فإن قلت لكم إني بريئة والله يعلم أني بريئة لا تصدقوني بذلك ولئن اعترفت لكم بأمر والله يعلم أني بريئة لتصدقونني وإني والله ما أجد لي ولكم مثلا إلا كما قال أبو يوسف فصبر جميل والله المستعان على ما تصفون . قالت ثم تحولت فاضطجعت على فراشي - قالت - وأنا والله حينئذ أعلم أني بريئة وأن الله مبرئي ببراءتي ولكن والله ما كنت أظن أن ينزل في شأني وحى يتلى ولشأني كان أحقر في نفسي من أن يتكلم الله عز وجل في بأمر يتلى ولكني كنت أرجو أن يرى رسول الله صلى الله عليه وسلم في النوم رؤيا يبرئني الله بها قالت فوالله ما رام رسول الله صلى الله عليه وسلم مجلسه ولا خرج من أهل البيت أحد حتى أنزل الله عز وجل على نبيه صلى الله عليه وسلم فأخذه ما كان يأخذه من البرحاء عند الوحى حتى إنه ليتحدر منه مثل الجمان من العرق في اليوم الشات من ثقل القول الذي أنزل عليه - قالت - فلما سري عن رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يضحك فكان أول كلمة تكلم بها أن قال " أبشري يا عائشة أما الله فقد برأك " . فقالت لي أمي قومي إليه فقلت والله لا أقوم إليه ولا أحمد إلا الله هو الذي أنزل براءتي - قالت - فأنزل الله عز وجل { إن الذين جاءوا بالإفك عصبة منكم} عشر آيات فأنزل الله عز وجل هؤلاء الآيات براءتي - قالت - فقال أبو بكر وكان ينفق على مسطح لقرابته منه وفقره والله لا أنفق عليه شيئا أبدا بعد الذي قال لعائشة . فأنزل الله عز وجل { ولا يأتل أولو الفضل منكم والسعة أن يؤتوا أولي القربى} إلى قوله { ألا تحبون أن يغفر الله لكم} قال حبان بن موسى قال عبد الله بن المبارك هذه أرجى آية في كتاب الله . فقال أبو بكر والله إني لأحب أن يغفر الله لي . فرجع إلى مسطح النفقة التي كان ينفق عليه وقال لا أنزعها منه أبدا . قالت عائشة وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم سأل زينب بنت جحش زوج النبي صلى الله عليه وسلم عن أمري " ما علمت أو ما رأيت " . فقالت يا رسول الله أحمي سمعي وبصري والله ما علمت إلا خيرا . قالت عائشة وهي التي كانت تساميني من أزواج النبي صلى الله عليه وسلم فعصمها الله بالورع وطفقت أختها حمنة بنت جحش تحارب لها فهلكت فيمن هلك . قال الزهري فهذا ما انتهى إلينا من أمر هؤلاء الرهط . وقال في حديث يونس احتملته الحمية .
হাব্বান ইবনু মূসা, ইসহাক্ ইবুন ইব্রাহীম আল হান্যালী, মুহাম্মাদ ইবনু রাফি‘ ও ‘আবদ ইবনু হুমায়দ (রহঃ), সা‘ঈদ ইবনু মুসাইয়্যাব, ‘উরওয়াহ্ ইবুন যুবায়র, ‘আলকামাহ্ ইবনু ওয়াক্কাস এবং ‘উবাইদুল্লাহ ইবনু ‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘উত্বাহ্ ইবনু মাস‘ঊদ (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
তাঁরা সকলেই রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী ‘আয়িশা (রাঃ)-এর ঐ কাহিনীটি বর্ণনা করেছেন, অপবাদ রটনাকারীরা তাঁর সম্পর্কে যে অপবাদ দিয়েছিল। তারপর রটানো অপবাদ হতে আল্লাহ তাঁকে নির্দোষ বর্ণনা করলেন। রাবী যুহরী (রহঃ) বলেন, তাঁরা সবাই আমার কাছে হাদীসের এক এক অংশ বর্ণনা করেছেন। তাঁদের কেউ কেউ অন্যের চেয়ে উক্ত হাদীসের কঠোর সংরক্ষণকারী ছিলেন এবং তা ভালভাবে বর্ণনা করতে সক্ষম ছিলেন। তাঁরা আমার কাছে যা বর্ণনা করেছেন, তাঁদের প্রত্যেকের বর্ণনা আমি যথাযথভাবে আয়ত্ব করে নিয়েছি। একজনের হাদীস অন্যের হাদীসকে সত্যায়িত করে। তাঁরা সকলেই উল্লেখ করেছেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী ‘আয়িশাহ্ সিদ্দীকা (রাঃ) বলেছেন যে, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সফরে যাওয়ার সংকল্প করতেন তখন তিনি তাঁর স্ত্রীদের মধ্যে লটারী করতেন। যাঁর নাম আসত তাঁকেই তিনি তাঁর সাথে সফরে নিতেন। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, এক যুদ্ধ-সফরে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লটারী করলেন এবং এতে আমার নাম উঠল। আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সে যুদ্ধে শারীক হই। পর্দার বিধান অবতীর্ণ হওয়ার পর এ যুদ্ধে আমি শারীক হয়েছিলাম। আরোহী অবস্থায় আমাকে ভিতরে রাখা হতো এবং অবতেরণের সময়ও হাওদার ভিতর থাকতাম। পরে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুদ্ধ হতে অব্যাহতির পর ফিরে এসে মাদীনার কাছাকাছি জায়গায় পৌঁছার পর এক রাতে তিনি রওনা হবার আদেশ দিলেন। লোকজন যখন রওনা হবার ব্যাপারে ঘোষণা দিল, তখন আমি দাঁড়িয়ে চলতে লাগলাম; এমনকি আমি সৈন্যদেরকে ছাড়িয়ে দূরে চলে গেলাম। এরপর আমি প্রাকৃতিক প্রয়োজন (প্রস্রাব পায়খানা) সেরে আরোহীর নিকট এলাম এবং নিজ বক্ষে হাত দিয়ে দেখলাম, যিফারী পুতির প্রস্তুত আমার হারটি হারিয়ে গিয়েছে। তাই আগের স্থানে ফিরে গিয়ে আমি আমার হারটি সন্ধান করলাম। (এতে আমার দেরী হয়ে গেল।) এদিকে হাওদা বহনকারী লোকজন এসে দ্রব্য-সামগ্রী উঠিয়ে আমার বহনকারী উটের উপর রেখে দিল। তারা ধারণা করেছিল, আমি হাওদার ভিতরেই আছি। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, তখনকার মহিলারা হালকা-পাতলা গঠনেরই হতো। না বেশি ভারী, না বেশি মোটা। কেননা তারা কম খানা খেত। তাই উঠানোর সময় হাওদার ওজন তাদের কাছে সাধারণ অবস্থা হতে ব্যতিক্রম মনে হয়নি। অধিকন্তু তখন আমি অল্প বয়সী ছিলাম। পরিশেষে লোকেরা উট দাঁড় করিয়ে পথ চলতে শুরু করে দিল। সৈন্যদের রওনা হয়ে যাবার পর আমি আমার হার খুঁজে পেলাম। এরপর আমি আগের স্থানে ফিরে এসে দেখলাম, তথায় কোন জন-মানুষের শব্দ নেই আর সাড়া দেয়ার মতো কোন লোকও তথায় নেই। তখন আমি সংকল্প করলাম, আমি যেখানে বসা ছিলাম সেখানেই বসে থাকব এবং আমি ভাবলাম, লোকেরা যখন খুঁজে আমাকে পাবে না তখন নিশ্চয়ই তারা আমার খোঁজে আমার নিকট ফিরে আসবে। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, আমি আমার সে স্থানে বসা অবস্থায় ঘুম এলো আর আমি ঘুমিয়ে পড়লাম। সাফ্ওয়ান ইবনু মুয়াত্তাল আস্ সুলামী আয্ যাক্ওয়ানী নামক এক লোক ছিল। আরামের উদ্দেশ্যে সৈন্যদের পেছনে শেষ রাত্রে সে আগের জায়গায়ই রয়ে গিয়েছিল। পরে সে রওনা হয়ে প্রত্যূষে আমার স্থানে পৌঁছল। দূর থেকে সে একটি মানব দেহ দেখতে পেয়ে আমার কাছে এলো এবং আমাকে দেখে সে চিনে ফেলল। কেননা পর্দার বিধান অবতীর্ণ হওয়ার পূর্বে সে আমাকে দেখেছিল। আমাকে চিনে সে “ইন্না- লিল্লা-হি ওয়া ইন্না- ইলাইহি রাজি‘ঊন” পড়লেন তাঁর “ইন্না- লিল্লা-হ .....” এর শব্দে আমার ঘুম ছুটে গেল। অকস্মাৎ আমি আমার চাদর দিয়ে স্বীয় মুখমণ্ডল আবৃত করে নিলাম। আল্লাহর শপথ! সে আমার সাথে কোন কথা বলেনি এবং “ইন্না- লিল্লা-হ .....” পাঠ ব্যতীত আর তার কোন কথাই আমি শুনিনি। এরপর সে তার উট বসিয়ে নিজ হাত বিছিয়ে দিলেন আমি তার উটের উপরে উঠলাম। আর সে পায়ে হেঁটে আমাকে সহ উট হাঁকিয়ে নিয়ে চলল। যেতে যেতে আমরা সৈন্য দলের কাছে গিয়ে পৌঁছলাম। তখন তারা দ্বিপ্রহরের প্রচণ্ড রোদের মধ্যে সওয়ারী থেকে নেমে ভূমিতে অবস্থান করছিল। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, আমার (অপবাদের) সম্পর্কে জড়িত হয়ে কতক লোক নিজেদের ধ্বংস ডেকে এনেছে আর এ সম্পর্কে যে প্রধান ভূমিকা গ্রহণ করেছিল তার নাম ‘আবদুল্লাহ ইবনু উবাই ইবনু সালূল। পরিশেষে আমরা মাদীনায় পৌঁছলাম। মাদীনায় পৌঁছার পর এক মাস যাবৎ আমি অসুস্থ ছিলাম। এদিকে মাদীনার মানুষজন অপবাদ রটনাকারীদের কথা গভীরভাবে পর্যালোচনা করে দেখতে লাগল। এ সম্পর্কে আমি কিছুই বুঝতে পারিনি। তবে এ অসুস্থ অবস্থায় রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর তরফ থেকে পূর্বের ন্যায় স্নেহ না পাওয়ার ফলে আমার মনে সন্দেহের উদ্রেক হয়েছিল। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘরে ঢুকে কেবল সালাম করে বলতেন, এই তুমি কেমন আছো? এ আচরণ আমাকে সন্দেহে ফেলে দিল। আমি সে (মন্দ) বিষয়টি সম্পর্কে জানতাম না। তারপর কিছুটা সুস্থ হবার পর আমি মানাসি‘ প্রান্তরের দিকে বের হলাম। আমার সাথে মিসতাহ্-এর আম্মাও ছিল। তা আমাদের শৌচাগার ছিল। আমরা রাতে বের হতাম এবং রাতেই চলে আসতাম। এ হলো আমাদের গৃহের নিকট শোচাগার নির্মাণের পূর্ববর্তী সময়ের ঘটনা। তখন আগের দিনের আরব মানুষের মতো মাঠে গিয়ে আমরা শৌচকার্য সারতাম। আর আমরা ঘরের কোণে শৌচাগার তৈরি করা পছন্দ করতাম না। অতএব আমি এবং মিসতাহ্-এর মা যেতে লাগলাম। সে ছিল আবূ রুহম ইবনু মুত্তালিব ইবনু ‘আব্দ মান্নাফ-এর কন্যা এবং তার মা ছিল আবূ বকর সিদ্দীক (রাঃ)-এর খালা সাখ্র ইবুন ‘আমির-এর মেয়ে। তাঁর সন্তানের নাম ছিল মিসতাহ্ ইবনু উসাসাহ্ ইবুন ‘আব্বাদ ইবনু মুত্তালিব। মোটকথা, আমি ও বিনতু আবূ রহ্ম (মিসতাহ্-এর মা) নিজ নিজ শৌচকার্য সেরে ঘরের দিকে রওনা হলাম। তখন মিসতাহ্-এর মা স্বীয় চাদরে পেঁচিয়ে হোঁচট খেয়ে মাটিতে পড়ে যায়। আর সে বলে উঠে মিস্তাহ ধ্বংস হোক। তখন আমি বললাম, তুমি অন্যায় কথা বলেছো। তুমি কি বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণকারী লোককে বকছ? সে বলল, হে অবলা নারী! মিসতাহ্ কি বলেছে, তুমি কি শোননি? আমি বললাম, সে কি বলেছে? “আয়িশাহ্ (রাঃ) বলেন, তারপর সে অপবাদ রটনাকারীরা যা বলেছে, সে সম্পর্কে আমাকে সংবাদ দিল। এতে আমার অসুস্থতা কয়েকগুণ বৃদ্ধি পেল। আমি যখন ঘরে ফিরে আসলাম, তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার ঘরে প্রবেশ করে আমাকে সালাম দিলেন এবং বললেন, এই তুমি কেমন আছো? তখন আমি তাকে প্রশ্ন করলাম, আপনি কি আমাকে আমার বাবা-মায়ের বাড়ীতে যাওয়ার অনুমতি দিবেন? ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, তখন আমি আমার বাবা-মায়ের ঘরে গিয়ে এ বিষয়টির খোঁজ করার সংকল্প করেছিলাম। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে অনুমতি দিলেন। আমি আমার মাতা-পিতার নিকট চলে আসলাম। তারপর আমি আমার মাকে বললাম, আম্মাজান! লোকেরা কী কথা বলছে? তিনি বললেন, মা! এদিকে কান দিয়ো না এবং একে মন্দ মনে করো না। আল্লাহর শপথ! কারো যদি কোন সুন্দরী সহধর্মিণী থাকে ও সে তাকে ভালবাসে আর ঐ মাহিলার কোন সতীনও থাকে তবে সতীনরা তার দোষচর্চা করবে না এমন খুব কমই হয়। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, এ কথা শুনে আমি বললাম, সুবহানাল্লাহ! লোকেরা এ কথা রটাতে শুরু করেছে? এরপর কেঁদে কেঁদে আমি সারা রাত কাটালাম। এমনকি সকালেও অশ্রু বন্ধ হলো না। আমি ঘুমোতে পারিনি। প্রভাতে আমি কাঁদছিলাম। এদিকে আমাকে তালাক দেয়ার ব্যাপারে পরামর্শ করার জন্য রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘আলী ইবনু আবূ তালিব (রাঃ) এবং উসামাহ্ ইবনু যায়দ (রাঃ)-কে ডাকলেন। তখন ওয়াহী স্থগিত ছিল। তিনি বলেন, উসামাহ্ ইবনু যায়দ (রাঃ) রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বিবীদের সতীত্ব এবং তাঁদের সাথে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর ভালবাসার ক্ষেত্রে যা জানতেন সে দিকেই তিনি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ইশারা করলেন। তিনি বললেন, হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! ‘আয়িশাহ্ আপনার সহধর্মিণী, ভাল ছাড়া তাঁর সম্পর্কে কোন কথাই আমাদের জানা নেই। আর ‘আলী ইবনু আবূ তালিব (রাঃ) বললেন, আল্লাহ তো আপনার উপর কোন সংকীর্ণতা চাপিয়ে দেননি। ‘আয়িশা (রাঃ) ব্যতীতও অনেক স্ত্রীলোক রয়েছে। আপনি যদি দাসী (বারীরাহ্)-কে প্রশ্ন করেন তবে সে সত্য বলে দিবে। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বারীরাহ্ (রাঃ)-কে ডেকে বললেন, হে বারীরাহ্! সন্দেহমূলক কোন কর্মে ‘আয়িশাকে তুমি কখনো দেখেছ কি? বারীরাহ্ (রাঃ) তাঁকে বললেন, ঐ সত্তার কসম! যিনি আপনাকে সত্য নবী হিসেবে পাঠিয়েছেন, আমি যদি তাঁর মাঝে কোন কিছু দেখতাম তবে নিশ্চয়ই এর ত্রুটি আমি উল্লেখ করতাম। তবে সে একজন অল্প বয়সী কন্যা। পরিবারের জন্যে আটার খামীর রেখেই সে ঘুমিয়ে থাকতো আর বকরী এসে তা খেয়ে ফেলতো। এ ত্রুটি ছাড়া বেশি কোন ত্রুটি ‘আয়িশার মাঝে আছে বলে আমার জানা নেই। তিনি বলেন, অতঃপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বারে দাঁড়িয়ে ‘আবদুল্লাহ ইবনু উবাই ইবুন সালূল হতে প্রতিশোধ আশা করলেন। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, তিনি মিম্বারে দাঁড়িয়ে বললেন, হে মুসলিম সমাজ! আমার পরিবারের ব্যাপারে যে লোকের পক্ষ হতে কষ্টদায়ক বাক্যের খবর আমার নিকট পৌঁছেছে তার প্রতিশোধ গ্রহণ করার মতো কোন লোক এখানে আছে কি? আমি তো আমার স্ত্রীর ব্যাপারে উত্তম ছাড়া অন্য কোন কথা জানি না এবং যে লোকের ব্যাপারে তারা অপবাদ রটনা করছে তাকেও আমি সৎলোক বলে জানি। সে তো আমাকে ছাড়া আমার ঘরে কখনো প্রবেশ করতো না। এ কথা শুনে সা‘দ ইবনু মু‘আয আল আনসারী (রাঃ) দাঁড়ালেন এবং বললেন, হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি আপনার তরফ হতে প্রতিশোধ নিবো। অপবাদ রটনাকারী লোক যদি আওস গোত্রের হয় তবে আমি তার গর্দান উড়িয়ে দিব। আর যদি সে আমাদের ভ্রাতা খায্রাজ গোত্রের হয় তবে আপনি আমাদেরকে আদেশ দিন। আমরা আপনার আদেশ পালন করব। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, তখন খাযরাজ সর্দার সা‘দ ইবনু ‘উবাদাহ্ (রাঃ) দাঁড়ালেন। তিনি একজন নেক্কার লোক ছিলেন। তবে তখন বংশীয় আত্মমর্যাদা তাঁকে মূর্খ বানিয়ে ফেলেছিল। তাই তিনি সা’দ ইবনু মু‘আযকে বললেন, তুমি মিথ্যা বলছো। আল্লাহ শপথ! তুমি তাকে হত্যা করবে না। তুমি তাকে হত্যা করতে সক্ষম হবে না। এ কথা শুনে সা‘দ ইবনু মু‘আয (রাঃ)-এর চাচাতো ভাই উসায়দ ইবনু হুযায়র (রাঃ) দাঁড়িয়ে সা‘দ ইবনু ‘উবাদাহ্ (রাঃ)-কে বললেন, তুমি মিথ্যা বলছো। আল্লাহর শপথ! নিশ্চয়ই আমরা তাকে হত্যা করব। নিশ্চয়ই তুমি মুনাফিক। তাই মুনাফিকদের পক্ষে কথা বলছো। এ সময় আওস ও খাযরাজ দু’ গোত্রের লোকেরা একে অপরের উপর উত্তেজিত হয়ে উঠল। এমনকি তারা যুদ্ধের ইচ্ছা করে বসলো। অথচ রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখনও তাদের সম্মুখে মিম্বারে দাঁড়ানো অবস্থায় ছিলেন। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁদেরকে থামিয়ে শান্ত করলেন। তারা নীরব থাকলো এবং তিনি নিজেও আর কোন কথা বললেন না। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, সেদিন আমি সারাক্ষণ কান্নাকাটি করলাম। অবিরত ধারায় আমার অশ্রুপাত হচ্ছিল। রাত্রে একটুও আমার ঘুম আসলো না। অতঃপর সামনের রাতেও আমি কেঁদে কাটালাম। এ রাতেও অঝোর ধারায় আমার অশ্রুপাত হলো এবং একটুকুও নিদ্রা যেতে পারলাম না। এ দেখে আমার আব্বা-আম্মা মনে করছিলেন যে, কান্নায় আমার কলিজা টুকরো টুকরো হয়ে যাবে। আমি কাঁদতে ছিলাম, আমার আব্বা-আম্মা আমার নিকটে বসা ছিলেন। এমন সময় একজন আনসার মহিলা আমার কাছে আসার অনুমতি চাইলে আমি তাকে অনুমতি দিলাম। সে এসে বসে কাঁদতে লাগল। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, আমাদের যখন এ অবস্থা এমন সময় রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের কাছে প্রবেশ করলেন এবং আমাদেরকে সালাম করে বসলেন। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, অথচ আমার সম্বন্ধে যা বলাবলি হচ্ছে তারপর থেকে তিনি কখনো আমার কাছে বসেননি। এমনিভাবে এক মাস অতিক্রান্ত হলো। আমার সম্পর্কে তাঁর কাছে কোন ওয়াহী আসলো না। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বসে তাশাহুদ পড়লেন। এরপর বললেন, যা হোক হে ‘আয়িশাহ্! তোমার ব্যাপারে আমার কাছে এমন এমন খবর পৌঁছেছে। যদি তুমি এ বিষয়ে নিষ্পাপ এবং পবিত্র হও, তবে শীঘ্রই আল্লাহ তা‘আলা তোমার পবিত্রতার বিষয়ে ঘোষণা করবেন। আর যদি তোমার দ্বারা কোন পাপ হয়েই থাকে তবে তুমি আল্লাহর কাছে মার্জনা প্রার্থনা এবং তাওবাহ্ করো। কেননা বান্দা পাপ স্বীকার করে তাওবাহ্ করলে আল্লাহ তার তাওবাহ্ গ্রহণ করেন। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর কথা সমাপ্ত করলেন, তখন আমার অশ্রুধারা বন্ধ হয়ে গেল। এমনকি তারপর আর এক ফোটা অশ্রুও আমি অনুভব করলাম না। তারপর আমি আমার পিতাকে বললাম, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা বললেন, আমার তরফ হতে তার উত্তর দিন। তিনিও বললেন, আল্লাহর শপথ! রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কি উত্তর দিব, আমার তা অজানা। এরপর আমি আমার মাকে বললাম, আমার তরফ হতে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উত্তর দিন। তিনি বললেন, আল্লাহ্র শপথ! রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কি উত্তর দিব, আমি তা জানি না। আমি বললাম, তখন আমি ছিলাম কম বয়সী কিশোরী। কুরআন মাজীদও অধিক পাঠ করতে পারতাম না। এ অবস্থা দেখে আমিই তখন বললাম, আল্লাহ শপথ! আমি জানি, আপনারা এ অপবাদের কথা শুনেছেন, মনে তা গেঁথে গেছে এবং আপনারা তা বিশ্বাস করে নিয়েছেন। কাজেই এখন যদি আমি বলি, আমি নিষ্কলুষ তবে এ বিষয়ে আপনারা আমাকে বিশ্বাস করবেন না। আর যদি আমি মেনে নেই, যে সম্পর্কে আল্লাহ জানেন যে, আমি নিষ্পাপ, তবে আপনারা তা বিশ্বাস করবেন। আল্লাহর শপথ! আমার ও আপনাদের জন্য (নাবী) ইউসুফ (‘আঃ)-এর পিতার কথার দৃষ্টান্ত ছাড়া ভিন্ন কোন দৃষ্টান্ত আমার দৃষ্টিতে পড়ে না। তিনি বলেছিলেন, “কাজেই পরিপূর্ণ ধৈর্যই উত্তম, তোমরা যা বলছো সে ব্যাপারে একমাত্র আল্লাহই আমার আশ্রয়স্থল।” তিনি [‘আয়িশাহ (রাঃ)] বলেন, অতঃপর আমি মুখ ফিরিয়ে নিলাম এবং বিছানায় শুয়ে পড়লাম। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, আল্লাহর শপথ! আল্লাহ তো ঐ সময়েও জানেন যে, নিশ্চয়ই আমি নিষ্পাপ এবং নিশ্চয়ই আল্লাহ তা‘আলা আমার পবিত্রতা উন্মোচন করে দিবেন। কিন্তু আল্লাহর শপথ! আমি মনে করিনি যে, আল্লাহ তা‘আলা আমার এ ব্যাপারে ওয়াহী অবতীর্ণ করবেন, যা পড়া হবে। কেননা আমার ব্যাপারে পড়ার মতো আল্লাহর পক্ষ থেকে কোন আয়াত অবতীর্ণ করা হবে আমার অবস্থা তার চেয়ে বেশি নিম্নমানের বলে আমি মনে করতাম। তবে আমি প্রত্যাশা করেছিলাম যে, স্বপ্নের মধ্যে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন কোন বিষয় দেখবেন যার মাধ্যমে আল্লাহ তা‘আলা আমার পবিত্রতা প্রকাশ করে দিবেন। ‘আয়িশাহ্ সিদ্দীকা (রাঃ) বলেন, আল্লাহ শপথ! রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখনো তাঁর জায়গা ছেড়ে যাননি এবং গৃহের লোকও কেউ বাইরে যায়নি। এমতাবস্থায় আল্লাহ তা‘আলা তাঁর নাবীর উপর ওয়াহী অবতীর্ণ করেন। ওয়াহী অবতীর্ণের প্রাক্কালে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর যে যন্ত্রণাদায়ক অবস্থা দেখা দিত তার অনুরূপ অবস্থা দেখা দিলো। এমনকি তাঁর প্রতি অবতীর্ণকৃত বাণীর ওযনের কারণে প্রচণ্ড শৈত্যপ্রবাহের দিনেও তাঁর শরীর হতে মুক্তার মতো বিন্দু বিন্দু ঘাম ঝরে পড়তো। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এ যন্ত্রণাদায়ক অবস্থা চলে গেলে তিনি হাসতে লাগলেন এবং প্রথমে যে কথাটি বললেন তা হলো : হে ‘আয়িশাহ্! সুসংবাদ গ্রহণ করো। আল্লাহ তোমার পবিত্রতা ঘোষণা করেছেন। এ কথা শুনে আমার মা আমাকে বললেন, তুমি উঠে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-সে সম্মান প্রদর্শন করো। আমি বললাম, আমি তাঁর প্রতি সম্মান প্রদর্শন করবো না এবং আল্লাহ ব্যতীত আর কারো প্রশংসা করবো না। তিনিই আমার পবিত্রতার ব্যাপারে আয়াত নাযিল করেছেন। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, আল্লাহ তা‘আলা আমার পবিত্রতার ব্যাপারে দশটি আয়াত (সূরাহ্ আন্ নূর ২৪ : ১১-২১) অবতীর্ণ করেছেন। “যারা অপবাদ রটনা করেছে তারা তো তোমাদেরই একটি দল, একে তোমরা তোমাদের জন্যে ক্ষতিকর মনে করো না; বরং এ তো তোমাদের জন্য কল্যাণকর।” ..... ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, আত্মীয়তার বন্ধন ও দারিদ্রের কারণে আবূ বকর সিদ্দীক (রাঃ) মিসতাহ্কে আর্থিক সাহায্য করতেন। কিন্তু ‘আয়িশাহ্ সম্বন্ধে সে যা বলেছিল সে কারণে আবূ বকর (রাঃ) শপথ করে বসলেন, আল্লাহ্র শপথ! আমি আর কোন সময় মিসতাহ্কে আর্থিক সহযোগিতা দিব না। তখন আল্লাহ তা‘আলা নাযিল করলেন : “তোমাদের মাঝে যারা ঐশ্বর্য ও প্রাচুর্যের অধিকারী তারা যেন কসম না করে যে, তারা দান করবে না আত্মীয়-স্বজনকে .....। তোমরা কি চাও না যে, আল্লাহ তোমাদের মাফ করেন”..... পর্যন্ত। হাব্বান ইবনু মূসা (রহঃ) বলেন, ‘আবদুল্লাহ ইবনু মুবারক (রহঃ) বলেছেন, আল-কুরআনের মধ্যে এ আয়াতটিই অধিক আশাব্যঞ্জক। তারপর আবূ বকর সিদ্দীক (রাঃ) বললেন, আল্লাহ শপথ! আমি অবশ্যই ভালোবাসি যে, আল্লাহ আমাকে মাফ করে দিন। এরপর মিসতাহ্ (রাঃ)-এর জন্যে যে পরিমাণ অর্থ ব্যয় করতেন তা পুনরায় খরচ করতে শুরু করলেন। আর বললেন, তাকে আমি এ অর্থ দেয়া কোন সময় বন্ধ করবো না। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রী যাইনাব বিন্ত জাহ্শ (রহঃ)-কে আমার সম্পর্কে প্রশ্ন করেছিলেন, তিনি যাইনাবকে বলেছিলেন, তুমি ‘আয়িশাহ্ সম্বন্ধে কি জানো বা দেখেছো? জবাবে তিনি বললেন, হে আল্লাহর রসূল! আমি আমার কান ও চোখকে হিফাযাত করেছি। আল্লাহর শপথ! তাঁর ব্যাপারে আমি উত্তম ব্যতীত কিছুই জানি না। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীদের মাঝে তিনিই আমার প্রতিদ্বন্দ্বী ছিলেন। কিন্তু আল্লাহ ভীতির মাধ্যমে আল্লাহ তাঁকে হিফাযাত করেছেন। অথচ তাঁর বোন হামানাহ্ বিন্ত জাহ্শ তাঁর পক্ষাবলম্বন করে ঝগড়া করে, আর এভাবে সে ক্ষতিগ্রস্তদের মধ্যে ক্ষতিগ্রস্ত হয়ে যায়। রাবী যুহরী (রহঃ) বলেন, ঐ লোকদের নিকট থেকে আমাদের কাছে যা পৌঁছেছে তা এ হাদীস। তবে রাবী ইউনুসের হাদীসের মধ্যে রয়েছে, ‘গোত্রীয় আত্মম্ভরিতা তাকে উত্তেজিত করে।’ (ই.ফা. ৬৭৬৩, ই.সে. ৬৮১৮)
হাব্বান ইবনু মূসা, ইসহাক্ ইবুন ইব্রাহীম আল হান্যালী, মুহাম্মাদ ইবনু রাফি‘ ও ‘আবদ ইবনু হুমায়দ (রহঃ), সা‘ঈদ ইবনু মুসাইয়্যাব, ‘উরওয়াহ্ ইবুন যুবায়র, ‘আলকামাহ্ ইবনু ওয়াক্কাস এবং ‘উবাইদুল্লাহ ইবনু ‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘উত্বাহ্ ইবনু মাস‘ঊদ (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
তাঁরা সকলেই রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী ‘আয়িশা (রাঃ)-এর ঐ কাহিনীটি বর্ণনা করেছেন, অপবাদ রটনাকারীরা তাঁর সম্পর্কে যে অপবাদ দিয়েছিল। তারপর রটানো অপবাদ হতে আল্লাহ তাঁকে নির্দোষ বর্ণনা করলেন। রাবী যুহরী (রহঃ) বলেন, তাঁরা সবাই আমার কাছে হাদীসের এক এক অংশ বর্ণনা করেছেন। তাঁদের কেউ কেউ অন্যের চেয়ে উক্ত হাদীসের কঠোর সংরক্ষণকারী ছিলেন এবং তা ভালভাবে বর্ণনা করতে সক্ষম ছিলেন। তাঁরা আমার কাছে যা বর্ণনা করেছেন, তাঁদের প্রত্যেকের বর্ণনা আমি যথাযথভাবে আয়ত্ব করে নিয়েছি। একজনের হাদীস অন্যের হাদীসকে সত্যায়িত করে। তাঁরা সকলেই উল্লেখ করেছেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী ‘আয়িশাহ্ সিদ্দীকা (রাঃ) বলেছেন যে, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সফরে যাওয়ার সংকল্প করতেন তখন তিনি তাঁর স্ত্রীদের মধ্যে লটারী করতেন। যাঁর নাম আসত তাঁকেই তিনি তাঁর সাথে সফরে নিতেন। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, এক যুদ্ধ-সফরে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লটারী করলেন এবং এতে আমার নাম উঠল। আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সে যুদ্ধে শারীক হই। পর্দার বিধান অবতীর্ণ হওয়ার পর এ যুদ্ধে আমি শারীক হয়েছিলাম। আরোহী অবস্থায় আমাকে ভিতরে রাখা হতো এবং অবতেরণের সময়ও হাওদার ভিতর থাকতাম। পরে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুদ্ধ হতে অব্যাহতির পর ফিরে এসে মাদীনার কাছাকাছি জায়গায় পৌঁছার পর এক রাতে তিনি রওনা হবার আদেশ দিলেন। লোকজন যখন রওনা হবার ব্যাপারে ঘোষণা দিল, তখন আমি দাঁড়িয়ে চলতে লাগলাম; এমনকি আমি সৈন্যদেরকে ছাড়িয়ে দূরে চলে গেলাম। এরপর আমি প্রাকৃতিক প্রয়োজন (প্রস্রাব পায়খানা) সেরে আরোহীর নিকট এলাম এবং নিজ বক্ষে হাত দিয়ে দেখলাম, যিফারী পুতির প্রস্তুত আমার হারটি হারিয়ে গিয়েছে। তাই আগের স্থানে ফিরে গিয়ে আমি আমার হারটি সন্ধান করলাম। (এতে আমার দেরী হয়ে গেল।) এদিকে হাওদা বহনকারী লোকজন এসে দ্রব্য-সামগ্রী উঠিয়ে আমার বহনকারী উটের উপর রেখে দিল। তারা ধারণা করেছিল, আমি হাওদার ভিতরেই আছি। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, তখনকার মহিলারা হালকা-পাতলা গঠনেরই হতো। না বেশি ভারী, না বেশি মোটা। কেননা তারা কম খানা খেত। তাই উঠানোর সময় হাওদার ওজন তাদের কাছে সাধারণ অবস্থা হতে ব্যতিক্রম মনে হয়নি। অধিকন্তু তখন আমি অল্প বয়সী ছিলাম। পরিশেষে লোকেরা উট দাঁড় করিয়ে পথ চলতে শুরু করে দিল। সৈন্যদের রওনা হয়ে যাবার পর আমি আমার হার খুঁজে পেলাম। এরপর আমি আগের স্থানে ফিরে এসে দেখলাম, তথায় কোন জন-মানুষের শব্দ নেই আর সাড়া দেয়ার মতো কোন লোকও তথায় নেই। তখন আমি সংকল্প করলাম, আমি যেখানে বসা ছিলাম সেখানেই বসে থাকব এবং আমি ভাবলাম, লোকেরা যখন খুঁজে আমাকে পাবে না তখন নিশ্চয়ই তারা আমার খোঁজে আমার নিকট ফিরে আসবে। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, আমি আমার সে স্থানে বসা অবস্থায় ঘুম এলো আর আমি ঘুমিয়ে পড়লাম। সাফ্ওয়ান ইবনু মুয়াত্তাল আস্ সুলামী আয্ যাক্ওয়ানী নামক এক লোক ছিল। আরামের উদ্দেশ্যে সৈন্যদের পেছনে শেষ রাত্রে সে আগের জায়গায়ই রয়ে গিয়েছিল। পরে সে রওনা হয়ে প্রত্যূষে আমার স্থানে পৌঁছল। দূর থেকে সে একটি মানব দেহ দেখতে পেয়ে আমার কাছে এলো এবং আমাকে দেখে সে চিনে ফেলল। কেননা পর্দার বিধান অবতীর্ণ হওয়ার পূর্বে সে আমাকে দেখেছিল। আমাকে চিনে সে “ইন্না- লিল্লা-হি ওয়া ইন্না- ইলাইহি রাজি‘ঊন” পড়লেন তাঁর “ইন্না- লিল্লা-হ .....” এর শব্দে আমার ঘুম ছুটে গেল। অকস্মাৎ আমি আমার চাদর দিয়ে স্বীয় মুখমণ্ডল আবৃত করে নিলাম। আল্লাহর শপথ! সে আমার সাথে কোন কথা বলেনি এবং “ইন্না- লিল্লা-হ .....” পাঠ ব্যতীত আর তার কোন কথাই আমি শুনিনি। এরপর সে তার উট বসিয়ে নিজ হাত বিছিয়ে দিলেন আমি তার উটের উপরে উঠলাম। আর সে পায়ে হেঁটে আমাকে সহ উট হাঁকিয়ে নিয়ে চলল। যেতে যেতে আমরা সৈন্য দলের কাছে গিয়ে পৌঁছলাম। তখন তারা দ্বিপ্রহরের প্রচণ্ড রোদের মধ্যে সওয়ারী থেকে নেমে ভূমিতে অবস্থান করছিল। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, আমার (অপবাদের) সম্পর্কে জড়িত হয়ে কতক লোক নিজেদের ধ্বংস ডেকে এনেছে আর এ সম্পর্কে যে প্রধান ভূমিকা গ্রহণ করেছিল তার নাম ‘আবদুল্লাহ ইবনু উবাই ইবনু সালূল। পরিশেষে আমরা মাদীনায় পৌঁছলাম। মাদীনায় পৌঁছার পর এক মাস যাবৎ আমি অসুস্থ ছিলাম। এদিকে মাদীনার মানুষজন অপবাদ রটনাকারীদের কথা গভীরভাবে পর্যালোচনা করে দেখতে লাগল। এ সম্পর্কে আমি কিছুই বুঝতে পারিনি। তবে এ অসুস্থ অবস্থায় রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর তরফ থেকে পূর্বের ন্যায় স্নেহ না পাওয়ার ফলে আমার মনে সন্দেহের উদ্রেক হয়েছিল। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘরে ঢুকে কেবল সালাম করে বলতেন, এই তুমি কেমন আছো? এ আচরণ আমাকে সন্দেহে ফেলে দিল। আমি সে (মন্দ) বিষয়টি সম্পর্কে জানতাম না। তারপর কিছুটা সুস্থ হবার পর আমি মানাসি‘ প্রান্তরের দিকে বের হলাম। আমার সাথে মিসতাহ্-এর আম্মাও ছিল। তা আমাদের শৌচাগার ছিল। আমরা রাতে বের হতাম এবং রাতেই চলে আসতাম। এ হলো আমাদের গৃহের নিকট শোচাগার নির্মাণের পূর্ববর্তী সময়ের ঘটনা। তখন আগের দিনের আরব মানুষের মতো মাঠে গিয়ে আমরা শৌচকার্য সারতাম। আর আমরা ঘরের কোণে শৌচাগার তৈরি করা পছন্দ করতাম না। অতএব আমি এবং মিসতাহ্-এর মা যেতে লাগলাম। সে ছিল আবূ রুহম ইবনু মুত্তালিব ইবনু ‘আব্দ মান্নাফ-এর কন্যা এবং তার মা ছিল আবূ বকর সিদ্দীক (রাঃ)-এর খালা সাখ্র ইবুন ‘আমির-এর মেয়ে। তাঁর সন্তানের নাম ছিল মিসতাহ্ ইবনু উসাসাহ্ ইবুন ‘আব্বাদ ইবনু মুত্তালিব। মোটকথা, আমি ও বিনতু আবূ রহ্ম (মিসতাহ্-এর মা) নিজ নিজ শৌচকার্য সেরে ঘরের দিকে রওনা হলাম। তখন মিসতাহ্-এর মা স্বীয় চাদরে পেঁচিয়ে হোঁচট খেয়ে মাটিতে পড়ে যায়। আর সে বলে উঠে মিস্তাহ ধ্বংস হোক। তখন আমি বললাম, তুমি অন্যায় কথা বলেছো। তুমি কি বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণকারী লোককে বকছ? সে বলল, হে অবলা নারী! মিসতাহ্ কি বলেছে, তুমি কি শোননি? আমি বললাম, সে কি বলেছে? “আয়িশাহ্ (রাঃ) বলেন, তারপর সে অপবাদ রটনাকারীরা যা বলেছে, সে সম্পর্কে আমাকে সংবাদ দিল। এতে আমার অসুস্থতা কয়েকগুণ বৃদ্ধি পেল। আমি যখন ঘরে ফিরে আসলাম, তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার ঘরে প্রবেশ করে আমাকে সালাম দিলেন এবং বললেন, এই তুমি কেমন আছো? তখন আমি তাকে প্রশ্ন করলাম, আপনি কি আমাকে আমার বাবা-মায়ের বাড়ীতে যাওয়ার অনুমতি দিবেন? ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, তখন আমি আমার বাবা-মায়ের ঘরে গিয়ে এ বিষয়টির খোঁজ করার সংকল্প করেছিলাম। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে অনুমতি দিলেন। আমি আমার মাতা-পিতার নিকট চলে আসলাম। তারপর আমি আমার মাকে বললাম, আম্মাজান! লোকেরা কী কথা বলছে? তিনি বললেন, মা! এদিকে কান দিয়ো না এবং একে মন্দ মনে করো না। আল্লাহর শপথ! কারো যদি কোন সুন্দরী সহধর্মিণী থাকে ও সে তাকে ভালবাসে আর ঐ মাহিলার কোন সতীনও থাকে তবে সতীনরা তার দোষচর্চা করবে না এমন খুব কমই হয়। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, এ কথা শুনে আমি বললাম, সুবহানাল্লাহ! লোকেরা এ কথা রটাতে শুরু করেছে? এরপর কেঁদে কেঁদে আমি সারা রাত কাটালাম। এমনকি সকালেও অশ্রু বন্ধ হলো না। আমি ঘুমোতে পারিনি। প্রভাতে আমি কাঁদছিলাম। এদিকে আমাকে তালাক দেয়ার ব্যাপারে পরামর্শ করার জন্য রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘আলী ইবনু আবূ তালিব (রাঃ) এবং উসামাহ্ ইবনু যায়দ (রাঃ)-কে ডাকলেন। তখন ওয়াহী স্থগিত ছিল। তিনি বলেন, উসামাহ্ ইবনু যায়দ (রাঃ) রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বিবীদের সতীত্ব এবং তাঁদের সাথে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর ভালবাসার ক্ষেত্রে যা জানতেন সে দিকেই তিনি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ইশারা করলেন। তিনি বললেন, হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! ‘আয়িশাহ্ আপনার সহধর্মিণী, ভাল ছাড়া তাঁর সম্পর্কে কোন কথাই আমাদের জানা নেই। আর ‘আলী ইবনু আবূ তালিব (রাঃ) বললেন, আল্লাহ তো আপনার উপর কোন সংকীর্ণতা চাপিয়ে দেননি। ‘আয়িশা (রাঃ) ব্যতীতও অনেক স্ত্রীলোক রয়েছে। আপনি যদি দাসী (বারীরাহ্)-কে প্রশ্ন করেন তবে সে সত্য বলে দিবে। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বারীরাহ্ (রাঃ)-কে ডেকে বললেন, হে বারীরাহ্! সন্দেহমূলক কোন কর্মে ‘আয়িশাকে তুমি কখনো দেখেছ কি? বারীরাহ্ (রাঃ) তাঁকে বললেন, ঐ সত্তার কসম! যিনি আপনাকে সত্য নবী হিসেবে পাঠিয়েছেন, আমি যদি তাঁর মাঝে কোন কিছু দেখতাম তবে নিশ্চয়ই এর ত্রুটি আমি উল্লেখ করতাম। তবে সে একজন অল্প বয়সী কন্যা। পরিবারের জন্যে আটার খামীর রেখেই সে ঘুমিয়ে থাকতো আর বকরী এসে তা খেয়ে ফেলতো। এ ত্রুটি ছাড়া বেশি কোন ত্রুটি ‘আয়িশার মাঝে আছে বলে আমার জানা নেই। তিনি বলেন, অতঃপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বারে দাঁড়িয়ে ‘আবদুল্লাহ ইবনু উবাই ইবুন সালূল হতে প্রতিশোধ আশা করলেন। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, তিনি মিম্বারে দাঁড়িয়ে বললেন, হে মুসলিম সমাজ! আমার পরিবারের ব্যাপারে যে লোকের পক্ষ হতে কষ্টদায়ক বাক্যের খবর আমার নিকট পৌঁছেছে তার প্রতিশোধ গ্রহণ করার মতো কোন লোক এখানে আছে কি? আমি তো আমার স্ত্রীর ব্যাপারে উত্তম ছাড়া অন্য কোন কথা জানি না এবং যে লোকের ব্যাপারে তারা অপবাদ রটনা করছে তাকেও আমি সৎলোক বলে জানি। সে তো আমাকে ছাড়া আমার ঘরে কখনো প্রবেশ করতো না। এ কথা শুনে সা‘দ ইবনু মু‘আয আল আনসারী (রাঃ) দাঁড়ালেন এবং বললেন, হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি আপনার তরফ হতে প্রতিশোধ নিবো। অপবাদ রটনাকারী লোক যদি আওস গোত্রের হয় তবে আমি তার গর্দান উড়িয়ে দিব। আর যদি সে আমাদের ভ্রাতা খায্রাজ গোত্রের হয় তবে আপনি আমাদেরকে আদেশ দিন। আমরা আপনার আদেশ পালন করব। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, তখন খাযরাজ সর্দার সা‘দ ইবনু ‘উবাদাহ্ (রাঃ) দাঁড়ালেন। তিনি একজন নেক্কার লোক ছিলেন। তবে তখন বংশীয় আত্মমর্যাদা তাঁকে মূর্খ বানিয়ে ফেলেছিল। তাই তিনি সা’দ ইবনু মু‘আযকে বললেন, তুমি মিথ্যা বলছো। আল্লাহ শপথ! তুমি তাকে হত্যা করবে না। তুমি তাকে হত্যা করতে সক্ষম হবে না। এ কথা শুনে সা‘দ ইবনু মু‘আয (রাঃ)-এর চাচাতো ভাই উসায়দ ইবনু হুযায়র (রাঃ) দাঁড়িয়ে সা‘দ ইবনু ‘উবাদাহ্ (রাঃ)-কে বললেন, তুমি মিথ্যা বলছো। আল্লাহর শপথ! নিশ্চয়ই আমরা তাকে হত্যা করব। নিশ্চয়ই তুমি মুনাফিক। তাই মুনাফিকদের পক্ষে কথা বলছো। এ সময় আওস ও খাযরাজ দু’ গোত্রের লোকেরা একে অপরের উপর উত্তেজিত হয়ে উঠল। এমনকি তারা যুদ্ধের ইচ্ছা করে বসলো। অথচ রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখনও তাদের সম্মুখে মিম্বারে দাঁড়ানো অবস্থায় ছিলেন। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁদেরকে থামিয়ে শান্ত করলেন। তারা নীরব থাকলো এবং তিনি নিজেও আর কোন কথা বললেন না। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, সেদিন আমি সারাক্ষণ কান্নাকাটি করলাম। অবিরত ধারায় আমার অশ্রুপাত হচ্ছিল। রাত্রে একটুও আমার ঘুম আসলো না। অতঃপর সামনের রাতেও আমি কেঁদে কাটালাম। এ রাতেও অঝোর ধারায় আমার অশ্রুপাত হলো এবং একটুকুও নিদ্রা যেতে পারলাম না। এ দেখে আমার আব্বা-আম্মা মনে করছিলেন যে, কান্নায় আমার কলিজা টুকরো টুকরো হয়ে যাবে। আমি কাঁদতে ছিলাম, আমার আব্বা-আম্মা আমার নিকটে বসা ছিলেন। এমন সময় একজন আনসার মহিলা আমার কাছে আসার অনুমতি চাইলে আমি তাকে অনুমতি দিলাম। সে এসে বসে কাঁদতে লাগল। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, আমাদের যখন এ অবস্থা এমন সময় রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের কাছে প্রবেশ করলেন এবং আমাদেরকে সালাম করে বসলেন। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, অথচ আমার সম্বন্ধে যা বলাবলি হচ্ছে তারপর থেকে তিনি কখনো আমার কাছে বসেননি। এমনিভাবে এক মাস অতিক্রান্ত হলো। আমার সম্পর্কে তাঁর কাছে কোন ওয়াহী আসলো না। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বসে তাশাহুদ পড়লেন। এরপর বললেন, যা হোক হে ‘আয়িশাহ্! তোমার ব্যাপারে আমার কাছে এমন এমন খবর পৌঁছেছে। যদি তুমি এ বিষয়ে নিষ্পাপ এবং পবিত্র হও, তবে শীঘ্রই আল্লাহ তা‘আলা তোমার পবিত্রতার বিষয়ে ঘোষণা করবেন। আর যদি তোমার দ্বারা কোন পাপ হয়েই থাকে তবে তুমি আল্লাহর কাছে মার্জনা প্রার্থনা এবং তাওবাহ্ করো। কেননা বান্দা পাপ স্বীকার করে তাওবাহ্ করলে আল্লাহ তার তাওবাহ্ গ্রহণ করেন। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর কথা সমাপ্ত করলেন, তখন আমার অশ্রুধারা বন্ধ হয়ে গেল। এমনকি তারপর আর এক ফোটা অশ্রুও আমি অনুভব করলাম না। তারপর আমি আমার পিতাকে বললাম, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা বললেন, আমার তরফ হতে তার উত্তর দিন। তিনিও বললেন, আল্লাহর শপথ! রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কি উত্তর দিব, আমার তা অজানা। এরপর আমি আমার মাকে বললাম, আমার তরফ হতে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উত্তর দিন। তিনি বললেন, আল্লাহ্র শপথ! রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কি উত্তর দিব, আমি তা জানি না। আমি বললাম, তখন আমি ছিলাম কম বয়সী কিশোরী। কুরআন মাজীদও অধিক পাঠ করতে পারতাম না। এ অবস্থা দেখে আমিই তখন বললাম, আল্লাহ শপথ! আমি জানি, আপনারা এ অপবাদের কথা শুনেছেন, মনে তা গেঁথে গেছে এবং আপনারা তা বিশ্বাস করে নিয়েছেন। কাজেই এখন যদি আমি বলি, আমি নিষ্কলুষ তবে এ বিষয়ে আপনারা আমাকে বিশ্বাস করবেন না। আর যদি আমি মেনে নেই, যে সম্পর্কে আল্লাহ জানেন যে, আমি নিষ্পাপ, তবে আপনারা তা বিশ্বাস করবেন। আল্লাহর শপথ! আমার ও আপনাদের জন্য (নাবী) ইউসুফ (‘আঃ)-এর পিতার কথার দৃষ্টান্ত ছাড়া ভিন্ন কোন দৃষ্টান্ত আমার দৃষ্টিতে পড়ে না। তিনি বলেছিলেন, “কাজেই পরিপূর্ণ ধৈর্যই উত্তম, তোমরা যা বলছো সে ব্যাপারে একমাত্র আল্লাহই আমার আশ্রয়স্থল।” তিনি [‘আয়িশাহ (রাঃ)] বলেন, অতঃপর আমি মুখ ফিরিয়ে নিলাম এবং বিছানায় শুয়ে পড়লাম। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, আল্লাহর শপথ! আল্লাহ তো ঐ সময়েও জানেন যে, নিশ্চয়ই আমি নিষ্পাপ এবং নিশ্চয়ই আল্লাহ তা‘আলা আমার পবিত্রতা উন্মোচন করে দিবেন। কিন্তু আল্লাহর শপথ! আমি মনে করিনি যে, আল্লাহ তা‘আলা আমার এ ব্যাপারে ওয়াহী অবতীর্ণ করবেন, যা পড়া হবে। কেননা আমার ব্যাপারে পড়ার মতো আল্লাহর পক্ষ থেকে কোন আয়াত অবতীর্ণ করা হবে আমার অবস্থা তার চেয়ে বেশি নিম্নমানের বলে আমি মনে করতাম। তবে আমি প্রত্যাশা করেছিলাম যে, স্বপ্নের মধ্যে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন কোন বিষয় দেখবেন যার মাধ্যমে আল্লাহ তা‘আলা আমার পবিত্রতা প্রকাশ করে দিবেন। ‘আয়িশাহ্ সিদ্দীকা (রাঃ) বলেন, আল্লাহ শপথ! রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখনো তাঁর জায়গা ছেড়ে যাননি এবং গৃহের লোকও কেউ বাইরে যায়নি। এমতাবস্থায় আল্লাহ তা‘আলা তাঁর নাবীর উপর ওয়াহী অবতীর্ণ করেন। ওয়াহী অবতীর্ণের প্রাক্কালে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর যে যন্ত্রণাদায়ক অবস্থা দেখা দিত তার অনুরূপ অবস্থা দেখা দিলো। এমনকি তাঁর প্রতি অবতীর্ণকৃত বাণীর ওযনের কারণে প্রচণ্ড শৈত্যপ্রবাহের দিনেও তাঁর শরীর হতে মুক্তার মতো বিন্দু বিন্দু ঘাম ঝরে পড়তো। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এ যন্ত্রণাদায়ক অবস্থা চলে গেলে তিনি হাসতে লাগলেন এবং প্রথমে যে কথাটি বললেন তা হলো : হে ‘আয়িশাহ্! সুসংবাদ গ্রহণ করো। আল্লাহ তোমার পবিত্রতা ঘোষণা করেছেন। এ কথা শুনে আমার মা আমাকে বললেন, তুমি উঠে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-সে সম্মান প্রদর্শন করো। আমি বললাম, আমি তাঁর প্রতি সম্মান প্রদর্শন করবো না এবং আল্লাহ ব্যতীত আর কারো প্রশংসা করবো না। তিনিই আমার পবিত্রতার ব্যাপারে আয়াত নাযিল করেছেন। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, আল্লাহ তা‘আলা আমার পবিত্রতার ব্যাপারে দশটি আয়াত (সূরাহ্ আন্ নূর ২৪ : ১১-২১) অবতীর্ণ করেছেন। “যারা অপবাদ রটনা করেছে তারা তো তোমাদেরই একটি দল, একে তোমরা তোমাদের জন্যে ক্ষতিকর মনে করো না; বরং এ তো তোমাদের জন্য কল্যাণকর।” ..... ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, আত্মীয়তার বন্ধন ও দারিদ্রের কারণে আবূ বকর সিদ্দীক (রাঃ) মিসতাহ্কে আর্থিক সাহায্য করতেন। কিন্তু ‘আয়িশাহ্ সম্বন্ধে সে যা বলেছিল সে কারণে আবূ বকর (রাঃ) শপথ করে বসলেন, আল্লাহ্র শপথ! আমি আর কোন সময় মিসতাহ্কে আর্থিক সহযোগিতা দিব না। তখন আল্লাহ তা‘আলা নাযিল করলেন : “তোমাদের মাঝে যারা ঐশ্বর্য ও প্রাচুর্যের অধিকারী তারা যেন কসম না করে যে, তারা দান করবে না আত্মীয়-স্বজনকে .....। তোমরা কি চাও না যে, আল্লাহ তোমাদের মাফ করেন”..... পর্যন্ত। হাব্বান ইবনু মূসা (রহঃ) বলেন, ‘আবদুল্লাহ ইবনু মুবারক (রহঃ) বলেছেন, আল-কুরআনের মধ্যে এ আয়াতটিই অধিক আশাব্যঞ্জক। তারপর আবূ বকর সিদ্দীক (রাঃ) বললেন, আল্লাহ শপথ! আমি অবশ্যই ভালোবাসি যে, আল্লাহ আমাকে মাফ করে দিন। এরপর মিসতাহ্ (রাঃ)-এর জন্যে যে পরিমাণ অর্থ ব্যয় করতেন তা পুনরায় খরচ করতে শুরু করলেন। আর বললেন, তাকে আমি এ অর্থ দেয়া কোন সময় বন্ধ করবো না। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রী যাইনাব বিন্ত জাহ্শ (রহঃ)-কে আমার সম্পর্কে প্রশ্ন করেছিলেন, তিনি যাইনাবকে বলেছিলেন, তুমি ‘আয়িশাহ্ সম্বন্ধে কি জানো বা দেখেছো? জবাবে তিনি বললেন, হে আল্লাহর রসূল! আমি আমার কান ও চোখকে হিফাযাত করেছি। আল্লাহর শপথ! তাঁর ব্যাপারে আমি উত্তম ব্যতীত কিছুই জানি না। ‘আয়িশা (রাঃ) বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীদের মাঝে তিনিই আমার প্রতিদ্বন্দ্বী ছিলেন। কিন্তু আল্লাহ ভীতির মাধ্যমে আল্লাহ তাঁকে হিফাযাত করেছেন। অথচ তাঁর বোন হামানাহ্ বিন্ত জাহ্শ তাঁর পক্ষাবলম্বন করে ঝগড়া করে, আর এভাবে সে ক্ষতিগ্রস্তদের মধ্যে ক্ষতিগ্রস্ত হয়ে যায়। রাবী যুহরী (রহঃ) বলেন, ঐ লোকদের নিকট থেকে আমাদের কাছে যা পৌঁছেছে তা এ হাদীস। তবে রাবী ইউনুসের হাদীসের মধ্যে রয়েছে, ‘গোত্রীয় আত্মম্ভরিতা তাকে উত্তেজিত করে।’ (ই.ফা. ৬৭৬৩, ই.সে. ৬৮১৮)
حدثنا حبان بن موسى، أخبرنا عبد الله بن المبارك، أخبرنا يونس بن يزيد، الأيلي ح وحدثنا إسحاق بن إبراهيم الحنظلي، ومحمد بن رافع، وعبد بن حميد، قال ابن رافع حدثنا وقال الآخران، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، والسياق، حديث معمر من رواية عبد وابن رافع قال يونس ومعمر جميعا عن الزهري أخبرني سعيد بن المسيب وعروة بن الزبير وعلقمة بن وقاص وعبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود عن حديث عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم حين قال لها أهل الإفك ما قالوا فبرأها الله مما قالوا وكلهم حدثني طائفة من حديثها وبعضهم كان أوعى لحديثها من بعض وأثبت اقتصاصا وقد وعيت عن كل واحد منهم الحديث الذي حدثني وبعض حديثهم يصدق بعضا ذكروا أن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أراد أن يخرج سفرا أقرع بين نسائه فأيتهن خرج سهمها خرج بها رسول الله صلى الله عليه وسلم معه - قالت عائشة - فأقرع بيننا في غزوة غزاها فخرج فيها سهمي فخرجت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم وذلك بعد ما أنزل الحجاب فأنا أحمل في هودجي وأنزل فيه مسيرنا حتى إذا فرغ رسول الله صلى الله عليه وسلم من غزوه وقفل ودنونا من المدينة آذن ليلة بالرحيل فقمت حين آذنوا بالرحيل فمشيت حتى جاوزت الجيش فلما قضيت من شأني أقبلت إلى الرحل فلمست صدري فإذا عقدي من جزع ظفار قد انقطع فرجعت فالتمست عقدي فحبسني ابتغاؤه وأقبل الرهط الذين كانوا يرحلون لي فحملوا هودجي فرحلوه على بعيري الذي كنت أركب وهم يحسبون أني فيه - قالت - وكانت النساء إذ ذاك خفافا لم يهبلن ولم يغشهن اللحم إنما يأكلن العلقة من الطعام فلم يستنكر القوم ثقل الهودج حين رحلوه ورفعوه وكنت جارية حديثة السن فبعثوا الجمل وساروا ووجدت عقدي بعد ما استمر الجيش فجئت منازلهم وليس بها داع ولا مجيب فتيممت منزلي الذي كنت فيه وظننت أن القوم سيفقدوني فيرجعون إلى فبينا أنا جالسة في منزلي غلبتني عيني فنمت وكان صفوان بن المعطل السلمي ثم الذكواني قد عرس من وراء الجيش فادلج فأصبح عند منزلي فرأى سواد إنسان نائم فأتاني فعرفني حين رآني وقد كان يراني قبل أن يضرب الحجاب على فاستيقظت باسترجاعه حين عرفني فخمرت وجهي بجلبابي ووالله ما يكلمني كلمة ولا سمعت منه كلمة غير استرجاعه حتى أناخ راحلته فوطئ على يدها فركبتها فانطلق يقود بي الراحلة حتى أتينا الجيش بعد ما نزلوا موغرين في نحر الظهيرة فهلك من هلك في شأني وكان الذي تولى كبره عبد الله بن أبى ابن سلول فقدمنا المدينة فاشتكيت حين قدمنا المدينة شهرا والناس يفيضون في قول أهل الإفك ولا أشعر بشىء من ذلك وهو يريبني في وجعي أني لا أعرف من رسول الله صلى الله عليه وسلم اللطف الذي كنت أرى منه حين أشتكي إنما يدخل رسول الله صلى الله عليه وسلم فيسلم ثم يقول " كيف تيكم " . فذاك يريبني ولا أشعر بالشر حتى خرجت بعد ما نقهت وخرجت معي أم مسطح قبل المناصع وهو متبرزنا ولا نخرج إلا ليلا إلى ليل وذلك قبل أن نتخذ الكنف قريبا من بيوتنا وأمرنا أمر العرب الأول في التنزه وكنا نتأذى بالكنف أن نتخذها عند بيوتنا فانطلقت أنا وأم مسطح وهي بنت أبي رهم بن المطلب بن عبد مناف وأمها ابنة صخر بن عامر خالة أبي بكر الصديق وابنها مسطح بن أثاثة بن عباد بن المطلب فأقبلت أنا وبنت أبي رهم قبل بيتي حين فرغنا من شأننا فعثرت أم مسطح في مرطها فقالت تعس مسطح . فقلت لها بئس ما قلت أتسبين رجلا قد شهد بدرا . قالت أى هنتاه أولم تسمعي ما قال قلت وماذا قال قالت فأخبرتني بقول أهل الإفك فازددت مرضا إلى مرضي فلما رجعت إلى بيتي فدخل على رسول الله صلى الله عليه وسلم فسلم ثم قال " كيف تيكم " . قلت أتأذن لي أن آتي أبوى قالت وأنا حينئذ أريد أن أتيقن الخبر من قبلهما . فأذن لي رسول الله صلى الله عليه وسلم فجئت أبوى فقلت لأمي يا أمتاه ما يتحدث الناس فقالت يا بنية هوني عليك فوالله لقلما كانت امرأة قط وضيئة عند رجل يحبها ولها ضرائر إلا كثرن عليها - قالت - قلت سبحان الله وقد تحدث الناس بهذا قالت فبكيت تلك الليلة حتى أصبحت لا يرقأ لي دمع ولا أكتحل بنوم ثم أصبحت أبكي ودعا رسول الله صلى الله عليه وسلم علي بن أبي طالب وأسامة بن زيد حين استلبث الوحى يستشيرهما في فراق أهله - قالت - فأما أسامة بن زيد فأشار على رسول الله صلى الله عليه وسلم بالذي يعلم من براءة أهله وبالذي يعلم في نفسه لهم من الود فقال يا رسول الله هم أهلك ولا نعلم إلا خيرا . وأما علي بن أبي طالب فقال لم يضيق الله عليك والنساء سواها كثير وإن تسأل الجارية تصدقك - قالت - فدعا رسول الله صلى الله عليه وسلم بريرة فقال " أى بريرة هل رأيت من شىء يريبك من عائشة " . قالت له بريرة والذي بعثك بالحق إن رأيت عليها أمرا قط أغمصه عليها أكثر من أنها جارية حديثة السن تنام عن عجين أهلها فتأتي الداجن فتأكله - قالت - فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم على المنبر فاستعذر من عبد الله بن أبى ابن سلول - قالت - فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو على المنبر " يا معشر المسلمين من يعذرني من رجل قد بلغ أذاه في أهل بيتي فوالله ما علمت على أهلي إلا خيرا ولقد ذكروا رجلا ما علمت عليه إلا خيرا وما كان يدخل على أهلي إلا معي " . فقام سعد بن معاذ الأنصاري فقال أنا أعذرك منه يا رسول الله إن كان من الأوس ضربنا عنقه وإن كان من إخواننا الخزرج أمرتنا ففعلنا أمرك - قالت - فقام سعد بن عبادة وهو سيد الخزرج وكان رجلا صالحا ولكن اجتهلته الحمية فقال لسعد بن معاذ كذبت لعمر الله لا تقتله ولا تقدر على قتله . فقام أسيد بن حضير وهو ابن عم سعد بن معاذ فقال لسعد بن عبادة كذبت لعمر الله لنقتلنه فإنك منافق تجادل عن المنافقين فثار الحيان الأوس والخزرج حتى هموا أن يقتتلوا ورسول الله صلى الله عليه وسلم قائم على المنبر فلم يزل رسول الله صلى الله عليه وسلم يخفضهم حتى سكتوا وسكت - قالت - وبكيت يومي ذلك لا يرقأ لي دمع ولا أكتحل بنوم ثم بكيت ليلتي المقبلة لا يرقأ لي دمع ولا أكتحل بنوم وأبواى يظنان أن البكاء فالق كبدي فبينما هما جالسان عندي وأنا أبكي استأذنت على امرأة من الأنصار فأذنت لها فجلست تبكي - قالت - فبينا نحن على ذلك دخل علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم فسلم ثم جلس - قالت - ولم يجلس عندي منذ قيل لي ما قيل وقد لبث شهرا لا يوحى إليه في شأني بشىء - قالت - فتشهد رسول الله صلى الله عليه وسلم حين جلس ثم قال " أما بعد يا عائشة فإنه قد بلغني عنك كذا وكذا فإن كنت بريئة فسيبرئك الله وإن كنت ألممت بذنب فاستغفري الله وتوبي إليه فإن العبد إذا اعترف بذنب ثم تاب تاب الله عليه " . قالت فلما قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم مقالته قلص دمعي حتى ما أحس منه قطرة فقلت لأبي أجب عني رسول الله صلى الله عليه وسلم فيما قال . فقال والله ما أدري ما أقول لرسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت لأمي أجيبي عني رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت والله ما أدري ما أقول لرسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت وأنا جارية حديثة السن لا أقرأ كثيرا من القرآن إني والله لقد عرفت أنكم قد سمعتم بهذا حتى استقر في نفوسكم وصدقتم به فإن قلت لكم إني بريئة والله يعلم أني بريئة لا تصدقوني بذلك ولئن اعترفت لكم بأمر والله يعلم أني بريئة لتصدقونني وإني والله ما أجد لي ولكم مثلا إلا كما قال أبو يوسف فصبر جميل والله المستعان على ما تصفون . قالت ثم تحولت فاضطجعت على فراشي - قالت - وأنا والله حينئذ أعلم أني بريئة وأن الله مبرئي ببراءتي ولكن والله ما كنت أظن أن ينزل في شأني وحى يتلى ولشأني كان أحقر في نفسي من أن يتكلم الله عز وجل في بأمر يتلى ولكني كنت أرجو أن يرى رسول الله صلى الله عليه وسلم في النوم رؤيا يبرئني الله بها قالت فوالله ما رام رسول الله صلى الله عليه وسلم مجلسه ولا خرج من أهل البيت أحد حتى أنزل الله عز وجل على نبيه صلى الله عليه وسلم فأخذه ما كان يأخذه من البرحاء عند الوحى حتى إنه ليتحدر منه مثل الجمان من العرق في اليوم الشات من ثقل القول الذي أنزل عليه - قالت - فلما سري عن رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يضحك فكان أول كلمة تكلم بها أن قال " أبشري يا عائشة أما الله فقد برأك " . فقالت لي أمي قومي إليه فقلت والله لا أقوم إليه ولا أحمد إلا الله هو الذي أنزل براءتي - قالت - فأنزل الله عز وجل { إن الذين جاءوا بالإفك عصبة منكم} عشر آيات فأنزل الله عز وجل هؤلاء الآيات براءتي - قالت - فقال أبو بكر وكان ينفق على مسطح لقرابته منه وفقره والله لا أنفق عليه شيئا أبدا بعد الذي قال لعائشة . فأنزل الله عز وجل { ولا يأتل أولو الفضل منكم والسعة أن يؤتوا أولي القربى} إلى قوله { ألا تحبون أن يغفر الله لكم} قال حبان بن موسى قال عبد الله بن المبارك هذه أرجى آية في كتاب الله . فقال أبو بكر والله إني لأحب أن يغفر الله لي . فرجع إلى مسطح النفقة التي كان ينفق عليه وقال لا أنزعها منه أبدا . قالت عائشة وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم سأل زينب بنت جحش زوج النبي صلى الله عليه وسلم عن أمري " ما علمت أو ما رأيت " . فقالت يا رسول الله أحمي سمعي وبصري والله ما علمت إلا خيرا . قالت عائشة وهي التي كانت تساميني من أزواج النبي صلى الله عليه وسلم فعصمها الله بالورع وطفقت أختها حمنة بنت جحش تحارب لها فهلكت فيمن هلك . قال الزهري فهذا ما انتهى إلينا من أمر هؤلاء الرهط . وقال في حديث يونس احتملته الحمية .
সহিহ মুসলিম > রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মর্যাদা সন্দেহমুক্ত হওয়া
সহিহ মুসলিম ৬৯১৬
حدثني زهير بن حرب، حدثنا عفان، حدثنا حماد بن سلمة، أخبرنا ثابت، عن أنس، أن رجلا، كان يتهم بأم ولد رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لعلي " اذهب فاضرب عنقه " . فأتاه علي فإذا هو في ركي يتبرد فيها فقال له علي اخرج . فناوله يده فأخرجه فإذا هو مجبوب ليس له ذكر فكف علي عنه ثم أتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال يا رسول الله إنه لمجبوب ما له ذكر
আনাস (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উম্মু ওয়ালাদের (দাসীদের) সঙ্গে এক লোকের প্রতি অভিযোগ আসে। তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘আলী (রাঃ)-কে বললেন, যাও, তার শীরোচ্ছেদ কর। ‘আলী (রাঃ) তার কাছে গিয়ে দেখলেন, সে কূয়ার মধ্যে শরীর ঠাণ্ডা করছে। ‘আলী (রাঃ) তাকে বললেন, বেরিয়ে এসো। সে ‘আলী (রাঃ)-এর দিকে হাত এগিয়ে দিলো। তিনি তাকে বের করলেন এবং দেখলেন, তার পুরুষাঙ্গ সম্পূর্ণ কাটা, তার লিঙ্গ নেই। তখন ‘আলী (রাঃ) তাকে হত্যা করা হতে বিরত থাকলেন। তারপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন, হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! সে তো লিঙ্গকাটা, তার যে লিঙ্গ নেই। (ই.ফা. ৬৭৬৬, ই.সে. ৬৮২১)
আনাস (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উম্মু ওয়ালাদের (দাসীদের) সঙ্গে এক লোকের প্রতি অভিযোগ আসে। তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘আলী (রাঃ)-কে বললেন, যাও, তার শীরোচ্ছেদ কর। ‘আলী (রাঃ) তার কাছে গিয়ে দেখলেন, সে কূয়ার মধ্যে শরীর ঠাণ্ডা করছে। ‘আলী (রাঃ) তাকে বললেন, বেরিয়ে এসো। সে ‘আলী (রাঃ)-এর দিকে হাত এগিয়ে দিলো। তিনি তাকে বের করলেন এবং দেখলেন, তার পুরুষাঙ্গ সম্পূর্ণ কাটা, তার লিঙ্গ নেই। তখন ‘আলী (রাঃ) তাকে হত্যা করা হতে বিরত থাকলেন। তারপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন, হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! সে তো লিঙ্গকাটা, তার যে লিঙ্গ নেই। (ই.ফা. ৬৭৬৬, ই.সে. ৬৮২১)
حدثني زهير بن حرب، حدثنا عفان، حدثنا حماد بن سلمة، أخبرنا ثابت، عن أنس، أن رجلا، كان يتهم بأم ولد رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لعلي " اذهب فاضرب عنقه " . فأتاه علي فإذا هو في ركي يتبرد فيها فقال له علي اخرج . فناوله يده فأخرجه فإذا هو مجبوب ليس له ذكر فكف علي عنه ثم أتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال يا رسول الله إنه لمجبوب ما له ذكر