সহিহ মুসলিম > যী-কারাদ ও অন্যান্য যুদ্ধ

সহিহ মুসলিম ৪৫৬৯

حدثنا قتيبة بن سعيد، حدثنا حاتم، - يعني ابن إسماعيل - عن يزيد بن أبي، عبيد قال سمعت سلمة بن الأكوع، يقول خرجت قبل أن يؤذن، بالأولى وكانت لقاح رسول الله صلى الله عليه وسلم ترعى بذي قرد - قال - فلقيني غلام لعبد الرحمن بن عوف فقال أخذت لقاح رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت من أخذها قال غطفان قال فصرخت ثلاث صرخات يا صباحاه ‏.‏ قال فأسمعت ما بين لابتى المدينة ثم اندفعت على وجهي حتى أدركتهم بذي قرد وقد أخذوا يسقون من الماء فجعلت أرميهم بنبلي وكنت راميا وأقول أنا ابن الأكوع واليوم يوم الرضع فأرتجز حتى استنقذت اللقاح منهم واستلبت منهم ثلاثين بردة - قال - وجاء النبي صلى الله عليه وسلم والناس فقلت يا نبي الله إني قد حميت القوم الماء وهم عطاش فابعث إليهم الساعة فقال ‏ "‏ يا ابن الأكوع ملكت فأسجح ‏"‏ ‏.‏ - قال - ثم رجعنا ويردفني رسول الله صلى الله عليه وسلم على ناقته حتى دخلنا المدينة ‏.‏

সালামাহ্‌ ইবনু আকওয়া’ (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

তিনি বলেন, আমি ফাজ্‌রের আযানের আগেই বের হয়ে পড়লাম। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর দুধের উট্‌নী তখন যীকারাদের (চারণ ভূমিতে) চরছিল। তখন ‘আবদুর রহমান ইবনু ‘আওফ (রাঃ)-এর গোলাম আমার সাথে সাক্ষাৎ করে বলল, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর দুধের উট্‌নীসমূহকে নিয়ে গেছে। আমি জিজ্ঞেস করলাম, কে সেগুলো নিয়ে গেছে? সে বলল, গাফ্‌তান গোত্রের লোকেরা। রাবী বলেন, তখন আমি উচ্চৈঃস্বরে তিনবার আওয়াজ দিলাম; সাহায্য চাই, সাহায্য চাই। রাবী (সালামাহ্‌ ইবনু আক্‌ওয়া’) বলেন, মাদীনার উভয় প্রান্তের মধ্যবর্তী সবাইকে আমি আমার সে আওয়াজ শুনালাম তারপর বের হয়ে গেলাম। যী-কারাদে গিয়ে তাদের (লুটেরাদের)-কে পেলাম। তখন তারা তাদের পশুদেরকে পানি পান করাচ্ছিল। তখন আমি তীর নিক্ষেপ করতে শুরু করলাম। আমি ছিলাম একজন দক্ষ তীরন্দাজ। আর তখন আমি বীরত্বসূচক কবিতা আবৃত্তি করছিলাম, “আমি আক্‌ওয়া’র পুত্র, আজ দুষ্টদের ধ্বংসের দিন।” (কিংবা আজ তার দিন যে শৈশব থেকে যুদ্ধের স্তন্য পান করেছে)। আমি আমার তীর নিক্ষেপ ও বীরত্বব্যঞ্জক কবিতা আবৃত্তি করতে থাকলাম। অবশেষে আমি দুধের উট্‌নীসমূহ মুক্ত করলাম এমনকি আমি তাদের ত্রিশটি চাদরও ছিনিয়ে নিলাম। এমন সময় রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও লোকজন এসে পড়লেন। তখন আমি বললাম, “হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ! আমি তাদের পানির পথ রুদ্ধ করে রেখেছি, তাই তারা পিপাসার্ত। এবার আপনি একটি বাহিনী প্রেরণ করুন। তখন তিনি (রসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আকওয়া’, এ সময় যা নেয়ার ছিল তুমি তা নিয়েছ। এবার ছেড়ে দাও। রাবী বলেন, তারপর আমরা ফিরে এলাম। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তাঁরই উট্‌নির পিছনে বসিয়ে নিলেন। তারপর আমরা মাদীনায় পৌঁছলাম। (ই.ফা. ৪৫২৬, ই.সে. ৪৫২৮)

সালামাহ্‌ ইবনু আকওয়া’ (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

তিনি বলেন, আমি ফাজ্‌রের আযানের আগেই বের হয়ে পড়লাম। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর দুধের উট্‌নী তখন যীকারাদের (চারণ ভূমিতে) চরছিল। তখন ‘আবদুর রহমান ইবনু ‘আওফ (রাঃ)-এর গোলাম আমার সাথে সাক্ষাৎ করে বলল, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর দুধের উট্‌নীসমূহকে নিয়ে গেছে। আমি জিজ্ঞেস করলাম, কে সেগুলো নিয়ে গেছে? সে বলল, গাফ্‌তান গোত্রের লোকেরা। রাবী বলেন, তখন আমি উচ্চৈঃস্বরে তিনবার আওয়াজ দিলাম; সাহায্য চাই, সাহায্য চাই। রাবী (সালামাহ্‌ ইবনু আক্‌ওয়া’) বলেন, মাদীনার উভয় প্রান্তের মধ্যবর্তী সবাইকে আমি আমার সে আওয়াজ শুনালাম তারপর বের হয়ে গেলাম। যী-কারাদে গিয়ে তাদের (লুটেরাদের)-কে পেলাম। তখন তারা তাদের পশুদেরকে পানি পান করাচ্ছিল। তখন আমি তীর নিক্ষেপ করতে শুরু করলাম। আমি ছিলাম একজন দক্ষ তীরন্দাজ। আর তখন আমি বীরত্বসূচক কবিতা আবৃত্তি করছিলাম, “আমি আক্‌ওয়া’র পুত্র, আজ দুষ্টদের ধ্বংসের দিন।” (কিংবা আজ তার দিন যে শৈশব থেকে যুদ্ধের স্তন্য পান করেছে)। আমি আমার তীর নিক্ষেপ ও বীরত্বব্যঞ্জক কবিতা আবৃত্তি করতে থাকলাম। অবশেষে আমি দুধের উট্‌নীসমূহ মুক্ত করলাম এমনকি আমি তাদের ত্রিশটি চাদরও ছিনিয়ে নিলাম। এমন সময় রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও লোকজন এসে পড়লেন। তখন আমি বললাম, “হে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ! আমি তাদের পানির পথ রুদ্ধ করে রেখেছি, তাই তারা পিপাসার্ত। এবার আপনি একটি বাহিনী প্রেরণ করুন। তখন তিনি (রসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আকওয়া’, এ সময় যা নেয়ার ছিল তুমি তা নিয়েছ। এবার ছেড়ে দাও। রাবী বলেন, তারপর আমরা ফিরে এলাম। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তাঁরই উট্‌নির পিছনে বসিয়ে নিলেন। তারপর আমরা মাদীনায় পৌঁছলাম। (ই.ফা. ৪৫২৬, ই.সে. ৪৫২৮)

حدثنا قتيبة بن سعيد، حدثنا حاتم، - يعني ابن إسماعيل - عن يزيد بن أبي، عبيد قال سمعت سلمة بن الأكوع، يقول خرجت قبل أن يؤذن، بالأولى وكانت لقاح رسول الله صلى الله عليه وسلم ترعى بذي قرد - قال - فلقيني غلام لعبد الرحمن بن عوف فقال أخذت لقاح رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت من أخذها قال غطفان قال فصرخت ثلاث صرخات يا صباحاه ‏.‏ قال فأسمعت ما بين لابتى المدينة ثم اندفعت على وجهي حتى أدركتهم بذي قرد وقد أخذوا يسقون من الماء فجعلت أرميهم بنبلي وكنت راميا وأقول أنا ابن الأكوع واليوم يوم الرضع فأرتجز حتى استنقذت اللقاح منهم واستلبت منهم ثلاثين بردة - قال - وجاء النبي صلى الله عليه وسلم والناس فقلت يا نبي الله إني قد حميت القوم الماء وهم عطاش فابعث إليهم الساعة فقال ‏ "‏ يا ابن الأكوع ملكت فأسجح ‏"‏ ‏.‏ - قال - ثم رجعنا ويردفني رسول الله صلى الله عليه وسلم على ناقته حتى دخلنا المدينة ‏.‏


সহিহ মুসলিম ৪৫৭২

وحدثنا أحمد بن يوسف الأزدي السلمي، حدثنا النضر بن محمد، عن عكرمة بن، عمار بهذا ‏.‏

‘ইকরামাহ ইবনু ‘আম্মার (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

‘ইকরামাহ ইবনু ‘আম্মার (রাঃ) -এর সূত্রে এ হাদীস বর্ণনা করেছেন। (ই.ফা ৪৫২৮, ই.সে. ৪৫৩০)

‘ইকরামাহ ইবনু ‘আম্মার (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

‘ইকরামাহ ইবনু ‘আম্মার (রাঃ) -এর সূত্রে এ হাদীস বর্ণনা করেছেন। (ই.ফা ৪৫২৮, ই.সে. ৪৫৩০)

وحدثنا أحمد بن يوسف الأزدي السلمي، حدثنا النضر بن محمد، عن عكرمة بن، عمار بهذا ‏.‏


সহিহ মুসলিম ৪৫৭১

قال إبراهيم حدثنا محمد بن يحيى، حدثنا عبد الصمد بن عبد الوارث، عن عكرمة، بن عمار بهذا الحديث بطوله

‘ইকরামাহ ইবনু আম্মার (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

‘ইকরামাহ ইবনু আম্মার (রাঃ) -এর সূত্রেও এ হাদীস বর্ণনা করেছেন। (ই.ফা. ৪৫২৭, ই.সে. ৪৫৩০)

‘ইকরামাহ ইবনু আম্মার (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

‘ইকরামাহ ইবনু আম্মার (রাঃ) -এর সূত্রেও এ হাদীস বর্ণনা করেছেন। (ই.ফা. ৪৫২৭, ই.সে. ৪৫৩০)

قال إبراهيم حدثنا محمد بن يحيى، حدثنا عبد الصمد بن عبد الوارث، عن عكرمة، بن عمار بهذا الحديث بطوله


সহিহ মুসলিম ৪৫৭০

حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة، حدثنا هاشم بن القاسم، ح وحدثنا إسحاق بن، إبراهيم أخبرنا أبو عامر العقدي، كلاهما عن عكرمة بن عمار، ح وحدثنا عبد الله بن، عبد الرحمن الدارمي - وهذا حديثه - أخبرنا أبو علي الحنفي، عبيد الله بن عبد المجيد حدثنا عكرمة، - وهو ابن عمار - حدثني إياس بن سلمة، حدثني أبي قال، قدمنا الحديبية مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ونحن أربع عشرة مائة وعليها خمسون شاة لا ترويها - قال - فقعد رسول الله صلى الله عليه وسلم على جبا الركية فإما دعا وإما بسق فيها - قال - فجاشت فسقينا واستقينا ‏.‏ قال ثم إن رسول الله صلى الله عليه وسلم دعانا للبيعة في أصل الشجرة ‏.‏ قال فبايعته أول الناس ثم بايع وبايع حتى إذا كان في وسط من الناس قال ‏"‏ بايع يا سلمة ‏"‏ ‏.‏ قال قلت قد بايعتك يا رسول الله في أول الناس قال ‏"‏ وأيضا ‏"‏ ‏.‏ قال ورآني رسول الله صلى الله عليه وسلم عزلا - يعني ليس معه سلاح - قال فأعطاني رسول الله صلى الله عليه وسلم حجفة أو درقة ثم بايع حتى إذا كان في آخر الناس قال ‏"‏ ألا تبايعني يا سلمة ‏"‏ ‏.‏ قال قلت قد بايعتك يا رسول الله في أول الناس وفي أوسط الناس قال ‏"‏ وأيضا ‏"‏ ‏.‏ قال فبايعته الثالثة ثم قال لي ‏"‏ يا سلمة أين حجفتك أو درقتك التي أعطيتك ‏"‏ ‏.‏ قال قلت يا رسول الله لقيني عمي عامر عزلا فأعطيته إياها - قال - فضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال ‏"‏ إنك كالذي قال الأول اللهم أبغني حبيبا هو أحب إلى من نفسي ‏"‏ ‏.‏ ثم إن المشركين راسلونا الصلح حتى مشى بعضنا في بعض واصطلحنا ‏.‏ قال وكنت تبيعا لطلحة بن عبيد الله أسقي فرسه وأحسه وأخدمه وآكل من طعامه وتركت أهلي ومالي مهاجرا إلى الله ورسوله صلى الله عليه وسلم قال فلما اصطلحنا نحن وأهل مكة واختلط بعضنا ببعض أتيت شجرة فكسحت شوكها فاضطجعت في أصلها - قال - فأتاني أربعة من المشركين من أهل مكة فجعلوا يقعون في رسول الله صلى الله عليه وسلم فأبغضتهم فتحولت إلى شجرة أخرى وعلقوا سلاحهم واضطجعوا فبينما هم كذلك إذ نادى مناد من أسفل الوادي يا للمهاجرين قتل ابن زنيم ‏.‏ قال فاخترطت سيفي ثم شددت على أولئك الأربعة وهم رقود فأخذت سلاحهم ‏.‏ فجعلته ضغثا في يدي قال ثم قلت والذي كرم وجه محمد لا يرفع أحد منكم رأسه إلا ضربت الذي فيه عيناه ‏.‏ قال ثم جئت بهم أسوقهم إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم - قال - وجاء عمي عامر برجل من العبلات يقال له مكرز ‏.‏ يقوده إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم على فرس مجفف في سبعين من المشركين فنظر إليهم رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال ‏"‏ دعوهم يكن لهم بدء الفجور وثناه ‏"‏ فعفا عنهم رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنزل الله ‏{‏ وهو الذي كف أيديهم عنكم وأيديكم عنهم ببطن مكة من بعد أن أظفركم عليهم‏}‏ الآية كلها ‏.‏ قال ثم خرجنا راجعين إلى المدينة فنزلنا منزلا بيننا وبين بني لحيان جبل وهم المشركون فاستغفر رسول الله صلى الله عليه وسلم لمن رقي هذا الجبل الليلة كأنه طليعة للنبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه - قال سلمة - فرقيت تلك الليلة مرتين أو ثلاثا ثم قدمنا المدينة فبعث رسول الله صلى الله عليه وسلم بظهره مع رباح غلام رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا معه وخرجت معه بفرس طلحة أنديه مع الظهر فلما أصبحنا إذا عبد الرحمن الفزاري قد أغار على ظهر رسول الله صلى الله عليه وسلم فاستاقه أجمع وقتل راعيه قال فقلت يا رباح خذ هذا الفرس فأبلغه طلحة بن عبيد الله وأخبر رسول الله صلى الله عليه وسلم أن المشركين قد أغاروا على سرحه - قال - ثم قمت على أكمة فاستقبلت المدينة فناديت ثلاثا يا صباحاه ‏.‏ ثم خرجت في آثار القوم أرميهم بالنبل وأرتجز أقول أنا ابن الأكوع واليوم يوم الرضع فألحق رجلا منهم فأصك سهما في رحله حتى خلص نصل السهم إلى كتفه - قال - قلت خذها وأنا ابن الأكوع واليوم يوم الرضع قال فوالله ما زلت أرميهم وأعقر بهم فإذا رجع إلى فارس أتيت شجرة فجلست في أصلها ثم رميته فعقرت به حتى إذا تضايق الجبل فدخلوا في تضايقه علوت الجبل فجعلت أرديهم بالحجارة - قال - فما زلت كذلك أتبعهم حتى ما خلق الله من بعير من ظهر رسول الله صلى الله عليه وسلم إلا خلفته وراء ظهري وخلوا بيني وبينه ثم اتبعتهم أرميهم حتى ألقوا أكثر من ثلاثين بردة وثلاثين رمحا يستخفون ولا يطرحون شيئا إلا جعلت عليه آراما من الحجارة يعرفها رسول الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه حتى أتوا متضايقا من ثنية فإذا هم قد أتاهم فلان بن بدر الفزاري فجلسوا يتضحون - يعني يتغدون - وجلست على رأس قرن قال الفزاري ما هذا الذي أرى قالوا لقينا من هذا البرح والله ما فارقنا منذ غلس يرمينا حتى انتزع كل شىء في أيدينا ‏.‏ قال فليقم إليه نفر منكم أربعة ‏.‏ قال فصعد إلى منهم أربعة في الجبل - قال - فلما أمكنوني من الكلام - قال - قلت هل تعرفوني قالوا لا ومن أنت قال قلت أنا سلمة بن الأكوع والذي كرم وجه محمد صلى الله عليه وسلم لا أطلب رجلا منكم إلا أدركته ولا يطلبني رجل منكم ‏.‏ فيدركني قال أحدهم أنا أظن ‏.‏ قال فرجعوا فما برحت مكاني حتى رأيت فوارس رسول الله صلى الله عليه وسلم يتخللون الشجر - قال - فإذا أولهم الأخرم الأسدي على إثره أبو قتادة الأنصاري وعلى إثره المقداد بن الأسود الكندي - قال - فأخذت بعنان الأخرم - قال - فولوا مدبرين قلت يا أخرم احذرهم لا يقتطعوك حتى يلحق رسول الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه ‏.‏ قال يا سلمة إن كنت تؤمن بالله واليوم الآخر وتعلم أن الجنة حق والنار حق فلا تحل بيني وبين الشهادة ‏.‏ قال فخليته فالتقى هو وعبد الرحمن - قال - فعقر بعبد الرحمن فرسه وطعنه عبد الرحمن فقتله وتحول على فرسه ولحق أبو قتادة فارس رسول الله صلى الله عليه وسلم بعبد الرحمن فطعنه فقتله فوالذي كرم وجه محمد صلى الله عليه وسلم لتبعتهم أعدو على رجلى حتى ما أرى ورائي من أصحاب محمد صلى الله عليه وسلم ولا غبارهم شيئا حتى يعدلوا قبل غروب الشمس إلى شعب فيه ماء يقال له ذو قرد ليشربوا منه وهم عطاش - قال - فنظروا إلى أعدو وراءهم فحليتهم عنه - يعني أجليتهم عنه - فما ذاقوا منه قطرة - قال - ويخرجون فيشتدون في ثنية - قال - فأعدو فألحق رجلا منهم فأصكه بسهم في نغض كتفه ‏.‏ قال قلت خذها وأنا ابن الأكوع واليوم يوم الرضع قال يا ثكلته أمه أكوعه بكرة قال قلت نعم يا عدو نفسه أكوعك بكرة - قال - وأردوا فرسين على ثنية قال فجئت بهما أسوقهما إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم - قال - ولحقني عامر بسطيحة فيها مذقة من لبن وسطيحة فيها ماء فتوضأت وشربت ثم أتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو على الماء الذي حليتهم عنه فإذا رسول الله صلى الله عليه وسلم قد أخذ تلك الإبل وكل شىء استنقذته من المشركين وكل رمح وبردة وإذا بلال نحر ناقة من الإبل الذي استنقذت من القوم وإذا هو يشوي لرسول الله صلى الله عليه وسلم من كبدها وسنامها - قال - قلت يا رسول الله خلني فأنتخب من القوم مائة رجل فأتبع القوم فلا يبقى منهم مخبر إلا قتلته - قال - فضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى بدت نواجذه في ضوء النار فقال ‏"‏ يا سلمة أتراك كنت فاعلا ‏"‏ ‏.‏ قلت نعم والذي أكرمك ‏.‏ فقال ‏"‏ إنهم الآن ليقرون في أرض غطفان ‏"‏ ‏.‏ قال فجاء رجل من غطفان فقال نحر لهم فلان جزورا فلما كشفوا جلدها رأوا غبارا فقالوا أتاكم القوم فخرجوا هاربين ‏.‏ فلما أصبحنا قال رسول الله صلى الله عليه وسلم ‏"‏ كان خير فرساننا اليوم أبو قتادة وخير رجالتنا سلمة ‏"‏ ‏.‏ قال ثم أعطاني رسول الله صلى الله عليه وسلم سهمين سهم الفارس وسهم الراجل فجمعهما لي جميعا ثم أردفني رسول الله صلى الله عليه وسلم وراءه على العضباء راجعين إلى المدينة - قال - فبينما نحن نسير قال وكان رجل من الأنصار لا يسبق شدا - قال - فجعل يقول ألا مسابق إلى المدينة هل من مسابق فجعل يعيد ذلك - قال - فلما سمعت كلامه قلت أما تكرم كريما ولا تهاب شريفا قال لا إلا أن يكون رسول الله صلى الله عليه وسلم قال قلت يا رسول الله بأبي وأمي ذرني فلأسابق الرجل قال ‏"‏ إن شئت ‏"‏ ‏.‏ قال قلت اذهب إليك وثنيت رجلى فطفرت فعدوت - قال - فربطت عليه شرفا أو شرفين أستبقي نفسي ثم عدوت في إثره فربطت عليه شرفا أو شرفين ثم إني رفعت حتى ألحقه - قال - فأصكه بين كتفيه - قال - قلت قد سبقت والله قال أنا أظن ‏.‏ قال فسبقته إلى المدينة قال فوالله ما لبثنا إلا ثلاث ليال حتى خرجنا إلى خيبر مع رسول الله صلى الله عليه وسلم قال فجعل عمي عامر يرتجز بالقوم تالله لولا الله ما اهتدينا ولا تصدقنا ولا صلينا ونحن عن فضلك ما استغنينا فثبت الأقدام إن لاقينا وأنزلن سكينة علينا فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم ‏"‏ من هذا ‏"‏ ‏.‏ قال أنا عامر ‏.‏ قال ‏"‏ غفر لك ربك ‏"‏ ‏.‏ قال وما استغفر رسول الله صلى الله عليه وسلم لإنسان يخصه إلا استشهد ‏.‏ قال فنادى عمر بن الخطاب وهو على جمل له يا نبي الله لولا ما متعتنا بعامر ‏.‏ قال فلما قدمنا خيبر قال خرج ملكهم مرحب يخطر بسيفه ويقول قد علمت خيبر أني مرحب شاكي السلاح بطل مجرب إذا الحروب أقبلت تلهب قال وبرز له عمي عامر فقال قد علمت خيبر أني عامر شاكي السلاح بطل مغامر قال فاختلفا ضربتين فوقع سيف مرحب في ترس عامر وذهب عامر يسفل له فرجع سيفه على نفسه فقطع أكحله فكانت فيها نفسه ‏.‏ قال سلمة فخرجت فإذا نفر من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم يقولون بطل عمل عامر قتل نفسه قال فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم وأنا أبكي فقلت يا رسول الله بطل عمل عامر قال رسول الله صلى الله عليه وسلم ‏"‏ من قال ذلك ‏"‏ ‏.‏ قال قلت ناس من أصحابك ‏.‏ قال ‏"‏ كذب من قال ذلك بل له أجره مرتين ‏"‏ ‏.‏ ثم أرسلني إلى علي وهو أرمد فقال ‏"‏ لأعطين الراية رجلا يحب الله ورسوله أو يحبه الله ورسوله ‏"‏ ‏.‏ قال فأتيت عليا فجئت به أقوده وهو أرمد حتى أتيت به رسول الله صلى الله عليه وسلم فبسق في عينيه فبرأ وأعطاه الراية وخرج مرحب فقال قد علمت خيبر أني مرحب شاكي السلاح بطل مجرب إذا الحروب أقبلت تلهب فقال علي أنا الذي سمتني أمي حيدره كليث غابات كريه المنظره أوفيهم بالصاع كيل السندره قال فضرب رأس مرحب فقتله ثم كان الفتح على يديه ‏.‏

ইয়াস ইবনু সালামাহ্ (রাঃ) তাঁর পিতা থেকে বর্নিতঃ

তিনি বলেন, আমরা রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর সঙ্গে হুদাইবিয়ায় পৌঁছলাম। তখন আমাদের সংখ্যা ছিল চৌদ্দশ’। তদুপরি সেখানে ছিল পঞ্চাশটি বকরী, যাদের পানি পানের জন্য পর্যাপ্ত পানি ছিল না। রাবী বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কূয়ার কিনারায় বসলেন এবং দু’আ করলেন অথবা তাতে থুতু দিলেন। রাবী বলেন, আর অমনি পানি উথ্লে উঠলো। তখন আমরাও পানি পান করলাম এবং (পশুদেরকেও) পানি পান করালাম। রাবী বলেন, তারপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের বাই’আতের জন্য বৃক্ষমূলে ডাকলেন। রাবী বলেন, তারপর লোকদের মধ্যে আমি সর্বাগ্রে বাই’আত হলাম। তারপর একে একে অন্যান্য লোকেরাও বাই’আত হলো। তিনি যখন বাই’আত গ্রহণ করতে করতে লোকজনের মধ্যবর্তী স্থানে পৌঁছলেন, তখন বললেন, হে সালামাহ্! তুমি বাই’আত হও। রাবী বলেন, তখন আমি বললাম, আমি তো, লোকদের মধ্যে প্রথমেই বাই’আত হয়েছি, হে আল্লাহর রসূল! তিনি বললেনঃ আবারও হও না? রাবী বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন আমাকে ঢাল দিয়ে বাই’আত করতে করতে লোকদের শেষ প্রান্তে পৌঁছলেন এবং বললেন, তুমি কি আমার কাছে বাই’আত হবে না, হে সালামাহ্! রাবী বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রসূল! আমি তো লোকদের মধ্যে প্রথমভাগে এবং মধ্যভাগে (দু দু’বার) আপনার কাছে বাই’আত হয়েছি। তিনি বললেনঃ আবারও হও না। তখন আমি তৃতীয় বার বাই’আত গ্রহণ করলাম। এরপর তিনি আমাকে বললেন, হে সালামাহ্! তোমার সে বড় ঢালটি বা ছোট ঢালটি কোথায়, যা আমি তোমাকে দিয়েছিলাম? রাবী (সালামাহ্) বলেন, আমি বললাম : হে আল্লাহর রসূল! আমার চাচা আমির আমার সাথে অস্ত্রবিহীন অবস্থায় দেখা করেছিলেন। তখন আমি তাঁকে তা দিয়ে দিয়েছি। রাবী বলেন, এতে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হেসে দিলেন এবং বললেনঃ তুমি দেখছি পূর্ববর্তীযুগের সে লোকের মত, যে বলেছিল, হে আল্লাহ! আমি এমন একজন বন্ধু চাই, যে আমার প্রানের চাইতেও আমার নিকট বেশি প্রিয় হবে।” এরপরে মুশরিকরা আমাদের কাছে প্রস্তাব পাঠালো। আমাদের একপক্ষের লোকজন অন্যপক্ষের শিবিরে যাতায়াত করতে লাগলো এবং শেষ পর্যন্ত আমরা উভয়পক্ষ পরস্পরে সন্ধিবদ্ধ হলাম। রাবী (সালামাহ্ (রাঃ) বলেন, আমি তালহাহ্ ইবনু ‘উবাইদুল্লাহর খিদমাতে নিয়োজিত ছিলাম। আমি তার ঘোড়াকে পানি পান করাতাম এবং তার পিঠ মালিশ করতাম এবং তাঁর অন্যান্য খিদমাতও করতাম। আমি তাঁর ওখানে খাওয়া-দাওয়া করতাম। নিজের পরিবার-পরিজন ও ধন-সম্পদ পরিত্যাগ করে আল্লাহ তা’আলা ও তাঁর রসূলের রাহে মুহাজির হয়েছি। রাবী বলেন, তারপর যখন আমরা ও মক্কাবাসীরা সন্ধিতে আবদ্ধ হলাম এবং আমাদের একপক্ষ অপরপক্ষের সাথে মিলেমিশে থাকতে লাগলাম। আমি একটি গাছ তলায় গিয়ে তার নীচের কাঁটা প্রভৃতি পরিষ্কার করে তার গোড়ায় একটু শুয়ে পড়ি। এমন সময় মাক্কাবাসী চারজন মুশরিক এসে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্পর্কে আজেবাজে কথা বলতে লাগলো। আমার কাছে ওদের কথাবার্তা অত্যন্ত খারাপ লাগলো এবং আমি স্থান পরিবর্তন করে আর একটি গাছের তলায় চলে গেলাম। তারা তাদের অস্ত্রাদি গাছের সাথে ঝুলিয়ে রেখে শুয়ে পড়লো। এমন সময় প্রান্তরের নিম্নাঞ্চল থেকে কে যেন চীৎকার করে বললো, হে মুহাজিরগণ! ইবনু যুনায়মকে কতল কর। আমি তৎক্ষণাৎ আমার তরবারি উঠিয়ে ধরলাম এবং ঐ চারজনের উপর ধাবিত হলাম। তখন তারা ঘুমিয়ে ছিল। আমি তাদের অস্ত্রগুলো হস্তগত করলাম এবং তা আঁটি বেঁধে আমার হাতে নিলাম। তিনি বলেন, এরপর আমি বললাম, যে মহান সত্তা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে সম্মানিত করেছেন তাঁর কসম! তোমাদের মধ্যে কেউ যদি মাথা তোলো, তবে তার সে অঙ্গে আঘাত করব যেখানে তার চোখ দু’টো রয়েছে। রাবী বলেন, তারপর তাদেরকে আমি হাঁকিয়ে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট পর্যন্ত নিয়ে গেলাম। তিনি বলেন, এমন সময় আমার চাচা আ’মির ‘আবালাত’ গোত্রের একজনকে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট নিয়ে এসেছে। তাকে বলা হতো মিকরিয। সে ছিল বর্ম সজ্জিত একটি ঘোড়ায় আসীন। আর তার সাথে সত্তর জন মুশরিক। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের দিকে তাকালেন এবং বললেনঃ “ওদেরকে ছেড়ে দাও, যাতে আক্রমণ ওদের পক্ষ থেকেই হয় এবং দ্বিতীয়বার তারাই অপরাধী প্রতিপন্ন হয়”। এ কথা বলে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের ক্ষমা করে দিলেন। তখন আল্লাহ তা’আলা নাযিল করলেন : “সে পবিত্র সত্তা যিনি তাদের হাতকে তোমাদের উপর থেকে এবং তোমাদের হাতকে তাদের উপর থেকে মক্কাপ্রান্তরে তাদের উপর তোমাদের বিজয়ী করার পর বিরত রেখেছেন”-(সূরা আন্ নূর ২৪ : ৪৮) আয়াতের শেষ পর্যন্ত। রাবী বলেন, তারপর মাদীনায় প্রত্যাবর্তনের জন্য বেরিয়ে পড়লাম। পথে এমন একটি মানযিলে আমরা অবতরণ করলাম যেখানে আমাদের ও লেহিয়ান গোত্রের মধ্যে কেবল একটি পাহাড়ের ব্যবধান ছিল। আর তারা ছিল মুশরিক। তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সে ব্যক্তির জন্য আল্লাহর দরবারে দু’আ করলেন, যে ব্যক্তি রাতে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীদের পক্ষ থেকে পাহারা দেয়ার জন্য পাহাড়ের উপর আরোহণ করবে। সালামাহ্ বলেন, সে রাতে আমি দুই কি তিনবার ঐ পাহাড়ে আরোহণ করেছিলাম। তারপর আমরা মাদীনায় এলাম। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর গোলাম রাবাহ্কে দিয়ে তাঁর উটসমূহ পাঠালেন। আর আমিও তালহার ঘোড়ায় চড়ে তাঁর সাথে সাথে উটগুলো হাঁকিয়ে চারণ ভূমির দিকে নিয়ে গেলাম। যখন আমাদের ভোর হলো ‘আবদুর রহমান ফাজারী চড়াও হয়ে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সমস্ত উট ছিনিয়ে নিয়ে গেল এবং পশুপালের রাখালকে হত্যা করলো। আমি তখন রাবাহ্কে বললাম, হে রাবাহ্! লও এ ঘোড়া নিয়ে তুমি তালহাহ্ ইবনু ‘উবাইদুল্লাহকে পৌঁছে দিও আর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে সংবাদ দাও যে, মুশরিকরা তাঁর উটগুলো লুটে নিয়ে গেছে। তিনি বলেন, তখন আমি একটি টিলার উপর দাঁড়ালাম। তারপর মাদীনার দিকে মুখ করে তিনবার চিৎকার দিলাম, ইয়া সাবাহা! তারপর আমি লুটেরাদের পিছু ধাওয়া করলাম ও তাদের উপর তীর নিক্ষেপ করতে লাগলাম। আর আমি মুখে এ চরণ উচ্চারণ করছিলাম, “আমি আকওয়া’র পুত্র, আজ সেদিন, আজকে মায়ের দুধ (কতখানি খেয়েছো তা) স্মরণের দিন।” তখন আমি তাদের যে কাউকে পেয়েছি, তার উপর এ রকমভাবে তীর নিক্ষেপ করেছি যে, তীরের অগ্রভাগ তার কাঁধ ছেদ করে বেরিয়েছে। তিনি বলেন, আমি বলতে লাগলাম, “এ আঘাত নাও, আমি আকওয়া’র পুত্র, আজ দুধপান স্মরণের দিন।” তিনি বলেন, আল্লাহর কসম! আমি তীর নিক্ষেপ করতে থাকলাম এবং ঘায়েল করতে লাগলাম এবং যখনই কোন ঘোড় সওয়ার আমার দিকে ফিরত তখনই আমি গাছের আড়ালে এসে তার গোড়ায় বসে তার প্রতি তীর নিক্ষেপ করতাম। আর তাকে যখম করে ফেলতাম। অবশেষে যখন তারা পাহাড়ের সংকীর্ণ পথে আসে এবং তারা সে সংকীর্ণ পথে ঢোকে আমি তখন পাহাড়ের উপর উঠে সেখান থেকে অবিরাম তাদের উপর পাথর নিক্ষেপ করতে থাকলাম। তিনি বলেন, এভাবে আমি তাদের পশ্চাদ্ধাবন করতে থাকলাম যে পর্যন্ত না আল্লাহর সৃষ্ট উটগুলো যা রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর সাওয়ারী হিসেবে ছিল তা আমার পেছনে রেখে না যাই। তারা এগুলো আমার আওতায় ফেলে চলে গেল। তারপরও আমি তাদের অনুসরণ করে তাদের উপর তীর নিক্ষেপ করতে থাকলাম। এমনিকি তারা ত্রিশটির বেশী চাদর এবং ত্রিশটি বল্লম নিজের বোঝা হালকা করার উদ্দেশ্যে ফেলে গেল। তারা যেসব বস্তু ফেলে যাচ্ছিল আমি তার প্রত্যেকটিকে পাথর দ্বারা চিহ্নিত করে যাচ্ছিলাম যাতে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীগণ তা দেখে চিনতে পারেন। অবশেষে তারা পাহাড়ের একটি সংকীর্ণ স্থানে গিয়ে পৌঁছলো। এমন সময় বাদ্র ফাজারীর অমুক পুত্র এসে তাদের সাথে মিলিত হলো। এবার তারা সকলে মিলে সকালের খাবার খেতে বসলো। আমি পাহাড়ের একটি শৃঙ্গে বসে পড়লাম। তখন সে ফাজারী বললো, ঐ যে লোকটিকে দেখছি সে কে? তারা বলল, লোকটির হাতে আমরা অনেক দুর্ভোগ পোহায়েছি। আল্লাহর কসম! রাতের আধাঁর থেকে নিয়ে এ পর্যন্ত লোকটি আমাদের পিছন থেকে সরছে না, সে আমাদের প্রতি অবিরত তীর নিক্ষেপ করছে, এমনকি আমাদের যথাসর্বস্ব সে কেড়ে নিয়েছে। তখন সে বলল, তোমাদের মধ্যকার চারজন উঠে গিয়ে তার উপর চড়াও হও। তখন তাদের চার ব্যক্তি পাহাড়ে উঠে আমার দিকে এগিয়ে এলো। তারপর তারা যখন আমার কথা শোনার মত নিকটবর্তী স্থানে এসে পৌঁছলো, তিনি বলেন, তখন আমি বললাম, তোমরা কি আমাকে চেন? তারা বলল, না। তিনি বলেন, আমি বললাম, আমি সালামাহ্ ইবনু আকওয়া’। কসম সে পবিত্র সত্তার, যিনি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সম্মানিত করেছেন! আমি তোমাদের যাকেই পাই তাকে ধরে ফেলব। কিন্তু তোমাদের কেউ চাইলেই আমাকে ধরতে পারবে না। তখন তাদের একজন বলল, আমিও তাই মনে করি। তিনি বলেন, তারপর তারা ফিরে গেল। আর আমি সে স্থানেই বসে রইলাম। অবশেষে আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর অশ্বারোহীদের গাছ-গাছালির মাঝ দিয়ে অগ্রসর হতে দেখলাম। তিনি বলেন, তাদের মধ্যে সর্বাগ্রে ছিলেন আখরাম আসাদী। তাঁর পিছনে আবু কাতাদাহ্ আনসারী। তাঁর পিছনে মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ কিন্দী। তিনি বলেন, আমি তখন আখরামের ঘোড়ার লাগাম ধরলাম। তিনি বলেন, তখন লুটেরা (শত্রুরা) পৃষ্ঠপ্রদর্শন করে পালিয়ে গেল। আমি বললাম, হে আখরাম! ওদের থেকে সতর্ক থাকবে। তারা যেন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীগণ এসে মিলিত হওয়ার পূর্বেই তোমাদের বিচ্ছিন্ন করে না ফেলে। আখরাম বললেন, হে সালামাহ্! তুমি যদি আল্লাহ ও কিয়ামাতের দিনের প্রতি বিশ্বাসী হও এবং জান্নাত ও জাহান্নামকে সত্য মনে কর তবে আমার এবং শাহাদাতের মধ্যে বাধা সৃষ্টি করো না। সালামাহ্ বলেন, তখন আমি তার পথ ছেড়ে দিলাম। তিনি তখন ‘আবদুর রহমানের সাথে সম্মুখ যুদ্ধে লিপ্ত হলেন। আখরাম ‘আবদুর রহমানের ঘোড়াকে আহত করলেন। আর ‘আবদুর রহমান বর্শার আঘাতে তাকে কতল করে দিল এবং আখরামের ঘোড়ার উপর চড়ে বসলো। ইতোমধ্যে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘোড়সাওয়ার আবু কাতাদাহ্ (রাঃ) এসে পৌঁছলেন। তিনি ‘আবদুর রহমানকে বর্শার আঘাতে হত্যা করলেন। সে পবিত্র সত্তার কসম! যিনি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মর্যাদামন্ডিত করেছেন, আমি তখন এতই দ্রুতগতিতে তাদের পিছু ধাওয়া করে যাচ্ছিলাম যে, আর পিছনে (অনেক দূর পর্যন্ত) মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর কোন সাহাবীকেই দেখতে পেলাম না, এমনকি তাদের ঘোড়ার খুরের ধূলিও আমার দৃষ্টিগোচর হলো না। এভাবে চলতে চলতে সূর্যাস্তের প্রাক্কালে তারা এমন একটি গিরিপথে উপনীত হল যেখানে যু-কারাদ নামক একটি প্রস্রবণ রয়েছে। অত্যন্ত তৃষ্ণার্ত অবস্থায় তারা পানি পান করতে অবতরণ করলো। তখন তারা আমাকে তাদের পিছু ধাওয়া করে দৌড়ে আসতে দেখতে পেলো। এক জায়গায় পানি পান করার পূর্বেই আমি সেখান থেকে তাদের তাড়িয়ে দিলাম। তখন তারা পাহাড়ের একটি ঢালু উপত্যকার দিকে দৌড়াতে লাগলো আর আমিও তাদের পিছু ধাওয়া করতে লাগলাম। আমি তাদের যে কোন একজনের নিকটবর্তী হতাম তার কাঁধের অস্থিতে তীর নিক্ষেপ করে বললাম, “আমি আকওয়া’র পুত্র, আজ দুধ স্মরণের দিন”। সে তখন বলল, তার মা তার জন্য কাঁদুক-তুমি কি সে আকওয়া যে আমাদের সেই ভোর থেকে অতিষ্ঠ করে রেখেছ? আমি বললাম, হ্যাঁ, তোমার জানের দুশমন, আমি সেই তোমার ভোরবেলার আকওয়া। তিনি বলেন, অতঃপর তারা দু’টি ক্লান্ত ঘোড়া উপত্যকায় ছেড়ে চলে গেল। তিনি বলেন, তখন আমি ঐ দু’টোকে হাঁকিয়ে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট নিয়ে এলাম। তিনি বলেন, সেখানে একটি “সাতীহা’ (চামড়ার পাত্র) এবং একটি পানি ভর্তি সাতীহা নিয়ে এসে ‘আমির’ আমার সাথে মিলিত হলেন। আমি তখন ওযূ করলাম এবং (দুধ) পান করলাম। তারপর এমন অবস্থায় রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর কাছে এলাম, যখন তিনি ঐ পানির কাছে ছিলেন যা থেকে আমি ওদেরকে তাড়িয়ে দিয়েছিলাম। এদিকে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঐ সমস্ত উট ও মুশরিকদের নিকট থেকে আমার ছিনিয়ে আনা বর্শা ও চাদর প্রভৃতি হস্তগত করেছেন। তখন বিলাল ঐ লোকদের কাছ থেকে আমার উদ্ধারকৃত একটি উট জবাই করে তার কলিজা এবং কুঁজ রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য ভুনা করছিলেন। তিনি বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রসূল! আমাকে সুযোগ দিন, আমি আমাদের লোকদের থেকে একশ’ জনকে বাছাই করে নিয়ে সে দুশমনের পিছু ধাওয়া করি যাতে তাদের সকলকে এমনিভাবে হত্যা করব যে, তাদের খবর বয়ে নিয়ে যাবার মত একটি লোকও অবশিষ্ট থাকবে না। তিনি বলেন, তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমনভাবে হাসলেন যে, চুলোর আগুনের আভায় তাঁর চোয়ালের দাঁতগুলো প্রকাশ পেলো। এরপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ হে সালামাহ্! আমি বললাম, হ্যাঁ, পবিত্র সত্তার শপথ! যিনি আপনাকে সম্মানিত করেছেন। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন বললেনঃ এতক্ষণে তো তারা গাত্ফান পল্লীতে আতিথ্য ভোগ করছে। তিনি বলেন, এমন সময় গাত্ফান গোত্রের একটি লোক এল। সে বলল, অমুক তাদের জন্য একটি উট যাবাহ করেছে। তারা যখন তাঁর চামড়া খসাচ্ছিল তখন তাঁরা ধুলো রাশি উড়তে দেখতে পায়। তখন তার বলে উঠলো ওরা (আকওয়া’ ও তাঁর বাহিনী) তোমাদের নিকট এসে পড়েছে। তখন তারা পালিয়ে যায়। এরপর আমাদের ভোর হলো। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আমাদের আজকে সেরা অশ্বারোহী হচ্ছে আবু কাতাদাহ্ আর আমাদের সেরা পদাতিক হচ্ছে সালামাহ্। তিনি বলেন, তারপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে অশ্বারোহী ও পদাতিক হিসেবে গনীমাতের দু’ অংশ দিলেন। আমাকে তিনি একত্রে দু’ অংশ দিলেন। তারপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের মাদীনায় ফিরে আসার কালে আমাকে তাঁর সাথে তাঁর উট্নী আয্বার পিছনে বসিয়ে নিলেন। তিনি বলেন, তারপর যখন আমরা পথ অতিক্রম করছিলাম, এমন সময় আনসারের এমন এক ব্যক্তি-যাকে পদব্রজে চলার ব্যাপারে কেউ পরাজিত করতে পারতো না-বলতে লাগলো-কেউ কি আছে যে, মাদীনায় সর্বাগ্রে পৌঁছার ব্যাপারে প্রতিযোগিতা করবে? এ কথাটি সে বারবার বলছিল। তিনি বলেন, যখন আমি তার এ (চ্যালেঞ্জমূলক) কথাটি শুনলাম তখন বললাম, তুমি কি কোন সম্মানিত লোককে সম্মান দিতে জাননা বা কোন ভদ্রলোককেই পরোয়া করবে না? সে বলল, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ব্যতীত অন্য কারো নয়। তিনি বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রসূল! আমার পিতা-মাতা আপনার উপর কুরবান, আপনি আমায় অনুমতি দিন যেন আমি ওই ব্যক্তির সাথে প্রতিযোগিতা করি। তখন তিনি বললেনঃ তোমার ইচ্ছা হলে। তিনি বলেন, তখন আমি বললাম, ওহে! আমি তোমার দিকে আসছি। তারপর আমি লাফ দিয়ে নিচে দৌড়ালাম। তারপর এক বা দু’ টিলা অতিক্রম করার দূরত্বে রইলাম তখন পর্যন্ত আমার দম বন্ধ রেখে তার পিছু পিছু দৌড় দিলাম। আরও দু’ এক টিলা পর্যন্ত ধীরগতিতে চলার পর সজোরে দৌড় দিয়ে তার নিকট পৌঁছে গেলাম। এবং তার দু’কাঁধের মধ্যবর্তী স্থানে একটি ঘুষি মেরে বললাম, ওহে! আল্লাহর কসম! তুমি হেরে গেছ। তখন সে বলল, আমিও তাই মনে করছি। তিনি বলেন, অতএব আমি তার পূর্বেই মাদীনায় পৌঁছে গেলাম। তিনি বললেন, আল্লাহর কসম! এরপর আমরা তিনরাতের অধিক মাদীনায় থাকতে পারিনি। এমনি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর সঙ্গে আমরা খাইবারের দিকে বেড়িয়ে পড়লাম। তিনি বলেন, তখন আমার চাচা ‘আমির (রাঃ) উৎসাহমূলক কবিতা আবৃত্তি করতে লাগলেন : “আল্লাহর কসম! আল্লাহর অনুগ্রহ না হলে আমরা হিদায়াত পেতাম না। সদাকাহ্ও দিতাম না আর সলাতও আদায় করতাম না। আমরা আপনার অনুগ্রহ থেকে কখনো বেপরওয়া হতে পারি না, তাই আপনি আমাদের কদম দৃঢ় রাখুন, যখন আমরা শত্রুদের সম্মুখীন হই এবং আপনি আমাদের প্রতি প্রশান্তি বর্ষণ করুন।” তারপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ এ ব্যক্তি কে? তিনি বললেন, আমি ‘আমির। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “তোমার রব তোমাকে ক্ষমা করুন।” রাবী বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন যার জন্য বিশেষভাবে ক্ষমার দু’আ করতেন সে শহীদ হতো। তিনি বলেন, তখন স্বীয় উটের উপর আসীন ‘উমার ইবনুল খাত্তাব (রাঃ) চীৎকার করে বললেন, ইয়া নবী আল্লাহ! ‘আমিরকে দিয়ে আমাদের আরো উপকৃত করলেন না কেন? তিনি বলেন, তারপর যখন আমরা খাইবারে উপস্থিত হলাম, তখন খাইবার অধিপতি মারহাব তরবারি দোলাতে দোলাতে বেরিয়ে এলো এবং বলল, “খাইবার জানে যে, আমি মুরাহ্হাব, পূর্ণ অস্ত্রেশস্ত্রে সজ্জিত, অভিজ্ঞতাপূর্ণ এক বীরপুরুষ যখন যুদ্ধ বিগ্রহ ঘনীভূত হয় তখন সে তরবারিসমূহ চমকাতে থাকে।” রাবী বলেন, আমার চাচা ‘আমির (রাঃ) কবিতা আবৃত্তি করতে করতে বললেন- “খাইবার জানে যে, আমি ‘আমির অস্ত্রে-শস্ত্রে সুসজ্জিত যুদ্ধে অবতীর্ণ। এক বীর বাহাদুর ভয়হীন ব্যক্তি।” রাবী বলেন, তারপর তাদের মধ্যে আঘাত বিনিময় হলো। ‘আমির (রাঃ) নীচে থেকে যখন তাকে আঘাত করতে চাইলেন, তখন তা ফিরে এসে তাঁর নিজের উপরই পতিত হলো, আর তাতে তাঁর পায়ের গোছার সংযোগশিরা কেটে গিয়ে মৃত্যু হল। (রাবী) সালামাহ্ (রাঃ) বলেন, তখন আমি বের হলাম। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কয়েকজন সাহাবীকে বলাবলি করতে শুনলাম যে, ‘আমিরের ‘আমাল বরবাদ হয়ে গেছে, সে আত্মহত্যা করেছে। তখন আমি কাঁদতে কাঁদতে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকটে এসে বললাম, হে আল্লাহর রসূল! ‘আমিরের ‘আমালগুলো বরবাদ হয়ে গেল? তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ (এ-কথা)-কে বলেছে? রাবী বলেন, আমি বললাম, আপনারই কয়েকজন সাহাবী। তিনি বললেন, যারা এরূপ বলেছে তারা মিথ্যা বলেছে এবং তার প্রতিদান সে দু’বার পাবে। তারপর তিনি আমাকে ‘আলী (রাঃ) -এর নিকট পাঠালেন। তখন তিনি চক্ষুরোগে আক্রান্ত ছিলেন। তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আমি এমন এক ব্যক্তিকে (আজ) পতাকা সমর্পণ করবো, যে আল্লাহ ও তাঁর রসূলকে ভালবাসে এবং আল্লাহ ও তাঁর রসূলও তাঁকে ভালবাসেন। তিনি বলেন, তারপর আমি আলী (রাঃ) -এর কাছে গেলাম এবং তাকে নিয়ে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলাম। আর তখন তাঁর চোখ ব্যাথাগ্রস্ত। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর চোখে থুথু দিলেন। আর (তাতেই) তিনি সুস্থ হলেন। তখন তিনি তাঁর হাতে পতাকা দিলেন। এবারো মারহাব বেরিয়ে এলো এবং কবিতা আওড়াতে লাগল- “খাইবার জানে যে, আমি মারহাব, যুদ্ধের অস্ত্রে সজ্জিত এক অভিজ্ঞতাপূর্ণ বীর বাহাদুর ব্যক্তি।“ তখন ‘আলী (রাঃ) বললেন- “আমি সে ব্যক্তি যাকে আমার মা ‘হায়দার’ নামে ডাকে, যার দর্শন বন্য সিংহের মত ভীতিপ্রদ, আমি দুশমনের প্রতিদান দেই বিরাট পরিমাণের পাত্র দিয়ে অর্থাৎ- তাদের নির্দ্বিধায় হত্যা করি”। এরপর তিনি মারহাবের মাথায় তলোয়ার মারলেন এবং তাকে হত্যা করলেন। তারপর তাঁরই হাতে (খাইবার) বিজয় হলো। (ই.ফা. ৪৫২৭, ই.সে. ৪৫২৯)

ইয়াস ইবনু সালামাহ্ (রাঃ) তাঁর পিতা থেকে বর্নিতঃ

তিনি বলেন, আমরা রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর সঙ্গে হুদাইবিয়ায় পৌঁছলাম। তখন আমাদের সংখ্যা ছিল চৌদ্দশ’। তদুপরি সেখানে ছিল পঞ্চাশটি বকরী, যাদের পানি পানের জন্য পর্যাপ্ত পানি ছিল না। রাবী বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কূয়ার কিনারায় বসলেন এবং দু’আ করলেন অথবা তাতে থুতু দিলেন। রাবী বলেন, আর অমনি পানি উথ্লে উঠলো। তখন আমরাও পানি পান করলাম এবং (পশুদেরকেও) পানি পান করালাম। রাবী বলেন, তারপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের বাই’আতের জন্য বৃক্ষমূলে ডাকলেন। রাবী বলেন, তারপর লোকদের মধ্যে আমি সর্বাগ্রে বাই’আত হলাম। তারপর একে একে অন্যান্য লোকেরাও বাই’আত হলো। তিনি যখন বাই’আত গ্রহণ করতে করতে লোকজনের মধ্যবর্তী স্থানে পৌঁছলেন, তখন বললেন, হে সালামাহ্! তুমি বাই’আত হও। রাবী বলেন, তখন আমি বললাম, আমি তো, লোকদের মধ্যে প্রথমেই বাই’আত হয়েছি, হে আল্লাহর রসূল! তিনি বললেনঃ আবারও হও না? রাবী বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন আমাকে ঢাল দিয়ে বাই’আত করতে করতে লোকদের শেষ প্রান্তে পৌঁছলেন এবং বললেন, তুমি কি আমার কাছে বাই’আত হবে না, হে সালামাহ্! রাবী বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রসূল! আমি তো লোকদের মধ্যে প্রথমভাগে এবং মধ্যভাগে (দু দু’বার) আপনার কাছে বাই’আত হয়েছি। তিনি বললেনঃ আবারও হও না। তখন আমি তৃতীয় বার বাই’আত গ্রহণ করলাম। এরপর তিনি আমাকে বললেন, হে সালামাহ্! তোমার সে বড় ঢালটি বা ছোট ঢালটি কোথায়, যা আমি তোমাকে দিয়েছিলাম? রাবী (সালামাহ্) বলেন, আমি বললাম : হে আল্লাহর রসূল! আমার চাচা আমির আমার সাথে অস্ত্রবিহীন অবস্থায় দেখা করেছিলেন। তখন আমি তাঁকে তা দিয়ে দিয়েছি। রাবী বলেন, এতে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হেসে দিলেন এবং বললেনঃ তুমি দেখছি পূর্ববর্তীযুগের সে লোকের মত, যে বলেছিল, হে আল্লাহ! আমি এমন একজন বন্ধু চাই, যে আমার প্রানের চাইতেও আমার নিকট বেশি প্রিয় হবে।” এরপরে মুশরিকরা আমাদের কাছে প্রস্তাব পাঠালো। আমাদের একপক্ষের লোকজন অন্যপক্ষের শিবিরে যাতায়াত করতে লাগলো এবং শেষ পর্যন্ত আমরা উভয়পক্ষ পরস্পরে সন্ধিবদ্ধ হলাম। রাবী (সালামাহ্ (রাঃ) বলেন, আমি তালহাহ্ ইবনু ‘উবাইদুল্লাহর খিদমাতে নিয়োজিত ছিলাম। আমি তার ঘোড়াকে পানি পান করাতাম এবং তার পিঠ মালিশ করতাম এবং তাঁর অন্যান্য খিদমাতও করতাম। আমি তাঁর ওখানে খাওয়া-দাওয়া করতাম। নিজের পরিবার-পরিজন ও ধন-সম্পদ পরিত্যাগ করে আল্লাহ তা’আলা ও তাঁর রসূলের রাহে মুহাজির হয়েছি। রাবী বলেন, তারপর যখন আমরা ও মক্কাবাসীরা সন্ধিতে আবদ্ধ হলাম এবং আমাদের একপক্ষ অপরপক্ষের সাথে মিলেমিশে থাকতে লাগলাম। আমি একটি গাছ তলায় গিয়ে তার নীচের কাঁটা প্রভৃতি পরিষ্কার করে তার গোড়ায় একটু শুয়ে পড়ি। এমন সময় মাক্কাবাসী চারজন মুশরিক এসে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্পর্কে আজেবাজে কথা বলতে লাগলো। আমার কাছে ওদের কথাবার্তা অত্যন্ত খারাপ লাগলো এবং আমি স্থান পরিবর্তন করে আর একটি গাছের তলায় চলে গেলাম। তারা তাদের অস্ত্রাদি গাছের সাথে ঝুলিয়ে রেখে শুয়ে পড়লো। এমন সময় প্রান্তরের নিম্নাঞ্চল থেকে কে যেন চীৎকার করে বললো, হে মুহাজিরগণ! ইবনু যুনায়মকে কতল কর। আমি তৎক্ষণাৎ আমার তরবারি উঠিয়ে ধরলাম এবং ঐ চারজনের উপর ধাবিত হলাম। তখন তারা ঘুমিয়ে ছিল। আমি তাদের অস্ত্রগুলো হস্তগত করলাম এবং তা আঁটি বেঁধে আমার হাতে নিলাম। তিনি বলেন, এরপর আমি বললাম, যে মহান সত্তা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে সম্মানিত করেছেন তাঁর কসম! তোমাদের মধ্যে কেউ যদি মাথা তোলো, তবে তার সে অঙ্গে আঘাত করব যেখানে তার চোখ দু’টো রয়েছে। রাবী বলেন, তারপর তাদেরকে আমি হাঁকিয়ে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট পর্যন্ত নিয়ে গেলাম। তিনি বলেন, এমন সময় আমার চাচা আ’মির ‘আবালাত’ গোত্রের একজনকে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট নিয়ে এসেছে। তাকে বলা হতো মিকরিয। সে ছিল বর্ম সজ্জিত একটি ঘোড়ায় আসীন। আর তার সাথে সত্তর জন মুশরিক। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের দিকে তাকালেন এবং বললেনঃ “ওদেরকে ছেড়ে দাও, যাতে আক্রমণ ওদের পক্ষ থেকেই হয় এবং দ্বিতীয়বার তারাই অপরাধী প্রতিপন্ন হয়”। এ কথা বলে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের ক্ষমা করে দিলেন। তখন আল্লাহ তা’আলা নাযিল করলেন : “সে পবিত্র সত্তা যিনি তাদের হাতকে তোমাদের উপর থেকে এবং তোমাদের হাতকে তাদের উপর থেকে মক্কাপ্রান্তরে তাদের উপর তোমাদের বিজয়ী করার পর বিরত রেখেছেন”-(সূরা আন্ নূর ২৪ : ৪৮) আয়াতের শেষ পর্যন্ত। রাবী বলেন, তারপর মাদীনায় প্রত্যাবর্তনের জন্য বেরিয়ে পড়লাম। পথে এমন একটি মানযিলে আমরা অবতরণ করলাম যেখানে আমাদের ও লেহিয়ান গোত্রের মধ্যে কেবল একটি পাহাড়ের ব্যবধান ছিল। আর তারা ছিল মুশরিক। তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সে ব্যক্তির জন্য আল্লাহর দরবারে দু’আ করলেন, যে ব্যক্তি রাতে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীদের পক্ষ থেকে পাহারা দেয়ার জন্য পাহাড়ের উপর আরোহণ করবে। সালামাহ্ বলেন, সে রাতে আমি দুই কি তিনবার ঐ পাহাড়ে আরোহণ করেছিলাম। তারপর আমরা মাদীনায় এলাম। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর গোলাম রাবাহ্কে দিয়ে তাঁর উটসমূহ পাঠালেন। আর আমিও তালহার ঘোড়ায় চড়ে তাঁর সাথে সাথে উটগুলো হাঁকিয়ে চারণ ভূমির দিকে নিয়ে গেলাম। যখন আমাদের ভোর হলো ‘আবদুর রহমান ফাজারী চড়াও হয়ে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সমস্ত উট ছিনিয়ে নিয়ে গেল এবং পশুপালের রাখালকে হত্যা করলো। আমি তখন রাবাহ্কে বললাম, হে রাবাহ্! লও এ ঘোড়া নিয়ে তুমি তালহাহ্ ইবনু ‘উবাইদুল্লাহকে পৌঁছে দিও আর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে সংবাদ দাও যে, মুশরিকরা তাঁর উটগুলো লুটে নিয়ে গেছে। তিনি বলেন, তখন আমি একটি টিলার উপর দাঁড়ালাম। তারপর মাদীনার দিকে মুখ করে তিনবার চিৎকার দিলাম, ইয়া সাবাহা! তারপর আমি লুটেরাদের পিছু ধাওয়া করলাম ও তাদের উপর তীর নিক্ষেপ করতে লাগলাম। আর আমি মুখে এ চরণ উচ্চারণ করছিলাম, “আমি আকওয়া’র পুত্র, আজ সেদিন, আজকে মায়ের দুধ (কতখানি খেয়েছো তা) স্মরণের দিন।” তখন আমি তাদের যে কাউকে পেয়েছি, তার উপর এ রকমভাবে তীর নিক্ষেপ করেছি যে, তীরের অগ্রভাগ তার কাঁধ ছেদ করে বেরিয়েছে। তিনি বলেন, আমি বলতে লাগলাম, “এ আঘাত নাও, আমি আকওয়া’র পুত্র, আজ দুধপান স্মরণের দিন।” তিনি বলেন, আল্লাহর কসম! আমি তীর নিক্ষেপ করতে থাকলাম এবং ঘায়েল করতে লাগলাম এবং যখনই কোন ঘোড় সওয়ার আমার দিকে ফিরত তখনই আমি গাছের আড়ালে এসে তার গোড়ায় বসে তার প্রতি তীর নিক্ষেপ করতাম। আর তাকে যখম করে ফেলতাম। অবশেষে যখন তারা পাহাড়ের সংকীর্ণ পথে আসে এবং তারা সে সংকীর্ণ পথে ঢোকে আমি তখন পাহাড়ের উপর উঠে সেখান থেকে অবিরাম তাদের উপর পাথর নিক্ষেপ করতে থাকলাম। তিনি বলেন, এভাবে আমি তাদের পশ্চাদ্ধাবন করতে থাকলাম যে পর্যন্ত না আল্লাহর সৃষ্ট উটগুলো যা রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর সাওয়ারী হিসেবে ছিল তা আমার পেছনে রেখে না যাই। তারা এগুলো আমার আওতায় ফেলে চলে গেল। তারপরও আমি তাদের অনুসরণ করে তাদের উপর তীর নিক্ষেপ করতে থাকলাম। এমনিকি তারা ত্রিশটির বেশী চাদর এবং ত্রিশটি বল্লম নিজের বোঝা হালকা করার উদ্দেশ্যে ফেলে গেল। তারা যেসব বস্তু ফেলে যাচ্ছিল আমি তার প্রত্যেকটিকে পাথর দ্বারা চিহ্নিত করে যাচ্ছিলাম যাতে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীগণ তা দেখে চিনতে পারেন। অবশেষে তারা পাহাড়ের একটি সংকীর্ণ স্থানে গিয়ে পৌঁছলো। এমন সময় বাদ্র ফাজারীর অমুক পুত্র এসে তাদের সাথে মিলিত হলো। এবার তারা সকলে মিলে সকালের খাবার খেতে বসলো। আমি পাহাড়ের একটি শৃঙ্গে বসে পড়লাম। তখন সে ফাজারী বললো, ঐ যে লোকটিকে দেখছি সে কে? তারা বলল, লোকটির হাতে আমরা অনেক দুর্ভোগ পোহায়েছি। আল্লাহর কসম! রাতের আধাঁর থেকে নিয়ে এ পর্যন্ত লোকটি আমাদের পিছন থেকে সরছে না, সে আমাদের প্রতি অবিরত তীর নিক্ষেপ করছে, এমনকি আমাদের যথাসর্বস্ব সে কেড়ে নিয়েছে। তখন সে বলল, তোমাদের মধ্যকার চারজন উঠে গিয়ে তার উপর চড়াও হও। তখন তাদের চার ব্যক্তি পাহাড়ে উঠে আমার দিকে এগিয়ে এলো। তারপর তারা যখন আমার কথা শোনার মত নিকটবর্তী স্থানে এসে পৌঁছলো, তিনি বলেন, তখন আমি বললাম, তোমরা কি আমাকে চেন? তারা বলল, না। তিনি বলেন, আমি বললাম, আমি সালামাহ্ ইবনু আকওয়া’। কসম সে পবিত্র সত্তার, যিনি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সম্মানিত করেছেন! আমি তোমাদের যাকেই পাই তাকে ধরে ফেলব। কিন্তু তোমাদের কেউ চাইলেই আমাকে ধরতে পারবে না। তখন তাদের একজন বলল, আমিও তাই মনে করি। তিনি বলেন, তারপর তারা ফিরে গেল। আর আমি সে স্থানেই বসে রইলাম। অবশেষে আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর অশ্বারোহীদের গাছ-গাছালির মাঝ দিয়ে অগ্রসর হতে দেখলাম। তিনি বলেন, তাদের মধ্যে সর্বাগ্রে ছিলেন আখরাম আসাদী। তাঁর পিছনে আবু কাতাদাহ্ আনসারী। তাঁর পিছনে মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ কিন্দী। তিনি বলেন, আমি তখন আখরামের ঘোড়ার লাগাম ধরলাম। তিনি বলেন, তখন লুটেরা (শত্রুরা) পৃষ্ঠপ্রদর্শন করে পালিয়ে গেল। আমি বললাম, হে আখরাম! ওদের থেকে সতর্ক থাকবে। তারা যেন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীগণ এসে মিলিত হওয়ার পূর্বেই তোমাদের বিচ্ছিন্ন করে না ফেলে। আখরাম বললেন, হে সালামাহ্! তুমি যদি আল্লাহ ও কিয়ামাতের দিনের প্রতি বিশ্বাসী হও এবং জান্নাত ও জাহান্নামকে সত্য মনে কর তবে আমার এবং শাহাদাতের মধ্যে বাধা সৃষ্টি করো না। সালামাহ্ বলেন, তখন আমি তার পথ ছেড়ে দিলাম। তিনি তখন ‘আবদুর রহমানের সাথে সম্মুখ যুদ্ধে লিপ্ত হলেন। আখরাম ‘আবদুর রহমানের ঘোড়াকে আহত করলেন। আর ‘আবদুর রহমান বর্শার আঘাতে তাকে কতল করে দিল এবং আখরামের ঘোড়ার উপর চড়ে বসলো। ইতোমধ্যে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘোড়সাওয়ার আবু কাতাদাহ্ (রাঃ) এসে পৌঁছলেন। তিনি ‘আবদুর রহমানকে বর্শার আঘাতে হত্যা করলেন। সে পবিত্র সত্তার কসম! যিনি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মর্যাদামন্ডিত করেছেন, আমি তখন এতই দ্রুতগতিতে তাদের পিছু ধাওয়া করে যাচ্ছিলাম যে, আর পিছনে (অনেক দূর পর্যন্ত) মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর কোন সাহাবীকেই দেখতে পেলাম না, এমনকি তাদের ঘোড়ার খুরের ধূলিও আমার দৃষ্টিগোচর হলো না। এভাবে চলতে চলতে সূর্যাস্তের প্রাক্কালে তারা এমন একটি গিরিপথে উপনীত হল যেখানে যু-কারাদ নামক একটি প্রস্রবণ রয়েছে। অত্যন্ত তৃষ্ণার্ত অবস্থায় তারা পানি পান করতে অবতরণ করলো। তখন তারা আমাকে তাদের পিছু ধাওয়া করে দৌড়ে আসতে দেখতে পেলো। এক জায়গায় পানি পান করার পূর্বেই আমি সেখান থেকে তাদের তাড়িয়ে দিলাম। তখন তারা পাহাড়ের একটি ঢালু উপত্যকার দিকে দৌড়াতে লাগলো আর আমিও তাদের পিছু ধাওয়া করতে লাগলাম। আমি তাদের যে কোন একজনের নিকটবর্তী হতাম তার কাঁধের অস্থিতে তীর নিক্ষেপ করে বললাম, “আমি আকওয়া’র পুত্র, আজ দুধ স্মরণের দিন”। সে তখন বলল, তার মা তার জন্য কাঁদুক-তুমি কি সে আকওয়া যে আমাদের সেই ভোর থেকে অতিষ্ঠ করে রেখেছ? আমি বললাম, হ্যাঁ, তোমার জানের দুশমন, আমি সেই তোমার ভোরবেলার আকওয়া। তিনি বলেন, অতঃপর তারা দু’টি ক্লান্ত ঘোড়া উপত্যকায় ছেড়ে চলে গেল। তিনি বলেন, তখন আমি ঐ দু’টোকে হাঁকিয়ে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট নিয়ে এলাম। তিনি বলেন, সেখানে একটি “সাতীহা’ (চামড়ার পাত্র) এবং একটি পানি ভর্তি সাতীহা নিয়ে এসে ‘আমির’ আমার সাথে মিলিত হলেন। আমি তখন ওযূ করলাম এবং (দুধ) পান করলাম। তারপর এমন অবস্থায় রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর কাছে এলাম, যখন তিনি ঐ পানির কাছে ছিলেন যা থেকে আমি ওদেরকে তাড়িয়ে দিয়েছিলাম। এদিকে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঐ সমস্ত উট ও মুশরিকদের নিকট থেকে আমার ছিনিয়ে আনা বর্শা ও চাদর প্রভৃতি হস্তগত করেছেন। তখন বিলাল ঐ লোকদের কাছ থেকে আমার উদ্ধারকৃত একটি উট জবাই করে তার কলিজা এবং কুঁজ রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য ভুনা করছিলেন। তিনি বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রসূল! আমাকে সুযোগ দিন, আমি আমাদের লোকদের থেকে একশ’ জনকে বাছাই করে নিয়ে সে দুশমনের পিছু ধাওয়া করি যাতে তাদের সকলকে এমনিভাবে হত্যা করব যে, তাদের খবর বয়ে নিয়ে যাবার মত একটি লোকও অবশিষ্ট থাকবে না। তিনি বলেন, তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমনভাবে হাসলেন যে, চুলোর আগুনের আভায় তাঁর চোয়ালের দাঁতগুলো প্রকাশ পেলো। এরপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ হে সালামাহ্! আমি বললাম, হ্যাঁ, পবিত্র সত্তার শপথ! যিনি আপনাকে সম্মানিত করেছেন। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন বললেনঃ এতক্ষণে তো তারা গাত্ফান পল্লীতে আতিথ্য ভোগ করছে। তিনি বলেন, এমন সময় গাত্ফান গোত্রের একটি লোক এল। সে বলল, অমুক তাদের জন্য একটি উট যাবাহ করেছে। তারা যখন তাঁর চামড়া খসাচ্ছিল তখন তাঁরা ধুলো রাশি উড়তে দেখতে পায়। তখন তার বলে উঠলো ওরা (আকওয়া’ ও তাঁর বাহিনী) তোমাদের নিকট এসে পড়েছে। তখন তারা পালিয়ে যায়। এরপর আমাদের ভোর হলো। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আমাদের আজকে সেরা অশ্বারোহী হচ্ছে আবু কাতাদাহ্ আর আমাদের সেরা পদাতিক হচ্ছে সালামাহ্। তিনি বলেন, তারপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে অশ্বারোহী ও পদাতিক হিসেবে গনীমাতের দু’ অংশ দিলেন। আমাকে তিনি একত্রে দু’ অংশ দিলেন। তারপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের মাদীনায় ফিরে আসার কালে আমাকে তাঁর সাথে তাঁর উট্নী আয্বার পিছনে বসিয়ে নিলেন। তিনি বলেন, তারপর যখন আমরা পথ অতিক্রম করছিলাম, এমন সময় আনসারের এমন এক ব্যক্তি-যাকে পদব্রজে চলার ব্যাপারে কেউ পরাজিত করতে পারতো না-বলতে লাগলো-কেউ কি আছে যে, মাদীনায় সর্বাগ্রে পৌঁছার ব্যাপারে প্রতিযোগিতা করবে? এ কথাটি সে বারবার বলছিল। তিনি বলেন, যখন আমি তার এ (চ্যালেঞ্জমূলক) কথাটি শুনলাম তখন বললাম, তুমি কি কোন সম্মানিত লোককে সম্মান দিতে জাননা বা কোন ভদ্রলোককেই পরোয়া করবে না? সে বলল, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ব্যতীত অন্য কারো নয়। তিনি বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রসূল! আমার পিতা-মাতা আপনার উপর কুরবান, আপনি আমায় অনুমতি দিন যেন আমি ওই ব্যক্তির সাথে প্রতিযোগিতা করি। তখন তিনি বললেনঃ তোমার ইচ্ছা হলে। তিনি বলেন, তখন আমি বললাম, ওহে! আমি তোমার দিকে আসছি। তারপর আমি লাফ দিয়ে নিচে দৌড়ালাম। তারপর এক বা দু’ টিলা অতিক্রম করার দূরত্বে রইলাম তখন পর্যন্ত আমার দম বন্ধ রেখে তার পিছু পিছু দৌড় দিলাম। আরও দু’ এক টিলা পর্যন্ত ধীরগতিতে চলার পর সজোরে দৌড় দিয়ে তার নিকট পৌঁছে গেলাম। এবং তার দু’কাঁধের মধ্যবর্তী স্থানে একটি ঘুষি মেরে বললাম, ওহে! আল্লাহর কসম! তুমি হেরে গেছ। তখন সে বলল, আমিও তাই মনে করছি। তিনি বলেন, অতএব আমি তার পূর্বেই মাদীনায় পৌঁছে গেলাম। তিনি বললেন, আল্লাহর কসম! এরপর আমরা তিনরাতের অধিক মাদীনায় থাকতে পারিনি। এমনি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর সঙ্গে আমরা খাইবারের দিকে বেড়িয়ে পড়লাম। তিনি বলেন, তখন আমার চাচা ‘আমির (রাঃ) উৎসাহমূলক কবিতা আবৃত্তি করতে লাগলেন : “আল্লাহর কসম! আল্লাহর অনুগ্রহ না হলে আমরা হিদায়াত পেতাম না। সদাকাহ্ও দিতাম না আর সলাতও আদায় করতাম না। আমরা আপনার অনুগ্রহ থেকে কখনো বেপরওয়া হতে পারি না, তাই আপনি আমাদের কদম দৃঢ় রাখুন, যখন আমরা শত্রুদের সম্মুখীন হই এবং আপনি আমাদের প্রতি প্রশান্তি বর্ষণ করুন।” তারপর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ এ ব্যক্তি কে? তিনি বললেন, আমি ‘আমির। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “তোমার রব তোমাকে ক্ষমা করুন।” রাবী বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন যার জন্য বিশেষভাবে ক্ষমার দু’আ করতেন সে শহীদ হতো। তিনি বলেন, তখন স্বীয় উটের উপর আসীন ‘উমার ইবনুল খাত্তাব (রাঃ) চীৎকার করে বললেন, ইয়া নবী আল্লাহ! ‘আমিরকে দিয়ে আমাদের আরো উপকৃত করলেন না কেন? তিনি বলেন, তারপর যখন আমরা খাইবারে উপস্থিত হলাম, তখন খাইবার অধিপতি মারহাব তরবারি দোলাতে দোলাতে বেরিয়ে এলো এবং বলল, “খাইবার জানে যে, আমি মুরাহ্হাব, পূর্ণ অস্ত্রেশস্ত্রে সজ্জিত, অভিজ্ঞতাপূর্ণ এক বীরপুরুষ যখন যুদ্ধ বিগ্রহ ঘনীভূত হয় তখন সে তরবারিসমূহ চমকাতে থাকে।” রাবী বলেন, আমার চাচা ‘আমির (রাঃ) কবিতা আবৃত্তি করতে করতে বললেন- “খাইবার জানে যে, আমি ‘আমির অস্ত্রে-শস্ত্রে সুসজ্জিত যুদ্ধে অবতীর্ণ। এক বীর বাহাদুর ভয়হীন ব্যক্তি।” রাবী বলেন, তারপর তাদের মধ্যে আঘাত বিনিময় হলো। ‘আমির (রাঃ) নীচে থেকে যখন তাকে আঘাত করতে চাইলেন, তখন তা ফিরে এসে তাঁর নিজের উপরই পতিত হলো, আর তাতে তাঁর পায়ের গোছার সংযোগশিরা কেটে গিয়ে মৃত্যু হল। (রাবী) সালামাহ্ (রাঃ) বলেন, তখন আমি বের হলাম। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কয়েকজন সাহাবীকে বলাবলি করতে শুনলাম যে, ‘আমিরের ‘আমাল বরবাদ হয়ে গেছে, সে আত্মহত্যা করেছে। তখন আমি কাঁদতে কাঁদতে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকটে এসে বললাম, হে আল্লাহর রসূল! ‘আমিরের ‘আমালগুলো বরবাদ হয়ে গেল? তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ (এ-কথা)-কে বলেছে? রাবী বলেন, আমি বললাম, আপনারই কয়েকজন সাহাবী। তিনি বললেন, যারা এরূপ বলেছে তারা মিথ্যা বলেছে এবং তার প্রতিদান সে দু’বার পাবে। তারপর তিনি আমাকে ‘আলী (রাঃ) -এর নিকট পাঠালেন। তখন তিনি চক্ষুরোগে আক্রান্ত ছিলেন। তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ আমি এমন এক ব্যক্তিকে (আজ) পতাকা সমর্পণ করবো, যে আল্লাহ ও তাঁর রসূলকে ভালবাসে এবং আল্লাহ ও তাঁর রসূলও তাঁকে ভালবাসেন। তিনি বলেন, তারপর আমি আলী (রাঃ) -এর কাছে গেলাম এবং তাকে নিয়ে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলাম। আর তখন তাঁর চোখ ব্যাথাগ্রস্ত। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর চোখে থুথু দিলেন। আর (তাতেই) তিনি সুস্থ হলেন। তখন তিনি তাঁর হাতে পতাকা দিলেন। এবারো মারহাব বেরিয়ে এলো এবং কবিতা আওড়াতে লাগল- “খাইবার জানে যে, আমি মারহাব, যুদ্ধের অস্ত্রে সজ্জিত এক অভিজ্ঞতাপূর্ণ বীর বাহাদুর ব্যক্তি।“ তখন ‘আলী (রাঃ) বললেন- “আমি সে ব্যক্তি যাকে আমার মা ‘হায়দার’ নামে ডাকে, যার দর্শন বন্য সিংহের মত ভীতিপ্রদ, আমি দুশমনের প্রতিদান দেই বিরাট পরিমাণের পাত্র দিয়ে অর্থাৎ- তাদের নির্দ্বিধায় হত্যা করি”। এরপর তিনি মারহাবের মাথায় তলোয়ার মারলেন এবং তাকে হত্যা করলেন। তারপর তাঁরই হাতে (খাইবার) বিজয় হলো। (ই.ফা. ৪৫২৭, ই.সে. ৪৫২৯)

حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة، حدثنا هاشم بن القاسم، ح وحدثنا إسحاق بن، إبراهيم أخبرنا أبو عامر العقدي، كلاهما عن عكرمة بن عمار، ح وحدثنا عبد الله بن، عبد الرحمن الدارمي - وهذا حديثه - أخبرنا أبو علي الحنفي، عبيد الله بن عبد المجيد حدثنا عكرمة، - وهو ابن عمار - حدثني إياس بن سلمة، حدثني أبي قال، قدمنا الحديبية مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ونحن أربع عشرة مائة وعليها خمسون شاة لا ترويها - قال - فقعد رسول الله صلى الله عليه وسلم على جبا الركية فإما دعا وإما بسق فيها - قال - فجاشت فسقينا واستقينا ‏.‏ قال ثم إن رسول الله صلى الله عليه وسلم دعانا للبيعة في أصل الشجرة ‏.‏ قال فبايعته أول الناس ثم بايع وبايع حتى إذا كان في وسط من الناس قال ‏"‏ بايع يا سلمة ‏"‏ ‏.‏ قال قلت قد بايعتك يا رسول الله في أول الناس قال ‏"‏ وأيضا ‏"‏ ‏.‏ قال ورآني رسول الله صلى الله عليه وسلم عزلا - يعني ليس معه سلاح - قال فأعطاني رسول الله صلى الله عليه وسلم حجفة أو درقة ثم بايع حتى إذا كان في آخر الناس قال ‏"‏ ألا تبايعني يا سلمة ‏"‏ ‏.‏ قال قلت قد بايعتك يا رسول الله في أول الناس وفي أوسط الناس قال ‏"‏ وأيضا ‏"‏ ‏.‏ قال فبايعته الثالثة ثم قال لي ‏"‏ يا سلمة أين حجفتك أو درقتك التي أعطيتك ‏"‏ ‏.‏ قال قلت يا رسول الله لقيني عمي عامر عزلا فأعطيته إياها - قال - فضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال ‏"‏ إنك كالذي قال الأول اللهم أبغني حبيبا هو أحب إلى من نفسي ‏"‏ ‏.‏ ثم إن المشركين راسلونا الصلح حتى مشى بعضنا في بعض واصطلحنا ‏.‏ قال وكنت تبيعا لطلحة بن عبيد الله أسقي فرسه وأحسه وأخدمه وآكل من طعامه وتركت أهلي ومالي مهاجرا إلى الله ورسوله صلى الله عليه وسلم قال فلما اصطلحنا نحن وأهل مكة واختلط بعضنا ببعض أتيت شجرة فكسحت شوكها فاضطجعت في أصلها - قال - فأتاني أربعة من المشركين من أهل مكة فجعلوا يقعون في رسول الله صلى الله عليه وسلم فأبغضتهم فتحولت إلى شجرة أخرى وعلقوا سلاحهم واضطجعوا فبينما هم كذلك إذ نادى مناد من أسفل الوادي يا للمهاجرين قتل ابن زنيم ‏.‏ قال فاخترطت سيفي ثم شددت على أولئك الأربعة وهم رقود فأخذت سلاحهم ‏.‏ فجعلته ضغثا في يدي قال ثم قلت والذي كرم وجه محمد لا يرفع أحد منكم رأسه إلا ضربت الذي فيه عيناه ‏.‏ قال ثم جئت بهم أسوقهم إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم - قال - وجاء عمي عامر برجل من العبلات يقال له مكرز ‏.‏ يقوده إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم على فرس مجفف في سبعين من المشركين فنظر إليهم رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال ‏"‏ دعوهم يكن لهم بدء الفجور وثناه ‏"‏ فعفا عنهم رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنزل الله ‏{‏ وهو الذي كف أيديهم عنكم وأيديكم عنهم ببطن مكة من بعد أن أظفركم عليهم‏}‏ الآية كلها ‏.‏ قال ثم خرجنا راجعين إلى المدينة فنزلنا منزلا بيننا وبين بني لحيان جبل وهم المشركون فاستغفر رسول الله صلى الله عليه وسلم لمن رقي هذا الجبل الليلة كأنه طليعة للنبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه - قال سلمة - فرقيت تلك الليلة مرتين أو ثلاثا ثم قدمنا المدينة فبعث رسول الله صلى الله عليه وسلم بظهره مع رباح غلام رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا معه وخرجت معه بفرس طلحة أنديه مع الظهر فلما أصبحنا إذا عبد الرحمن الفزاري قد أغار على ظهر رسول الله صلى الله عليه وسلم فاستاقه أجمع وقتل راعيه قال فقلت يا رباح خذ هذا الفرس فأبلغه طلحة بن عبيد الله وأخبر رسول الله صلى الله عليه وسلم أن المشركين قد أغاروا على سرحه - قال - ثم قمت على أكمة فاستقبلت المدينة فناديت ثلاثا يا صباحاه ‏.‏ ثم خرجت في آثار القوم أرميهم بالنبل وأرتجز أقول أنا ابن الأكوع واليوم يوم الرضع فألحق رجلا منهم فأصك سهما في رحله حتى خلص نصل السهم إلى كتفه - قال - قلت خذها وأنا ابن الأكوع واليوم يوم الرضع قال فوالله ما زلت أرميهم وأعقر بهم فإذا رجع إلى فارس أتيت شجرة فجلست في أصلها ثم رميته فعقرت به حتى إذا تضايق الجبل فدخلوا في تضايقه علوت الجبل فجعلت أرديهم بالحجارة - قال - فما زلت كذلك أتبعهم حتى ما خلق الله من بعير من ظهر رسول الله صلى الله عليه وسلم إلا خلفته وراء ظهري وخلوا بيني وبينه ثم اتبعتهم أرميهم حتى ألقوا أكثر من ثلاثين بردة وثلاثين رمحا يستخفون ولا يطرحون شيئا إلا جعلت عليه آراما من الحجارة يعرفها رسول الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه حتى أتوا متضايقا من ثنية فإذا هم قد أتاهم فلان بن بدر الفزاري فجلسوا يتضحون - يعني يتغدون - وجلست على رأس قرن قال الفزاري ما هذا الذي أرى قالوا لقينا من هذا البرح والله ما فارقنا منذ غلس يرمينا حتى انتزع كل شىء في أيدينا ‏.‏ قال فليقم إليه نفر منكم أربعة ‏.‏ قال فصعد إلى منهم أربعة في الجبل - قال - فلما أمكنوني من الكلام - قال - قلت هل تعرفوني قالوا لا ومن أنت قال قلت أنا سلمة بن الأكوع والذي كرم وجه محمد صلى الله عليه وسلم لا أطلب رجلا منكم إلا أدركته ولا يطلبني رجل منكم ‏.‏ فيدركني قال أحدهم أنا أظن ‏.‏ قال فرجعوا فما برحت مكاني حتى رأيت فوارس رسول الله صلى الله عليه وسلم يتخللون الشجر - قال - فإذا أولهم الأخرم الأسدي على إثره أبو قتادة الأنصاري وعلى إثره المقداد بن الأسود الكندي - قال - فأخذت بعنان الأخرم - قال - فولوا مدبرين قلت يا أخرم احذرهم لا يقتطعوك حتى يلحق رسول الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه ‏.‏ قال يا سلمة إن كنت تؤمن بالله واليوم الآخر وتعلم أن الجنة حق والنار حق فلا تحل بيني وبين الشهادة ‏.‏ قال فخليته فالتقى هو وعبد الرحمن - قال - فعقر بعبد الرحمن فرسه وطعنه عبد الرحمن فقتله وتحول على فرسه ولحق أبو قتادة فارس رسول الله صلى الله عليه وسلم بعبد الرحمن فطعنه فقتله فوالذي كرم وجه محمد صلى الله عليه وسلم لتبعتهم أعدو على رجلى حتى ما أرى ورائي من أصحاب محمد صلى الله عليه وسلم ولا غبارهم شيئا حتى يعدلوا قبل غروب الشمس إلى شعب فيه ماء يقال له ذو قرد ليشربوا منه وهم عطاش - قال - فنظروا إلى أعدو وراءهم فحليتهم عنه - يعني أجليتهم عنه - فما ذاقوا منه قطرة - قال - ويخرجون فيشتدون في ثنية - قال - فأعدو فألحق رجلا منهم فأصكه بسهم في نغض كتفه ‏.‏ قال قلت خذها وأنا ابن الأكوع واليوم يوم الرضع قال يا ثكلته أمه أكوعه بكرة قال قلت نعم يا عدو نفسه أكوعك بكرة - قال - وأردوا فرسين على ثنية قال فجئت بهما أسوقهما إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم - قال - ولحقني عامر بسطيحة فيها مذقة من لبن وسطيحة فيها ماء فتوضأت وشربت ثم أتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو على الماء الذي حليتهم عنه فإذا رسول الله صلى الله عليه وسلم قد أخذ تلك الإبل وكل شىء استنقذته من المشركين وكل رمح وبردة وإذا بلال نحر ناقة من الإبل الذي استنقذت من القوم وإذا هو يشوي لرسول الله صلى الله عليه وسلم من كبدها وسنامها - قال - قلت يا رسول الله خلني فأنتخب من القوم مائة رجل فأتبع القوم فلا يبقى منهم مخبر إلا قتلته - قال - فضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى بدت نواجذه في ضوء النار فقال ‏"‏ يا سلمة أتراك كنت فاعلا ‏"‏ ‏.‏ قلت نعم والذي أكرمك ‏.‏ فقال ‏"‏ إنهم الآن ليقرون في أرض غطفان ‏"‏ ‏.‏ قال فجاء رجل من غطفان فقال نحر لهم فلان جزورا فلما كشفوا جلدها رأوا غبارا فقالوا أتاكم القوم فخرجوا هاربين ‏.‏ فلما أصبحنا قال رسول الله صلى الله عليه وسلم ‏"‏ كان خير فرساننا اليوم أبو قتادة وخير رجالتنا سلمة ‏"‏ ‏.‏ قال ثم أعطاني رسول الله صلى الله عليه وسلم سهمين سهم الفارس وسهم الراجل فجمعهما لي جميعا ثم أردفني رسول الله صلى الله عليه وسلم وراءه على العضباء راجعين إلى المدينة - قال - فبينما نحن نسير قال وكان رجل من الأنصار لا يسبق شدا - قال - فجعل يقول ألا مسابق إلى المدينة هل من مسابق فجعل يعيد ذلك - قال - فلما سمعت كلامه قلت أما تكرم كريما ولا تهاب شريفا قال لا إلا أن يكون رسول الله صلى الله عليه وسلم قال قلت يا رسول الله بأبي وأمي ذرني فلأسابق الرجل قال ‏"‏ إن شئت ‏"‏ ‏.‏ قال قلت اذهب إليك وثنيت رجلى فطفرت فعدوت - قال - فربطت عليه شرفا أو شرفين أستبقي نفسي ثم عدوت في إثره فربطت عليه شرفا أو شرفين ثم إني رفعت حتى ألحقه - قال - فأصكه بين كتفيه - قال - قلت قد سبقت والله قال أنا أظن ‏.‏ قال فسبقته إلى المدينة قال فوالله ما لبثنا إلا ثلاث ليال حتى خرجنا إلى خيبر مع رسول الله صلى الله عليه وسلم قال فجعل عمي عامر يرتجز بالقوم تالله لولا الله ما اهتدينا ولا تصدقنا ولا صلينا ونحن عن فضلك ما استغنينا فثبت الأقدام إن لاقينا وأنزلن سكينة علينا فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم ‏"‏ من هذا ‏"‏ ‏.‏ قال أنا عامر ‏.‏ قال ‏"‏ غفر لك ربك ‏"‏ ‏.‏ قال وما استغفر رسول الله صلى الله عليه وسلم لإنسان يخصه إلا استشهد ‏.‏ قال فنادى عمر بن الخطاب وهو على جمل له يا نبي الله لولا ما متعتنا بعامر ‏.‏ قال فلما قدمنا خيبر قال خرج ملكهم مرحب يخطر بسيفه ويقول قد علمت خيبر أني مرحب شاكي السلاح بطل مجرب إذا الحروب أقبلت تلهب قال وبرز له عمي عامر فقال قد علمت خيبر أني عامر شاكي السلاح بطل مغامر قال فاختلفا ضربتين فوقع سيف مرحب في ترس عامر وذهب عامر يسفل له فرجع سيفه على نفسه فقطع أكحله فكانت فيها نفسه ‏.‏ قال سلمة فخرجت فإذا نفر من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم يقولون بطل عمل عامر قتل نفسه قال فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم وأنا أبكي فقلت يا رسول الله بطل عمل عامر قال رسول الله صلى الله عليه وسلم ‏"‏ من قال ذلك ‏"‏ ‏.‏ قال قلت ناس من أصحابك ‏.‏ قال ‏"‏ كذب من قال ذلك بل له أجره مرتين ‏"‏ ‏.‏ ثم أرسلني إلى علي وهو أرمد فقال ‏"‏ لأعطين الراية رجلا يحب الله ورسوله أو يحبه الله ورسوله ‏"‏ ‏.‏ قال فأتيت عليا فجئت به أقوده وهو أرمد حتى أتيت به رسول الله صلى الله عليه وسلم فبسق في عينيه فبرأ وأعطاه الراية وخرج مرحب فقال قد علمت خيبر أني مرحب شاكي السلاح بطل مجرب إذا الحروب أقبلت تلهب فقال علي أنا الذي سمتني أمي حيدره كليث غابات كريه المنظره أوفيهم بالصاع كيل السندره قال فضرب رأس مرحب فقتله ثم كان الفتح على يديه ‏.‏


সহিহ মুসলিম > মহান আল্লাহর বাণী : “তিনি সে সত্তা যিনি তাদের হাতকে তোমাদের উপর থেকে দূরে রেখেছেন”

সহিহ মুসলিম ৪৫৭৩

حدثني عمرو بن محمد الناقد، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس بن مالك، أن ثمانين، رجلا من أهل مكة هبطوا على رسول الله صلى الله عليه وسلم من جبل التنعيم متسلحين يريدون غرة النبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه فأخذهم سلما فاستحياهم فأنزل الله عز وجل ‏{‏ وهو الذي كف أيديهم عنكم وأيديكم عنهم ببطن مكة من بعد أن أظفركم عليهم‏}‏

আনাস ইবনু মালিক (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

মাক্কাবাসীদের মধ্য থেকে সশস্ত্র আশি ব্যক্তি একদা অতর্কিতে তান্‌’ঈম পাহাড় থেকে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর দিকে অবতরণ অরে। তাদের উদ্দেশ্য ছিল রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীগণের অসতর্কতার সুযোগ গ্রহণ। তিনি তাদের বিনা যুদ্ধে বন্দী করলেন, এরপর তাদের জীবিত ছেড়ে দিলেন। তখন আল্লাহ তা’আলা নাযিল করলেন : (অর্থ) “তিনি সে পবিত্র সত্তা, যিনি মক্কা প্রান্তরে তাদের হাতকে তোমাদের উপর থেকে এবং তোমাদের হাতকে তাদের উপর থেকে বিরত রেখেছেন-তাদের উপর তোমাদের বিজয়ী করার পর”-(সুরা ফাত্‌হ ৪৮ : ২৪)। (ই.ফা. ৪৫২৯, ই.সে. ৪৫৩১)

আনাস ইবনু মালিক (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

মাক্কাবাসীদের মধ্য থেকে সশস্ত্র আশি ব্যক্তি একদা অতর্কিতে তান্‌’ঈম পাহাড় থেকে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর দিকে অবতরণ অরে। তাদের উদ্দেশ্য ছিল রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীগণের অসতর্কতার সুযোগ গ্রহণ। তিনি তাদের বিনা যুদ্ধে বন্দী করলেন, এরপর তাদের জীবিত ছেড়ে দিলেন। তখন আল্লাহ তা’আলা নাযিল করলেন : (অর্থ) “তিনি সে পবিত্র সত্তা, যিনি মক্কা প্রান্তরে তাদের হাতকে তোমাদের উপর থেকে এবং তোমাদের হাতকে তাদের উপর থেকে বিরত রেখেছেন-তাদের উপর তোমাদের বিজয়ী করার পর”-(সুরা ফাত্‌হ ৪৮ : ২৪)। (ই.ফা. ৪৫২৯, ই.সে. ৪৫৩১)

حدثني عمرو بن محمد الناقد، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس بن مالك، أن ثمانين، رجلا من أهل مكة هبطوا على رسول الله صلى الله عليه وسلم من جبل التنعيم متسلحين يريدون غرة النبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه فأخذهم سلما فاستحياهم فأنزل الله عز وجل ‏{‏ وهو الذي كف أيديهم عنكم وأيديكم عنهم ببطن مكة من بعد أن أظفركم عليهم‏}‏


সহিহ মুসলিম > পুরুষদের সাথে যুদ্ধে স্ত্রীলোকদের অংশগ্রহণ

সহিহ মুসলিম ৪৫৭৬

حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا جعفر بن سليمان، عن ثابت، عن أنس بن مالك، قال كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يغزو بأم سليم ونسوة من الأنصار معه إذا غزا فيسقين الماء ويداوين الجرحى ‏.‏

আনাস (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

তিনি বলেছেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উম্মু সুলায়ম ও আনসারের কতিপয় মহিলাকে তাঁর সাথে যুদ্ধক্ষেত্রে নিয়ে যেতেন। তারা আর্তদের পানি পান করাতেন এবং আহতদের শুশ্রুষা করতেন। (ই.ফা. ৪৫৩১, ই.সে. ৪৫৩৪)

আনাস (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

তিনি বলেছেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উম্মু সুলায়ম ও আনসারের কতিপয় মহিলাকে তাঁর সাথে যুদ্ধক্ষেত্রে নিয়ে যেতেন। তারা আর্তদের পানি পান করাতেন এবং আহতদের শুশ্রুষা করতেন। (ই.ফা. ৪৫৩১, ই.সে. ৪৫৩৪)

حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا جعفر بن سليمان، عن ثابت، عن أنس بن مالك، قال كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يغزو بأم سليم ونسوة من الأنصار معه إذا غزا فيسقين الماء ويداوين الجرحى ‏.‏


সহিহ মুসলিম ৪৫৭৪

حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس، أن أم سليم، اتخذت يوم حنين خنجرا فكان معها فرآها أبو طلحة فقال يا رسول الله هذه أم سليم معها خنجر فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم ‏"‏ ما هذا الخنجر ‏"‏ ‏.‏ قالت اتخذته إن دنا مني أحد من المشركين بقرت به بطنه ‏.‏ فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم يضحك قالت يا رسول الله اقتل من بعدنا من الطلقاء انهزموا بك ‏.‏ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم ‏"‏ يا أم سليم إن الله قد كفى وأحسن ‏"‏

আনাস (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

(তাঁর মা) উম্মু সুলায়ম হুনায়নের যুদ্ধের দিন একটি ছোরা ধারণ করেছিলেন, যা তার সঙ্গে থাকত। (তার স্বামী) আবূ তালহাহ্‌ তা দেখতে পেয়ে বলেন, হে আল্লাহর রসূল! ইনি উম্মু সুলায়ম। আর তার সাথে একটি ছোরা রয়েছে। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেনঃ এ ছোরা কিসের জন্য? তিনি বললেন, এটি এজন্য নিয়েছি যদি কোন বিধর্মী মুশরিক আমার কাছাকাছি আসে, তবে এ দিয়ে আমি তার পেট চিরে ফেলবো। তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসতে লাগলেন। তখন তিনি (উম্মু সুলায়ম) বললেন, হে আল্লাহর রসূল! (মক্কা বিজয়ের দিন) আমাদের ছাড়া যারা ছাড়া পেয়ে গেছে এবং পরাজয়ের মুখে ইসলাম গ্রহণ করেছে, তাদের হত্যা করে ফেলুন। তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ হে উম্মু সুলায়ম! আল্লাহই (মুশরিকদের বিরুদ্ধে) যথেষ্ট। তিনি (আমাদের প্রতি) সদয় রয়েছেন। (ই.ফা. ৪৫৩০, ই.সে. ৪৫৩২)

আনাস (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

(তাঁর মা) উম্মু সুলায়ম হুনায়নের যুদ্ধের দিন একটি ছোরা ধারণ করেছিলেন, যা তার সঙ্গে থাকত। (তার স্বামী) আবূ তালহাহ্‌ তা দেখতে পেয়ে বলেন, হে আল্লাহর রসূল! ইনি উম্মু সুলায়ম। আর তার সাথে একটি ছোরা রয়েছে। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেনঃ এ ছোরা কিসের জন্য? তিনি বললেন, এটি এজন্য নিয়েছি যদি কোন বিধর্মী মুশরিক আমার কাছাকাছি আসে, তবে এ দিয়ে আমি তার পেট চিরে ফেলবো। তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসতে লাগলেন। তখন তিনি (উম্মু সুলায়ম) বললেন, হে আল্লাহর রসূল! (মক্কা বিজয়ের দিন) আমাদের ছাড়া যারা ছাড়া পেয়ে গেছে এবং পরাজয়ের মুখে ইসলাম গ্রহণ করেছে, তাদের হত্যা করে ফেলুন। তখন রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ হে উম্মু সুলায়ম! আল্লাহই (মুশরিকদের বিরুদ্ধে) যথেষ্ট। তিনি (আমাদের প্রতি) সদয় রয়েছেন। (ই.ফা. ৪৫৩০, ই.সে. ৪৫৩২)

حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس، أن أم سليم، اتخذت يوم حنين خنجرا فكان معها فرآها أبو طلحة فقال يا رسول الله هذه أم سليم معها خنجر فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم ‏"‏ ما هذا الخنجر ‏"‏ ‏.‏ قالت اتخذته إن دنا مني أحد من المشركين بقرت به بطنه ‏.‏ فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم يضحك قالت يا رسول الله اقتل من بعدنا من الطلقاء انهزموا بك ‏.‏ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم ‏"‏ يا أم سليم إن الله قد كفى وأحسن ‏"‏


সহিহ মুসলিম ৪৫৭৭

حدثنا عبد الله بن عبد الرحمن الدارمي، حدثنا عبد الله بن عمرو، - وهو أبو معمر المنقري - حدثنا عبد الوارث، حدثنا عبد العزيز، - وهو ابن صهيب - عن أنس، بن مالك قال لما كان يوم أحد انهزم ناس من الناس عن النبي صلى الله عليه وسلم وأبو طلحة بين يدى النبي صلى الله عليه وسلم مجوب عليه بحجفة - قال - وكان أبو طلحة رجلا راميا شديد النزع وكسر يومئذ قوسين أو ثلاثا - قال - فكان الرجل يمر معه الجعبة من النبل فيقول انثرها لأبي طلحة ‏.‏ قال ويشرف نبي الله صلى الله عليه وسلم ينظر إلى القوم فيقول أبو طلحة يا نبي الله بأبي أنت وأمي لا تشرف لا يصبك سهم من سهام القوم نحري دون نحرك قال ولقد رأيت عائشة بنت أبي بكر وأم سليم وإنهما لمشمرتان أرى خدم سوقهما تنقلان القرب على متونهما ثم تفرغانه في أفواههم ثم ترجعان فتملآنها ثم تجيئان تفرغانه في أفواه القوم ولقد وقع السيف من يدى أبي طلحة إما مرتين وإما ثلاثا من النعاس ‏.‏

আনাস (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

তিনি বলেছেন, উহুদ যুদ্ধের দিন যুদ্ধে পরাস্ত হয়ে কতিপয় লোক নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে আড়াল করে রেখেছিলেন। আর আবূ তালহাহ্‌ (রাঃ) ছিলেন একজন অতি দক্ষ তীরন্দাজ। সেদিন (যুদ্ধে) তিনি দু’ বা তিনটি ধনুক ভেঙ্গে ফেলেন। রাবী বলেন, যখনই কোন ব্যক্তি তীর নিয়ে তার পাশ দিয়ে গমন করতো, তখনই তিনি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন, এগুলো আবূ তালহার জন্য রেখে যাও। রাবী বলেন, যখনই নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাথা তুলে লোকজনের প্রতি তাকাতেন, তখনই আবূ তালহাহ্‌ (রাঃ) বলে উঠতেন, হে আল্লাহর নাবী! আপনার জন্য আমার পিতা-মাতা কুরবান! আপনি মাথা উঠাবেন না; এমন না হয় শত্রুপক্ষের তীর এসে আপনার গায়ে লাগে। আপনার বক্ষ রক্ষার্থে আমার বক্ষ নিবেদিত। আবূ তালহাহ্‌ বলেন, আমি (সেদিন) আবু বাক্‌র কন্যা ‘আয়িশাহ্‌ ও উম্মু সুলায়মকে এমন অবস্থায় দেখেছি, তাঁরা তাঁদের পিঠে পানির মশক বয়ে আনছিলেন। তখন তাঁরা এমনভাবে কাপড় গুছিয়ে চলছিলেন যে, আমি তাদের পায়ে পরিহিত অলংকার দেখতে পাচ্ছিলাম। তাঁরা আহতদের মুখে পানি ঢেলে দিচ্ছিলেন। তাঁরা আবার গিয়ে মশক ভরে পানি এনে আহতদের মুখে পানি দিচ্ছিলেন। আবূ তালহার হাত থেকে সেদিন তন্দ্রার ঘোরে দু’বার বা তিনবার তলোয়ার পড়ে যায়। (ই.ফা. ৪৫৩২, ই.সে. ৪৫৩৫)

আনাস (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

তিনি বলেছেন, উহুদ যুদ্ধের দিন যুদ্ধে পরাস্ত হয়ে কতিপয় লোক নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে আড়াল করে রেখেছিলেন। আর আবূ তালহাহ্‌ (রাঃ) ছিলেন একজন অতি দক্ষ তীরন্দাজ। সেদিন (যুদ্ধে) তিনি দু’ বা তিনটি ধনুক ভেঙ্গে ফেলেন। রাবী বলেন, যখনই কোন ব্যক্তি তীর নিয়ে তার পাশ দিয়ে গমন করতো, তখনই তিনি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন, এগুলো আবূ তালহার জন্য রেখে যাও। রাবী বলেন, যখনই নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাথা তুলে লোকজনের প্রতি তাকাতেন, তখনই আবূ তালহাহ্‌ (রাঃ) বলে উঠতেন, হে আল্লাহর নাবী! আপনার জন্য আমার পিতা-মাতা কুরবান! আপনি মাথা উঠাবেন না; এমন না হয় শত্রুপক্ষের তীর এসে আপনার গায়ে লাগে। আপনার বক্ষ রক্ষার্থে আমার বক্ষ নিবেদিত। আবূ তালহাহ্‌ বলেন, আমি (সেদিন) আবু বাক্‌র কন্যা ‘আয়িশাহ্‌ ও উম্মু সুলায়মকে এমন অবস্থায় দেখেছি, তাঁরা তাঁদের পিঠে পানির মশক বয়ে আনছিলেন। তখন তাঁরা এমনভাবে কাপড় গুছিয়ে চলছিলেন যে, আমি তাদের পায়ে পরিহিত অলংকার দেখতে পাচ্ছিলাম। তাঁরা আহতদের মুখে পানি ঢেলে দিচ্ছিলেন। তাঁরা আবার গিয়ে মশক ভরে পানি এনে আহতদের মুখে পানি দিচ্ছিলেন। আবূ তালহার হাত থেকে সেদিন তন্দ্রার ঘোরে দু’বার বা তিনবার তলোয়ার পড়ে যায়। (ই.ফা. ৪৫৩২, ই.সে. ৪৫৩৫)

حدثنا عبد الله بن عبد الرحمن الدارمي، حدثنا عبد الله بن عمرو، - وهو أبو معمر المنقري - حدثنا عبد الوارث، حدثنا عبد العزيز، - وهو ابن صهيب - عن أنس، بن مالك قال لما كان يوم أحد انهزم ناس من الناس عن النبي صلى الله عليه وسلم وأبو طلحة بين يدى النبي صلى الله عليه وسلم مجوب عليه بحجفة - قال - وكان أبو طلحة رجلا راميا شديد النزع وكسر يومئذ قوسين أو ثلاثا - قال - فكان الرجل يمر معه الجعبة من النبل فيقول انثرها لأبي طلحة ‏.‏ قال ويشرف نبي الله صلى الله عليه وسلم ينظر إلى القوم فيقول أبو طلحة يا نبي الله بأبي أنت وأمي لا تشرف لا يصبك سهم من سهام القوم نحري دون نحرك قال ولقد رأيت عائشة بنت أبي بكر وأم سليم وإنهما لمشمرتان أرى خدم سوقهما تنقلان القرب على متونهما ثم تفرغانه في أفواههم ثم ترجعان فتملآنها ثم تجيئان تفرغانه في أفواه القوم ولقد وقع السيف من يدى أبي طلحة إما مرتين وإما ثلاثا من النعاس ‏.‏


সহিহ মুসলিম ৪৫৭৫

وحدثنيه محمد بن حاتم، حدثنا بهز، حدثنا حماد بن سلمة، أخبرنا إسحاق بن، عبد الله بن أبي طلحة عن أنس بن مالك، في قصة أم سليم عن النبي صلى الله عليه وسلم مثل حديث ثابت

আনাস ইবনু মালিক (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

উম্মু সুলায়মের কাহিনী বর্ণনা প্রসঙ্গে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে পূর্বে বর্ণিত হাদীসের অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। (ই.ফা. ৪৫৩০, ই.সে. ৪৫৩৩)

আনাস ইবনু মালিক (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

উম্মু সুলায়মের কাহিনী বর্ণনা প্রসঙ্গে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে পূর্বে বর্ণিত হাদীসের অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। (ই.ফা. ৪৫৩০, ই.সে. ৪৫৩৩)

وحدثنيه محمد بن حاتم، حدثنا بهز، حدثنا حماد بن سلمة، أخبرنا إسحاق بن، عبد الله بن أبي طلحة عن أنس بن مالك، في قصة أم سليم عن النبي صلى الله عليه وسلم مثل حديث ثابت


সহিহ মুসলিম > জিহাদ অভিযানে অংশগ্রহণকারী মহিলাদের জন্য গনীমাতের কোন অংশ নেই, তবে স্বেচ্ছায় তাদের কিছু দেয়া এবং শত্রুপক্ষের শিশুদের হত্যা করা নিষিদ্ধ

সহিহ মুসলিম ৪৫৮৩

وحدثني أبو كريب، حدثنا أبو أسامة، حدثنا زائدة، حدثنا سليمان الأعمش، عن المختار بن صيفي، عن يزيد بن هرمز، قال كتب نجدة إلى ابن عباس ‏.‏ فذكر بعض الحديث ولم يتم القصة كإتمام من ذكرنا حديثهم ‏.‏

ইয়াযীদ ইবনু হুরমুয (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ

তিনি বলেন, নাজদাহ্‌ ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ)-কে লিখেছিলেন, বর্ণনাকারী এ হাদীসের কিয়দংশ রিওয়ায়াত করেছেন। তবে তাঁদের হাদীসসমূহের মতো তিনি ঘটনা হুবহু বর্ননা করেননি। (ই.ফা. ৪৫৩৮, ই.সে. ৪৫৪১)

ইয়াযীদ ইবনু হুরমুয (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ

তিনি বলেন, নাজদাহ্‌ ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ)-কে লিখেছিলেন, বর্ণনাকারী এ হাদীসের কিয়দংশ রিওয়ায়াত করেছেন। তবে তাঁদের হাদীসসমূহের মতো তিনি ঘটনা হুবহু বর্ননা করেননি। (ই.ফা. ৪৫৩৮, ই.সে. ৪৫৪১)

وحدثني أبو كريب، حدثنا أبو أسامة، حدثنا زائدة، حدثنا سليمان الأعمش، عن المختار بن صيفي، عن يزيد بن هرمز، قال كتب نجدة إلى ابن عباس ‏.‏ فذكر بعض الحديث ولم يتم القصة كإتمام من ذكرنا حديثهم ‏.‏


সহিহ মুসলিম ৪৫৮১

وحدثناه عبد الرحمن بن بشر العبدي، حدثنا سفيان، حدثنا إسماعيل بن أمية، عن سعيد بن أبي سعيد، عن يزيد بن هرمز، قال كتب نجدة إلى ابن عباس ‏.‏ وساق الحديث بمثله ‏.‏ قال أبو إسحاق حدثني عبد الرحمن بن بشر، حدثنا سفيان، بهذا الحديث بطوله

ইয়াযীদ ইবনু হুরমু্য (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ

তিনি বলেন নাজদাহ্‌ (রহঃ) ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ)-এর কাছে পত্র লিখেন এবং অনুরূপ হাদীস বর্ননা করেন। আবূ ইসহাক্‌ বলেন, সুফ্‌ইয়ান (রহঃ) অনুরূপ হাদীস বিস্তারিত বর্ণনা করেন। (ই.ফা. ৪৫৩৬, ই.সে. ৪৫৩৯)

ইয়াযীদ ইবনু হুরমু্য (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ

তিনি বলেন নাজদাহ্‌ (রহঃ) ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ)-এর কাছে পত্র লিখেন এবং অনুরূপ হাদীস বর্ননা করেন। আবূ ইসহাক্‌ বলেন, সুফ্‌ইয়ান (রহঃ) অনুরূপ হাদীস বিস্তারিত বর্ণনা করেন। (ই.ফা. ৪৫৩৬, ই.সে. ৪৫৩৯)

وحدثناه عبد الرحمن بن بشر العبدي، حدثنا سفيان، حدثنا إسماعيل بن أمية، عن سعيد بن أبي سعيد، عن يزيد بن هرمز، قال كتب نجدة إلى ابن عباس ‏.‏ وساق الحديث بمثله ‏.‏ قال أبو إسحاق حدثني عبد الرحمن بن بشر، حدثنا سفيان، بهذا الحديث بطوله


সহিহ মুসলিম ৪৫৭৮

حدثنا عبد الله بن مسلمة بن قعنب، حدثنا سليمان، - يعني ابن بلال - عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن يزيد بن هرمز، أن نجدة، كتب إلى ابن عباس يسأله عن خمس، خلال ‏.‏ فقال ابن عباس لولا أن أكتم، علما ما كتبت إليه ‏.‏ كتب إليه نجدة أما بعد فأخبرني هل كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يغزو بالنساء وهل كان يضرب لهن بسهم وهل كان يقتل الصبيان ومتى ينقضي يتم اليتيم وعن الخمس لمن هو فكتب إليه ابن عباس كتبت تسألني هل كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يغزو بالنساء وقد كان يغزو بهن فيداوين الجرحى ويحذين من الغنيمة وأما بسهم فلم يضرب لهن وإن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يكن يقتل الصبيان فلا تقتل الصبيان وكتبت تسألني متى ينقضي يتم اليتيم فلعمري إن الرجل لتنبت لحيته وإنه لضعيف الأخذ لنفسه ضعيف العطاء منها فإذا أخذ لنفسه من صالح ما يأخذ الناس فقد ذهب عنه اليتم وكتبت تسألني عن الخمس لمن هو وإنا كنا نقول هو لنا ‏.‏ فأبى علينا قومنا ذاك ‏.‏

ইয়াযীদ ইবনু হুরমুয (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ

নাজদাহ্‌ (রহঃ) ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ) -কে পাঁচটি ব্যাপারে প্রশ্ন করে পত্র লিখলেন। তখন ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ) বললেন, যদি আমি ‘ইল্‌ম গোপনকারী হওয়ার আশংকা না করতাম তাহলে আমি তার কাছে জবাব লিখতাম না। নাজ্‌দাহ সে পত্রে তাঁকে লিখেছিলেন, হাম্‌দ ও সালাতের পর আমাকে অবহিত করুন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি মহিলাদেরকে নিয়ে যুদ্ধযাত্রা করতেন? তিনি তাদেরকে কি গনীমাতের ভাগ দিতেন? তিনি কি শত্রুপক্ষের শিশুদের হত্যা করতেন? আর কখন ইয়াতীমের ইয়াতীম অবস্থার সমাপ্তি হয়? আর গনীমাতের এক পঞ্চমাংশের হকদার কারা? জবাবে ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ) লিখলেন, তুমি আমাকে লিখিত প্রশ্ন করেছো যে, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি মহিলাদেরকে নিয়ে যুদ্ধযাত্রা করতেন? হ্যাঁ, তিনি তাদেরকে নিয়ে যুদ্ধ যাত্রা করতেন এবং তাঁরা আহতদের সেবা-শুশ্রুষা করতেন এবং গনীমাতের মাল থেকে তাদেরকে পুরস্কৃত করা হতো, কিন্তু গনীমাতের ভাগ তাদের জন্য বরাদ্দ করা হতো না। আর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কখনও শিশুদের হত্যা করতেন না। সুতরাং তুমিও শিশুদেরকে হত্যা করবে না। আর তোমার চিঠিতে আমাকে এও প্রশ্ন করেছ যে, কখন ইয়াতীমের ইয়াতীম অবস্থা সমাপ্ত হয়? আমার জীবনের শপথ! অনেক সময় কোন ব্যক্তির দাড়ি গজিয়ে যায়; অথচ সে তার নিজের হক গ্রহণে দুর্বল থাকে এবং অন্য কারো হক প্রদানের বেলায়ও দুর্বল থাকে। সুতরাং যখন সে লোকদের মতো নিজের অধিকার বুঝে নিতে পারে তখনই তার ইয়াতীম অবস্থার সমাপ্তি হয়। আর তুমি লিখেছ, গনীমাতের এক পঞ্চমাংশ কাদের প্রাপ্য? আমরা বলি, তা আমাদের (আহলে বায়তদের) জন্যই, কিন্তু আমাদের গোত্রের লোকেরা (বানূ উমাইয়াহ্‌) তা অস্বীকার করছে। (ই.ফা. ৪৫৩৩, ই.সে. ৪৫৩৬)

ইয়াযীদ ইবনু হুরমুয (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ

নাজদাহ্‌ (রহঃ) ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ) -কে পাঁচটি ব্যাপারে প্রশ্ন করে পত্র লিখলেন। তখন ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ) বললেন, যদি আমি ‘ইল্‌ম গোপনকারী হওয়ার আশংকা না করতাম তাহলে আমি তার কাছে জবাব লিখতাম না। নাজ্‌দাহ সে পত্রে তাঁকে লিখেছিলেন, হাম্‌দ ও সালাতের পর আমাকে অবহিত করুন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি মহিলাদেরকে নিয়ে যুদ্ধযাত্রা করতেন? তিনি তাদেরকে কি গনীমাতের ভাগ দিতেন? তিনি কি শত্রুপক্ষের শিশুদের হত্যা করতেন? আর কখন ইয়াতীমের ইয়াতীম অবস্থার সমাপ্তি হয়? আর গনীমাতের এক পঞ্চমাংশের হকদার কারা? জবাবে ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ) লিখলেন, তুমি আমাকে লিখিত প্রশ্ন করেছো যে, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি মহিলাদেরকে নিয়ে যুদ্ধযাত্রা করতেন? হ্যাঁ, তিনি তাদেরকে নিয়ে যুদ্ধ যাত্রা করতেন এবং তাঁরা আহতদের সেবা-শুশ্রুষা করতেন এবং গনীমাতের মাল থেকে তাদেরকে পুরস্কৃত করা হতো, কিন্তু গনীমাতের ভাগ তাদের জন্য বরাদ্দ করা হতো না। আর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কখনও শিশুদের হত্যা করতেন না। সুতরাং তুমিও শিশুদেরকে হত্যা করবে না। আর তোমার চিঠিতে আমাকে এও প্রশ্ন করেছ যে, কখন ইয়াতীমের ইয়াতীম অবস্থা সমাপ্ত হয়? আমার জীবনের শপথ! অনেক সময় কোন ব্যক্তির দাড়ি গজিয়ে যায়; অথচ সে তার নিজের হক গ্রহণে দুর্বল থাকে এবং অন্য কারো হক প্রদানের বেলায়ও দুর্বল থাকে। সুতরাং যখন সে লোকদের মতো নিজের অধিকার বুঝে নিতে পারে তখনই তার ইয়াতীম অবস্থার সমাপ্তি হয়। আর তুমি লিখেছ, গনীমাতের এক পঞ্চমাংশ কাদের প্রাপ্য? আমরা বলি, তা আমাদের (আহলে বায়তদের) জন্যই, কিন্তু আমাদের গোত্রের লোকেরা (বানূ উমাইয়াহ্‌) তা অস্বীকার করছে। (ই.ফা. ৪৫৩৩, ই.সে. ৪৫৩৬)

حدثنا عبد الله بن مسلمة بن قعنب، حدثنا سليمان، - يعني ابن بلال - عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن يزيد بن هرمز، أن نجدة، كتب إلى ابن عباس يسأله عن خمس، خلال ‏.‏ فقال ابن عباس لولا أن أكتم، علما ما كتبت إليه ‏.‏ كتب إليه نجدة أما بعد فأخبرني هل كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يغزو بالنساء وهل كان يضرب لهن بسهم وهل كان يقتل الصبيان ومتى ينقضي يتم اليتيم وعن الخمس لمن هو فكتب إليه ابن عباس كتبت تسألني هل كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يغزو بالنساء وقد كان يغزو بهن فيداوين الجرحى ويحذين من الغنيمة وأما بسهم فلم يضرب لهن وإن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يكن يقتل الصبيان فلا تقتل الصبيان وكتبت تسألني متى ينقضي يتم اليتيم فلعمري إن الرجل لتنبت لحيته وإنه لضعيف الأخذ لنفسه ضعيف العطاء منها فإذا أخذ لنفسه من صالح ما يأخذ الناس فقد ذهب عنه اليتم وكتبت تسألني عن الخمس لمن هو وإنا كنا نقول هو لنا ‏.‏ فأبى علينا قومنا ذاك ‏.‏


সহিহ মুসলিম ৪৫৭৯

حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة، وإسحاق بن إبراهيم، كلاهما عن حاتم بن إسماعيل، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن يزيد بن هرمز، أن نجدة، كتب إلى ابن عباس يسأله عن خلال، ‏.‏ بمثل حديث سليمان بن بلال غير أن في، حديث حاتم وإن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يكن يقتل الصبيان فلا تقتل الصبيان إلا أن تكون تعلم ما علم الخضر من الصبي الذي قتل ‏.‏ وزاد إسحاق في حديثه عن حاتم وتميز المؤمن فتقتل الكافر وتدع المؤمن ‏.‏

ইবনূ হুরমু্য (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ

নাজদাহ্‌ (রহঃ) ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ) -কে কয়েকটি ব্যাপারে প্রশ্ন করে পত্র লিখেন। পরবর্তী অংশ সুলাইমান ইবনু বিলালের হাদীসের অনুরূপ। তবে হাতিমের এ হাদীসে রয়েছে যে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শিশুদেরকে হত্যা করতেন না। সুতরাং তুমিও বালকদেরকে হত্যা করবে না। তবে যদি তুমি তা জানতে পারো, যা ‘খিযির’ সেই বালক সম্পর্কে জানতে পেরেছিলেন, যাকে তিনি হত্যা করেছিলেন, তবে স্বতন্ত্র কথা। এ হাদীসের একজন রাবী ইসহাক্‌ (রহঃ) তাঁর বর্ণনায় হাদীসের সূত্রে এতটুকু বাড়িয়েছেন-আর যদি তুমি বেছে বের করতে পারো মু’মিনকে, তবে তুমি কাফিরকে হত্যা করবে এবং মু’মিনকে ছেড়ে দিবে। (ই.ফা. ৪৫৩৪, ই.সে. ৪৫৩৭)

ইবনূ হুরমু্য (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ

নাজদাহ্‌ (রহঃ) ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ) -কে কয়েকটি ব্যাপারে প্রশ্ন করে পত্র লিখেন। পরবর্তী অংশ সুলাইমান ইবনু বিলালের হাদীসের অনুরূপ। তবে হাতিমের এ হাদীসে রয়েছে যে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শিশুদেরকে হত্যা করতেন না। সুতরাং তুমিও বালকদেরকে হত্যা করবে না। তবে যদি তুমি তা জানতে পারো, যা ‘খিযির’ সেই বালক সম্পর্কে জানতে পেরেছিলেন, যাকে তিনি হত্যা করেছিলেন, তবে স্বতন্ত্র কথা। এ হাদীসের একজন রাবী ইসহাক্‌ (রহঃ) তাঁর বর্ণনায় হাদীসের সূত্রে এতটুকু বাড়িয়েছেন-আর যদি তুমি বেছে বের করতে পারো মু’মিনকে, তবে তুমি কাফিরকে হত্যা করবে এবং মু’মিনকে ছেড়ে দিবে। (ই.ফা. ৪৫৩৪, ই.সে. ৪৫৩৭)

حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة، وإسحاق بن إبراهيم، كلاهما عن حاتم بن إسماعيل، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن يزيد بن هرمز، أن نجدة، كتب إلى ابن عباس يسأله عن خلال، ‏.‏ بمثل حديث سليمان بن بلال غير أن في، حديث حاتم وإن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يكن يقتل الصبيان فلا تقتل الصبيان إلا أن تكون تعلم ما علم الخضر من الصبي الذي قتل ‏.‏ وزاد إسحاق في حديثه عن حاتم وتميز المؤمن فتقتل الكافر وتدع المؤمن ‏.‏


সহিহ মুসলিম ৪৫৮০

وحدثنا ابن أبي عمر، حدثنا سفيان، عن إسماعيل بن أمية، عن سعيد المقبري، عن يزيد بن هرمز، قال كتب نجدة بن عامر الحروري إلى ابن عباس يسأله عن العبد، والمرأة يحضران المغنم هل يقسم لهما وعن قتل الولدان وعن اليتيم متى ينقطع عنه اليتم وعن ذوي القربى من هم فقال ليزيد اكتب إليه فلولا أن يقع في أحموقة ما كتبت إليه اكتب إنك كتبت تسألني عن المرأة والعبد يحضران المغنم هل يقسم لهما شىء وإنه ليس لهما شىء إلا أن يحذيا وكتبت تسألني عن قتل الولدان وإن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يقتلهم وأنت فلا تقتلهم إلا أن تعلم منهم ما علم صاحب موسى من الغلام الذي قتله وكتبت تسألني عن اليتيم متى ينقطع عنه اسم اليتم وإنه لا ينقطع عنه اسم اليتم حتى يبلغ ويؤنس منه رشد وكتبت تسألني عن ذوي القربى من هم وإنا زعمنا أنا هم فأبى ذلك علينا قومنا ‏.‏

ইয়াযীদ ইবনু হুরমুয (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ

তিনি বলেন যে, নাজদাহ্‌ ইবনু ‘আম্‌র হারূরী ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ) -এর নিকট পত্র লিখে জানতে চাইলেন, জিহাদে উপস্থিত গোলাম ও মহিলাদের গনীমাতের অংশ দেয়া হবে কি? আর (শত্রুপক্ষের) শিশুদের হত্যা সম্পর্কে এবং ইয়াতীম সম্পর্কে যে, কখন তার ইয়াতীম অবস্থার সমাপ্তি ঘটে? এবং ‘যাবিল কুরবা’ বা নিকটাত্মীয় কারা? তখন তিনি ইয়াযীদকে বললেন, তুমি তাকে লিখ, তার নির্বুদ্ধিতায় পতিত হবার আশঙ্কা না থাকলে আমি তাকে পত্র লিখাতাম না। লিখ, তুমি আমাকে লিখেছো এ প্রশ্ন করে যে, যারা জিহাদে যোগ দিয়েছে এমন নারী এবং গোলামকে কি গনীমাতের কিছু দেয়া হবে? তাদের (নির্ধারিত) কিছুই দেয়া হবে না। তবে সবার কাছ থেকে কিছু কিছু নিয়ে (বখ্‌শিশরূপে) দেয়া হবে। তুমি আমকে প্রশ্ন করে লিখেছ শিশুদের হত্যা সম্পর্কে। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কখনও তাদেরকে হত্যা করেন নি এবং তুমিও তাদেরকে হত্যা করবে না। তবে (তা স্বতন্ত্র কথা) যদি তুমি তাদের ব্যাপারে তা জানতে পারো যা মূসা (‘আঃ)-এর সঙ্গী [খিযির (আঃ)] জানতে পেরেছিলেন, যে ছেলেটিকে তিনি হত্যা করেছিলেন তার সম্পর্কে। তার ইয়াতীম নাম ঘুচবে না যতক্ষণ না সে বালিগ হবে এবং তার মধ্যে বুদ্ধিমত্তা পরিলক্ষিত হবে। আর তুমি আমাকে ‘যাবিল কুরবা’ সম্বন্ধে প্রশ্ন করে লিখেছ যে, তারা কারা? আমরা মনে করি, আমরাই তাঁরা। কিন্তু আমাদের লোকেরা তা অস্বীকার করেছে। (ই.ফা. ৪৫৩৫, ই.সে. ৪৫৩৮)

ইয়াযীদ ইবনু হুরমুয (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ

তিনি বলেন যে, নাজদাহ্‌ ইবনু ‘আম্‌র হারূরী ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ) -এর নিকট পত্র লিখে জানতে চাইলেন, জিহাদে উপস্থিত গোলাম ও মহিলাদের গনীমাতের অংশ দেয়া হবে কি? আর (শত্রুপক্ষের) শিশুদের হত্যা সম্পর্কে এবং ইয়াতীম সম্পর্কে যে, কখন তার ইয়াতীম অবস্থার সমাপ্তি ঘটে? এবং ‘যাবিল কুরবা’ বা নিকটাত্মীয় কারা? তখন তিনি ইয়াযীদকে বললেন, তুমি তাকে লিখ, তার নির্বুদ্ধিতায় পতিত হবার আশঙ্কা না থাকলে আমি তাকে পত্র লিখাতাম না। লিখ, তুমি আমাকে লিখেছো এ প্রশ্ন করে যে, যারা জিহাদে যোগ দিয়েছে এমন নারী এবং গোলামকে কি গনীমাতের কিছু দেয়া হবে? তাদের (নির্ধারিত) কিছুই দেয়া হবে না। তবে সবার কাছ থেকে কিছু কিছু নিয়ে (বখ্‌শিশরূপে) দেয়া হবে। তুমি আমকে প্রশ্ন করে লিখেছ শিশুদের হত্যা সম্পর্কে। রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কখনও তাদেরকে হত্যা করেন নি এবং তুমিও তাদেরকে হত্যা করবে না। তবে (তা স্বতন্ত্র কথা) যদি তুমি তাদের ব্যাপারে তা জানতে পারো যা মূসা (‘আঃ)-এর সঙ্গী [খিযির (আঃ)] জানতে পেরেছিলেন, যে ছেলেটিকে তিনি হত্যা করেছিলেন তার সম্পর্কে। তার ইয়াতীম নাম ঘুচবে না যতক্ষণ না সে বালিগ হবে এবং তার মধ্যে বুদ্ধিমত্তা পরিলক্ষিত হবে। আর তুমি আমাকে ‘যাবিল কুরবা’ সম্বন্ধে প্রশ্ন করে লিখেছ যে, তারা কারা? আমরা মনে করি, আমরাই তাঁরা। কিন্তু আমাদের লোকেরা তা অস্বীকার করেছে। (ই.ফা. ৪৫৩৫, ই.সে. ৪৫৩৮)

وحدثنا ابن أبي عمر، حدثنا سفيان، عن إسماعيل بن أمية، عن سعيد المقبري، عن يزيد بن هرمز، قال كتب نجدة بن عامر الحروري إلى ابن عباس يسأله عن العبد، والمرأة يحضران المغنم هل يقسم لهما وعن قتل الولدان وعن اليتيم متى ينقطع عنه اليتم وعن ذوي القربى من هم فقال ليزيد اكتب إليه فلولا أن يقع في أحموقة ما كتبت إليه اكتب إنك كتبت تسألني عن المرأة والعبد يحضران المغنم هل يقسم لهما شىء وإنه ليس لهما شىء إلا أن يحذيا وكتبت تسألني عن قتل الولدان وإن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يقتلهم وأنت فلا تقتلهم إلا أن تعلم منهم ما علم صاحب موسى من الغلام الذي قتله وكتبت تسألني عن اليتيم متى ينقطع عنه اسم اليتم وإنه لا ينقطع عنه اسم اليتم حتى يبلغ ويؤنس منه رشد وكتبت تسألني عن ذوي القربى من هم وإنا زعمنا أنا هم فأبى ذلك علينا قومنا ‏.‏


সহিহ মুসলিম ৪৫৮২

حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا وهب بن جرير بن حازم، حدثني أبي قال، سمعت قيسا، يحدث عن يزيد بن هرمز، ح وحدثني محمد بن حاتم، - واللفظ له - قال حدثنا بهز، حدثنا جرير بن حازم، حدثني قيس بن سعد، عن يزيد بن هرمز، قال كتب نجدة بن عامر إلى ابن عباس قال فشهدت ابن عباس حين قرأ كتابه وحين كتب جوابه وقال ابن عباس والله لولا أن أرده عن نتن يقع فيه ما كتبت إليه ولا نعمة عين قال فكتب إليه إنك سألت عن سهم ذي القربى الذي ذكر الله من هم وإنا كنا نرى أن قرابة رسول الله صلى الله عليه وسلم هم نحن فأبى ذلك علينا قومنا وسألت عن اليتيم متى ينقضي يتمه وإنه إذا بلغ النكاح وأونس منه رشد ودفع إليه ماله فقد انقضى يتمه وسألت هل كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقتل من صبيان المشركين أحدا فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يكن يقتل منهم أحدا وأنت فلا تقتل منهم أحدا إلا أن تكون تعلم منهم ما علم الخضر من الغلام حين قتله وسألت عن المرأة والعبد هل كان لهما سهم معلوم إذا حضروا البأس فإنهم لم يكن لهم سهم معلوم إلا أن يحذيا من غنائم القوم

কায়স (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

তিনি বলেন, ইয়াযীদ ইবনু হুরমুযকে আমি এ হাদীস বর্ণনা করতে শুনেছি। মুহাম্মাদ ইবনু হাতিম ইয়াযীদ ইবনু হুরমুয হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, নাজদাহ্‌ ইবনু ‘আমির ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ) -কে পত্র লিখেন। রাবী বলেন, ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ) যখন তাঁর পত্রখানি পাঠ করেন এবং যখন তিনি তার জবাব লিখেন তখন আমি তাঁর (ইবনু ‘আব্বাস) সামনেই উপস্থিত ছিলাম। ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ) বলেন, যদি সে নাপাকীতে (অজ্ঞানতা প্রসূত কথাবার্তায়) পতিত হবে বলে আশংকা না করতাম তবে আমি তার কাছে জবাব লিখতাম না। তার চোখ কোন দিন না জুড়াক (অর্থাৎ আল্লাহ তাকে খুশী না রাখুক, তার বাতিল ‘আকীদার দরুন এ বদদু’আ করলেন)। রাবী (ইয়াযীদ) বলেন, তারপর তিনি তাকে লিখলেন, তুমি আমাকে জিজ্ঞেস করেছ, আল্লাহ (গনীমাতের অংশ সংক্রান্ত আয়াতে) যাদের সম্পর্কে উল্লেখ করেছেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর ঘনিষ্ঠজন কারা? আমরা মনে করি, আমরাই রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সে ঘনিষ্ঠজন। কিন্তু আমাদের গোত্রের লোকেরা তা অস্বীকার করে। আর তুমি ইয়াতীম সম্পর্কে প্রশ্ন করেছ যে, কখন তার ইয়াতীম অবস্থার সমাপ্তি ঘটে? যখন সে বিবাহযোগ্য হয়, তার মধ্যে বুদ্ধি বিবেচনা পরিলক্ষিত হয় এবং তার সম্পদ তার কাছে প্রত্যর্পণ করা হয়, তখন তার ইয়াতীম অবস্থার অবসান ঘটে। আর তুমি প্রশ্ন করেছ, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি মুশরিকদের কোন শিশুকে হত্যা করতেন? রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনদিন তাদের শিশুদের কাউকে হত্যা করেন নি। সুতরাং তুমিও তাদের কাউকে হত্যা করবে না। অবশ্য তুমি যদি অবগত হও, যা অবগত হয়েছিলেন খিযির (‘আঃ) সে বালকটির সম্পর্কে যখন তিনি তাকে হত্যা করেন। আর তুমি প্রশ্ন করেছ, নারী ও গোলাম সম্পর্কে, যখন তারা যুদ্ধে উপস্থিত থাকে, তাদের জন্য নির্ধারিত অংশ নেই। তবে লোকদের গনীমাতের মাল থেকে তারা উপঢৌকন হিসেবে পায়। (ই.ফা. ৪৫৩৭, ই.সে. ৪৫৪০)

কায়স (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

তিনি বলেন, ইয়াযীদ ইবনু হুরমুযকে আমি এ হাদীস বর্ণনা করতে শুনেছি। মুহাম্মাদ ইবনু হাতিম ইয়াযীদ ইবনু হুরমুয হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, নাজদাহ্‌ ইবনু ‘আমির ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ) -কে পত্র লিখেন। রাবী বলেন, ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ) যখন তাঁর পত্রখানি পাঠ করেন এবং যখন তিনি তার জবাব লিখেন তখন আমি তাঁর (ইবনু ‘আব্বাস) সামনেই উপস্থিত ছিলাম। ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ) বলেন, যদি সে নাপাকীতে (অজ্ঞানতা প্রসূত কথাবার্তায়) পতিত হবে বলে আশংকা না করতাম তবে আমি তার কাছে জবাব লিখতাম না। তার চোখ কোন দিন না জুড়াক (অর্থাৎ আল্লাহ তাকে খুশী না রাখুক, তার বাতিল ‘আকীদার দরুন এ বদদু’আ করলেন)। রাবী (ইয়াযীদ) বলেন, তারপর তিনি তাকে লিখলেন, তুমি আমাকে জিজ্ঞেস করেছ, আল্লাহ (গনীমাতের অংশ সংক্রান্ত আয়াতে) যাদের সম্পর্কে উল্লেখ করেছেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর ঘনিষ্ঠজন কারা? আমরা মনে করি, আমরাই রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সে ঘনিষ্ঠজন। কিন্তু আমাদের গোত্রের লোকেরা তা অস্বীকার করে। আর তুমি ইয়াতীম সম্পর্কে প্রশ্ন করেছ যে, কখন তার ইয়াতীম অবস্থার সমাপ্তি ঘটে? যখন সে বিবাহযোগ্য হয়, তার মধ্যে বুদ্ধি বিবেচনা পরিলক্ষিত হয় এবং তার সম্পদ তার কাছে প্রত্যর্পণ করা হয়, তখন তার ইয়াতীম অবস্থার অবসান ঘটে। আর তুমি প্রশ্ন করেছ, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি মুশরিকদের কোন শিশুকে হত্যা করতেন? রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনদিন তাদের শিশুদের কাউকে হত্যা করেন নি। সুতরাং তুমিও তাদের কাউকে হত্যা করবে না। অবশ্য তুমি যদি অবগত হও, যা অবগত হয়েছিলেন খিযির (‘আঃ) সে বালকটির সম্পর্কে যখন তিনি তাকে হত্যা করেন। আর তুমি প্রশ্ন করেছ, নারী ও গোলাম সম্পর্কে, যখন তারা যুদ্ধে উপস্থিত থাকে, তাদের জন্য নির্ধারিত অংশ নেই। তবে লোকদের গনীমাতের মাল থেকে তারা উপঢৌকন হিসেবে পায়। (ই.ফা. ৪৫৩৭, ই.সে. ৪৫৪০)

حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا وهب بن جرير بن حازم، حدثني أبي قال، سمعت قيسا، يحدث عن يزيد بن هرمز، ح وحدثني محمد بن حاتم، - واللفظ له - قال حدثنا بهز، حدثنا جرير بن حازم، حدثني قيس بن سعد، عن يزيد بن هرمز، قال كتب نجدة بن عامر إلى ابن عباس قال فشهدت ابن عباس حين قرأ كتابه وحين كتب جوابه وقال ابن عباس والله لولا أن أرده عن نتن يقع فيه ما كتبت إليه ولا نعمة عين قال فكتب إليه إنك سألت عن سهم ذي القربى الذي ذكر الله من هم وإنا كنا نرى أن قرابة رسول الله صلى الله عليه وسلم هم نحن فأبى ذلك علينا قومنا وسألت عن اليتيم متى ينقضي يتمه وإنه إذا بلغ النكاح وأونس منه رشد ودفع إليه ماله فقد انقضى يتمه وسألت هل كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقتل من صبيان المشركين أحدا فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يكن يقتل منهم أحدا وأنت فلا تقتل منهم أحدا إلا أن تكون تعلم منهم ما علم الخضر من الغلام حين قتله وسألت عن المرأة والعبد هل كان لهما سهم معلوم إذا حضروا البأس فإنهم لم يكن لهم سهم معلوم إلا أن يحذيا من غنائم القوم


সহিহ মুসলিম ৪৫৮৪

حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة، حدثنا عبد الرحيم بن سليمان، عن هشام، عن حفصة، بنت سيرين عن أم عطية الأنصارية، قالت غزوت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم سبع غزوات أخلفهم في رحالهم فأصنع لهم الطعام وأداوي الجرحى وأقوم على المرضى

উম্মু ‘আতিয়্যাহ্‌ আন্‌সারীয়াহ (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

তিনি বলেন, আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে সাতটি যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছি। আমি তাঁদের শিবিরের পশ্চাতে অবস্থান করতাম, তাদের খাবার তৈরী করতাম, আহতদের চিকিৎসা করতাম, এবং রোগীদের সেবাশুশ্রূষা করতাম। (ই.ফা. ৪৫৩৯, ই.সে. ৪৫৪২)

উম্মু ‘আতিয়্যাহ্‌ আন্‌সারীয়াহ (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ

তিনি বলেন, আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে সাতটি যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছি। আমি তাঁদের শিবিরের পশ্চাতে অবস্থান করতাম, তাদের খাবার তৈরী করতাম, আহতদের চিকিৎসা করতাম, এবং রোগীদের সেবাশুশ্রূষা করতাম। (ই.ফা. ৪৫৩৯, ই.সে. ৪৫৪২)

حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة، حدثنا عبد الرحيم بن سليمان، عن هشام، عن حفصة، بنت سيرين عن أم عطية الأنصارية، قالت غزوت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم سبع غزوات أخلفهم في رحالهم فأصنع لهم الطعام وأداوي الجرحى وأقوم على المرضى


সহিহ মুসলিম ৪৫৮৫

وحدثنا عمرو الناقد، حدثنا يزيد بن هارون، حدثنا هشام بن حسان، بهذا الإسناد نحوه ‏.‏

হিশাম ইবনু হাস্সান (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ

এ সূত্রে হাদীস বর্ণনা করেছেন। (ই.ফা. ৪৫৪০, ই.সে. ৪৫৪৩)

হিশাম ইবনু হাস্সান (রহঃ) থেকে বর্নিতঃ

এ সূত্রে হাদীস বর্ণনা করেছেন। (ই.ফা. ৪৫৪০, ই.সে. ৪৫৪৩)

وحدثنا عمرو الناقد، حدثنا يزيد بن هارون، حدثنا هشام بن حسان، بهذا الإسناد نحوه ‏.‏


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