সুনানে ইবনে মাজাহ > ঋতুবতী স্ত্রীলোক বিদায়ী তাওয়াফ না করে প্রস্থান করতে পারে
সুনানে ইবনে মাজাহ ৩০৭২
حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة، حدثنا سفيان بن عيينة، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة، ح وحدثنا محمد بن رمح، أنبأنا الليث بن سعد، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة، وعروة، عن عائشة، قالت حاضت صفية بنت حيى بعدما أفاضت . قالت عائشة فذكرت ذلك لرسول الله ـ صلى الله عليه وسلم ـ . فقال " أحابستنا هي " . فقلت إنها قد أفاضت ثم حاضت بعد ذلك . قال رسول الله ـ صلى الله عليه وسلم ـ " فلتنفر " .
আয়িশাহ (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
তাওয়াফে ইফাদা করার পর সাফিয়্যা বিনতু হুয়ায় (রাঃ) ঋতুবতী হলেন। আয়িশাহ (রাঃ) বলেন, আমি তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) - কে জানালাম। তিনি বলেন, সে কি আমাদের আটক রাখবে? আমি বললাম, তিনি তাওয়াফে ইফাযা করেছেন, অতঃপর ঋতুবতী হয়েছেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) - বললেন তাহলে রওয়ানা হতে পারো। [৩০৭২] তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
আয়িশাহ (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
তাওয়াফে ইফাদা করার পর সাফিয়্যা বিনতু হুয়ায় (রাঃ) ঋতুবতী হলেন। আয়িশাহ (রাঃ) বলেন, আমি তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) - কে জানালাম। তিনি বলেন, সে কি আমাদের আটক রাখবে? আমি বললাম, তিনি তাওয়াফে ইফাযা করেছেন, অতঃপর ঋতুবতী হয়েছেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) - বললেন তাহলে রওয়ানা হতে পারো। [৩০৭২] তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة، حدثنا سفيان بن عيينة، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة، ح وحدثنا محمد بن رمح، أنبأنا الليث بن سعد، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة، وعروة، عن عائشة، قالت حاضت صفية بنت حيى بعدما أفاضت . قالت عائشة فذكرت ذلك لرسول الله ـ صلى الله عليه وسلم ـ . فقال " أحابستنا هي " . فقلت إنها قد أفاضت ثم حاضت بعد ذلك . قال رسول الله ـ صلى الله عليه وسلم ـ " فلتنفر " .
সুনানে ইবনে মাজাহ ৩০৭৩
حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة، وعلي بن محمد، قالا حدثنا أبو معاوية، حدثنا الأعمش، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة، قالت ذكر رسول الله ـ صلى الله عليه وسلم ـ صفية فقلنا قد حاضت . فقال " عقرى حلقى ما أراها إلا حابستنا " . فقلنا يا رسول الله إنها قد طافت يوم النحر . قال " فلا إذا مروها فلتنفر " .
আয়িশাহ (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাফিয়্যা (রাঃ) সম্পর্কে জানতে চাইলে আমরা বললাম, সে ঋতুবতী হয়েছে। তিনি বলেনঃ বন্ধ্যা, ন্যাড়া, সে তো আমাদের আটকে ফেলেছে। আমি বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ! তিনি কোরবানীর দিন তাওয়াফ করেছেন। তিনি বলেনঃ তাহলে অসুবিধা নেই। তোমরা তাকে রওনা হতে বলো। [৩০৭৩] তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
আয়িশাহ (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাফিয়্যা (রাঃ) সম্পর্কে জানতে চাইলে আমরা বললাম, সে ঋতুবতী হয়েছে। তিনি বলেনঃ বন্ধ্যা, ন্যাড়া, সে তো আমাদের আটকে ফেলেছে। আমি বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ! তিনি কোরবানীর দিন তাওয়াফ করেছেন। তিনি বলেনঃ তাহলে অসুবিধা নেই। তোমরা তাকে রওনা হতে বলো। [৩০৭৩] তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة، وعلي بن محمد، قالا حدثنا أبو معاوية، حدثنا الأعمش، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة، قالت ذكر رسول الله ـ صلى الله عليه وسلم ـ صفية فقلنا قد حاضت . فقال " عقرى حلقى ما أراها إلا حابستنا " . فقلنا يا رسول الله إنها قد طافت يوم النحر . قال " فلا إذا مروها فلتنفر " .
সুনানে ইবনে মাজাহ > রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু 'আলাইহি ওয়াসাল্লাম)ের হজ্জ
সুনানে ইবনে মাজাহ ৩০৭৫
حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة، حدثنا محمد بن بشر العبدي، عن محمد بن عمرو، حدثني يحيى بن عبد الرحمن بن حاطب، عن عائشة، قالت خرجنا مع رسول الله ـ صلى الله عليه وسلم ـ للحج على أنواع ثلاثة فمنا من أهل بحج وعمرة معا ومنا من أهل بحج مفرد ومنا من أهل بعمرة مفردة . فمن كان أهل بحج وعمرة معا لم يحلل من شىء مما حرم منه حتى يقضي مناسك الحج ومن أهل بالحج مفردا لم يحلل من شىء مما حرم منه حتى يقضي مناسك الحج ومن أهل بعمرة مفردة فطاف بالبيت وبين الصفا والمروة حل ما حرم منه حتى يستقبل حجا .
আয়িশাহ (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
আমরা রাসূলু্ল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর সাথে তিন পর্যায়ে বিভক্ত হয়ে হজ্জের উদ্দেশ্যে রওনা হলাম। আমাদের কতক একসাথে হজ্জ ও উমরার ইহরাম বাঁধে কতক শুধু বেঁধেছিল তাদের জন্য হজ্জের অনুষ্ঠানাদি শেষ না করা পর্যন্ত (ইহরামের ফলে) কোন (সাময়িক) নিষিদ্ধ জিনিস হালাল হয়নি। অনুরূপ যারা শুধুমাত্র হজ্জের ইহরাম বেঁধেছিল তাদের জন্যও হজ্জের অনুষ্ঠানাদি শেষ না করা পর্যন্ত (ইহরামের ফলে) কোন (সাময়িক) নিষিদ্ধ জিনিস হালাল হয়নি। আর যারা শুধু উমরার ইহরাম বেঁধেছিল, তাদের জন্য বাইতুল্লাহ তাওয়াফ ও সাফা-মারওয়ার মাঝখানে সাঈ করার পর (ইহরামের কারণে) যা কিছু হারাম ছিল তা হালাল হয়ে গেল, হাজের ইহরাম বাঁধার পূর্ব পর্যন্ত [৩০৭৫] তাহকীক আলবানীঃ সানাদটি হাসান।
আয়িশাহ (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
আমরা রাসূলু্ল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর সাথে তিন পর্যায়ে বিভক্ত হয়ে হজ্জের উদ্দেশ্যে রওনা হলাম। আমাদের কতক একসাথে হজ্জ ও উমরার ইহরাম বাঁধে কতক শুধু বেঁধেছিল তাদের জন্য হজ্জের অনুষ্ঠানাদি শেষ না করা পর্যন্ত (ইহরামের ফলে) কোন (সাময়িক) নিষিদ্ধ জিনিস হালাল হয়নি। অনুরূপ যারা শুধুমাত্র হজ্জের ইহরাম বেঁধেছিল তাদের জন্যও হজ্জের অনুষ্ঠানাদি শেষ না করা পর্যন্ত (ইহরামের ফলে) কোন (সাময়িক) নিষিদ্ধ জিনিস হালাল হয়নি। আর যারা শুধু উমরার ইহরাম বেঁধেছিল, তাদের জন্য বাইতুল্লাহ তাওয়াফ ও সাফা-মারওয়ার মাঝখানে সাঈ করার পর (ইহরামের কারণে) যা কিছু হারাম ছিল তা হালাল হয়ে গেল, হাজের ইহরাম বাঁধার পূর্ব পর্যন্ত [৩০৭৫] তাহকীক আলবানীঃ সানাদটি হাসান।
حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة، حدثنا محمد بن بشر العبدي، عن محمد بن عمرو، حدثني يحيى بن عبد الرحمن بن حاطب، عن عائشة، قالت خرجنا مع رسول الله ـ صلى الله عليه وسلم ـ للحج على أنواع ثلاثة فمنا من أهل بحج وعمرة معا ومنا من أهل بحج مفرد ومنا من أهل بعمرة مفردة . فمن كان أهل بحج وعمرة معا لم يحلل من شىء مما حرم منه حتى يقضي مناسك الحج ومن أهل بالحج مفردا لم يحلل من شىء مما حرم منه حتى يقضي مناسك الحج ومن أهل بعمرة مفردة فطاف بالبيت وبين الصفا والمروة حل ما حرم منه حتى يستقبل حجا .
সুনানে ইবনে মাজাহ ৩০৭৬
حدثنا القاسم بن محمد بن عباد المهلبي، حدثنا عبد الله بن داود، حدثنا سفيان، قال حج رسول الله ـ صلى الله عليه وسلم ـ ثلاث حجات حجتين قبل أن يهاجر وحجة بعد ما هاجر من المدينة وقرن مع حجته عمرة واجتمع ما جاء به النبي ـ صلى الله عليه وسلم ـ وما جاء به علي مائة بدنة منها جمل لأبي جهل في أنفه برة من فضة فنحر النبي ـ صلى الله عليه وسلم ـ بيده ثلاثا وستين ونحر علي ما غبر . قيل له من ذكره قال جعفر عن أبيه عن جابر وابن أبي ليلى عن الحكم عن مقسم عن ابن عباس .
সুফিয়ান (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিনবার হজ্জ করেছেনঃ হিজরতের পূর্বে দু’বার এবং হিজরতের পর মদীনা থেকে একবার (যা বিদায় হজ্জ নামে প্রসিদ্ধ)। শেষোক্তটি তিনি কিরান হজ্জ করেছেন অর্থাৎ একত্রে হজ্জ ও উমরার ইহরাম বাঁধেন। এ হজ্জে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যতোটি কোরবানীর পশু এনেছিলেন এবং আলী (রাঃ) যতোটি পশু এনেছিলেন তার মোট সংখ্যা ছিল একশত। এর মধ্যে একটি উট ছিল আবূ জাহলের, যার নাসারন্ধ্রে রূপার লাগাম আঁটা ছিল। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) স্বহস্তে ৬৩টি এবং ‘আলী (রাঃ) অবশিষ্টগুলি কোরবানী করেন। সুফিয়ানকে জিজ্ঞাসা করা হলো, এ হাদীস কে তার নিকট বর্ণনা করেছেন? তিনি বলেন, জাফর সাদিক, তিনি তার পিতার সূত্রে, তিনি জাবির (রাঃ) -র সূত্রে। অন্যদিকে বিন আবূ লাইলা, তিনি আল-হাকামের সূত্রে, তিনি মিকসামের সূত্রে, তিনি বিন আব্বাস (রাঃ) এর সূত্রে। তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
সুফিয়ান (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিনবার হজ্জ করেছেনঃ হিজরতের পূর্বে দু’বার এবং হিজরতের পর মদীনা থেকে একবার (যা বিদায় হজ্জ নামে প্রসিদ্ধ)। শেষোক্তটি তিনি কিরান হজ্জ করেছেন অর্থাৎ একত্রে হজ্জ ও উমরার ইহরাম বাঁধেন। এ হজ্জে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যতোটি কোরবানীর পশু এনেছিলেন এবং আলী (রাঃ) যতোটি পশু এনেছিলেন তার মোট সংখ্যা ছিল একশত। এর মধ্যে একটি উট ছিল আবূ জাহলের, যার নাসারন্ধ্রে রূপার লাগাম আঁটা ছিল। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) স্বহস্তে ৬৩টি এবং ‘আলী (রাঃ) অবশিষ্টগুলি কোরবানী করেন। সুফিয়ানকে জিজ্ঞাসা করা হলো, এ হাদীস কে তার নিকট বর্ণনা করেছেন? তিনি বলেন, জাফর সাদিক, তিনি তার পিতার সূত্রে, তিনি জাবির (রাঃ) -র সূত্রে। অন্যদিকে বিন আবূ লাইলা, তিনি আল-হাকামের সূত্রে, তিনি মিকসামের সূত্রে, তিনি বিন আব্বাস (রাঃ) এর সূত্রে। তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
حدثنا القاسم بن محمد بن عباد المهلبي، حدثنا عبد الله بن داود، حدثنا سفيان، قال حج رسول الله ـ صلى الله عليه وسلم ـ ثلاث حجات حجتين قبل أن يهاجر وحجة بعد ما هاجر من المدينة وقرن مع حجته عمرة واجتمع ما جاء به النبي ـ صلى الله عليه وسلم ـ وما جاء به علي مائة بدنة منها جمل لأبي جهل في أنفه برة من فضة فنحر النبي ـ صلى الله عليه وسلم ـ بيده ثلاثا وستين ونحر علي ما غبر . قيل له من ذكره قال جعفر عن أبيه عن جابر وابن أبي ليلى عن الحكم عن مقسم عن ابن عباس .
সুনানে ইবনে মাজাহ ৩০৭৪
حدثنا هشام بن عمار حدثنا حاتم بن إسمعيل حدثنا جعفر بن محمد عن أبيه قال دخلنا على جابر بن عبد الله فلما انتهينا إليه سأل عن القوم حتٰى انتهى إلي فقلت أنا محمد بن علي بن الحسين فأهوى بيده إلى رأسي فحل زري الأعلى ثم حل زري الأسفل ثم وضع كفه بين ثديي وأنا يومئذ غلام شاب فقال مرحبا بك سل عما شئت فسألته وهو أعمى فجاء وقت الصلاة فقام في نساجة ملتحفا بها كلما وضعها على منكبيه رجع طرفاها إليه من صغرها ورداؤه إلى جانبه على المشجب فصلى بنا فقلت أخبرنا عن حجة رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال بيده فعقد تسعا وقال إن رسول الله صلى الله عليه وسلم مكث تسع سنين لم يحج فأذن في الناس في العاشرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم حاج فقدم المدينة بشر كثير كلهم يلتمس أن يأتم برسول الله صلى الله عليه وسلم ويعمل بمثل عمله فخرج وخرجنا معه فأتينا ذا الحليفة فولدت أسماء بنت عميس محمد بن أبي بكر فأرسلت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم كيف أصنع قال اغتسلي واستثفري بثوب وأحرمي فصلى رسول الله صلى الله عليه وسلم في المسجد ثم ركب القصواء حتٰى إذا استوت به ناقته على البيداء قال جابر نظرت إلى مد بصري من بين يديه بين راكب وماش وعن يمينه مثل ذلك وعن يساره مثل ذلك ومن خلفه مثل ذلك ورسول الله صلى الله عليه وسلم بين أظهرنا وعليه ينزل القرآن وهو يعرف تأويله ما عمل به من شيء عملنا به فأهل بالتوحيد لبيك اللٰهم لبيك لبيك لا شريك لك لبيك إن الحمد والنعمة لك والملك لا شريك لك وأهل الناس بهذا الذي يهلون به فلم يرد رسول الله صلى الله عليه وسلم عليهم شيئا منه ولزم رسول الله صلى الله عليه وسلم تلبيته قال جابر لسنا ننوي إلا الحج لسنا نعرف العمرة حتٰى إذا أتينا البيت معه استلم الركن فرمل ثلاثا ومشى أربعا ثم قام إلى مقام إبراهيم فقال { واتخذوا من مقام إبراهيم مصلى }. فجعل المقام بينه وبين البيت فكان أبي يقول ولا أعلمه إلا ذكره عن النبي صلى الله عليه وسلم إنه كان يقرأ في الركعتين قل يا أيها الكافرون و قل هو الله أحد ثم رجع إلى البيت فاستلم الركن ثم خرج من الباب إلى الصفا حتٰى إذا دنا من الصفا قرأ { إن الصفا والمروة من شعائر الله }. نبدأ بما بدأ الله به فبدأ بالصفا فرقي عليه حتٰى رأى البيت فكبر الله وهلله وحمده وقال لا إله إلا الله وحده لا شريك له له الملك وله الحمد يحيي ويميت وهو على كل شيء قدير لا إله إلا الله وحده لا شريك له أنجز وعده ونصر عبده وهزم الأحزاب وحده ثم دعا بين ذلك وقال مثل هذا ثلاث مرات ثم نزل إلى المروة فمشى حتٰى إذا انصبت قدماه رمل في بطن الوادي حتٰى إذا صعدتا يعني قدماه مشى حتٰى أتى المروة ففعل على المروة كما فعل على الصفا فلما كان آخر طوافه على المروة قال لو أني استقبلت من أمري ما استدبرت لم أسق الهدي وجعلتها عمرة فمن كان منكم ليس معه هدي فليحلل وليجعلها عمرة فحل الناس كلهم وقصروا إلا النبي صلى الله عليه وسلم ومن كان معه الهدي فقام سراقة بن مالك بن جعشم فقال يا رسول الله ألعامنا هذا أم لأبد الأبد قال فشبك رسول الله صلى الله عليه وسلم أصابعه في الأخرى وقال دخلت العمرة في الحج هكذا مرتين لا بل لأبد الأبد قال وقدم علي ببدن النبي صلى الله عليه وسلم فوجد فاطمة ممن حل ولبست ثيابا صبيغا واكتحلت فأنكر ذلك عليها علي فقالت أمرني أبي بهذا فكان علي يقول بالعراق فذهبت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم محرشا على فاطمة في الذي صنعته مستفتيا رسول الله صلى الله عليه وسلم في الذي ذكرت عنه وأنكرت ذلك عليها فقال صدقت صدقت ماذا قلت حين فرضت الحج قال قلت اللٰهم إني أهل بما أهل به رسولك صلى الله عليه وسلم قال فإن معي الهدي فلا تحل قال فكان جماعة الهدي الذي جاء به علي من اليمن والذي أتى به النبي صلى الله عليه وسلم من المدينة مائة ثم حل الناس كلهم وقصروا إلا النبي صلى الله عليه وسلم ومن كان معه هدي فلما كان يوم التروية وتوجهوا إلى منى أهلوا بالحج فركب رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلى بمنى الظهر والعصر والمغرب والعشاء والصبح ثم مكث قليلا حتٰى طلعت الشمس وأمر بقبة من شعر فضربت له بنمرة فسار رسول الله صلى الله عليه وسلم لا تشك قريش إلا أنه واقف عند المشعر الحرام أو المزدلفة كما كانت قريش تصنع في الجاهلية فأجاز رسول الله صلى الله عليه وسلم حتٰى أتى عرفة فوجد القبة قد ضربت له بنمرة فنزل بها حتٰى إذا زاغت الشمس أمر بالقصواء فرحلت له فركب حتٰى أتى بطن الوادي فخطب الناس فقال إن دماءكم وأموالكم عليكم حرام كحرمة يومكم هذا في شهركم هذا في بلدكم هذا ألا وإن كل شيء من أمر الجاهلية موضوع تحت قدمي هاتين ودماء الجاهلية موضوعة وأول دم أضعه دم ربيعة بن الحارث كان مسترضعا في بني سعد فقتلته هذيل وربا الجاهلية موضوع وأول ربا أضعه ربانا ربا العباس بن عبد المطلب فإنه موضوع كله فاتقوا الله في النساء فإنكم أخذتموهن بأمانة الله واستحللتم فروجهن بكلمة الله وإن لكم عليهن أن لا يوطئن فرشكم أحدا تكرهونه فإن فعلن ذلك فاضربوهن ضربا غير مبرح ولهن عليكم رزقهن وكسوتهن بالمعروف وقد تركت فيكم ما لم تضلوا إن اعتصمتم به كتاب الله وأنتم مسئولون عني فما أنتم قائلون قالوا نشهد أنك قد بلغت وأديت ونصحت فقال بإصبعه السبابة إلى السماء وينكبها إلى الناس اللٰهم اشهد اللٰهم اشهد ثلاث مرات ثم أذن بلال ثم أقام فصلى الظهر ثم أقام فصلى العصر ولم يصل بينهما شيئا ثم ركب رسول الله صلى الله عليه وسلم حتٰى أتى الموقف فجعل بطن ناقته إلى الصخرات وجعل حبل المشاة بين يديه واستقبل القبلة فلم يزل واقفا حتٰى غربت الشمس وذهبت الصفرة قليلا حتٰى غاب القرص وأردف أسامة بن زيد خلفه فدفع رسول الله صلى الله عليه وسلم وقد شنق القصواء بالزمام حتٰى إن رأسها ليصيب مورك رحله ويقول بيده اليمنى أيها الناس السكينة السكينة» كلما أتى حبلا من الحبال أرخى لها قليلا حتٰى تصعد ثم أتى المزدلفة فصلى بها المغرب والعشاء بأذان واحد وإقامتين ولم يصل بينهما شيئا ثم اضطجع رسول الله صلى الله عليه وسلم حتٰى طلع الفجر فصلى الفجر حين تبين له الصبح بأذان وإقامة ثم ركب القصواء حتٰى أتى المشعر الحرام فرقي عليه فحمد الله وكبره وهلله فلم يزل واقفا حتٰى أسفر جدا ثم دفع قبل أن تطلع الشمس وأردف الفضل بن العباس وكان رجلا حسن الشعر أبيض وسيما فلما دفع رسول الله صلى الله عليه وسلم مر الظعن يجرين فطفق ينظر إليهن فوضع رسول الله صلى الله عليه وسلم يده من الشق الآخر فصرف الفضل وجهه من الشق الآخر ينظر حتٰى أتى محسرا حرك قليلا ثم سلك الطريق الوسطى التي تخرجك إلى الجمرة الكبرى حتٰى أتى الجمرة التي عند الشجرة فرمى بسبع حصيات يكبر مع كل حصاة منها مثل حصى الخذف ورمى من بطن الوادي ثم انصرف إلى المنحر فنحر ثلاثا وستين بدنة بيده وأعطى عليا فنحر ما غبر وأشركه في هديه ثم أمر من كل بدنة ببضعة فجعلت في قدر فطبخت فأكلا من لحمها وشربا من مرقها ثم أفاض رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى البيت فصلى بمكة الظهر فأتى بني عبد المطلب وهم يسقون على زمزم فقال انزعوا بني عبد المطلب لولا أن يغلبكم الناس على سقايتكم لنزعت معكم فناولوه دلوا فشرب منه
মুহাম্মাদ বিন আলী বিন হুসায়ন বিন আলী বিন আবূ তালিব থেকে বর্নিতঃ
আমরা জাবির বিন আবদুল্লাহ (রাঃ) এর নিকট গেলাম। আমরা তার নিকট উপস্থিত হলে তিনি সাক্ষাতপ্রার্থীদের পরিচয় জানতে চান। আমার পরিচয় জিজ্ঞেস করলে আমি বলি যে, আমি ইবনুল হুসাইনের পুত্র মুহাম্মাদ। অতএব তিনি (স্নেহভরে) আমার দিকে তার হাত বাড়ালেন এবং তা আমার মাথার উপর রাখলেন। তিনি প্রথমে আমার পরিচ্ছদের উপর দিকের বোতাম, অতঃপর নিচের বোতাম খুললেন, অতঃপর তার হাত আমার বুকের উপর রাখলেন। আমি তখন উঠতি বয়সের যুবক। তিনি বলেন, তোমাকে মোবারকবাদ জানাই। তুমি যা জানতে চাও জিজ্ঞেস করো। আমি তাকে জিজ্ঞেস করলাম, এ সময় তিনি (বাধ্যর্কজনিত কারণে) দৃষ্টিশক্তি হারিয়ে ফেলেছিলেন। ইতোমধ্যে সলাতের ওয়াক্ত হলো। তিনি নিজেকে একটি চাদরে আবৃত করে উঠে দাঁড়ালেন। তিনি যখনই চাদরের প্রান্তভাগ নিজের কাঁধের উপর রাখতেন, তা (আকারে) ছোট হওয়ার কারণে নিচে পড়ে যেতো। তার আরেকটি বড় চাদর তার পাশেই আলনায় রাখা ছিল। তিনি আমাদের নিয়ে সলাত আদায় করলেন। অতঃপর আমি বললাম, আপনি আমাদেরকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর (বিদায়) হাজ্জ্ সম্পর্কে অবহিত করুন। জাবির (রাঃ) স্বহস্তে (৯) সংখ্যার প্রতি ইংগিত করে বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নয় বছর (মদীনায়) অবস্থান করেন এবং (এ সময়কালের মধ্যে) হজ্জ করেননি। অতঃপর ১০ম বর্ষে লোকেরদের মধ্যে ঘোষণা করালেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (এ বছর) হজ্জে যাবেন। সুতরাং মদীনায় অসংখ্য লোকের সমাগম হলো। তাদের প্রত্যেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর অনুসরণ করতে এবং তাঁর অনুরূপ আমল করতে আগ্রহী। অতএবং তিনি রওয়ানা হলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে রওয়ানা হলাম। আমরা যুল-হুলাইফা নামক স্থানে পৌঁছলে আসমা বিনতু উমাইস (রাঃ) মুহাম্মাদ বিন আবূ বাকরকে প্রসব করলেন। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট লোক পাঠিয়ে জানতে চাইলেন, এমন অবস্থায় আমি কী করবো? তিনি বলেনঃ তুমি গোসল করো, এক খণ্ড কাপড় দিয়ে পট্টি বাঁধো এবং ইহরামের পোশাক পরিধান করো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) - মসজিদে (ইহরামের দু’রাক’আত) সলাত আদায় করলেন, অতঃপর ‘কাসওয়া’ নামক উষ্ট্রীতে আরোহণ করলেন। অবশেষে ‘বায়দা’ নামক স্থানে তাঁর উষ্ট্রী যখন তাঁকে নিয়ে সোজা হয়ে দাঁড়ালো, তখন আমি (জাবির) সামনের দিকে যতদূর দৃষ্টিযায় তাকিয়ে দেখলাম, লোকে লোকারণ্য, কতক সওয়ারীতে এবং কতক পদব্রজে অগ্রসর হচ্ছে। ডান দিকে, বাঁ দিকে এবং পেছনেও একই দৃশ্য। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের মাঝখানে ছিলেন এবং তাঁর উপর কুরআন নাযিল হচ্ছিল। একমাত্র তিনিই এর আসল তাৎপর্য জানেন এবং তিনি যা করতেন আমরাও তাই করতাম। তিনি আল্লাহর তাওহীদ সম্বলিত এই তালবিয়া পাঠ করলেনঃ লাব্বাইকা আল্লাহুম্মা লাব্বাইকা লাব্বাইকা লা শারীকা লাকা লাব্বাইকা ইন্নাল-হামদা ওয়ান-নিয়’মাতা লাকা ওয়াল-মুলকা লা শারীকা লাকা” (আমি তোমার দরবারে হাজির আছি যে আল্লাহ, আমি তোমার দরবারে হাজির, আমি তোমার দরবারে হাজির। তোমার কোন শরীক নাই, আমি তোমার দরবারে উপস্থিত। নিশ্চিত সমস্ত প্রশংসা, সমস্ত নিয়ামত তোমারই এবং রাজত্বও, তোমার কোন শরীক নাই)। লোকেরাও উপরোক্ত তালবিয়া পাঠ করলো যা (আজকাল) পাঠ করা হয়। লোকেরা তাঁর তালবিয়ার সাথে কিছু শব্দ বাড়িয়ে বলেন, কিন্তু তিনি তাদের বাধা দেননি। আর রাসূলূল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপরোক্ত তালবিয়াই পাঠ করেন। জাবির (রাঃ) বলেন, আমরা হজ্জ ছাড়া অন্য কিছুর নিয়াত করিনি, আমরা উমরার কথা জানতাম না। অবশেষ আমরা তাঁর সাথে বাইতুল্লাহ শরীফে পৌঁছলে তিনি রুকন (হাজরে আসওয়াদ) চুম্বন করলেন, অতঃপর (সাতবর কাবা ঘর) তাওয়াফ করলেন, (প্রথম) তিনবার দ্রুত গতিতে এবং চারবার স্বাভাবিক গতিতে। অতঃপর তিনি মাকামে ইবরাহীমে পৌঁছে তিলাওয়াত করলেনঃ “তোমরা ইবরাহীমের দাঁড়াবার স্থানকে সলাতের স্থানরূপে গ্রহণ করো” (সূরা বাকারাঃ ১২৫) তিনি মাকামে ইবরাহীমকে তাঁর ও বাইতুল্লাহর মাঝখানে রেখে (দুই রাক’আত সলাত আদায় করলেন)। (জা’ফর বলেন) আমার পিতা (মুহাম্মাদ) বলতেন, আমি যতদূর জানি, তিনি (জাবির) বরং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেনঃ তিনি দু’ রাক্আত নামাযে সূরা কাফিরূন ও সূরা ইখলাস পড়েছেন। অতঃপর মহানবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাইতুল্লাহ ফিরে এলেন এবং হাজরে আসওয়াদে চুমা দিলেন। অতঃপর তিনি দরজা দিয়ে সাফা পাহাড়ের দিকে বের হলেন এবং সাফার নিকটবর্তী হয়ে তিলাওয়াত করলেনঃ “নিশ্চয় সাফা ও মারওয়া পাহাড়দ্বয় আল্লাহর নিদর্শন সমূহের অন্যতম” (সূরা বাকারাঃ ১৫৮) এবং (আরও বললেন) আল্লাহ তা’আলা যা দিয়ে আরম্ভ করেছেন আমরাও তা দিয়ে আরম্ভ করবো। অতএব তিনি সাফা পাহাড় থেকে শুরু করলে এবং তার এতোটা উপরে আরোহন করলেন যে, বাইতুল্লাহ শরীফ দেখতে পেলেন। তিনি (কিবলামুখী হয়ে) আল্লাহর একত্ব ও মহত্ব ঘোষণা করলেন এবং এ দুআ’ পড়েন : “লা-ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়াহ্দাহু লা শারীকা লাহু লাহুল-মুলক ওয়া লাহুল-হামদু ইউহ্যী ওয়া ইউমীতু ওয়া হুওয়া আলা কুল্লি শাইয়েন কাদীর। লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়াহ্দাহু লা-শারীকা লাহু আনজাযা ওয়াদাহু ওয়অ নাসারা আবদাহু ওয়আ হাযামাল আহযাবা ওয়াহ্দাহু” (আল্লাহ ছাড়া কোন ইলাহ নাই, তিনি এক, তাঁর কোন শরীক নাই, তাঁর জন্য রাজত্ব এবং তাঁর জন্য সমস্ত প্রশংসা, তিনি প্রতিটি জিনিসের উপর শক্তিমান। আল্লাহ ছাড়া কোন ইলাহ নাই, তিনি এক, তিনি নিজের প্রতিশ্রুতি পূর্ণ করেছেন, নিজের বান্দাকে সাহায্য করেছেন এবং একাই সমস্ত সম্মিলিত শক্তিকে পরাভূত করেছেন)। তিনি এ দুআ’ তিনবার পড়লেন এবং মাঝখানে অনুরূপ আরো কিছু দুআ’ পড়লেন। অতঃপর তিনি নেমে মারওয়া পাহাড়ের দিকে অ্গ্রসর হলেন, যাবত না তাঁর পা মোবারক উপত্যকার সমতল ভূমিতে গিয়ে ঠেকলো। তিনি দৌড়ে চললেন যাবত না উপত্যকার মধ্যভাগ অতিক্রম করলে। মারওয়া পাহাড়ে উঠার সময় হেঁটে উঠলেন, অতঃপর এখানেও তাই করলেন, যা তিনি সাফা পাহাড়ে করেছিলেন। শেষ তাওয়াফে তিনি মারওয়া পাহাড়ে পৌঁছে (লোকেদের সম্বোধন করে) বললেনঃ যদি আমি আগে বুঝতে পারতাম যে, আমার কী করা উচিত তাহলে আমি সাথে করে কোরবানীর পশু আনতাম না এবং (হজ্জের) ইহরামকে উমরায় পরিবর্তিত করতাম। অতএব তোমাদের মধ্যে যার সাথে কোরবানীর পশু নাই, সে যেন ইহরাম খুলে ফেলে এবং একে উমরায় পরিণত করে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং যাদের সাথে কোরবানীর পশু ছিল তারা ব্যতীত সকলেই ইহরাম খুলে ফেলেন এবং চুল ছোট করলেন। এ সময় সুরাকা বিন মালিক বিন জুশুম (রাঃ) দাঁড়িয়ে বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! এ ব্যবস্থা কি আমাদের এ বছরের জন্য, না সর্বকালের জন্য? রাসূলূল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ হাতের আংগুলগুলো পরস্পরের ফাঁকে ঢুকিয়ে দু’বার বললেনঃ উমরা হজ্জের মধ্যে প্রবেশ করলো, না, বরং সর্বকালের জন্য। এ সময় আলী (রাঃ) নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর জন্য কোরবানীর পশু নিয়ে এলেন এবং যারা ইহরাম খুলে ফেলেছে, ফাতিমা (রাঃ) কেও তাদের অন্তুর্ভুক্ত দেখতে পেলেন। তিনি রঙ্গীন কাপড় পরিহিত ছিলেন এবং চোখে সুরমা দিয়েছিলেন। আলী (রাঃ) তা অপছন্দ করলেন। ফাতিমা (রাঃ) বললেন, আমার পিতা আমাকে এরূপ করার নির্দেশ দিয়েছেন। (রাবী বলেন) এরপর আলী (রাঃ) ইরাকে অবস্থানকালে বলতেন, তখন আমি রাসূলুল্লহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট উপস্থিত হলাম ফাতিমার উপর অসন্তুষ্ট অবস্থায়, সে যা করেছে সে সম্পর্কে মাসআলা জানার জন্য। আমি তাঁকে বললাম যে, আমি তার এ কাজ অপছন্দ করেছি। রাসূলূল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ ফাতিমা ঠিকই করেছে, ঠিকই বলেছে! তুমি হজ্জের ইহরাম বাঁধার সময় কী বলেছিলে? আলী (রাঃ) বলেন, আমি বলেছিলাম, হে আল্লাহ! আমি ইহরাম বাঁধলাম যে নিয়াতে ইহরাম বেঁধেছেন আপনার রাসূল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ আমার সাথে কোরবানীর পশু আছে, অতএব তুমি (আলী) ইহরাম খুলো না। জাবির (রাঃ) বলেন, ‘আলী (রাঃ) ইয়ামেন থেকে যে পশুপাল নিয়ে আসেন এবং নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজের সাথে করে যে পশুগুলো নিয়ে এসেছিলেন এর সর্বমোট সংখ্যা দাঁড়ায় একশত। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং যাদের সাথে কোরবানীর পশু ছিল তারা ব্যতীত আর সকলেই ইহরাম খুলে ফেলেন এবং চুল ছোট করে। অতঃপর তারবিয়ার দিন (৮ যিলহজ্জ) শুরু হলে লোকেরা পুনরায় ইহরাম বাঁধলো এবং মিনার দিকে রওয়ানা হলো। আর নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সওয়ার হয়ে গেলেন এবং তথায় যোহর, আসর, মাগরিব, এশা ও ফজরের সলাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি সূর্য উদিত হওয়া পর্যন্ত তথায় কিছুক্ষণ অপেক্ষা করলেন এবং তাঁর জন্য নামিরা নামক স্থানে গিয়ে তাঁবু টানানোর জন্য নির্দেশ দিলেন, অতঃপর নিজেও রওয়ানা হয়ে গেলেন। কুরাইশগণ নিশ্চিত ছিল যে, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাশআরুল হারাম নামক স্থানে অবস্থান করবেন, যেমন কুরাইশগণ জাহিলী যুগে এখানে অবস্থান করতো (মানহানি হওয়ার আশঙ্কায় তারা সাধারনের সাথে একত্রে আরাফাতে অবস্থান করতো না)। কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সামনে অগ্রসর হতে থাকলেন যাবত না আরাফাতে পৌঁছলেন। তিনি দেখতে পেলেন, নামিরায় তাঁর জন্য তাঁবু খাটানো হয়েছে। তিনি এখানে অবতরণ করলেন। অবমেষ সূর্য (পশ্চিমাকাশে) ঢলে পড়লে তিনি তাঁর কাসওয়া নামক উষ্ট্রী সাজানোর জন্য নির্দেশ দিলে তা সাজানো হলো। অতঃপর তিনি উপত্যকার মাঝখানে আসেন এবং লোকেদের উদ্দেশে ভাষণ দিলেন। তিনি বললেনঃ “তোমাদের জীবন ও সম্পদ তোমাদের পরস্পরের জন্য হারাম, যেভাবে এই দিনে, এই মাসে এবং এই শহরে হারাম”। “সাবধান! জাহিলী যুগের সকল জিনিস (অপ-সংষ্কৃতি) রহিত হলো। আমাদের (বংশের) রক্তের দাবির মধ্যে সর্বপ্রথম আমি রবীআ ইবনুল হারিসের রক্তের দাবি রহিত করলাম”। সে সাদ গোত্রে শিশু অবস্থায় লালিত-পালিত হওয়াকালীন হুযাইল গোত্রের লোকেরা তাকে হত্যা করেছিল। “জাহিলী যুগের সূদও রহিত করা হলো। আমাদের বংশের প্রাপ্য সূদের মধ্যে সর্ব প্রথম আমি আবদুল মুত্তালিবের পুত্র আব্বাস (রাঃ) -র প্রাপ্য সমুদয় সূদ রহিত করলাম”। “তোমরা স্ত্রীলোকদের ব্যাপারে আল্লাহকে ভয় করবে। তোমরা তাদেরকে আল্লাহর জামানতে গ্রহণ করেছো এবং আল্লাহর কালামের মাধ্যমে তাদের লজ্জাস্থান নিজেদের জন্য হালাল করেছো। তাদের উপর তোমাদের অধিকার এই যে, তারা যেন তোমাদের অন্দর মহলে এমন কোন লোককে যেতে না দেয় যাকে তোমরা অপছন্দ করো। যদি তারা অনুরূপ কাজ করে তবে তাদেরকে হাল্কাভাবে মারপিট করবে। আর তোমাদের উপর তাদের অধিকার এই যে, তোমরা ন্যয়সঙ্গতভাবে তাদের পোশাক ও ভরণপোষণের ব্যবস্থা করবে”। “আমি তোমাদের মাঝে এমন এক জিনিস রেখে যাচ্ছি যা দৃঢ়ভাবে আঁকড়ে ধরে থাকলে তোমরা পথভ্রষ্ট হবে না। তা হচ্ছে আল্লাহর কিতাব”। “তোমাদেরকে আমার সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হবে, তখন তোমরা কী বলবে? উপস্থিত জনতা বললো, আমরা সাক্ষ্য দিবো যে, আপনি (আল্লাহর বাণী) পৌঁছে দিয়েছেন, আপনার কর্তব্য পালন করেছেন এবং সদুপদেশ দিয়েছেন”। অতঃপর তিনি নিজের তর্জনী (শাহাদাত আঙ্গুল) আকাশের দিকে উত্তোলন করেন এবং জনতার প্রতি ইঙ্গিত করে বলেনঃ হে আল্লাহ! আপনি সাক্ষী থাকুন, হে আল্লাহ, আপনি সাক্ষী থাকুন (তিনবার) অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাসওয়ার উপর সওয়ার হয়ে আল মাওকিফ (অবস্থানস্থল) এ এলেন, নিজের কাসওয়া নামক উষ্ট্রীর পেট পাথরের স্তুপের দিকে করে দিলেন এবং পায়ে হাঁটার পথ নিজের সামনে রেখে কিবলামুখী হয়ে দাঁড়ালেন। সূর্য গোলক সম্পূর্ণ অদৃশ্য হয়ে গেল। তিনি উসামা (রাঃ) -কে তাঁর বাহনের পেছন দিকে বসালেন এবং কাসওয়ার নাসারন্ধ্রের দড়ি সজোরে টান দিলেন, ফলে এর মাথা জিনপোষ স্পর্শ করলো (এবং তা অগ্রযাত্রা শুরু করলো)। তিনি তাঁর ডান হাতের ইশারায় বলেনঃ “হে জনমণ্ডলী! শান্তভাবে, শান্তভাবে (ধীরে সুস্থে মধ্যম গতিতে) অগ্রসর হও”। তখনই তিনি বালুর স্তূপের নিকট পৌঁছতেন, কাসওয়ার নাসারন্ধ্রের দড়ি কিছুটা ঢিল দিতেন, যাতে তা উপর দিকে উঠতে পারে। এভাবে তিনি মুযদালিফায় পৌঁছলেন এবং এখানে এক আযানে ও দু’ ইকামতে মাগরিব ও ইশার সলাত আদায় করলেন। এই দু’ সলাতের মাঝখানে অন্য কোন সলাত আদায় করেননি। অতপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শুয়ে ঘুমালেন যাবত না ফজরের ওয়াক্ত হলো। অতঃপর ঊষা পরিস্কার হয়ে গেলে তিনি আযান ও ইকামাতসহ ফজরের সলাত আদায় করলেন। অতঃপর কাসওয়ার পিঠে আরোহন করে ‘মাশআরুল-হারাম’ নামক স্থানে আসেন। এখানে তিনি (কিবলামুখী হয়ে) আল্লাহর প্রশংসা করলেন, তাঁর মহত্ব বর্ণনা করলেন, কলেমা তাওহীদ পড়লেন এবং তাঁর একত্ব ঘোষণা করলেন। আকাশ যথেষ্ট পরিস্কার না হওয়া পর্যন্ত তিনি দাঁড়িয়ে এরূপ করতে থাকলেন। সূর্য উদয়ের পূর্বে তিনি আবার রওয়ানা হলেন এবং ফাযল বিন আব্বাসকে সওয়ারীতে তাঁর পিছনে বসালেন। সে ছিল সুদর্শন যুবক এং তার মাথার চুল ছিল অত্যন্ত সুন্দর। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন অগ্রসর হলেন তখন (পাশাপাশি) একদল মহিলাও যাচ্ছিল। ফাযল তাদের দিকে তাকাতে লাগলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজের হাত অন্যদিক থেকে ফাযলের চেহারার উপর রাখলেন। সে আবার অন্যদিকে মুখ ঘুরিয়ে দেখতে লাগলো। এভাবে তিনি ‘বাতনে মুহাসসির’ নামক স্থানে পৌঁছলেন এবং সাওয়ারীর গতি কিছুটা দ্রুততর করলে। তিনি মধ্যপথ দিয়ে অগ্রসর হলেন যা জামরাতুল কুবরায় গিয়ে পৌঁছেছে। তিনি বৃক্ষের নিকটের জামরায় এলেন এবং নিচের খালি জায়গায় দাঁড়িয়ে এখানে সাতটি কাঁকর নিক্ষেপ করলে এবং নিজ হাতে তেষট্টিটি পশু যবেহ করলেন। অতঃপর যে কয়টি অবশিষ্ট ছিল তা আলী (রাঃ) কে যবেহ করতে বললেন এবং তিনি তা কোরবানী করলেন। তিনি নিজ পশুতে ‘আলীকেও শরীক করলেন। অতঃপর তিনি প্রতিটি পশুর কিছু অংশ নিয়ে একত্রে রান্না করার নির্দেশ দিলে। অতএব তাই করা হলো। তাঁরা উভয়ে এই গোশত থেকে আহার করলেন এবং ঝোল পান করলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সওয়ার হয়ে বাইতুল্লাহর দিকে রওয়ানা হলেন এবং মক্বায় পৌঁছে যোহরের সলাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি (নিজ গোত্র) বনূ আবদুল মুত্তালিবে এলেন। তারা লোকেদের যমযমের পানি পান করাচ্ছিল। তিনি বললেনঃ হে আবদুল্ মুত্তালিবের বংশধর! পানি তোলো। আমি যদি আশঙ্কা না করতাম যে, পানি পান করানোর ব্যাপারে লোকেরা তোমাদের পরাভূত করবে, তাহলে আমি নিজেও তোমাদের সাথে পানি তুলতাম। তারা তাঁকে এক বালতি পানি দিলো এবং তিনি তা থেকে কিছু পান করলেন। [৩০৭৪] তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
মুহাম্মাদ বিন আলী বিন হুসায়ন বিন আলী বিন আবূ তালিব থেকে বর্নিতঃ
আমরা জাবির বিন আবদুল্লাহ (রাঃ) এর নিকট গেলাম। আমরা তার নিকট উপস্থিত হলে তিনি সাক্ষাতপ্রার্থীদের পরিচয় জানতে চান। আমার পরিচয় জিজ্ঞেস করলে আমি বলি যে, আমি ইবনুল হুসাইনের পুত্র মুহাম্মাদ। অতএব তিনি (স্নেহভরে) আমার দিকে তার হাত বাড়ালেন এবং তা আমার মাথার উপর রাখলেন। তিনি প্রথমে আমার পরিচ্ছদের উপর দিকের বোতাম, অতঃপর নিচের বোতাম খুললেন, অতঃপর তার হাত আমার বুকের উপর রাখলেন। আমি তখন উঠতি বয়সের যুবক। তিনি বলেন, তোমাকে মোবারকবাদ জানাই। তুমি যা জানতে চাও জিজ্ঞেস করো। আমি তাকে জিজ্ঞেস করলাম, এ সময় তিনি (বাধ্যর্কজনিত কারণে) দৃষ্টিশক্তি হারিয়ে ফেলেছিলেন। ইতোমধ্যে সলাতের ওয়াক্ত হলো। তিনি নিজেকে একটি চাদরে আবৃত করে উঠে দাঁড়ালেন। তিনি যখনই চাদরের প্রান্তভাগ নিজের কাঁধের উপর রাখতেন, তা (আকারে) ছোট হওয়ার কারণে নিচে পড়ে যেতো। তার আরেকটি বড় চাদর তার পাশেই আলনায় রাখা ছিল। তিনি আমাদের নিয়ে সলাত আদায় করলেন। অতঃপর আমি বললাম, আপনি আমাদেরকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর (বিদায়) হাজ্জ্ সম্পর্কে অবহিত করুন। জাবির (রাঃ) স্বহস্তে (৯) সংখ্যার প্রতি ইংগিত করে বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নয় বছর (মদীনায়) অবস্থান করেন এবং (এ সময়কালের মধ্যে) হজ্জ করেননি। অতঃপর ১০ম বর্ষে লোকেরদের মধ্যে ঘোষণা করালেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (এ বছর) হজ্জে যাবেন। সুতরাং মদীনায় অসংখ্য লোকের সমাগম হলো। তাদের প্রত্যেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর অনুসরণ করতে এবং তাঁর অনুরূপ আমল করতে আগ্রহী। অতএবং তিনি রওয়ানা হলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে রওয়ানা হলাম। আমরা যুল-হুলাইফা নামক স্থানে পৌঁছলে আসমা বিনতু উমাইস (রাঃ) মুহাম্মাদ বিন আবূ বাকরকে প্রসব করলেন। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট লোক পাঠিয়ে জানতে চাইলেন, এমন অবস্থায় আমি কী করবো? তিনি বলেনঃ তুমি গোসল করো, এক খণ্ড কাপড় দিয়ে পট্টি বাঁধো এবং ইহরামের পোশাক পরিধান করো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) - মসজিদে (ইহরামের দু’রাক’আত) সলাত আদায় করলেন, অতঃপর ‘কাসওয়া’ নামক উষ্ট্রীতে আরোহণ করলেন। অবশেষে ‘বায়দা’ নামক স্থানে তাঁর উষ্ট্রী যখন তাঁকে নিয়ে সোজা হয়ে দাঁড়ালো, তখন আমি (জাবির) সামনের দিকে যতদূর দৃষ্টিযায় তাকিয়ে দেখলাম, লোকে লোকারণ্য, কতক সওয়ারীতে এবং কতক পদব্রজে অগ্রসর হচ্ছে। ডান দিকে, বাঁ দিকে এবং পেছনেও একই দৃশ্য। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের মাঝখানে ছিলেন এবং তাঁর উপর কুরআন নাযিল হচ্ছিল। একমাত্র তিনিই এর আসল তাৎপর্য জানেন এবং তিনি যা করতেন আমরাও তাই করতাম। তিনি আল্লাহর তাওহীদ সম্বলিত এই তালবিয়া পাঠ করলেনঃ লাব্বাইকা আল্লাহুম্মা লাব্বাইকা লাব্বাইকা লা শারীকা লাকা লাব্বাইকা ইন্নাল-হামদা ওয়ান-নিয়’মাতা লাকা ওয়াল-মুলকা লা শারীকা লাকা” (আমি তোমার দরবারে হাজির আছি যে আল্লাহ, আমি তোমার দরবারে হাজির, আমি তোমার দরবারে হাজির। তোমার কোন শরীক নাই, আমি তোমার দরবারে উপস্থিত। নিশ্চিত সমস্ত প্রশংসা, সমস্ত নিয়ামত তোমারই এবং রাজত্বও, তোমার কোন শরীক নাই)। লোকেরাও উপরোক্ত তালবিয়া পাঠ করলো যা (আজকাল) পাঠ করা হয়। লোকেরা তাঁর তালবিয়ার সাথে কিছু শব্দ বাড়িয়ে বলেন, কিন্তু তিনি তাদের বাধা দেননি। আর রাসূলূল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপরোক্ত তালবিয়াই পাঠ করেন। জাবির (রাঃ) বলেন, আমরা হজ্জ ছাড়া অন্য কিছুর নিয়াত করিনি, আমরা উমরার কথা জানতাম না। অবশেষ আমরা তাঁর সাথে বাইতুল্লাহ শরীফে পৌঁছলে তিনি রুকন (হাজরে আসওয়াদ) চুম্বন করলেন, অতঃপর (সাতবর কাবা ঘর) তাওয়াফ করলেন, (প্রথম) তিনবার দ্রুত গতিতে এবং চারবার স্বাভাবিক গতিতে। অতঃপর তিনি মাকামে ইবরাহীমে পৌঁছে তিলাওয়াত করলেনঃ “তোমরা ইবরাহীমের দাঁড়াবার স্থানকে সলাতের স্থানরূপে গ্রহণ করো” (সূরা বাকারাঃ ১২৫) তিনি মাকামে ইবরাহীমকে তাঁর ও বাইতুল্লাহর মাঝখানে রেখে (দুই রাক’আত সলাত আদায় করলেন)। (জা’ফর বলেন) আমার পিতা (মুহাম্মাদ) বলতেন, আমি যতদূর জানি, তিনি (জাবির) বরং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেনঃ তিনি দু’ রাক্আত নামাযে সূরা কাফিরূন ও সূরা ইখলাস পড়েছেন। অতঃপর মহানবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাইতুল্লাহ ফিরে এলেন এবং হাজরে আসওয়াদে চুমা দিলেন। অতঃপর তিনি দরজা দিয়ে সাফা পাহাড়ের দিকে বের হলেন এবং সাফার নিকটবর্তী হয়ে তিলাওয়াত করলেনঃ “নিশ্চয় সাফা ও মারওয়া পাহাড়দ্বয় আল্লাহর নিদর্শন সমূহের অন্যতম” (সূরা বাকারাঃ ১৫৮) এবং (আরও বললেন) আল্লাহ তা’আলা যা দিয়ে আরম্ভ করেছেন আমরাও তা দিয়ে আরম্ভ করবো। অতএব তিনি সাফা পাহাড় থেকে শুরু করলে এবং তার এতোটা উপরে আরোহন করলেন যে, বাইতুল্লাহ শরীফ দেখতে পেলেন। তিনি (কিবলামুখী হয়ে) আল্লাহর একত্ব ও মহত্ব ঘোষণা করলেন এবং এ দুআ’ পড়েন : “লা-ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়াহ্দাহু লা শারীকা লাহু লাহুল-মুলক ওয়া লাহুল-হামদু ইউহ্যী ওয়া ইউমীতু ওয়া হুওয়া আলা কুল্লি শাইয়েন কাদীর। লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়াহ্দাহু লা-শারীকা লাহু আনজাযা ওয়াদাহু ওয়অ নাসারা আবদাহু ওয়আ হাযামাল আহযাবা ওয়াহ্দাহু” (আল্লাহ ছাড়া কোন ইলাহ নাই, তিনি এক, তাঁর কোন শরীক নাই, তাঁর জন্য রাজত্ব এবং তাঁর জন্য সমস্ত প্রশংসা, তিনি প্রতিটি জিনিসের উপর শক্তিমান। আল্লাহ ছাড়া কোন ইলাহ নাই, তিনি এক, তিনি নিজের প্রতিশ্রুতি পূর্ণ করেছেন, নিজের বান্দাকে সাহায্য করেছেন এবং একাই সমস্ত সম্মিলিত শক্তিকে পরাভূত করেছেন)। তিনি এ দুআ’ তিনবার পড়লেন এবং মাঝখানে অনুরূপ আরো কিছু দুআ’ পড়লেন। অতঃপর তিনি নেমে মারওয়া পাহাড়ের দিকে অ্গ্রসর হলেন, যাবত না তাঁর পা মোবারক উপত্যকার সমতল ভূমিতে গিয়ে ঠেকলো। তিনি দৌড়ে চললেন যাবত না উপত্যকার মধ্যভাগ অতিক্রম করলে। মারওয়া পাহাড়ে উঠার সময় হেঁটে উঠলেন, অতঃপর এখানেও তাই করলেন, যা তিনি সাফা পাহাড়ে করেছিলেন। শেষ তাওয়াফে তিনি মারওয়া পাহাড়ে পৌঁছে (লোকেদের সম্বোধন করে) বললেনঃ যদি আমি আগে বুঝতে পারতাম যে, আমার কী করা উচিত তাহলে আমি সাথে করে কোরবানীর পশু আনতাম না এবং (হজ্জের) ইহরামকে উমরায় পরিবর্তিত করতাম। অতএব তোমাদের মধ্যে যার সাথে কোরবানীর পশু নাই, সে যেন ইহরাম খুলে ফেলে এবং একে উমরায় পরিণত করে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং যাদের সাথে কোরবানীর পশু ছিল তারা ব্যতীত সকলেই ইহরাম খুলে ফেলেন এবং চুল ছোট করলেন। এ সময় সুরাকা বিন মালিক বিন জুশুম (রাঃ) দাঁড়িয়ে বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! এ ব্যবস্থা কি আমাদের এ বছরের জন্য, না সর্বকালের জন্য? রাসূলূল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ হাতের আংগুলগুলো পরস্পরের ফাঁকে ঢুকিয়ে দু’বার বললেনঃ উমরা হজ্জের মধ্যে প্রবেশ করলো, না, বরং সর্বকালের জন্য। এ সময় আলী (রাঃ) নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর জন্য কোরবানীর পশু নিয়ে এলেন এবং যারা ইহরাম খুলে ফেলেছে, ফাতিমা (রাঃ) কেও তাদের অন্তুর্ভুক্ত দেখতে পেলেন। তিনি রঙ্গীন কাপড় পরিহিত ছিলেন এবং চোখে সুরমা দিয়েছিলেন। আলী (রাঃ) তা অপছন্দ করলেন। ফাতিমা (রাঃ) বললেন, আমার পিতা আমাকে এরূপ করার নির্দেশ দিয়েছেন। (রাবী বলেন) এরপর আলী (রাঃ) ইরাকে অবস্থানকালে বলতেন, তখন আমি রাসূলুল্লহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট উপস্থিত হলাম ফাতিমার উপর অসন্তুষ্ট অবস্থায়, সে যা করেছে সে সম্পর্কে মাসআলা জানার জন্য। আমি তাঁকে বললাম যে, আমি তার এ কাজ অপছন্দ করেছি। রাসূলূল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেনঃ ফাতিমা ঠিকই করেছে, ঠিকই বলেছে! তুমি হজ্জের ইহরাম বাঁধার সময় কী বলেছিলে? আলী (রাঃ) বলেন, আমি বলেছিলাম, হে আল্লাহ! আমি ইহরাম বাঁধলাম যে নিয়াতে ইহরাম বেঁধেছেন আপনার রাসূল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ আমার সাথে কোরবানীর পশু আছে, অতএব তুমি (আলী) ইহরাম খুলো না। জাবির (রাঃ) বলেন, ‘আলী (রাঃ) ইয়ামেন থেকে যে পশুপাল নিয়ে আসেন এবং নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজের সাথে করে যে পশুগুলো নিয়ে এসেছিলেন এর সর্বমোট সংখ্যা দাঁড়ায় একশত। নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং যাদের সাথে কোরবানীর পশু ছিল তারা ব্যতীত আর সকলেই ইহরাম খুলে ফেলেন এবং চুল ছোট করে। অতঃপর তারবিয়ার দিন (৮ যিলহজ্জ) শুরু হলে লোকেরা পুনরায় ইহরাম বাঁধলো এবং মিনার দিকে রওয়ানা হলো। আর নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সওয়ার হয়ে গেলেন এবং তথায় যোহর, আসর, মাগরিব, এশা ও ফজরের সলাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি সূর্য উদিত হওয়া পর্যন্ত তথায় কিছুক্ষণ অপেক্ষা করলেন এবং তাঁর জন্য নামিরা নামক স্থানে গিয়ে তাঁবু টানানোর জন্য নির্দেশ দিলেন, অতঃপর নিজেও রওয়ানা হয়ে গেলেন। কুরাইশগণ নিশ্চিত ছিল যে, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাশআরুল হারাম নামক স্থানে অবস্থান করবেন, যেমন কুরাইশগণ জাহিলী যুগে এখানে অবস্থান করতো (মানহানি হওয়ার আশঙ্কায় তারা সাধারনের সাথে একত্রে আরাফাতে অবস্থান করতো না)। কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সামনে অগ্রসর হতে থাকলেন যাবত না আরাফাতে পৌঁছলেন। তিনি দেখতে পেলেন, নামিরায় তাঁর জন্য তাঁবু খাটানো হয়েছে। তিনি এখানে অবতরণ করলেন। অবমেষ সূর্য (পশ্চিমাকাশে) ঢলে পড়লে তিনি তাঁর কাসওয়া নামক উষ্ট্রী সাজানোর জন্য নির্দেশ দিলে তা সাজানো হলো। অতঃপর তিনি উপত্যকার মাঝখানে আসেন এবং লোকেদের উদ্দেশে ভাষণ দিলেন। তিনি বললেনঃ “তোমাদের জীবন ও সম্পদ তোমাদের পরস্পরের জন্য হারাম, যেভাবে এই দিনে, এই মাসে এবং এই শহরে হারাম”। “সাবধান! জাহিলী যুগের সকল জিনিস (অপ-সংষ্কৃতি) রহিত হলো। আমাদের (বংশের) রক্তের দাবির মধ্যে সর্বপ্রথম আমি রবীআ ইবনুল হারিসের রক্তের দাবি রহিত করলাম”। সে সাদ গোত্রে শিশু অবস্থায় লালিত-পালিত হওয়াকালীন হুযাইল গোত্রের লোকেরা তাকে হত্যা করেছিল। “জাহিলী যুগের সূদও রহিত করা হলো। আমাদের বংশের প্রাপ্য সূদের মধ্যে সর্ব প্রথম আমি আবদুল মুত্তালিবের পুত্র আব্বাস (রাঃ) -র প্রাপ্য সমুদয় সূদ রহিত করলাম”। “তোমরা স্ত্রীলোকদের ব্যাপারে আল্লাহকে ভয় করবে। তোমরা তাদেরকে আল্লাহর জামানতে গ্রহণ করেছো এবং আল্লাহর কালামের মাধ্যমে তাদের লজ্জাস্থান নিজেদের জন্য হালাল করেছো। তাদের উপর তোমাদের অধিকার এই যে, তারা যেন তোমাদের অন্দর মহলে এমন কোন লোককে যেতে না দেয় যাকে তোমরা অপছন্দ করো। যদি তারা অনুরূপ কাজ করে তবে তাদেরকে হাল্কাভাবে মারপিট করবে। আর তোমাদের উপর তাদের অধিকার এই যে, তোমরা ন্যয়সঙ্গতভাবে তাদের পোশাক ও ভরণপোষণের ব্যবস্থা করবে”। “আমি তোমাদের মাঝে এমন এক জিনিস রেখে যাচ্ছি যা দৃঢ়ভাবে আঁকড়ে ধরে থাকলে তোমরা পথভ্রষ্ট হবে না। তা হচ্ছে আল্লাহর কিতাব”। “তোমাদেরকে আমার সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হবে, তখন তোমরা কী বলবে? উপস্থিত জনতা বললো, আমরা সাক্ষ্য দিবো যে, আপনি (আল্লাহর বাণী) পৌঁছে দিয়েছেন, আপনার কর্তব্য পালন করেছেন এবং সদুপদেশ দিয়েছেন”। অতঃপর তিনি নিজের তর্জনী (শাহাদাত আঙ্গুল) আকাশের দিকে উত্তোলন করেন এবং জনতার প্রতি ইঙ্গিত করে বলেনঃ হে আল্লাহ! আপনি সাক্ষী থাকুন, হে আল্লাহ, আপনি সাক্ষী থাকুন (তিনবার) অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাসওয়ার উপর সওয়ার হয়ে আল মাওকিফ (অবস্থানস্থল) এ এলেন, নিজের কাসওয়া নামক উষ্ট্রীর পেট পাথরের স্তুপের দিকে করে দিলেন এবং পায়ে হাঁটার পথ নিজের সামনে রেখে কিবলামুখী হয়ে দাঁড়ালেন। সূর্য গোলক সম্পূর্ণ অদৃশ্য হয়ে গেল। তিনি উসামা (রাঃ) -কে তাঁর বাহনের পেছন দিকে বসালেন এবং কাসওয়ার নাসারন্ধ্রের দড়ি সজোরে টান দিলেন, ফলে এর মাথা জিনপোষ স্পর্শ করলো (এবং তা অগ্রযাত্রা শুরু করলো)। তিনি তাঁর ডান হাতের ইশারায় বলেনঃ “হে জনমণ্ডলী! শান্তভাবে, শান্তভাবে (ধীরে সুস্থে মধ্যম গতিতে) অগ্রসর হও”। তখনই তিনি বালুর স্তূপের নিকট পৌঁছতেন, কাসওয়ার নাসারন্ধ্রের দড়ি কিছুটা ঢিল দিতেন, যাতে তা উপর দিকে উঠতে পারে। এভাবে তিনি মুযদালিফায় পৌঁছলেন এবং এখানে এক আযানে ও দু’ ইকামতে মাগরিব ও ইশার সলাত আদায় করলেন। এই দু’ সলাতের মাঝখানে অন্য কোন সলাত আদায় করেননি। অতপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শুয়ে ঘুমালেন যাবত না ফজরের ওয়াক্ত হলো। অতঃপর ঊষা পরিস্কার হয়ে গেলে তিনি আযান ও ইকামাতসহ ফজরের সলাত আদায় করলেন। অতঃপর কাসওয়ার পিঠে আরোহন করে ‘মাশআরুল-হারাম’ নামক স্থানে আসেন। এখানে তিনি (কিবলামুখী হয়ে) আল্লাহর প্রশংসা করলেন, তাঁর মহত্ব বর্ণনা করলেন, কলেমা তাওহীদ পড়লেন এবং তাঁর একত্ব ঘোষণা করলেন। আকাশ যথেষ্ট পরিস্কার না হওয়া পর্যন্ত তিনি দাঁড়িয়ে এরূপ করতে থাকলেন। সূর্য উদয়ের পূর্বে তিনি আবার রওয়ানা হলেন এবং ফাযল বিন আব্বাসকে সওয়ারীতে তাঁর পিছনে বসালেন। সে ছিল সুদর্শন যুবক এং তার মাথার চুল ছিল অত্যন্ত সুন্দর। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন অগ্রসর হলেন তখন (পাশাপাশি) একদল মহিলাও যাচ্ছিল। ফাযল তাদের দিকে তাকাতে লাগলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজের হাত অন্যদিক থেকে ফাযলের চেহারার উপর রাখলেন। সে আবার অন্যদিকে মুখ ঘুরিয়ে দেখতে লাগলো। এভাবে তিনি ‘বাতনে মুহাসসির’ নামক স্থানে পৌঁছলেন এবং সাওয়ারীর গতি কিছুটা দ্রুততর করলে। তিনি মধ্যপথ দিয়ে অগ্রসর হলেন যা জামরাতুল কুবরায় গিয়ে পৌঁছেছে। তিনি বৃক্ষের নিকটের জামরায় এলেন এবং নিচের খালি জায়গায় দাঁড়িয়ে এখানে সাতটি কাঁকর নিক্ষেপ করলে এবং নিজ হাতে তেষট্টিটি পশু যবেহ করলেন। অতঃপর যে কয়টি অবশিষ্ট ছিল তা আলী (রাঃ) কে যবেহ করতে বললেন এবং তিনি তা কোরবানী করলেন। তিনি নিজ পশুতে ‘আলীকেও শরীক করলেন। অতঃপর তিনি প্রতিটি পশুর কিছু অংশ নিয়ে একত্রে রান্না করার নির্দেশ দিলে। অতএব তাই করা হলো। তাঁরা উভয়ে এই গোশত থেকে আহার করলেন এবং ঝোল পান করলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সওয়ার হয়ে বাইতুল্লাহর দিকে রওয়ানা হলেন এবং মক্বায় পৌঁছে যোহরের সলাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি (নিজ গোত্র) বনূ আবদুল মুত্তালিবে এলেন। তারা লোকেদের যমযমের পানি পান করাচ্ছিল। তিনি বললেনঃ হে আবদুল্ মুত্তালিবের বংশধর! পানি তোলো। আমি যদি আশঙ্কা না করতাম যে, পানি পান করানোর ব্যাপারে লোকেরা তোমাদের পরাভূত করবে, তাহলে আমি নিজেও তোমাদের সাথে পানি তুলতাম। তারা তাঁকে এক বালতি পানি দিলো এবং তিনি তা থেকে কিছু পান করলেন। [৩০৭৪] তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
حدثنا هشام بن عمار حدثنا حاتم بن إسمعيل حدثنا جعفر بن محمد عن أبيه قال دخلنا على جابر بن عبد الله فلما انتهينا إليه سأل عن القوم حتٰى انتهى إلي فقلت أنا محمد بن علي بن الحسين فأهوى بيده إلى رأسي فحل زري الأعلى ثم حل زري الأسفل ثم وضع كفه بين ثديي وأنا يومئذ غلام شاب فقال مرحبا بك سل عما شئت فسألته وهو أعمى فجاء وقت الصلاة فقام في نساجة ملتحفا بها كلما وضعها على منكبيه رجع طرفاها إليه من صغرها ورداؤه إلى جانبه على المشجب فصلى بنا فقلت أخبرنا عن حجة رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال بيده فعقد تسعا وقال إن رسول الله صلى الله عليه وسلم مكث تسع سنين لم يحج فأذن في الناس في العاشرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم حاج فقدم المدينة بشر كثير كلهم يلتمس أن يأتم برسول الله صلى الله عليه وسلم ويعمل بمثل عمله فخرج وخرجنا معه فأتينا ذا الحليفة فولدت أسماء بنت عميس محمد بن أبي بكر فأرسلت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم كيف أصنع قال اغتسلي واستثفري بثوب وأحرمي فصلى رسول الله صلى الله عليه وسلم في المسجد ثم ركب القصواء حتٰى إذا استوت به ناقته على البيداء قال جابر نظرت إلى مد بصري من بين يديه بين راكب وماش وعن يمينه مثل ذلك وعن يساره مثل ذلك ومن خلفه مثل ذلك ورسول الله صلى الله عليه وسلم بين أظهرنا وعليه ينزل القرآن وهو يعرف تأويله ما عمل به من شيء عملنا به فأهل بالتوحيد لبيك اللٰهم لبيك لبيك لا شريك لك لبيك إن الحمد والنعمة لك والملك لا شريك لك وأهل الناس بهذا الذي يهلون به فلم يرد رسول الله صلى الله عليه وسلم عليهم شيئا منه ولزم رسول الله صلى الله عليه وسلم تلبيته قال جابر لسنا ننوي إلا الحج لسنا نعرف العمرة حتٰى إذا أتينا البيت معه استلم الركن فرمل ثلاثا ومشى أربعا ثم قام إلى مقام إبراهيم فقال { واتخذوا من مقام إبراهيم مصلى }. فجعل المقام بينه وبين البيت فكان أبي يقول ولا أعلمه إلا ذكره عن النبي صلى الله عليه وسلم إنه كان يقرأ في الركعتين قل يا أيها الكافرون و قل هو الله أحد ثم رجع إلى البيت فاستلم الركن ثم خرج من الباب إلى الصفا حتٰى إذا دنا من الصفا قرأ { إن الصفا والمروة من شعائر الله }. نبدأ بما بدأ الله به فبدأ بالصفا فرقي عليه حتٰى رأى البيت فكبر الله وهلله وحمده وقال لا إله إلا الله وحده لا شريك له له الملك وله الحمد يحيي ويميت وهو على كل شيء قدير لا إله إلا الله وحده لا شريك له أنجز وعده ونصر عبده وهزم الأحزاب وحده ثم دعا بين ذلك وقال مثل هذا ثلاث مرات ثم نزل إلى المروة فمشى حتٰى إذا انصبت قدماه رمل في بطن الوادي حتٰى إذا صعدتا يعني قدماه مشى حتٰى أتى المروة ففعل على المروة كما فعل على الصفا فلما كان آخر طوافه على المروة قال لو أني استقبلت من أمري ما استدبرت لم أسق الهدي وجعلتها عمرة فمن كان منكم ليس معه هدي فليحلل وليجعلها عمرة فحل الناس كلهم وقصروا إلا النبي صلى الله عليه وسلم ومن كان معه الهدي فقام سراقة بن مالك بن جعشم فقال يا رسول الله ألعامنا هذا أم لأبد الأبد قال فشبك رسول الله صلى الله عليه وسلم أصابعه في الأخرى وقال دخلت العمرة في الحج هكذا مرتين لا بل لأبد الأبد قال وقدم علي ببدن النبي صلى الله عليه وسلم فوجد فاطمة ممن حل ولبست ثيابا صبيغا واكتحلت فأنكر ذلك عليها علي فقالت أمرني أبي بهذا فكان علي يقول بالعراق فذهبت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم محرشا على فاطمة في الذي صنعته مستفتيا رسول الله صلى الله عليه وسلم في الذي ذكرت عنه وأنكرت ذلك عليها فقال صدقت صدقت ماذا قلت حين فرضت الحج قال قلت اللٰهم إني أهل بما أهل به رسولك صلى الله عليه وسلم قال فإن معي الهدي فلا تحل قال فكان جماعة الهدي الذي جاء به علي من اليمن والذي أتى به النبي صلى الله عليه وسلم من المدينة مائة ثم حل الناس كلهم وقصروا إلا النبي صلى الله عليه وسلم ومن كان معه هدي فلما كان يوم التروية وتوجهوا إلى منى أهلوا بالحج فركب رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلى بمنى الظهر والعصر والمغرب والعشاء والصبح ثم مكث قليلا حتٰى طلعت الشمس وأمر بقبة من شعر فضربت له بنمرة فسار رسول الله صلى الله عليه وسلم لا تشك قريش إلا أنه واقف عند المشعر الحرام أو المزدلفة كما كانت قريش تصنع في الجاهلية فأجاز رسول الله صلى الله عليه وسلم حتٰى أتى عرفة فوجد القبة قد ضربت له بنمرة فنزل بها حتٰى إذا زاغت الشمس أمر بالقصواء فرحلت له فركب حتٰى أتى بطن الوادي فخطب الناس فقال إن دماءكم وأموالكم عليكم حرام كحرمة يومكم هذا في شهركم هذا في بلدكم هذا ألا وإن كل شيء من أمر الجاهلية موضوع تحت قدمي هاتين ودماء الجاهلية موضوعة وأول دم أضعه دم ربيعة بن الحارث كان مسترضعا في بني سعد فقتلته هذيل وربا الجاهلية موضوع وأول ربا أضعه ربانا ربا العباس بن عبد المطلب فإنه موضوع كله فاتقوا الله في النساء فإنكم أخذتموهن بأمانة الله واستحللتم فروجهن بكلمة الله وإن لكم عليهن أن لا يوطئن فرشكم أحدا تكرهونه فإن فعلن ذلك فاضربوهن ضربا غير مبرح ولهن عليكم رزقهن وكسوتهن بالمعروف وقد تركت فيكم ما لم تضلوا إن اعتصمتم به كتاب الله وأنتم مسئولون عني فما أنتم قائلون قالوا نشهد أنك قد بلغت وأديت ونصحت فقال بإصبعه السبابة إلى السماء وينكبها إلى الناس اللٰهم اشهد اللٰهم اشهد ثلاث مرات ثم أذن بلال ثم أقام فصلى الظهر ثم أقام فصلى العصر ولم يصل بينهما شيئا ثم ركب رسول الله صلى الله عليه وسلم حتٰى أتى الموقف فجعل بطن ناقته إلى الصخرات وجعل حبل المشاة بين يديه واستقبل القبلة فلم يزل واقفا حتٰى غربت الشمس وذهبت الصفرة قليلا حتٰى غاب القرص وأردف أسامة بن زيد خلفه فدفع رسول الله صلى الله عليه وسلم وقد شنق القصواء بالزمام حتٰى إن رأسها ليصيب مورك رحله ويقول بيده اليمنى أيها الناس السكينة السكينة» كلما أتى حبلا من الحبال أرخى لها قليلا حتٰى تصعد ثم أتى المزدلفة فصلى بها المغرب والعشاء بأذان واحد وإقامتين ولم يصل بينهما شيئا ثم اضطجع رسول الله صلى الله عليه وسلم حتٰى طلع الفجر فصلى الفجر حين تبين له الصبح بأذان وإقامة ثم ركب القصواء حتٰى أتى المشعر الحرام فرقي عليه فحمد الله وكبره وهلله فلم يزل واقفا حتٰى أسفر جدا ثم دفع قبل أن تطلع الشمس وأردف الفضل بن العباس وكان رجلا حسن الشعر أبيض وسيما فلما دفع رسول الله صلى الله عليه وسلم مر الظعن يجرين فطفق ينظر إليهن فوضع رسول الله صلى الله عليه وسلم يده من الشق الآخر فصرف الفضل وجهه من الشق الآخر ينظر حتٰى أتى محسرا حرك قليلا ثم سلك الطريق الوسطى التي تخرجك إلى الجمرة الكبرى حتٰى أتى الجمرة التي عند الشجرة فرمى بسبع حصيات يكبر مع كل حصاة منها مثل حصى الخذف ورمى من بطن الوادي ثم انصرف إلى المنحر فنحر ثلاثا وستين بدنة بيده وأعطى عليا فنحر ما غبر وأشركه في هديه ثم أمر من كل بدنة ببضعة فجعلت في قدر فطبخت فأكلا من لحمها وشربا من مرقها ثم أفاض رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى البيت فصلى بمكة الظهر فأتى بني عبد المطلب وهم يسقون على زمزم فقال انزعوا بني عبد المطلب لولا أن يغلبكم الناس على سقايتكم لنزعت معكم فناولوه دلوا فشرب منه
সুনানে ইবনে মাজাহ > হজ্জের উদ্দেশে যাওয়ার পথে বাধাগ্রস্ত হলে
সুনানে ইবনে মাজাহ ৩০৭৭
حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة حدثنا يحيى بن سعيد وابن علية عن حجاج بن أبي عثمان حدثني يحيى بن أبي كثير حدثني عكرمة حدثني الحجاج بن عمرو الأنصاري قال سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول من كسر أو عرج فقد حل وعليه حجة أخرى فحدثت به ابن عباس وأبا هريرة فقالا صدق
আল-হাজ্জাক বিন আমর আল-আনসারী (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে বলতে শুনেছি : যার হাড় ভেঙ্গে গেলো অথবা যে লেংড়া হয়ে গেলো। ইহরাম বাঁধার পর) , সে ইহরামমুক্ত হয়ে গেলো। সে পুনর্বার হজ্জ করবে। (আবূ বাক্র বিন আবূ শায়বাহ, ইয়াহইয়অ বিন সাঈদ ও ইবনু উলায়্যাহ, হাজ্জাজ বিন আবূ উসমান, ইয়াহইয়া বিন আবূ কাসীর, ইকরামাহ, ইবনু আব্বাস ও আবূ হুরায়রাহ (রাঃ) , (ইকরিমাহ বলেন) , আমি এ হাদীস বিন আব্বাস (রাঃ) ও আবূ হুরায়রাহ (রাঃ) -র নিকট বর্ণনা করলে তারা উভয়ে বলেন, তিনি (হাজ্জাজ) সত্য বলেছেন। [৩০৭৭] তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
আল-হাজ্জাক বিন আমর আল-আনসারী (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -কে বলতে শুনেছি : যার হাড় ভেঙ্গে গেলো অথবা যে লেংড়া হয়ে গেলো। ইহরাম বাঁধার পর) , সে ইহরামমুক্ত হয়ে গেলো। সে পুনর্বার হজ্জ করবে। (আবূ বাক্র বিন আবূ শায়বাহ, ইয়াহইয়অ বিন সাঈদ ও ইবনু উলায়্যাহ, হাজ্জাজ বিন আবূ উসমান, ইয়াহইয়া বিন আবূ কাসীর, ইকরামাহ, ইবনু আব্বাস ও আবূ হুরায়রাহ (রাঃ) , (ইকরিমাহ বলেন) , আমি এ হাদীস বিন আব্বাস (রাঃ) ও আবূ হুরায়রাহ (রাঃ) -র নিকট বর্ণনা করলে তারা উভয়ে বলেন, তিনি (হাজ্জাজ) সত্য বলেছেন। [৩০৭৭] তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة حدثنا يحيى بن سعيد وابن علية عن حجاج بن أبي عثمان حدثني يحيى بن أبي كثير حدثني عكرمة حدثني الحجاج بن عمرو الأنصاري قال سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول من كسر أو عرج فقد حل وعليه حجة أخرى فحدثت به ابن عباس وأبا هريرة فقالا صدق
সুনানে ইবনে মাজাহ ৩০৭৮
حدثنا سلمة بن شبيب حدثنا عبد الرزاق أنبأنا معمر عن يحيى بن أبي كثير عن عكرمة عن عبد الله بن رافع مولى أم سلمة قال سألت الحجاج بن عمرو عن حبس المحرم فقال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم من كسر أو مرض أو عرج فقد حل وعليه الحج من قابل قال عكرمة فحدثت به ابن عباس وأبا هريرة فقالا صدق قال عبد الرزاق فوجدته في جزء هشام صاحب الدستوائي فأتيت به معمرا فقرأ علي أو قرأت عليه
আল-হাজ্জাজ বিন আমর (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কোন ব্যক্তির হাড় ভেঙ্গে গেলে বা সে পঙ্গু হয়ে গেলে বা রোগাক্রান্ত হয়ে পড়লে অথবা বাধাগ্রস্ত হলে সে হালাল হয়ে যাবে। তাকে পরবর্তী বছর হজ্জ করতে হবে। সালামাহ বিন শাবীব, আবদুর রায্যাক, মা’মার, ইয়াহইয়া বিন আবূ কাসীর, ইকরিমাহ, ইবনু আব্বাস ও আবূ হুরায়রাহ (রাঃ) , (ইকরিমাহ) বলেন, আমি এ হাদীস ইবনু আব্বাস ও আবূ হুরায়রাহ (রাঃ) এর নিকট বর্ণনা করলে তারা উভয়ে বলেন, তিনি সত্য বলেছেন। আবদুর রাযযাক বলেন, আমি এ হাদীস হিশাম আদ-দাসতাওয়াঈর কিতাবে লিপিবদ্ধ পেয়েছে। আমি তা নিয়ে মামার-এর নিকট এলে তিনি আমার সামনে তা পাঠ করেন অথবা আমি তার সামনে তা পাঠ করি। [৩০৭৮] তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
আল-হাজ্জাজ বিন আমর (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ কোন ব্যক্তির হাড় ভেঙ্গে গেলে বা সে পঙ্গু হয়ে গেলে বা রোগাক্রান্ত হয়ে পড়লে অথবা বাধাগ্রস্ত হলে সে হালাল হয়ে যাবে। তাকে পরবর্তী বছর হজ্জ করতে হবে। সালামাহ বিন শাবীব, আবদুর রায্যাক, মা’মার, ইয়াহইয়া বিন আবূ কাসীর, ইকরিমাহ, ইবনু আব্বাস ও আবূ হুরায়রাহ (রাঃ) , (ইকরিমাহ) বলেন, আমি এ হাদীস ইবনু আব্বাস ও আবূ হুরায়রাহ (রাঃ) এর নিকট বর্ণনা করলে তারা উভয়ে বলেন, তিনি সত্য বলেছেন। আবদুর রাযযাক বলেন, আমি এ হাদীস হিশাম আদ-দাসতাওয়াঈর কিতাবে লিপিবদ্ধ পেয়েছে। আমি তা নিয়ে মামার-এর নিকট এলে তিনি আমার সামনে তা পাঠ করেন অথবা আমি তার সামনে তা পাঠ করি। [৩০৭৮] তাহকীক আলবানীঃ সহীহ।
حدثنا سلمة بن شبيب حدثنا عبد الرزاق أنبأنا معمر عن يحيى بن أبي كثير عن عكرمة عن عبد الله بن رافع مولى أم سلمة قال سألت الحجاج بن عمرو عن حبس المحرم فقال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم من كسر أو مرض أو عرج فقد حل وعليه الحج من قابل قال عكرمة فحدثت به ابن عباس وأبا هريرة فقالا صدق قال عبد الرزاق فوجدته في جزء هشام صاحب الدستوائي فأتيت به معمرا فقرأ علي أو قرأت عليه
সুনানে ইবনে মাজাহ > বাধাগ্রস্ত হলে তার ফিদ্য়া
সুনানে ইবনে মাজাহ ৩০৮০
حدثنا عبد الرحمن بن إبراهيم، حدثنا عبد الله بن نافع، عن أسامة بن زيد، عن محمد بن كعب، عن كعب بن عجرة، قال أمرني النبي ـ صلى الله عليه وسلم ـ حين آذاني القمل أن أحلق رأسي وأصوم ثلاثة أيام أو أطعم ستة مساكين وقد علم أن ليس عندي ما أنسك .
কা’ব বিন উজরাহ (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
উকুন আমাকে কষ্ট দিতে থাকলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে মাথা কামানোর নির্দেশ দেন এবং তিনি দিন রোযা রাখতে অথবা ছয়জন মিসকীনকে আহার করাতে বলেন। তিনি জানতেন যে আমার নিকট কোরবানী করার মত কিছু ছিলো না। [৩০৮০] তাহকীক আলবানীঃ সহীহ
কা’ব বিন উজরাহ (রাঃ) থেকে বর্নিতঃ
উকুন আমাকে কষ্ট দিতে থাকলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে মাথা কামানোর নির্দেশ দেন এবং তিনি দিন রোযা রাখতে অথবা ছয়জন মিসকীনকে আহার করাতে বলেন। তিনি জানতেন যে আমার নিকট কোরবানী করার মত কিছু ছিলো না। [৩০৮০] তাহকীক আলবানীঃ সহীহ
حدثنا عبد الرحمن بن إبراهيم، حدثنا عبد الله بن نافع، عن أسامة بن زيد، عن محمد بن كعب، عن كعب بن عجرة، قال أمرني النبي ـ صلى الله عليه وسلم ـ حين آذاني القمل أن أحلق رأسي وأصوم ثلاثة أيام أو أطعم ستة مساكين وقد علم أن ليس عندي ما أنسك .
সুনানে ইবনে মাজাহ ৩০৭৯
حدثنا محمد بن بشار، ومحمد بن الوليد، قالا حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن عبد الرحمن بن الأصبهاني، عن عبد الله بن معقل، قال قعدت إلى كعب بن عجرة في المسجد فسألته عن هذه الآية، {ففدية من صيام أو صدقة أو نسك} . قال كعب في أنزلت كان بي أذى من رأسي فحملت إلى رسول الله ـ صلى الله عليه وسلم ـ والقمل يتناثر على وجهي فقال " ما كنت أرى الجهد بلغ منك ما أرى أتجد شاة " . قلت لا . قال فنزلت هذه الآية {ففدية من صيام أو صدقة أو نسك} . قال فالصوم ثلاثة أيام والصدقة على ستة مساكين لكل مسكين نصف صاع من طعام والنسك شاة .
আবদুল্লাহ থেকে বর্নিতঃ
আমি মসজিদের মধ্যে কা’ব বিন উজরাহ (রাঃ) এর নিকট উপবিষ্ট ছিলাম। আমি তার নিকট নিম্নোক্ত আয়াত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম (অনুবাদ) : “তবে রোযা অথবা সদাকা অথবা কোরবানীর মাধ্যমে ফিদ্য়া দিবে” (সূরা বাকারাঃ ১৯৬) কা’ব (রাঃ) বলেন, এ আয়াত আমার সম্পর্কে নাযিল হয়েছিল। আমার মাথার অসুখ ছিল। আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট নিয়ে যাওয়া হলো। উকুন আমার মুখমণ্ডলে ছড়িয়েছিল। তখন তিনি বলেনঃ আমি তোমাকে যে কষ্ট ভোগ করতে দেখছি তেমনটি আর কখনও দেখিনি। তুমি কি একট বকরী সংগ্রহ করতে পারবে? আমি বললাম, না। রাবী বলেন, তখন এ আয়াত নাযিল হলোঃ “তবে রোযা অথবা সদাকা অথবা কোরবানীর মাধ্যমে ফিদ্য়া দিবে”। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তিন দিন রোযা রাখতে হবে, আর সদাকার ক্ষেত্রে ছয়জন মিসকীনকে খাদ্যদ্রব্য দিতে হবে, মাথাপিছা অর্ধ সা’ (এক কেজি দু’শ পঞ্চাশ গ্রাম) এবং কোরবানীর ক্ষেত্রে একটি বকরী। [৩০৭৯]
আবদুল্লাহ থেকে বর্নিতঃ
আমি মসজিদের মধ্যে কা’ব বিন উজরাহ (রাঃ) এর নিকট উপবিষ্ট ছিলাম। আমি তার নিকট নিম্নোক্ত আয়াত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম (অনুবাদ) : “তবে রোযা অথবা সদাকা অথবা কোরবানীর মাধ্যমে ফিদ্য়া দিবে” (সূরা বাকারাঃ ১৯৬) কা’ব (রাঃ) বলেন, এ আয়াত আমার সম্পর্কে নাযিল হয়েছিল। আমার মাথার অসুখ ছিল। আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট নিয়ে যাওয়া হলো। উকুন আমার মুখমণ্ডলে ছড়িয়েছিল। তখন তিনি বলেনঃ আমি তোমাকে যে কষ্ট ভোগ করতে দেখছি তেমনটি আর কখনও দেখিনি। তুমি কি একট বকরী সংগ্রহ করতে পারবে? আমি বললাম, না। রাবী বলেন, তখন এ আয়াত নাযিল হলোঃ “তবে রোযা অথবা সদাকা অথবা কোরবানীর মাধ্যমে ফিদ্য়া দিবে”। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ তিন দিন রোযা রাখতে হবে, আর সদাকার ক্ষেত্রে ছয়জন মিসকীনকে খাদ্যদ্রব্য দিতে হবে, মাথাপিছা অর্ধ সা’ (এক কেজি দু’শ পঞ্চাশ গ্রাম) এবং কোরবানীর ক্ষেত্রে একটি বকরী। [৩০৭৯]
حدثنا محمد بن بشار، ومحمد بن الوليد، قالا حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن عبد الرحمن بن الأصبهاني، عن عبد الله بن معقل، قال قعدت إلى كعب بن عجرة في المسجد فسألته عن هذه الآية، {ففدية من صيام أو صدقة أو نسك} . قال كعب في أنزلت كان بي أذى من رأسي فحملت إلى رسول الله ـ صلى الله عليه وسلم ـ والقمل يتناثر على وجهي فقال " ما كنت أرى الجهد بلغ منك ما أرى أتجد شاة " . قلت لا . قال فنزلت هذه الآية {ففدية من صيام أو صدقة أو نسك} . قال فالصوم ثلاثة أيام والصدقة على ستة مساكين لكل مسكين نصف صاع من طعام والنسك شاة .